पंचांग कैलेंडर का महत्व और देवी-देवताओं की तस्वीरों की समस्या

पंचांग कैलेंडर हिंदू धर्म का एक अनमोल रत्न है। यह न केवल तिथि, वार, नक्षत्र और योग बताता है, बल्कि हमारे प्रमुख त्योहारों, व्रतों और विशेष दिनों की जानकारी भी देता है। लेकिन कई पंचांग कैलेंडरों में भगवान की तस्वीरें छपी होने से समस्या हो जाती है। कूड़े या नाली में फेंकने पर अपवित्र व्यवहार लगता है, जो अपराध जैसा प्रतीत होता है। परम पूज्य प्रेमानंद महाराज जी ने इस पर सख्त चेतावनी दी है और प्रकाशकों से अपील की है कि कैलेंडरों में भगवान के चित्र न छापें। इस लेख में हम आसान शब्दों में इस विषय को विस्तार से समझेंगे।


पंचांग कैलेंडर क्या है और इसका लाभ क्यों?

पंचांग शब्द संस्कृत के पांच अंगों से बना है – तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। यह हिंदू पंचांग कैलेंडर चंद्रमा और सूर्य की गति पर आधारित होता है। एक साधारण कैलेंडर तो केवल तारीखें बताता है, लेकिन पंचांग हमें धार्मिक जीवन जीने का पूरा मार्गदर्शन देता है।

सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे हम हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहार जान लेते हैं। जैसे दीपावली, होली, नवरात्रि, दशहरा, शिवरात्रि आदि। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति पंचांग देखे तो पता चल जाता है कि अमुक तिथि को एकादशी व्रत है या सोमवार को शिवजी का व्रत रखना चाहिए। विशेष दिवस जैसे अक्षय तृतीया, गुरु पुष्य योग या राहु काल भी इससे पता चल जाते हैं। किसान भाई खेती के शुभ मुहूर्त निकालते हैं, विवाह के लिए अच्छा दिन चुनते हैं।

पंचांग से हमारी संस्कृति जीवित रहती है। बच्चे-बूढ़े सभी इसे देखकर धार्मिक कार्य करते हैं। परम पूज्य प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं कि पंचांग हमारा धार्मिक कंपास है, जो हमें सही दिशा दिखाता है। बिना इसके हम भटक सकते हैं। आजकल डिजिटल पंचांग भी आ गए हैं, लेकिन पारंपरिक पंचांग की मिठास अलग है।

हिंदू त्योहारों और विशेष दिनों की जानकारी का महत्व

हिंदू धर्म में त्योहार जीवन का हिस्सा हैं। पंचांग से हम जानते हैं कि चैत्र मास में नवरात्रि कब शुरू होगी। रामनवमी, जन्माष्टमी जैसे पर्व कब मनाने हैं। व्रत-उपवास की तिथियां साफ बताई जाती हैं। जैसे निर्जला एकादशी, करवा चौथ आदि।

विशेष दिवस जैसे अमावस्या, पौर्णिमा पर श्राद्ध या पूजा का समय मिलता है। ज्योतिषीय योग जैसे रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग से शुभ कार्य होते हैं। महिलाएं सौभाग्यवती भव के लिए व्रत रखती हैं। पंचांग से दान-पुण्य के दिन पता चलते हैं। नरक चतुर्दशी, भाई दूज सब कुछ व्यवस्थित रहता है।

बिना पंचांग के हम आधुनिक कैलेंडर पर निर्भर हो जाते हैं, जो हिंदू परंपराओं को भूलने का कारण बनता है। पंचांग हमें अपनी जड़ों से जोड़े रखता है। प्रेमानंद महाराज जी की अपील है कि हर घर में पंचांग हो, लेकिन साफ-सुथरा।

पंचांग कैलेंडरों में देवी-देवताओं की तस्वीरों की समस्या

अब आते हैं मुख्य समस्या पर। कई प्रकाशक पंचांग कैलेंडरों को आकर्षक बनाने के लिए भगवान राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा, गणेश जी की रंगीन तस्वीरें छापते हैं। साल भर यह दीवार पर टंगा रहता है। लेकिन साल खत्म होने पर क्या करें? फेंक दें तो कूड़े-नाली में भगवान का चित्र जाना अपमान जैसा लगता है।

यह अपवित्र व्यवहार है। हिंदू मान्यता में भगवान का चित्र या मूर्ति पवित्र है। इसे कुत्तों या गंदगी के बीच फेंकना महापाप माना जाता है। लोग परेशान हो जाते हैं। कोई जलाकर विसर्जन करें तो धुआं निकले, कोई गंगा में बहाएं तो प्लास्टिक प्रदूषण हो। घर में रखें तो जगह न भरे। डिस्पोज करने का समय आते ही दुविधा हो जाती है।

प्रकाशक तो कमाई के चक्कर में चित्र छापते हैं, लेकिन भक्तों का क्या? बच्चे अनजाने में खेल-खेल में फाड़ दें तो? यह समस्या हर साल लाखों घरों में होती है। प्रेमानंद महाराज जी ने इसे देखा और सख्त चेतावनी दी।

परम पूज्य प्रेमानंद महाराज जी की चेतावनी और अपील

परम पूज्य प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज हिंदू धर्म के महान संत हैं। वे भक्ति, संस्कृति और परंपराओं के रक्षक हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि पंचांग कैलेंडरों में भगवान के चित्र न छापे जाएं। उनकी चेतावनी है – “यह भगवान का अपमान है। चित्र छापना व्यापार है, लेकिन भक्तों को अपराध में न डालें।”

महाराज जी कहते हैं कि भगवान को चित्रों में सीमित न करें। वे सर्वव्यापी हैं। पंचांग का काम ज्योतिषीय जानकारी देना है, चित्रों से सजाना नहीं। प्रकाशकों से अपील है – सादा पंचांग छापें, जिसमें त्योहार, तिथियां, मुहूर्त हों। चित्र न डालें तो डिस्पोज की कोई समस्या न रहेगी।

उनकी यह बात सोशल मीडिया, प्रवचनों में फैली। लाखों भक्तों ने समर्थन किया। महाराज जी ने कहा, “कैलेंडर फेंकना पड़ता है, भगवान को फेंकोगे कैसे?” उनकी अपील हिंदू समाज के लिए दिशानिर्देश है।

धार्मिक दृष्टि से चित्रों का अपवित्र होना क्यों पाप है?

हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि भगवान का रूप, नाम, चित्र सब पवित्र हैं। गरुड़ पुराण में मूर्ति पूजा के नियम हैं। चित्र को अग्नि, जल या भूमि में विसर्जित करने के सख्त नियम हैं। लेकिन कैलेंडर का चित्र कागज का होता है, प्लास्टिक कोटिंग वाला। इसे जलाना मुश्किल, बहाना प्रदूषण।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं – “मां तु वेषभाजं विद्धि” अर्थात मुझे रूपों में जानो, लेकिन अपमान मत करो। मनुस्मृति में मूर्ति भंग का प्रायश्चित बताया गया है। कैलेंडर चित्र को कूड़े में फेंकना वैसा ही है। इससे वात्सल्य भाव, श्रद्धा क्षीण होती है। बच्चे गलत सीखते हैं।

संतों की परंपरा में चित्र पूजा होती है, लेकिन स्थायी नहीं। कैलेंडर अस्थायी है। इसलिए चित्र न छापना ही श्रेयस्कर।

प्रकाशकों की भूमिका और व्यापारिक लोभ

पंचांग प्रकाशक मुख्य दोषी हैं। वे जानते हैं कि चित्रों से कैलेंडर ज्यादा बिकते हैं। बाजार में प्रतिस्पर्धा है – रंग-बिरंगे चित्र, बड़े-बड़े भगवान। एक कैलेंडर 50-100 रुपये का बिकता है, लाखों छपते हैं। लाभ कमाने के लिए धर्म का व्यापार।

लेकिन क्या लाभ अस्थायी है? प्रेमानंद महाराज जी कहते हैं – “धर्म का सौदा मत करो। सादा पंचांग छापो, भक्त आशीर्वाद देंगे।” कई प्रकाशक जैसे गीता प्रेस सादे पंचांग छापते हैं, वे सफल हैं। अन्य को सुधारना चाहिए। सरकार या हिंदू संगठन नियम बना सकते हैं।

सादा पंचांग के फायदे

सादा पंचांग बिना चित्रों वाला सबसे अच्छा। इससे कोई डिस्पोज समस्या नहीं। साल खत्म होने पर आराम से रख दें या रद्दी में डाल दें। मुख्य जानकारी बरकरार रहती है। बच्चे त्योहार सीखेंगे, बिना अपराध बोध के।

आजकल पेपरलेस पंचांग आ रहे हैं – ऐप्स, वेबसाइट। लेकिन पारंपरिक पंचांग की जगह अलग। सादा होने से पवित्र रहता है। महाराज जी की अपील मानें तो समाज सुधरेगा।

समाधान के उपाय: क्या करें भक्त और प्रकाशक?

भक्तों के लिए उपाय:

  • सादा पंचांग ही खरीदें। चित्र वाले न लें।
  • पुराना कैलेंडर जलाकर विसर्जित करें, लेकिन सावधानी से।
  • डिजिटल पंचांग इस्तेमाल करें।
  • बच्चों को सिखाएं कि भगवान चित्रों में नहीं, हृदय में हैं।

प्रकाशकों के लिए:

  • चित्र बंद करें। त्योहारों की सूची, मुहूर्त दें।
  • महाराज जी की अपील मानें।
  • गुणवत्ता बढ़ाएं, सस्ता रखें।

समाज के लिए:

  • जागरूकता फैलाएं। सोशल मीडिया पर शेयर करें।
  • हिंदू संगठन अभियान चलाएं।

प्रेमानंद महाराज जी का जीवन और संदेश

परम पूज्य प्रेमानंद महाराज जी का जन्म उत्तर प्रदेश में हुआ। वे राधावल्लभ संप्रदाय के अनुयायी हैं। वृंदावन में रहते हैं। उनके प्रवचन लाखों को प्रेरित करते हैं। वे कहते हैं – “भक्ति सादगी में है, दिखावे में नहीं।” उनकी चेतावनी पंचांग सुधार का माध्यम बनेगी।

उनके आश्रम में सादा पंचांग वितरित होता है। भक्तों को सिखाते हैं कि धर्म सरल हो।

निष्कर्ष: सादा पंचांग अपनाएं

पंचांग कैलेंडर हिंदू जीवन का आधार है। त्योहार, व्रत, मुहूर्त इससे मिलते हैं। लेकिन चित्रों से समस्या है। प्रेमानंद महाराज जी की चेतावनी मानें। प्रकाशक सुधारें, भक्त जागरूक हों। सादा पंचांग से कोई अपराध नहीं। आइए संकल्प लें – अगले साल सादा पंचांग ही लेंगे। जय श्री राधे, जय श्री राम, जय श्री राम!

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