चिंताओं से मुक्त कैसे हों?

चिंताओं से मुक्त होने पर इस प्रवचन में महाराज जी की मुख्य बात सिर्फ एक है – नाम जप और भगवान पर भरोसा जीवन की सारी चिंताओं को जला देते हैं।

नीचे पहले प्रश्न (“चिंताओं से मुक्त कैसे हों?”) पर कही गई बातों को बिंदुवार, विस्तार से एक लेख के रूप में रखा है।


1. चिंता से चिंतन की ओर: मूल सूत्र

  • प्रश्न यह था कि आज पूरा संसार किसी न किसी कारण चिंताग्रस्त है, ऐसी चिंताओं को चिंतन में कैसे बदला जाए।
  • महाराज जी का पहला वाक्य है – जितना नाम जप करोगे, उतनी चिंता नष्ट होगी और उतना चिंतन बढ़ेगा।
  • यहाँ “चिंता” का अर्थ है असुरक्षा, भय, भविष्य की फिक्र; और “चिंतन” का अर्थ है भगवान, नाम और भजन पर मन का टिकना।

महाराज जी यह स्पष्ट करते हैं कि मन खाली नहीं रह सकता – या तो वह संसार की चिंता में लगेगा, या भगवान के चिंतन में। नाम जप वह साधन है जो मन को चिंता से हटाकर चिंतन में स्थिर कर देता है।


2. चिंता के चार मुख्य कारण

महाराज जी चिंता के मूल कारणों को बहुत स्पष्ट तरीके से चार वर्गों में रखते हैं।

  1. शरीर की चिंता
    • सबसे पहली चिंता का विषय शरीर है – बीमारी, बढ़ती उम्र, दिखावट, क्षमता आदि।
    • साधक का बहुत समय इसी में निकल जाता है कि मेरा शरीर ठीक रहे, मुझे कोई रोग न हो।
  2. शरीर के भोगों की चिंता
    • दूसरी चिंता शरीर के सुख-सुविधाओं को लेकर होती है – अच्छा खाना, आराम, आरामदायक जीवन, सुविधाएँ।
    • भोग-सुख की चाह बढ़ती जाती है और उसके साथ-साथ डर भी बढ़ता है कि कहीं ये सब छिन न जाए।
  3. शरीर के संबंधियों की चिंता
    • तीसरी चिंता शरीर के संबंधियों की है – पति/पत्नी, बच्चे, माता-पिता, मित्र, समाज में प्रतिष्ठा।
    • हम बार-बार सोचते रहते हैं कि इनके साथ कुछ न हो जाए, ये नाराज न हो जाएँ, इनका भविष्य क्या होगा।
  4. इन सबके पालन-पोषण के लिए धन की चिंता
    • चौथी चिंता धन की है – नौकरी, व्यापार, आमदनी, भविष्य की आर्थिक सुरक्षा।
    • धन को इन सबका आधार मानकर मन हर समय गणना, डर और तुलना में लगा रहता है।

महाराज जी यही बताते हैं कि लगभग हर व्यक्ति की चिंता इन्हीं चार घेरे में घूमती रहती है, और मन कभी शांत नहीं होता।


3. नाम जप: चिंताओं को मिटाने वाली औषधि

  • महाराज जी कहते हैं – हम आपसे सच्ची कहते हैं, यदि आप नाम जप करोगे, तो इन सब चिंताओं को भगवान मिटा देंगे।
  • परिणाम यह होगा कि न अर्थ (धन) की चिंता रहेगी, न शरीर की चिंता, न परिवार की, न परलोक की – कोई चिंता छू भी नहीं पाएगी, सिर्फ आनंद ही आनंद बचेगा।

यहाँ दो बातें स्पष्ट हैं:

  1. नाम जप सिर्फ मन को बहलाने का उपाय नहीं, ईश्वरीय वादा है
    • वे कहते हैं कि हम यूँ ही “हर सवाल का उत्तर नाम जप में घसीट” नहीं रहे, बल्कि अनुभूति से कह रहे हैं।
    • चुनौती की तरह कहते हैं: जप करके देखो, यदि चिंताएँ न मिटें तो हमें जीवन भर कहना।
  2. नाम जप का सीधा संबंध भगवान की कृपा से
    • भगवान की स्मृति और नाम में शक्ति है कि वह चिंता की जड़ – अहंकार, आसक्ति और भय – पर प्रहार करती है।
    • जैसे दवा शरीर के रोग पर काम करती है, वैसे नाम मन के “चिंता-रोग” पर काम करता है।

4. “ऐसा कैसे हो सकता है?” – शंका का समाधान

बहुत लोग सोचते हैं – “सिर्फ नाम जप से इतनी बड़ी-बड़ी चिंताएँ कैसे मिट जाएँगी?”

  • महाराज जी कहते हैं: आपको ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि आपने अभी तक भगवान का आश्रय लिया ही नहीं, न ही नाम जप को गंभीरता से अपनाया है।
  • वे याद दिलाते हैं – जिसने अनंत ब्रह्मांडों की रचना पलक झपकते कर दी, उसे तुम अपनी छोटी-सी कामना पूरी करने में असमर्थ मानते हो? वह आपकी छोटी-सी चिंता दूर नहीं कर सकता? यह अविश्वास का परिणाम है।

यहाँ उनका तर्क है:

  • जिस परमात्मा ने अनंत ब्रह्मांड बनाए, उसे हमारे आर्थिक, पारिवारिक या मानसिक मुद्दे हल करने में असमर्थ मानना स्वयं एक अज्ञान है।
  • समस्या यह नहीं कि भगवान सक्षम नहीं हैं, समस्या यह है कि हमारा भरोसा नहीं है और भजन नहीं है, इसलिए हम हमेशा चिंतित रहते हैं।

5. भरोसा और भजन: निश्चिंत जीवन का आधार

महाराज जी बार-बार दो शब्द लेते हैं – “भरोसा” और “भजन”।

  • वे कहते हैं: भरोसा और भजन हो तो हर स्थिति में निश्चिंतता ही निश्चिंतता है।
  • इसका अर्थ यह है कि परिस्थितियाँ बाहरी तौर पर बदलें न बदलें, भीतर की स्थिति बदल जाती है – मन निश्चिंत हो जाता है।

कुछ बातें जो वे संकेत रूप में बताते हैं:

  • निश्चिंतता “समस्या शून्य जीवन” से नहीं आती, बल्कि “भगवान पर भरोसा और नाम जप” से आती है।
  • भरोसा का मतलब है – “भगवान मेरे हैं, मैं भगवान का हूँ, वह मेरा भरण-पोषण करने वाले, रक्षक और स्वामी हैं।”
  • जब भरोसा टूटता है, तो मन हर घटना को अकेले झेलने लगता है, वहीं से चिंता, भय और अवसाद शुरू होते हैं।

6. भगवान का आश्रय: वादा और चुनौती

महाराज जी बहुत स्पष्ट और दृढ़ स्वर में एक “वादा” रखते हैं।

  • वे कहते हैं: भगवान का आश्रय ले लो, सब चिंताएँ नष्ट होंगी – यह वादा है।
  • वे यह भी कहते हैं: आश्रय लेकर नाम जप करो, यदि चिंताएँ मिटें नहीं, तो मुझे कहना।

यह कथन साधक के लिए दो प्रकार से महत्वपूर्ण है:

  1. आश्रय की परिभाषा
    • सिर्फ माला घुमाना आश्रय नहीं है; मन से मान लेना कि “मैं अकेला नहीं हूँ, मेरा एक स्वामी है।”
    • अपने निर्णय, भय और संघर्षों में भीतर से भगवान की शरण का भाव रखना – “हे प्रभु, आप जानो, मैं आपके चरणों में छोड़ता हूँ।”
  2. निरंतर अभ्यास की अपेक्षा
    • यह कोई एक दिन, एक सप्ताह का प्रयोग नहीं है, बल्कि जीवन भर की साधना है।
    • वे कहते हैं कि जब तक पाप नष्ट नहीं होते, तब तक पूरा अनुभव तुरंत नहीं आता, लेकिन जप करते-करते एक दिन ऐसा आता है जब साधक “निहाल और आनंद मगन” हो जाता है।

7. चिंता, भय, शोक और डिप्रेशन का आध्यात्मिक कारण

महाराज जी आज के समय की एक बड़ी समस्या को शब्द देते हैं – “डिप्रेशन” और “नेगेटिव विचार”।

  • वे कहते हैं: जब भरोसा संसार पर रहता है, कर्म पाप के होते हैं, भजन होता नहीं, तो चिंता, भय, शोक, डिप्रेशन निश्चित रूप से आएँगे।
  • इसका मतलब है कि मानसिक अशांति का मूल कारण केवल बाहरी घटनाएँ नहीं, बल्कि भीतर का अविश्वास और भगवान से दूर होना है।

इसके विपरीत:

  • यदि भजन है, तो पॉजिटिव विचारों का ऐसा खेल चलता है कि दुख और विपत्ति में भी एक अद्भुत आनंद बना रहता है।
  • यह “मानसिक ब्रह्मचर्य” जैसा है – मन को भगवान में स्थिर करने से वह नकारात्मकता के प्रवाह से स्वतः हट जाता है।

8. दुख और विपत्ति में भी आनंद: शरणागति का चमत्कार

यह बात सामान्य बुद्धि से सबसे कठिन लगती है कि दुख और विपत्ति में भी आनंद कैसे हो सकता है।

  • महाराज जी कहते हैं: यही तो परमात्मा की शरण का चमत्कार है कि हर दुख और हर विपत्ति में भी एक अद्भुत आनंद और अद्भुत सुख अनुभव होता है।
  • वे कहते हैं कि उस आनंद की आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

इसका आध्यात्मिक अर्थ:

  • जब मन भगवान की शरण में होता है, तो दुख “ईश्वरीय प्रसाद” जैसा स्वीकार होने लगता है – “यह भी मेरे परमप्रिय के हाथ से आया हुआ प्रसाद है।”
  • दुख की तीव्रता के भीतर भी एक गहरी शांति और प्रेम का रस छिपा होता है, जिसे केवल वही व्यक्ति अनुभव करता है जो भजन और भरोसे के साथ जी रहा हो।

9. नाम जप को “औषधि” की तरह स्वीकार करो

महाराज जी एक सुंदर उपमा देते हैं।

  • जैसे हम डॉक्टर की दी हुई औषधि रोग निवृत्ति के लिए बिना ज्यादा प्रश्न किए खा लेते हैं, वैसे ही समस्त दुखों के नाश के लिए संत की बताई औषधि – नाम जप – को स्वीकार करना चाहिए।
  • वे आग्रह करते हैं – “राधा राधा रटो, रट के देख लो, फिर कुछ समय बाद स्वयं बताना कि जीवन कैसा हो गया।”

इस उपमा से यह बातें निकलती हैं:

  • साधक को हर बात में तर्क नहीं लगाना चाहिए; जहाँ विश्वसनीय संत है और उनका उपदेश शास्त्र-सम्मत है, उसे आज़माकर देखना चाहिए।
  • औषधि का फल तभी मिलता है जब उसे नियमितता और विश्वास से लिया जाए – बीच में छोड़ देने से या शंका में खाकर भी मन न लगाने से लाभ अधूरा रह जाता है।

10. पाप नष्ट होने तक धैर्य रखो

  • महाराज जी कहते हैं कि जब तक पाप नष्ट नहीं होते, तब तक साधक को पूर्ण अनुभव नहीं होता, बस थोड़ा-बहुत ही महसूस होता है।
  • जहाँ पाप नष्ट हो जाते हैं, वहाँ साधक “निहाल” और “आनंद मगन” हो जाता है।

इसका मतलब:

  • प्रारब्ध और संचित कर्मों की जो मोटी परत है, वह तुरंत हटती नहीं, नाम जप से धीरे-धीरे पिघलती है।
  • साधक को यह समझकर चलना चाहिए कि शुरुआत में भी यदि थोड़ी शांति, थोड़ी सकारात्मकता महसूस हो रही हो, तो यह मार्ग सही है – आगे जाकर यही अनुभव गहरा होता जाएगा।

11. व्यावहारिक जीवन में लागू करने के कदम

महाराज जी की बातों को साधक अपने रोज़मर्रा जीवन में कुछ सरल चरणों में उतार सकता है:

  1. दैनिक नाम जप का संकल्प
    • कम से कम सुबह-शाम कुछ निश्चित समय “राधा नाम” या अपने गुरुदेव द्वारा दिए गए मंत्र का जप करें।
    • शुरुआत में गिनती कम भी हो तो चलेगा, पर नियमितता और श्रद्धा न टूटे।
  2. चिंता आते ही उसे “सिग्नल” मानें
    • जैसे ही चिंता का विचार उठे, तुरंत भीतर से नाम जप शुरू करें।
    • मन को बार-बार याद दिलाएँ: “यह चिंता मेरी नहीं, इसे भी प्रभु के चरणों में अर्पित करता/करती हूँ।”
  3. भगवान पर भरोसा का अभ्यास
    • मन ही मन बार-बार यह भाव करें – “हे प्रभु, आपने अनंत ब्रह्मांड रचे हैं, मेरा छोटा-सा जीवन और समस्या आपके लिए क्या है? आप ही संभालिए।”
    • घटनाओं को “संयोग” न मानकर “ईश्वरीय व्यवस्था” मानने का अभ्यास करें।
  4. संसार पर भरोसा कम करो, भगवान पर भरोसा बढ़ाओ
    • महाराज जी कहते हैं: तुम भरोसा संसार का रखते हो, कर्म पाप के करते हो, भजन करते नहीं, तो चिंता और डिप्रेशन आएँगे ही।
    • इसका व्यावहारिक तात्पर्य है – हर योजना, निर्णय और डर के बीच एक क्षण रुककर पूछना: “मैं किस पर अधिक भरोसा कर रहा हूँ – बैंक बैलेंस और लोगों पर, या भगवान पर?”
  5. संत वचन को औषधि की तरह मानो
    • जैसे डॉक्टर की दवा को बिना बहस के लेते हैं, वैसे ही गुरु-संत की आज्ञा – नाम जप, सत्संग, शरणागति – को अपनाएँ।
    • अपनी बुद्धि की सीमाओं को स्वीकार करके संत-बुद्धि पर भरोसा करना भी चिंता-त्याग का बड़ा साधन है।

12. चिंतामुक्त जीवन की पहचान

महाराज जी की बातों के आधार पर, एक सच्चे अर्थ में चिंतामुक्त साधक की कुछ पहचानें समझ में आती हैं:

  • परिस्थितियाँ बदलें न बदलें, उसके भीतर एक स्थाई निश्चिंतता रहती है।
  • दुख, बीमारी या आर्थिक कठिनाई में भी उसके भीतर कहीं न कहीं अद्भुत आनंद और एक तरह की प्रसन्नता बनी रहती है।
  • उसका मन स्वाभाविक रूप से बार-बार नाम पर लौट आता है, जैसे सांस अपने आप चलती है, वैसे नाम उसके जीवन में धड़कता रहता है।
  • वह संसार पर कम, भगवान पर ज्यादा भरोसा करता है; निर्णय लेते समय भी उसकी पहली याद भगवान के चरण होते हैं, न कि केवल गणित और डर।

13. निष्कर्ष: दो ही बातों को पकड़ लो

पूरे उत्तर को यदि एक सूत्र में बाँधा जाए, तो महाराज जी की बात दो ही शब्दों में है – भरोसा और भजन

  • नाम जप करो – जितना जप बढ़ाओगे, उतनी चिंता घटेगी और भगवान का चिंतन बढ़ेगा।
  • भगवान पर भरोसा रखो – जिसने अनंत ब्रह्मांडों की रचना की, वह तुम्हारी छोटी-छोटी चिंताओं को दूर करने में असमर्थ नहीं है; समस्या सिर्फ यह है कि हमने उन्हें भुला दिया है।

इन दो बातों पर सच्चे मन से चलना शुरू कर दो, तो महाराज जी के शब्दों में – “नाम जप करो, निश्चिंत हो जाओ, फिर देखो तुम्हारा जीवन कितना आनंदमय हो जाएगा।”

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