मूल बात यह है कि मोह छोड़े बिना भी नहीं, बल्कि मोह छोड़ कर ही बच्चों का पालन‑पोषण अधिक शुद्ध, सुरक्षित और भगवत मार्ग पर हो सकता है। नीचे महाराज जी की बातों को आसान भाषा में, बिन्दुवार और लगभग 2000 शब्दों के विस्तार से समझाया गया है।
1. प्रश्न क्या है और हमारी सामान्य उलझन
बहुत से गृहस्थों के मन में यही शंका उठती है –
“अगर हम मोह छोड़ देंगे, तो बच्चों से लगाव कैसे रहेगा, उनका पालन‑पोषण कैसे होगा, परिवार कैसे चलेगा?”
सवाल के पीछे छिपा डर यह है कि मोह ही हमें कमाने‑धमाने, बच्चों के लिए संघर्ष करने और परिवार को संभालने की शक्ति देता है।
महाराज जी स्पष्ट करते हैं कि यह धारणा भ्रम है; यह सोचना कि “मोह नहीं होगा तो बच्चे पलेंगे नहीं”, वास्तविकता नहीं, मन की ग़लत मान्यता है।
वे कहते हैं – “जो तुम्हें लग रहा है कि बिना मोह के हम अपने बच्चों का पालन नहीं कर सकते, ये तुम्हारा भ्रम है।”
2. मोह और प्रेम में मूल अंतर
महाराज जी सबसे पहले “मोह” और “प्रेम” का अंतर समझाते हैं, क्योंकि यहीं से सारी उलझन सुलझती है।
- मोह मलिन है, प्रेम निर्मल है
- “मोह मलिन होता है, प्रेम निर्मल होता है।”
- मोह में स्वार्थ, भय, असुरक्षा, ‘ये मेरा है’ की जकड़ और अग्यानता रहती है।
- प्रेम में पवित्रता, स्वीकार, समर्पण और भगवत भाव रहता है।
- मोह में अज्ञान, प्रेम में ज्ञान
- महाराज जी कहते हैं – “मोह में तो अज्ञानता है, प्रेम में ज्ञान है।”
- मोह हमें बंधन में बाँधता है, प्रेम हमें और सामने वाले दोनों को ऊँचा उठाता है।
- मोह में हम शरीर को सब कुछ मान लेते हैं, प्रेम में हम भीतर बैठे भगवान को देखते हैं।
- मोह ‘अपना‑अपना’ का खेल, प्रेम सबमें भगवान को देखता है
- मोह: “ये मेरा बच्चा, मेरी पत्नी, मेरे माता‑पिता” – इसमें ‘मैं’ और ‘मेरा’ की पकड़ बहुत मजबूत रहती है।
- प्रेम: सबको ईश्वर का रूप मानकर, सबमें एक ही परमात्मा को देखता है।
इसलिए महाराज जी बार‑बार यह बिंदु पकड़ा रहे हैं कि असली ताकत मोह नहीं, बल्कि शुद्ध प्रेम है।
3. बच्चों के रूप में भगवान को देखने का भाव
अब मुख्य प्रश्न – “बिना मोह के बच्चों का पालन कैसे होगा?” – इसका सीधा समाधान महाराज जी एक ही सूत्र में देते हैं:
बच्चों, पत्नी, माता‑पिता – सबमें भगवान का दर्शन करने का भाव।
- “मेरे भगवान मेरे बच्चे के रूप में आए हैं”
- महाराज जी कहते हैं – “यदि हम अपने बच्चे से प्रेम करें कि मेरे भगवान मेरे बच्चे के रूप में आए हैं, क्या इससे बढ़कर कोई भाव हो सकता है?”
- सोचिए, जब आप अपने बच्चे को “मेरे भगवान” मानकर देखेंगे, तो क्या उससे बढ़कर कोई सम्मान, कोई सुरक्षा, कोई प्रेम हो सकता है?
- इस भाव में आपका प्रेम बहुत ऊँचा, बहुत पवित्र हो जाता है, जो मोह से कहीं श्रेष्ठ है।
- पत्नी को भगवान का रूप मानना
- “हम अपनी पत्नी को इससे बढ़कर क्या प्यार कर सकते हैं? हम उसे अपना भगवान मानते हैं।”
- इसका अर्थ यह नहीं कि पत्नी को भगवान मानकर अंधभक्ति की जाए; अर्थ यह है कि उसके भीतर भी वही परमात्मा विराजमान है, यह भाव मन में रखकर व्यवहार किया जाए।
- माता‑पिता को देव स्वरूप मानना
- शास्त्र का वचन: “मातृ देवो भव, पितृ देवो भव।”
- माता‑पिता को देवतुल्य मानने का भाव ही हमारे व्यवहार को पवित्र करता है।
- जब हम उन्हें देव स्वरूप मानते हैं, तब मोह नहीं, कृतज्ञता और सेवा भाव प्रकट होता है।
- निष्कर्ष: मोह का नाश, भगवत प्रेम का उदय
- “हम यदि भगवान की भावना करें तो मोह का नाश हो जाए और भगवत प्रेम हो जाए। सब में भगवान विराजमान हैं।”
- जब आप बच्चा, पत्नी, माता‑पिता – सभी को भगवान का ही रूप मानते हैं, तब आपका लगाव मोह से प्रेम में बदल जाता है।
- इस प्रेम में चिंता तो होती है, जिम्मेदारी भी रहती है, लेकिन स्वार्थ और चिपकन नहीं रहती।
4. शरीर का महत्व नहीं, भीतर के भगवान का महत्व
महाराज जी एक अत्यंत गहरा बिंदु समझाते हैं – हम आज भी अनजाने में शरीर से ज्यादा भीतर के तत्व का ही महत्व रखते हैं।
- देह से भगवान चला जाए तो?
- “मेरे बेटे के रूप में कौन आया है? भगवान ही तो आए हैं। भगवान अगर चले जाएं उनके शरीर से तो उस शरीर को हम जला देते हैं, गाड़ देते हैं, शरीर का कोई महत्व नहीं रखते।”
- जब प्राण (अर्थात् चेतना का मूल तत्व) चला जाता है, तो वही प्यारा शरीर जिसे हम सीने से लगाकर रखते थे, अचानक श्मशान या कब्र के योग्य हो जाता है।
- यह बताता है कि असली मूल्य तो भीतर के चैतन्य का था, शरीर का नहीं।
- आज भी आप भगवान का ही महत्व रख रहे हैं
- “तो आज भी आप अनजाने में भगवान का ही महत्व रख रहे हैं।”
- आप सोचते हैं कि आप शरीर से प्रेम कर रहे हैं, पर वास्तव में आप उस जीवनी शक्ति, उस चैतन्य, उस ‘प्राण तत्व’ से प्रेम कर रहे हैं जो भगवान का ही अंश है।
- जब यह समझ स्थायी हो जाए कि बच्चे के शरीर‑रूपी मंदिर में भगवान हैं, तभी प्रेम शुद्ध हो जाता है, और मोह अपने आप पीछे हटता है।
- “अपने बेटे के शरीर रूपी मंदिर में भगवान को देखो”
- “अपने बेटे के शरीर रूपी मंदिर में भगवान को देखो; मेरा परमात्मा इस रूप में आया है और प्यार करो। आपकी भक्ति बढ़ेगी और भगवान की प्राप्ति होगी और बेटे का प्यार भी सुरक्षित रहेगा।”
- यहाँ दो लाभ हैं –
- आपकी भक्ति और भगवत प्राप्ति की दिशा मजबूत होती है।
- और साथ ही बच्चे के प्रति आपका प्रेम स्थिर, संतुलित और सुरक्षित रहता है; आप अंधे मोह में गलती नहीं करते।
5. मोह के बिना भी पालन‑पोषण कैसे सम्भव है?
अब मूल बात – “मोह के बिना परिवार का पोषण कैसे होगा?” – महाराज जी ने इसे सीधे शब्दों में सुलझाया है।
- “ऐसा मत सोचो कि मोह के बिना परिवार का पोषण कैसे होगा”
- महाराज जी कहते हैं – “ऐसा न सोचो कि मोह के बिना परिवार का पोषण कैसे हो सकता है। बहुत अच्छे से हो सकता है, यदि हम भगवत भाव करें तो।”
- यानी, परिवार का पालन‑पोषण मोह से नहीं, भगवत भाव से भी – और अधिक स्वस्थ रूप में – हो सकता है।
- मोह हमें थकाता है, भय देता है; भगवत भाव हमें स्थिरता, प्रेरणा और आनंद देता है।
- पालन‑पोषण का आधार: प्रेम + जिम्मेदारी
- पालना‑पोशना केवल भावुकता नहीं, यह प्रेम और जिम्मेदारी का संतुलन है।
- जब आप बच्चों को भगवान का रूप मानकर पालते हैं, तो
- उनके शरीर, स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कार – सबका ध्यान रखते हैं,
- साथ ही उनके माध्यम से भगवान को प्रसन्न करने का भाव भी रखते हैं।
- मोह नहीं, नाम जप से भाव जागता है
- “भगवत भाव करने के लिए नाम जप जरूरी है। बिना नाम जप के भावना नहीं जागृत होती। भजन से ही भाव की प्राप्ति होती है, खूब नाम जप करो।”
- यानी, मात्र बौद्धिक समझ से काम नहीं चलेगा; हृदय में भगवान का भाव जगाने के लिए सतत नाम जप, भजन, स्मरण की आवश्यकता है।
- जितना अधिक नाम जप होगा, उतनी ही दृढ़ता से प्रेम जागेगा और मोह स्वतः ढीला पड़ेगा।
6. महाराज जी का अपना उदाहरण: बिना मोह के भी गहरा पालन‑पोषण
सवालकर्ता ने ही संकेत दिया कि आपके अनुगत सैकड़ों संत रह रहे हैं, उनका पालन‑पोषण आप कर रहे हैं, क्या यह मोह से हो रहा है? इस पर महाराज जी अत्यंत सुंदर उदाहरण देते हैं।
- “क्या आपको मोह है?”
- प्रश्न उठा कि “महाराज जी, आपके अधीन यहां चार‑पाँच सौ संत रह रहे हैं, आप पालन‑पोषण कर रहे हैं, क्या आपको मोह है?”
- महाराज जी बताते हैं कि जो प्रेम उनके मन में है, वह साधारण गृहस्थ के प्रेम से करोड़ गुना अधिक है।
- “हमको करोड़ गुना प्यार है, हर बच्चा हमारी आत्मा है”
- “हमें जितना एक गृहस्थ अपने परिवार से प्यार करता होगा, उससे करोड़ गुना प्यार है। हर बच्चा हमको हमारे हृदय से हमारी आत्मा है, हर बच्चा‑बच्ची हमारी आत्मा है।”
- यह वाक्य दिखाता है कि बिना ‘मोह’ शब्द के प्रयोग के, बिना ‘मेरा‑तेरा’ की जकड़ के, प्रेम कितना गहरा हो सकता है।
- वे अपने शिष्यों और परिकर को केवल अनुयायी नहीं, अपनी ही आत्मा का अंश मानकर प्रेम करते हैं।
- कछुए का उदाहरण – चिंतन द्वारा पालन
- “जैसे कछुआ अपने अंडे को जल में रहकर चिंतन के द्वारा परिपक्व कर देता है, ऐसे हम चिंतन के द्वारा अपने शिष्य या परिकर… सबका चिंतन करते हैं।”
- कछुआ अंडों के साथ हमेशा शारीरिक रूप से नहीं रहता, पर निरंतर चिंतन से उन्हें सुरक्षित रखता है – यही प्रतीक है।
- महाराज जी कहते हैं कि वे भी चिंतन द्वारा, आंतरिक प्रेम द्वारा, अपने शिष्यों का पालन‑पोषण करते हैं, भले ही बाहरी दुलार कम दिखे।
- प्रकट दुलार नहीं, फिर भी सबको अनुभूति
- “हम कभी पास नहीं बैठते, कभी हम ये नहीं कहते ‘हम तुम्हें प्यार करते हैं’, कभी दुलार नहीं करते, लेकिन जो सत्य मार्ग में लगा है, उसे अनुभव होगा कि मुझसे बहुत प्यार करते हैं।”
- इसका अर्थ है – सच्चा प्रेम केवल शब्दों और बाहरी लाड़‑प्यार से नहीं, भीतर की चिंता, शुभकामना और कल्याण की भावना से व्यक्त होता है।
- यह प्रेम मोह रहित होते हुए भी अत्यंत गहरा और पोषणकारी है।
7. शुद्ध प्रेम क्या है और कैसे सबका पोषण करता है?
- “शुद्ध प्रेम चिंतन के द्वारा होता है”
- महाराज जी कहते हैं – “शुद्ध प्रेम चिंतन के द्वारा होता है। भगवत चिंतन करते हुए भाव में भर के जिसका चिंतन कर लिया, उसका कल्याण हो गया, उसका मंगल हो गया, दुखों का नाश हो गया।”
- जब आप किसी का कल्याण सोचते हुए, भगवान से जोड़कर उसके लिए प्रार्थना, नाम जप, शुभ चिंतन करते हैं, वहीं शुद्ध प्रेम है।
- यह प्रेम सामने वाले के जीवन में परिवर्तन भी ला सकता है, भले ही आप प्रत्यक्ष रूप से कभी उससे मीठी बातें न करें।
- लाखों लोग भी इस प्रेम से जुड़ सकते हैं
- महाराज जी कहते हैं कि देश‑विदेश में लाखों लोग हैं, जिन्हें वे बाहरी रूप से तो पहचानते भी नहीं, लेकिन वे भाव करते हैं और उनका परिवर्तन हो रहा है, क्योंकि आंतरिक चिंतन से परिवर्तन होता है – उसी का नाम प्रेम है।
- यह बताता है कि प्रेम की शक्ति दूरी, समय और संख्या से बंधी नहीं; यह केवल हृदय और भाव से संचालित होती है।
- गुरु और भगवान का अभेद प्रेम
- “वास्तविक प्रेम तो गुरु ही कर सकते हैं। भगवान और गुरु अभेद हैं… वास्तविक प्रेम तो भगवान और गुरुदेव ही करते हैं, और तो सब माया का खेल है।”
- यह प्रेम किसी एक‑दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं होता; वह सर्वव्यापी, निष्पक्ष, सबके लिए समान होता है।
- माता‑पिता, गुरु, महात्मा – जब भगवत भाव से प्रेम करते हैं, तब ही वह प्रेम वास्तव में कल्याणकारी बनता है।
8. सबको अपनी आत्मा मानकर प्रेम करना
- सबको समान प्रेम देना – महात्मा का गुण
- “सबको अपना बच्चा मानकर, सबको अपनी आत्मा मानकर ये तो कोई महात्मा ही प्रेम कर सकता है। सबको बराबर प्रेम देना।”
- जहाँ मोह होता है, वहाँ भीतर फर्क होता है – ‘ये अपना, ये पराया’; पर जहाँ प्रेम होता है, वहाँ सबके प्रति समान शुभभाव होता है।
- किसी के लिए नफरत योग्य भाव नहीं
- महाराज जी कहते हैं – “इनमें से कोई ऐसा नहीं जो हमारे लिए नफरत करने योग्य हो।”
- यह दृष्टि जब माता‑पिता अपने चार भिन्न‑भिन्न स्वभाव वाले पुत्रों पर रखते हैं – महात्मा, गृहस्थ, पागल, दुराचारी – तब भी उनके भीतर वात्सल्य ही रहता है।
- यह उदाहरण दिखाता है कि प्रेम व्यक्ति के गुण‑दोष देखकर नहीं, उसके भीतर बैठे परमात्मा को देखकर किया जाता है।
- प्रभु के दरबार में घोर पापी का भी स्वागत
- “प्रभु के दरबार में घोर पापी का भी स्वागत है… हमारी दृष्टि में ‘मेरा प्रिय आत्मा, मेरा प्रिय प्राण भगवान’ पधारे हैं इस रूप में, इसके अलावा और परिचय नहीं जानते।”
- इसी दृष्टि को यदि हम अपने घर, परिवार, बच्चों, जीवन‑साथी पर लागू कर दें, तो हमारा पूरा संबंध प्रेम में बदल जाता है, मोह धीरे‑धीरे समाप्त हो जाता है।
9. व्यावहारिक जीवन में इस उपदेश को कैसे अपनाएँ?
अंत में, गृहस्थ के लिए कुछ स्पष्ट, सरल व्यवहारिक बिंदु:
- रोज़ मन में यह भाव जपें
- “मेरे बच्चे के रूप में भगवान हैं, मेरी पत्नी में भगवान हैं, मेरे माता‑पिता देव स्वरूप हैं।”
- हर दिन 1–2 मिनट चुपचाप बैठकर परिवार के हर सदस्य को सामने कल्पना करें और भीतर से कहें – “आपमें भगवान हैं, आप भगवान का ही रूप हैं।”
- नाम जप को जीवन का आधार बनाएं
- महाराज जी के अनुसार “बिना नाम जप के भावना नहीं जागृत होती, भजन से ही भाव की प्राप्ति होती है।”
- कोई भी मंत्र, विशेषकर भगवान का नाम – जैसे “राधे राधे”, “राम”, “कृष्ण” – दिन में चलते‑फिरते, काम करते, बच्चों का ध्यान रखते हुए मन ही मन जपते रहें।
- बच्चों के लिए चिंतन और प्रार्थना करें
- मात्र भविष्य की चिंता करने के बजाय, प्रतिदिन 5–10 मिनट बच्चों के लिए विशेष रूप से प्रार्थना करें –
- “हे ठाकुरजी, इन्हें सद्बुद्धि देना, इन्हें अपने मार्ग में लगाए रखना।”
- यह आंतरिक चिंतन ही शुद्ध प्रेम का रूप है, जो उनके जीवन को भीतर से मजबूत करेगा।
- मात्र भविष्य की चिंता करने के बजाय, प्रतिदिन 5–10 मिनट बच्चों के लिए विशेष रूप से प्रार्थना करें –
- बाहरी दुलार और अनुशासन – दोनों संतुलित रखें
- केवल लाड़‑प्यार (मोह) से बच्चे बिगड़ भी सकते हैं, केवल कठोरता से टूट भी सकते हैं।
- प्रेम‑भाव से, भगवान का रूप मानकर, आवश्यक अनुशासन और आवश्यक स्नेह – दोनों का संतुलन रखें।
- गलती हो जाए तो स्वयं को जज न करें, भाव ठीक रखें
- गृहस्थ जीवन में पूर्णता मुश्किल है; कभी‑कभी क्रोध, चिड़चिड़ापन, अधिक लगाव आ भी जाता है।
- महत्वपूर्ण यह है कि आप बार‑बार भीतर लौटकर यह याद करें – “मुझे मोह की नहीं, प्रेम और भगवत भाव की दिशा में बढ़ना है”, और नाम जप से हृदय को शुद्ध करते रहें।
इस प्रकार, महाराज जी का संदेश यह है कि मोह रहित होकर भी बच्चों और परिवार का पालन‑पोषण न केवल संभव है, बल्कि अधिक पवित्र, अधिक सुरक्षित और आध्यात्मिक रूप से लाभदायक है, यदि हम सबमें भगवान को देख कर शुद्ध प्रेम और भगवत चिंतन के साथ जीवन जिएँ।






