विदेशों में गीता प्रेस की किताबें इतनी महंगी क्यों?

गीता प्रेस की किताबों के विदेशों में बहुत ज्यादा दाम पर बिकने की खबर हाल में सामने आई है। इस वजह से गीता प्रेस अब अपने वितरण तंत्र को बदलने और विदेशों में नई व्यवस्था बनाने की योजना पर काम कर रहा है।​

समस्या क्या है?

  • गीता प्रेस की वही किताब जो भारत में कुछ सौ रुपये में मिलती है, विदेशों में कई हज़ार रुपये तक में बेची जा रही है।​
  • कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर 400 रुपये की किताब 3,000 से 10,000 रुपये तक के दाम पर दिखती है।​
  • विदेशों में रहने वाले लोग असली छपा हुआ मूल्य नहीं जान पाते या उनके पास और कोई विकल्प नहीं होता, इसलिए मजबूरी में महँगा खरीदते हैं।​

इतनी महँगाई क्यों हो रही है?

  • विदेशों में गीता प्रेस की कोई मज़बूत और सीधी वितरण व्यवस्था अभी तक नहीं बनी है, इसलिए ज्यादातर बिक्री थर्ड पार्टी सेलर्स के जरिए होती है।​
  • किताबें सीमित मात्रा में पहुँचती हैं, ऊपर से अंतरराष्ट्रीय शिपिंग, टैक्स और वेयरहाउस की लागत भी जुड़ जाती है, जिससे कीमतें बढ़ जाती हैं।​
  • कुछ विक्रेता इन धार्मिक ग्रंथों की मांग और कमी का फायदा उठाकर बहुत ज्यादा मुनाफा जोड़ देते हैं।​

गीता प्रेस की मूल सोच

  • गीता प्रेस की स्थापना 1923 में इसलिए हुई थी कि सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर लोग भी धर्मग्रंथ आसानी से पढ़ सकें।wikipedia+1​
  • गीता प्रेस का उद्देश्य अधिक मुनाफा कमाना नहीं, बल्कि कम दाम पर शास्त्र और धार्मिक पुस्तकों को लोगों तक पहुँचाना है।​
  • यही कारण है कि भारत में हनुमान चालीसा, दुर्गा चालीसा जैसी कई पुस्तकों की कीमत एक रुपये से शुरू होती है और अच्छी, साफ-सुथरी छपाई के साथ दी जाती हैं।​

पहले भारत में क्या किया गया?

  • कुछ साल पहले भारत में भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर गीता प्रेस की किताबें या तो मिलती नहीं थीं या छपे हुए दाम से ज्यादा पर बिकती थीं।​
  • इस समस्या को सुधारने के लिए गीता प्रेस ने लोकप्रिय किताबों की बड़ी मात्रा सीधे ई-कॉमर्स वेयरहाउस तक भेजनी शुरू की।​
  • जब सप्लाई ठीक से और लगातार होने लगी, तो ओवरप्राइसिंग की गुंजाइश काफी कम हो गई और दाम सामान्य स्तर के करीब आने लगे।​

अब विदेशों के लिए नई योजना

  • अब गीता प्रेस वही मॉडल विदेशों के लिए अपनाने पर विचार कर रहा है, ताकि बाहर रहने वाले पाठकों को भी किताबें उचित दाम पर मिल सकें।​
  • योजना यह है कि अलग-अलग देशों में स्थानीय पार्टनर बनाए जाएँ जो वहाँ स्टॉक रखें, ऑनलाइन और समुदायों के माध्यम से किताबें पहुँचा सकें।​
  • गीता प्रेस ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पर भी पोस्ट करके ऐसे लोगों और संस्थाओं से सहयोग माँगा है जिन्हें क्रॉस-बॉर्डर ई-कॉमर्स, बुक डिस्ट्रीब्यूशन और वेयरहाउसिंग का अनुभव हो।​

‘ओवरहॉल’ यानी बदलाव किस तरह?

  • यह ओवरहॉल मुख्य रूप से वितरण प्रणाली का है, ताकि किताबें सीधे और भरोसेमंद चैनल से पाठकों तक पहुँचें, न कि केवल बिचौलियों के भरोसे रहें।​
  • लक्ष्य यह नहीं कि हर जगह भारतीय कीमत जैसी ही दर रखी जाए, बल्कि यह कि 8–50 गुना तक की अनैतिक बढ़ोतरी को रोका जा सके।​
  • गीता प्रेस यह भी देख रहा है कि टैक्स, शिपिंग और स्थानीय नियमों की लागत जोड़कर भी कीमतें जितना संभव हो, भारतीय स्तर से ज्यादा दूर न जाएँ।​

नेपाल जैसे शुरुआती प्रयोग

  • नेपाल में समुदाय की सहायता से एक स्थानीय आउटलेट शुरू किया गया है, जहाँ से गीता प्रेस की किताबें बेची जा रही हैं।​
  • यह छोटा प्रयोग गीता प्रेस को यह समझने में मदद कर रहा है कि भारत से बाहर किसी देश में किताबें बेचने के लिए क्या-क्या कानूनी, लॉजिस्टिक और आर्थिक चुनौतियाँ आती हैं।​

कीमतों के असर और चिंता

  • बहुत अधिक दाम होने की वजह से केवल समृद्ध लोग ही किताबें खरीद पाते हैं, जबकि मध्यम और गरीब वर्ग, खासकर युवाओं और नई पीढ़ी के पाठकों के लिए ये किताबें दूर होती जा रही हैं।​
  • अगर कीमतें ऐसे ही ऊँची रहीं तो कई लोग जो इन ग्रंथों को पढ़ना शुरू करना चाहते हैं, पहली ही सीढ़ी पर रुक जाएंगे।​
  • गीता प्रेस का मानना है कि यदि किताबें उचित और सुलभ दाम पर रहेंगी तो पाठकों का दायरा बढ़ेगा, नहीं तो धीरे-धीरे कम होता जाएगा।​

गीता प्रेस की आर्थिक स्थिति और दबाव

  • गीता प्रेस आम तौर पर किताबें लागत से भी कम दाम पर देने की कोशिश करता है, ताकि अधिक से अधिक लोगों तक धार्मिक साहित्य पहुँचे।jagran+1​
  • कागज के दाम और टैक्स (जैसे जीएसटी) बढ़ने से प्रेस पर आर्थिक दबाव आता है, और समय-समय पर उन्हें भारत में भी कीमतों पर पुनर्विचार करना पड़ता है।​
  • प्रेस से होने वाला घाटा, उससे जुड़े ट्रस्ट की अन्य संस्थाओं की आय से पूरा किया जाता है, ताकि किताबें फिर भी सस्ती रह सकें।​

पाठकों के लिए व्यावहारिक सुझाव

  • विदेश में रहने वाले लोग अगर गीता प्रेस की किताब खरीद रहे हों तो पहले आधिकारिक वेबसाइट या मान्यता प्राप्त विक्रेता पर भारतीय मूल कीमत देखकर तुलना कर सकते हैं।​
  • यदि कोई किताब छपे हुए मूल्य से कई गुना दाम पर मिल रही हो तो थोड़ा समय लेकर अन्य प्लेटफॉर्म या समुदायिक समूहों (मंदिर, भारतीय संगठन) में विकल्प तलाशना लाभदायक हो सकता है।​
  • जो लोग लॉजिस्टिक्स या बुक डिस्ट्रीब्यूशन के क्षेत्र में हैं, वे गीता प्रेस के साथ सीधा सहयोग करके अपने देश में उचित दाम पर किताबों की उपलब्धता बढ़ा सकते हैं।​

निष्कर्ष रूप में सार

  • विदेशों में गीता प्रेस की पुस्तकों के अत्यधिक दाम एक गंभीर समस्या बन चुके हैं, जिससे आम प्रवासी पाठक की पहुँच सीमित हो रही है।​
  • इस स्थिति को बदलने के लिए गीता प्रेस वितरण व्यवस्था का बड़ा ओवरहॉल करने, नए अंतरराष्ट्रीय पार्टनर बनाने और सप्लाई चेन को मज़बूत करने पर काम कर रहा है।​
  • उद्देश्य यही है कि गीता प्रेस की मूल भावना—सस्ती, सरल और सुलभ धार्मिक पुस्तकों का प्रसार—भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में बनी रहे।

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