हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: किरायेदार जिन्‍होंने किराया नहीं दिया व दुकान अवैध रूप से सबलेट की, उन्‍हें बेदखली का आदेश

परिचय

हाल ही में हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया गया, जिसमें एक मकान मालिक को अपने किरायेदार और उनसे जुड़े सब-टेनेट के विरुद्ध बेदखली का अधिकार दिया गया। यह केस न केवल किराया न चुकाने, बल्कि बिना अनुमति के तीसरे पक्ष को संपत्ति हस्तांतरित करने यानी ‘सबलेट’ करने का भी था।​

मामला क्या था?

मालिक श्री प्रकाश ने अदालत में याचिका दायर कर ये आरोप लगाया कि किरायेदार ने न केवल जुलाई 2014 से किराया देना बंद कर दिया, बल्कि 2021 में बिना लिखित अनुमति के दुकान को किसी अन्य व्यक्ति, यानी सब-टेनेट को किराए पर दे दिया। याचिका के अनुसार मूल किरायेदार स्व. श्री चौधरी थे, जिनकी मृत्यु के बाद उनके कानूनी वारिस दुकान के किरायेदार बने। इन्होंने अप्रैल 2021 में दुकान सबलेट कर दी।​

किरायेदार और सब-टेनेट की दलीलें

किरायेदारों का कहना था कि वे दुकान अपने सब-टेनेट के साथ साझेदारी के तहत चला रहे हैं, और यह पार्टनरशिप उनकी मां की खराब सेहत के चलते बनाई गई। किराया बकाया होने का दावा खारिज करते हुए, उन्होंने कहा कि मकान मालिक ने पहले ही किराया बाकी होने की एक और याचिका दायर कर रखी है।​

सब-टेनेट ने भी यही दलील दी कि वह केवल 50:50 लाभ-हानि साझेदारी के तहत कार्यरत है, और कोई अन्य समझौता नहीं हुआ।​

किराए का बकाया और सबलेट्टिंग का आरोप

रेंट कंट्रोलर ने सभी सबूतों को देखने के बाद पाया कि 5,23,994 रुपये किराया बकाया था, और दुकान अवैध रूप से सबलेट की गई थी। पार्टनरशिप डीड के क्लॉज-17 के अनुसार, मई 2021 के बाद से किराया, बिजली, पानी के बिल सब-टेनेट को देना था, और सब-टेनेट को हर महीने 10,000 रुपये किराएदार की मां को भी देना था।​

अदालत की विवेचना

रेंट कंट्रोलर और अपीलीय प्राधिकरण ने देखा कि पार्टनरशिप डीड महज कानून की आंखों में धूल झोंकने के लिए बनाई गई थी। असली परिस्थिति यह थी कि किरायेदारों ने दुकान की बागडोर और कब्जा, पैसे के एवज में, सब-टेनेट को सौंप दिया। तथाकथित पार्टनरशिप केवल एक परदा थी और मकसद संपत्ति का कब्जा हस्तांतरित करना था।​

उच्च न्यायालय की टिप्पणी

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने भी रेंट कंट्रोलर और अपीलीय प्राधिकरण के फैसले को सही ठहराया और स्पष्ट किया कि उन्होंने जो तथ्यात्मक निष्कर्ष निकाले, उसमें कोई गैरकानूनी या मनमानी नहीं थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि दो अदालतों के तथ्यों पर आधारित फैसलों में हाई कोर्ट पुन: मूल्यांकन नहीं कर सकता, जब तक कि कोई प्रत्यक्ष भ्रष्टाचार, अन्याय या गैरकानूनी कृत्य सामने न आए।​

सब-टेनेट की याचिका पर अदालत की राय

कोर्ट ने माना कि सब-टेनेट, क्योंकि उसे भी पार्टी बनाया गया था, तो वह भी याचिका दायर करने का हकदार था। हालांकि, अदालत ने साफ किया कि सब-टेनेट जरूरी पार्टी नहीं, लेकिन अगर उसे भी ब्लेम किया गया हो तो उसे भी सुनवाई मिलती है।​

पार्टनरशिप डीड की असलियत

कोर्ट ने देखा कि किरायेदार या सब-टेनेट ने कोई ऐसा लेन-देन का सबूत नहीं दिया, जिससे लग सके कि लाभ-हानि का असल में बंटवारा हुआ। ना ही कोई अकाउंट बुक, न ही कॉमन बिजनेस रिकॉर्ड प्रस्तुत किए गए। वहीं पार्टनरशिप डीड का क्लॉज-17 साफ तौर पर दिखाता था कि संपत्ति का असली नियंत्रण सब-टेनेट के पास है।​

फैसले के कानूनी निहितार्थ

  • कोर्ट ने कहा कि पार्टनरशिप या अन्य ऐसे क्लॉज, जिनका उद्देश्य किराएदार को हर महीने निश्चित राशि दिलवाना है या संपत्ति का कंट्रोल दूर करना है, वो अवैध सबलेट्टिंग का ज्यादा मजबूत सबूत हैं।​
  • किरायेदार या सब-टेनेट, अगर ठीक से दस्तावेज नहीं रखते, तो कोर्ट को तथ्यांकन में कोई शक्ल नहीं होगी।​
  • हाई कोर्ट ने दोहराया कि रिवीजनल जूरिस्डिक्शन में फैक्ट्स को दोबारा जांचकर पुराने आदेश पलटे नहीं जा सकते।​

मालिकों के लिए मुख्य सबक

  • मकान मालिक को हर हाल में लीज़ डीड, सबलेटिंग से मना करने वाला क्लॉज, और किराए की विस्तृत रिकॉर्डिंग रखनी चाहिए।​
  • संपत्ति की असल हिरासत किसके पास है, इसका रिकॉर्ड रखें—जैसे विजिट, बिजली-बिल, पानी-बिल बगैरह।
  • अगर कोई “पार्टनरशिप” बन रही है, जिसमें किराएदार को मंथली गारंटीड रकम मिले, वो अवैध सबलेटिंग का इशारा है।
  • बेदखली केस में कथित सब-टेनेट को भी पक्षकार बनाएं, ताकि बाद में विवाद न हो और तयशुदा डूअल ग्राउंड्स (किराया बकाया और सबलेटिंग) पर मजबूत केस खड़ा हो सके।​

अदालत का अंतिम आदेश

  • हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि दोनों निचली अदालतों के तथ्यों पर आधारित फैसलों में कोई खामी नहीं है, इसलिए किरायेदार और सब-टेनेट की याचिका खारिज की जाती है। कोई कॉस्ट नहीं दी गई। रिकॉर्ड वापस भेजने के आदेश।​

निष्कर्ष

यह फैसला स्पष्ट करता है कि मकान मालिक को अपनी संपत्ति और किराएदारी पर नियंत्रित अधिकार होते हैं और यदि किरायेदार संपत्ति का अवैध सबलेटिंग या किराया भुगतान में चूक करता है तो अदालत मालिक के पक्ष में फैसला देती है। कोर्ट संबंधों की असलियत को देखती है, न कि केवल पार्टनरशिप जैसी किसी डीड की लकीरों को। मकान मालिकों को दस्तावेज संकलन व समय पर कानूनी प्रक्रिया से अपने अधिकार सुरक्षित रखने चाहिए।​

  1. https://economictimes.indiatimes.com/wealth/legal/will/landlord-wins-eviction-case-against-tenant-who-stopped-paying-rent-since-2014-and-sub-let-property-in-2021-himachal-pradesh-high-court-order/articleshow/125241579.cms

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