देश‑स्तर पर कुछ साफ संकेत दिख रहे हैं कि हाल के वर्षों में स्वैच्छिक रिटायरमेंट (VRS) के मामले बढ़े हैं, साथ ही काम का दबाव, राजनीतिक‑प्रशासनिक दबाव और पब्लिक की अपेक्षाएँ मिलकर IAS अफसरों का मानसिक तनाव बढ़ा रहे हैं। फिर भी वेतन, प्रतिष्ठा, विविध अनुभव और नीति‑निर्माण में भूमिका के कारण IAS आज भी बहुतेरे मेधावी युवाओं के लिए आकर्षक करियर बना हुआ है, बस “ग्लैमर बनाम ग्राउंड रियलिटी” की खाई पहले से ज्यादा साफ दिखने लगी है।
क्या रिटायरमेंट / VRS बढ़ रहा है?
- केंद्र सरकार और राज्यों के नियमों के तहत IAS व IPS अफसर 20–30 साल की सेवा के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ले सकते हैं।
- हाल के वर्षों में अलग‑अलग कैडरों से वरिष्ठ IAS अधिकारियों द्वारा VRS के आवेदन “स्पेट” या “ट्रेंड” के रूप में रिपोर्ट किए गए हैं; उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में लगातार कई वरिष्ठ IAS द्वारा VRS माँगने पर राज्य स्तर पर चिंता जताई गई।
- राजस्व सेवा (IRS) में तो 2014 के बाद से 850+ अधिकारियों द्वारा VRS लेने को “ट्रबलिंग ट्रेंड” कहा गया, जो बताता है कि संपूर्ण ब्यूरोक्रेसी में असंतोष और वैकल्पिक करियर के प्रति आकर्षण बढ़ा है; समान प्रकार की स्थितियाँ IAS और IPS में भी चर्चा का विषय हैं, भले ही सटीक संख्या अलग हो।
इन संकेतों से यह साफ है कि “early exit” की प्रवृत्ति पहले की तुलना में अधिक दिख रही है, खासकर उन अफसरों में जिन्हें प्राइवेट सेक्टर, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं या कॉरपोरेट गवर्नेंस में बेहतर अवसर दिखते हैं।
मानसिक दबाव और बर्नआउट
- आधुनिक प्रशासन में IAS अफसरों पर काम का बोझ बहुत विविध है: कानून‑व्यवस्था, विकास योजनाएँ, चुनाव, आपदा प्रबंधन, मीडिया‑सोशल मीडिया की निगरानी, VIP टूर, कोर्ट केस, ऑडिट, सतर्कता जाँच आदि – सब कुछ एक साथ सँभालना पड़ता है।
- कई पूर्व IAS और ट्रेनर (जैसे डॉ. विवेक अत्रेय आदि) मानते हैं कि दिनचर्या अत्यधिक अनिश्चित और “24×7 ऑन कॉल” है, जहाँ अफसर का एक दिन अचानक किसी हादसे, दंगे, प्राकृतिक आपदा या राजनीतिक निर्देश से पूरी तरह बदल सकता है; यह लगातार हाई‑अलर्ट की स्थिति मानसिक थकान और बर्नआउट को बढ़ाती है।youtube+1
- सिविल सेवकों में बढ़ते “ब्यूरोक्रेटिक बर्नआउट” पर विश्लेषणों में बताया गया है कि लगातार बढ़ती workload, तात्कालिकता की संस्कृति (“सब कुछ अभी”), सार्वजनिक शिकायतों का दबाव, सोशल मीडिया की सार्वजनिक आलोचना, और ऊपर‑से‑नीचे आदेशों की भरमार के कारण तनाव और भावनात्मक थकावट एक वास्तविक समस्या है।
कई अफसर अनौपचारिक रूप से insomnia (नींद की कमी), family time की कमी, और “perpetual crisis mode” में जीने की शिकायत करते हैं, जो लंबे समय में मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।
प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव की हकीकत
- पूर्व IAS अधिकारी अक्सर बताते हैं कि सर्विस की सबसे बड़ी चुनौती “political‑administrative interface” है: ट्रांसफर‑पोस्टिंग, टेंडर, कानून‑व्यवस्था, जाँच एजेंसियाँ – इन सब पर लोकल और स्टेट‑लेवल राजनीति का प्रभाव बहुत अधिक होता है।youtube+1
- कई पूर्व अफसर सार्वजनिक इंटरव्यू में कहते हैं कि “प्रोफेशनल ऑटोनॉमी” सीमित हो रही है: फील्ड में फैसले लेने की स्वतंत्रता घटने, और “टॉप‑डाउन” निर्देशों के चलते अफसर खुद को सिर्फ “इम्प्लीमेंटेशन मशीन” की तरह महसूस करने लगते हैं, जबकि वे नीति‑निर्माण में रचनात्मक योगदान देना चाहते हैं।
- कुछ मामलों में, ईमानदार फैसलों के बावजूद जब अफसरों पर FIR, विभागीय जाँच, या सालों तक कोर्ट केस चलते हैं, तो “रिस्क‑रिवॉर्ड” का संतुलन टूटता है; कई वरिष्ठ IAS लिखित या मौखिक रूप से स्वीकारते हैं कि “फाइल पर साइन करने का जोखिम” पहले से कहीं ज्यादा महसूस होता है।
यही कारण है कि कई युवा और मिड‑कैरियर अधिकारी महसूस करते हैं कि यदि वे कॉरपोरेट, मल्टीनेशनल या पॉलिसी‑कंसल्टिंग में जाएँ तो कम राजनीतिक हस्तक्षेप और ज्यादा प्रोफेशनल सम्मान व आर्थिक लाभ मिल सकता है।
क्या IAS अब उतनी आकर्षक नौकरी नहीं?
यह तस्वीर एक‑तरफा नहीं है; कुछ कारण नौकरी को कम आकर्षक बनाते हैं, तो कई कारण आज भी इसे बेहद आकर्षक बनाए रखते हैं।
जो कारक आकर्षण कम करते हैं:
- तेजी से बढ़ता काम का बोझ और 24×7 उपलब्ध रहने की अपेक्षा
- राजनीतिक हस्तक्षेप, ट्रांसफर‑इंडस्ट्री, और “फ्री‑हैंड” की कमी
- सोशल मीडिया ट्रोलिंग, मीडिया ट्रायल और पब्लिक की अवास्तविक अपेक्षाएँ
- लंबी अवधि की कानूनी अनिश्चितताएँ (जाँच, केस, फिक्सेशन)
- प्राइवेट सेक्टर की तुलना में सीमित वेतन‑वृद्धि, लेकिन लगभग समान या ज्यादा तनाव
जो कारक IAS को अभी भी आकर्षक बनाते हैं:
- देश की शीर्ष ऑल इंडिया सर्विस होने से जबरदस्त सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान
- विविधता: फील्ड पोस्टिंग, नीति‑निर्माण, मंत्रालय, अंतरराष्ट्रीय असाइनमेंट – एक ही करियर में कई तरह की भूमिकाएँ
- वास्तविक पब्लिक इम्पैक्ट: जिलों में काम करते समय शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर, रोज़गार आदि पर सीधा असर देखने का अवसर
- स्थिर नौकरी, पेंशन, पोस्ट‑रेटायरमेंट बोर्ड/कमीशन/रेगुलेटरी बॉडी में नियुक्ति जैसी संभावनाएँ
- कई पूर्व IAS मानते हैं कि “जो लोग पब्लिक सर्विस से सचमुच प्रेरित हैं, उनके लिए यह अब भी unmatched platform है।”
यानी IAS का “ग्लैमर” शायद कम हुआ हो, लेकिन “सार्थकता” और “scope of impact” आज भी असाधारण है; फर्क सिर्फ यह है कि अब उम्मीदवार पहले से ज्यादा सूचनासम्पन्न हैं और प्राइवेट सेक्टर के विकल्पों से उसकी तुलना भी कर रहे हैं।
ग्राउंड रियलिटी: अफसरों और विशेषज्ञों की दृष्टि
पूर्व और वर्तमान IAS अफसरों के सार्वजनिक इंटरव्यू, कॉलम और ब्लॉग से कुछ कॉमन थीम उभरती हैं।
- कई अफसर कहते हैं कि IAS जॉब “टफेस्ट जॉब” है, लेकिन सबसे ज़्यादा “फुलफिलिंग” भी; जिन्होंने ईमानदारी से काम किया, वे अपने जिलों/विभागों की छोटी‑छोटी सफलताओं को जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं।
- एक पूर्व IAS ने खुलकर लिखा कि वे सर्विस छोड़ रहे हैं क्योंकि “बहुत ज़्यादा comfort zone” महसूस हो रहा था और उन्हें नए चैलेंज, उद्यमिता और दुनिया देखने की इच्छा थी; मतलब हर एक का सर्विस छोड़ना केवल नकारात्मक कारण से नहीं, कभी‑कभी व्यक्तिगत आकांक्षाओं और नए अवसरों की खोज से भी जुड़ा होता है।
- विशेषज्ञ विश्लेषणों में यह बात बार‑बार आती है कि “ब्यूरोक्रेटिक बर्नआउट” सिर्फ IAS की समस्या नहीं, बल्कि पूरे सरकारी तंत्र की है; समाधान के लिए काम‑घंटों का यथार्थवादी प्रबंधन, डिजिटल वर्कफ्लो, बेहतर स्टाफिंग, मानसिक स्वास्थ्य सपोर्ट और राजनीतिक‑प्रशासनिक संबंधों में संस्थागत सुधार आवश्यक हैं।
कुल मिलाकर ज़मीनी हकीकत यह है कि:
- हाँ, मानसिक दबाव और काम का तनाव पिछले दशक की तुलना में अधिक जटिल और multi‑dimensional हो चुका है।
- हाँ, चुनिंदा कैडरों और राज्यों में VRS और early exit की प्रवृत्ति चिंता का विषय बन रही है।
- लेकिन साथ‑साथ, हजारों गंभीर और प्रतिभावान युवा अब भी UPSC की कठिन तैयारी करके इसी सर्विस में आना चाहते हैं, और अनेक पूर्व IAS आज भी इसे जीवन का सबसे अर्थपूर्ण निर्णय मानते हैं।
युवाओं के लिए व्यावहारिक सलाह यही है कि IAS को न तो सिर्फ “पावर और परिक्विज़िट्स” की आँख से देखें, न ही सिर्फ “शिकार‑ए‑पॉलिटिक्स” की; बल्कि इसकी कठोर वास्तविकताओं, मानसिक दबाव, अनिश्चितताओं और साथ‑ही‑साथ इसकी अपार संभावनाओं – दोनों को समझकर संतुलित निर्णय लें।









