गजेन्द्र कोठारी कौन हैं और उनकी 100 करोड़ वाली सोच क्या है?

गजेन्द्र कोठारी की पूरी कहानी और उनकी इन्वेस्टिंग फिलॉसफी को समझ कर, एक साधारण इन्वेस्टर भी अपने लिए एक मजबूत, प्रैक्टिकल और सुरक्षित वेल्थ‑बिल्डिंग प्लान बना सकता है। नीचे पॉइंटवाइज़, एक फाइनेंशियल प्लानर के नज़रिए से उनकी जर्नी और उससे मिलने वाला मार्गदर्शन दिया गया है।


1. गजेन्द्र कोठारी की जर्नी का सार

  • गजेन्द्र कोठारी एटिका वेल्थ के MD और CEO हैं और पिछले करीब 20 साल से म्यूचुअल फंड वेल्थ मैनेजमेंट में काम कर रहे हैं।
  • उन्होंने 2010 के आसपास सिर्फ 5,000–10,000 रुपये की SIP से शुरुआत की और आज उनका फैमिली म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो लगभग 60 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच चुका है।
  • उनका मानना है कि उन्होंने कोई “जबरदस्त रिस्क” लेकर नहीं, बल्कि बोरिंग, डिसिप्लिन्ड SIP और लंबे समय तक “कुछ न करने” (इनएक्टिविटी) के ज़रिए वेल्थ बनाई है।

2. रिटर्न नहीं, वेल्थ का गेम

  • गजेन्द्र बार‑बार कहते हैं कि ज्यादातर लोग 20–25% रिटर्न के पीछे भागते हैं, जबकि सिर्फ 2% लोग सच में वेल्थ क्रिएशन के बारे में सोचते हैं।
  • उनका फ्रेमवर्क यह है कि इक्विटी से “इन्फ्लेशन + 5–6%” रिटर्न मिल जाए तो वह काफी है; भारत में अगर महंगाई 5–6% है तो 11–12% CAGR पर भी आप बहुत बड़ी वेल्थ बना सकते हैं।
  • बैंक FD, गोल्ड या रियल एस्टेट लंबी अवधि में आम तौर पर महंगाई से 2–4% ऊपर रहते हैं, जबकि इक्विटी क्लास 5–6% ऊपर रह सकती है, इसलिए दीर्घकालिक वेल्थ के लिए इक्विटी म्यूचुअल फंड या ETF अनिवार्य माने जाते हैं।

3. SIP से 10,000 से 60 करोड़ तक

  • गजेन्द्र ने अपनी पहली SIP 2010 के आसपास की, उस समय 5,000–5,000 की दो SIP (एक टैक्स सेविंग डाइवर्सिफाइड फंड और एक स्मॉल/माइक्रो कैप फंड) से शुरुआत की।
  • 15 साल में इन फंड्स का CAGR लगभग 18–20% रहा; टैक्स‑सेवर डाइवर्सिफाइड फंड ~18% और स्मॉल कैप फंड ~20% के करीब कंपाउंड हुआ, जिससे मिलाकर लगभग 18–19% CAGR मिला।
  • उन्होंने कभी यह SIP तोड़ी नहीं, बीच में मार्केट क्रैश, कोविड, स्मॉल‑कैप करेक्शन सब झेले, लेकिन “रिडेम्प्शन बटन” नहीं दबाया; यही कंपाउंडिंग का सबसे बड़ा रहस्य है।

4. टैक्स और चर्निंग से दूर रहना

  • गजेन्द्र स्पष्ट कहते हैं कि डायरेक्ट स्टॉक में बार‑बार खरीद‑फरोख्त करने से आपकी कंपाउंडिंग टूटती है और कैपिटल गेन टैक्स (शॉर्ट/लॉन्ग टर्म) आपकी वेल्थ को 30–40 साल बाद बहुत नुकसान पहुंचाता है।
  • म्यूचुअल फंड “ट्रस्ट स्ट्रक्चर” में टैक्स‑एक्सेम्प्ट होते हैं; फंड मैनेजर कितनी भी चर्निंग करे, आपको टैक्स नहीं लगता, आपका टैक्स सिर्फ रिडेम्प्शन पर लगता है।
  • उन्होंने 2010 वाली पहली SIP पर 15 साल तक “1 रुपये भी टैक्स” नहीं दिया, क्योंकि उन्होंने बेचने की गलती नहीं की; यही “कम चर्न, कम टैक्स, ज्यादा कंपाउंडिंग” का व्यवहारिक उदाहरण है।

5. इनएक्टिविटी और पेशेंस की फिलॉसफी

  • गजेन्द्र का मुख्य लेसन: स्टॉक मार्केट “इंपेशेंट से पेशेंट” व्यक्ति तक वेल्थ ट्रांसफर करने की मशीन है; ज़्यादातर नुकसान अधीरता और बार‑बार एक्शन लेने से होता है।
  • वे कहते हैं कि नेचर कभी जल्दी में नहीं रहती, फिर भी सब काम हो जाते हैं; इन्वेस्टिंग में भी “जल्दी अमीर बनने” की बजाय समय देना जरूरी है।
  • WhatsApp, सोशल मीडिया, न्यूज़ और “हॉट टिप्स” से दूर रहकर, बस एक लॉजिकल प्लान बनाकर उसी पर टिके रहना – यही उनके अनुसार सच्चा स्किल है।

6. कॉन्ट्रा थिंकिंग: पॉपुलर से दूर, अनपॉपुलर में खरीद

  • उनका प्रसिद्ध वाक्य: “जो पॉपुलर है, वह शायद ही प्रॉफिटेबल होता है।” गोल्ड, लक्ज़री रियल एस्टेट, IPO हाइप, स्मॉल‑कैप बूम – ये सब पॉपुलर फेज़ में कम रिटर्न देते हैं।
  • वे “वैल्यू/कॉन्ट्रा” अप्रोच अपनाते हैं – जो सेक्टर, कंट्री या थीम 20–30% या उससे ज्यादा गिरा हो, और सब उसे नापसंद कर रहे हों, वहां धीरे‑धीरे SIP या टॉप‑अप करते हैं।
  • उदाहरण: 2020 के आसपास जब PSU स्टॉक्स 10 साल तक खराब रिटर्न के बाद सबके नज़रअंदाज़ थे, उन्होंने एक PSU फंड में 75,000–1.5 लाख की SIP शुरू की और 4 साल में 37 लाख डालकर ~97 लाख निकाले (~56% CAGR)।

7. पेंडुलम स्ट्रेटजी (Pendulum Strategy)

  • गजेन्द्र मार्केट को पेंडुलम की तरह देखते हैं – कभी बहुत ओवरवैल्यूड (यूफोरिया), कभी अंडरवैल्यूड (डर/पैनिक), बीच में “एवरेज” पर कम समय रहता है।
  • उनकी स्ट्रेटजी:
    • जब कोई सेक्टर/थीम अपने पीक से ~20–30% या ज्यादा गिरा हो, हेटेड हो, तो वहां धीरे‑धीरे खरीद (SIP/टॉप‑अप) बढ़ाते हैं।
    • जब वही थीम बहुत पॉपुलर हो जाए, सब प्रवेश कर रहे हों, और खुद के रिटर्न 30–50% CAGR जैसे असामान्य स्तर पर पहुंच जाएं, तो धीरे‑धीरे मुनाफा बुक कर दूसरी अंडरवैल्यूड थीम में रोटेट कर देते हैं।
  • बाकी 90% समय वे “कुछ नहीं” करते – न फंड बदलना, न बार‑बार सेल; यही इनएक्टिविटी उनके अनुसार वेल्थ का सबसे बड़ा स्तंभ है।

8. पोर्टफोलियो स्ट्रक्चर: लार्ज, मिड और स्मॉल कैप

  • वर्तमान समय में उनका लगभग 60% कॉर्पस लार्ज+मिड कैप फंड्स में और ~40% स्मॉल‑कैप/अग्रेसिव थीम्स में है; SIP इन सेक्टर फंड्स और स्मॉल कैप्स में ज़्यादा जाती है।
  • हर साल अप्रैल में वे देखते हैं कि पिछले साल कौन सी थीम या कैटेगरी कम चली; नई SIP वृद्धि वहीँ अलोकेट करते हैं, जो “अभी चल नहीं रही”, न कि जो पहले से टॉप परफॉर्म कर चुकी है।
  • अलार्मिंग यूफोरिया, वैल्यूएशन बबल या “सभी लोग उसी थीम में” होने तक वे होल्ड करते हैं; तभी आंशिक या बड़े स्तर पर ट्रिमिंग पर विचार करते हैं।

9. म्यूचुअल फंड को बस की तरह समझना

  • वे म्यूचुअल फंड को एक बस के रूप में समझाते हैं – एक तय रूट, अनुभवी ड्राइवर (फंड मैनेजर), रेगुलेटेड सिस्टम (SEBI), कम किराया और कई पैसेंजरों के साथ सुरक्षित सफ़र।
  • इन्वेस्टर 500 रुपये से भी शुरुआत कर सकता है, जब चाहे एंट्री‑एक्ज़िट कर सकता है, और फंड की स्ट्रेटजी, कॉस्ट, पोर्टफोलियो, टैक्स इफेक्ट सब डॉक्यूमेंटेड होते हैं।
  • शुरुआती लोगों के लिए वे इंडेक्स फंड (Nifty 50) से शुरुआत की सलाह देते हैं, क्योंकि यह 50 सबसे बड़ी कंपनियों में डिवर्सिफाइड एक्सपोज़र देता है और भारत की लगभग 80–85% मार्केट कैप को कैप्चर करता है।

10. रोलिंग रिटर्न और सही फंड सेलेक्शन

फाइनेंशियल प्लानर के तौर पर गजेन्द्र कुछ टेक्निकल पैरामीटर पर बहुत ज़ोर देते हैं।

  • पॉइंट‑टू‑पॉइंट रिटर्न (1, 3, 5 साल) के पीछे भागना गलत है; यह अक्सर एक अच्छे एक साल से “औसत” को अच्छा दिखाता है।
  • वे “रोलिंग रिटर्न” देखने को कहते हैं – जैसे 5 साल की हर डेट पर 5 साल आगे का रिटर्न; इससे फंड की कंसिस्टेंसी और डाउन‑साइड फेज़ में व्यवहार समझ आता है।
  • दूसरे पैरामीटर:
    • TER (Total Expense Ratio): कॉस्ट को समझना; इंडेक्स फंड्स में 0.1–0.3% के आसपास, एक्टिव फंड्स में 1–2.25% तक हो सकता है।
    • Sharpe Ratio: जोखिम के बदले कितना रिटर्न मिला; मार्केट गिरते समय जिस फंड की गिरावट कम हो, वह बेहतर है, भले ही बुल मार्केट में थोड़ा कम चढ़े।
  • वे 2–3 अच्छे फंड मैनेजर वाले फंड चुनकर, 3–5 साल से पहले परफॉर्मेंस जज न करने की सलाह देते हैं; 3–4 फंड से अधिक रखने को वे अवॉइड करते हैं।

11. गोल‑बेस्ड प्लानिंग और फैमिली इन्वॉल्वमेंट

  • गजेन्द्र के अनुसार सच्ची फाइनेंशियल प्लानिंग “कौन सा फंड?” से ज्यादा “क्यों पैसा चाहिए? किस गोल के लिए?” पर आधारित होनी चाहिए।
  • वे क्लाइंट मीटिंग में पहले फैमिली के गोल, डर, सपने, जॉब/वर्क सैटिस्फैक्शन और लाइफस्टाइल पर चर्चा करते हैं, फंड सेलेक्शन बाद में आता है।
  • वे पति‑पत्नी और बच्चों को साथ बैठकर प्लानिंग करने पर ज़ोर देते हैं – ताकि सबको गोल, एसेट्स, इंश्योरेंस, और रिस्क की समझ हो और “एक व्यक्ति पर निर्भरता” न रहे।

12. बच्चों के लिए 10,000 की SIP से 1 करोड़

  • अपनी बेटी के लिए उन्होंने 10,000 रुपये की SIP चाइल्ड फंड में शुरू की, दिवाली/बर्थडे के गिफ्ट एनवेलप्स भी टॉप‑अप में जोड़ते रहे और ~15 साल में करीब 20 लाख इन्वेस्ट होकर 1 करोड़ से ज्यादा का कॉर्पस बन गया।
  • सुझाव:
    • बच्चों के नाम पर बैंक अकाउंट खोलकर, वहीं से ऑटो‑डिडक्ट SIP चलाएं, ताकि इमोशनल अटैचमेंट बने और पैरेंट्स बीच में निकालने के लिए प्रलोभित न हों।
    • चाइल्ड फंड या “चिल्ड्रन/रिटायरमेंट” नाम वाले फंड में लॉक‑इन (5 साल या 18 साल तक) भी मदद करता है कि आप जल्दी रिडीम न करें।
  • 20–30 हजार की SIP करने वाले पेरेंट्स के लिए, 15–18 साल में बच्चों की पढ़ाई, पोस्ट‑ग्रेजुएशन और शादी जैसे गोल्स आराम से कवर किए जा सकते हैं।

13. 22–25 साल के युवा के लिए गाइडेंस

  • 22–25 साल की उम्र में गजेन्द्र सबसे पहले “2 साल का खर्चा” जितना सेफ कॉर्पस बनाने की सलाह देते हैं, ताकि जॉब न पसंद हो तो भी आप आत्मविश्वास के साथ बदलाव कर सकें।
  • उनके हिसाब से इस उम्र में सबसे बड़ा कैपिटल “ह्यूमन कैपिटल” है – यानी स्किल, पैशन और सीखने की क्षमता; पहले इसे अपग्रेड करना, करियर दिशा सही पकड़ना ज़रूरी है।
  • जब करियर और इनकम स्टेबल हो जाए, तब 20% इनकम की SIP ऐसी बनाएं जिसे कभी टच न करें (लाइफटाइम रिटायरमेंट/फ्रीडम के लिए) और बाकी 80% गोल‑बेस्ड SIP/खर्च में फ्लेक्सिबल रखें।

14. घर खरीदने, लोन और लेवरेज पर विचार

  • गजेन्द्र की राय में शुरुआती 10–15 साल (20s–early 30s) में घर खरीदना वेल्थ क्रिएशन को बहुत पीछे धकेल देता है, क्योंकि भारी EMI आपकी कैश‑फ्लो और करियर फ्लेक्सिबिलिटी दोनों नष्ट कर देती है।
  • वे उदाहरण देते हैं कि मुंबई जैसे शहर में 3 करोड़ का घर EMI लगभग 3 लाख होगी, जबकि वही घर किराए पर 1 लाख में मिल सकता है; बाकी 2 लाख SIP और अनुभव/हॉलिडे पर खर्च किए जा सकते हैं।
  • “लोन लेकर मार्केट क्रैश में इन्वेस्ट” जैसी स्ट्रेटजी को वे 99% लोगों के लिए खतरनाक बताते हैं, क्योंकि क्रैश के समय ही नौकरी/बिज़नेस रिस्क सबसे ज्यादा होता है; रीपेमेंट क्षमता टूटने पर मजबूरन फायर‑सेल और स्थायी नुकसान हो सकता है।

15. काम, पैशन और फाइनेंशियल फ्रीडम

  • गजेन्द्र के लिए असली फाइनेंशियल प्लानिंग का लक्ष्य “फायर (Retire Early)” नहीं, बल्कि “काम को मजबूरी से विकल्प (choice)” में बदलना है।
  • वे देखते हैं कि 80–90% लोग ऐसे काम में हैं जो उन्हें पसंद नहीं, लेकिन ब्रांड नाम, समाज, और सैलरी के कारण फंसे रहते हैं; यह मानसिक और स्वास्थ्य दोनों पर बोझ है।
  • उनकी सलाह: अगर कोई जॉब आपको खुश नहीं रखती, तो खर्च कम कर, कॉर्पस बनाकर, 50% सैलरी कट के साथ भी किसी पसंदीदा काम में जाना बेहतर है; 2–3 साल में स्किल और पैशन के साथ वहां भी अच्छी इनकम बन सकती है।

16. फाइनेंशियल प्लानर की तरह अपनी लाइफ डिजाइन कैसे करें

गजेन्द्र की कहानी से निकलने वाले कुछ प्रैक्टिकल स्टेप्स:

  • 6–24 महीने का इमरजेंसी कॉर्पस बनाएं (सेलरी वालों के लिए कम से कम 6–12 महीने, करियर बदलने का इरादा हो तो 24 महीने)।
  • इनकम का कम से कम 20% ऐसी SIP में डालें जिसे 60+ की उम्र तक टच न करने का नियम बनाएं – इंडेक्स/डाइवर्सिफाइड इक्विटी फंड में।
  • बच्चों की पढ़ाई/शादी, रिटायरमेंट, घर, हॉलिडे – हर गोल के लिए अलग SIP/फंड मैप करें, ताकि “किसके लिए पैसा लगा है” साफ रहे।
  • फंड चुनते समय: रोलिंग रिटर्न, Sharpe ratio, TER, और 10–15 साल का ट्रैक रिकॉर्ड देखें; 2–3 अच्छे फंड मैनेजर वाले फंड काफी हैं।
  • हर साल अप्रैल में SIP बढ़ाएं और नई SIP उन थीम/कैटेगरी में लगाएं जो पिछला साल कम चली हों (कॉन्ट्रा अलोकेशन)।
  • घर और भारी लोन जल्दी न लें; पहले करियर, इमरजेंसी फंड और इक्विटी कॉर्पस मजबूत करें, फिर जरूरत और लाइफस्टाइल के हिसाब से हाउसिंग निर्णय लें।
  • फैमिली और बच्चों को जल्दी से जल्दी पैसे, बैंक अकाउंट, SIP, और म्यूचुअल फंड की बेसिक समझ दें; 10–15 साल की उम्र में ही उन्हें अपना पोर्टफोलियो दिखाकर ओनरशिप की भावना पैदा करें।

17. 100 करोड़ का लक्ष्य – प्रतीक, मजबूरी नहीं

  • गजेन्द्र ने “वन इडियट” नाम की एक शॉर्ट मूवी देखने के बाद 100 करोड़ कॉर्पस का लक्ष्य रखा; यह उन्हें एक प्रतीकात्मक, मोटिवेशनल नंबर लगता है, न कि लाइफ‑और‑डेथ टारगेट।
  • उनका मानना है कि 100 करोड़ बनने के बाद भी वे उतना खर्च नहीं करेंगे; कॉर्पस अपने आप कंपाउंड होकर आगे बढ़ता रहेगा, लेकिन जीवन का मकसद सिर्फ नंबर बढ़ाना नहीं, अर्थपूर्ण काम, परिवार और संतुलित जीवन जीना होना चाहिए।
  • इसलिए वे क्लाइंट्स से भी कहते हैं: पहले तय करें कि “पैसा क्यों चाहिए”, फिर उसी के अनुसार कॉर्पस और स्ट्रेटजी डिजाइन करें; वरना 50 से 100, फिर 200–400 की रेस कभी खत्म नहीं होती।

यह पूरी कहानी दिखाती है कि एक साधारण, लॉजिकल, गोल‑बेस्ड और टैक्स‑एफिशिएंट SIP स्ट्रेटजी, थोड़े कॉन्ट्रा थिंकिंग, और बहुत ज्यादा पेशेंस के साथ, एक मिडल‑क्लास इन्वेस्टर भी 25–30 साल में 100 करोड़ तक की संभावित वेल्थ बना सकता है – बिना जुआ खेलने, टिप्स के पीछे भागने या रिस्की लेवरेज लिए।

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