अगर कोई बेटा नहीं होगा तो मरनेके बाद हमें पिण्ड-पानी कौन देगा और पिण्ड-पानी न मिलनेसे हमारी गति कैसे होगी ? (EN)

प्रश्न- अगर कोई बेटा नहीं होगा तो मरनेके बाद हमें पिण्ड-पानी कौन देगा और पिण्ड-पानी न मिलनेसे हमारी गति कैसे होगी ?

उत्तर-पिण्ड-पानी देनेसे पिण्ड-पानी लेनेवालोंका आगे जन्म-मरण चालू होता है। जैसे रास्तेमें चलनेवाला व्यक्ति भूख-प्यासके कारण कहीं रुक जाता है, रास्तेमें अटक जाता है और अन्न-जल मिलनेके बाद फिर अपने रास्तेपर चल पड़ता है, ऐसे ही मृतात्माओंको पिण्ड-पानी न मिलनेसे वे एक जगह अटक जाते हैं, रुक जाते हैं और पिण्ड-पानी मिलनेसे वे वहाँसे चल पड़ते हैं अर्थात् उनकी आगे गति शुरू हो जाती है, उनका जन्म-मरण चालू हो जाता है; परन्तु उनकी मुक्ति, कल्याण नहीं होता।

वास्तवमें मुक्ति होना, कल्याण होना सन्तानके अधीन किंचिन्मात्र भी नहीं है। अगर मुक्ति सन्तानके अधीन हो तो मुक्ति पराधीन ही हुई ! फिर मनुष्य जन्मकी स्वतन्त्रता कहाँ रही ? कल्याणमें, मुक्तिमें जब शरीरकी आसक्ति भी बाधक है, तो फिर मरनेके बाद भी पुत्रसे पिण्ड-पानीकी आशा कल्याण कैसे होने देगी ? वह तो बन्धनमें ही डालेगी। अतः जो अपना कल्याण चाहता है, उसको पुत्रैषणा (पुत्रकी इच्छा), लोकैषणा (संसारमें आदर-सत्कार, मान-बड़ाईकी इच्छा) और वित्तैषणा (धनकी इच्छा)- इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये, क्योंकि ये तीनों ही परमात्मप्राप्तिमें बाधक हैं।

जिसको सन्तानकी, पिण्ड-पानीकी इच्छा है, वह जन्म. आना मरणके चक्रमें पड़े रहना चाहता है; क्योंकि कहीं जन्म होता नहीं तभी तो वह पिण्ड-पानी चाहेगा। अगर जन्म होगा ही नहीं तो पिण्ड-पानी किसको चाहिये !

पुत्र न होनेसे कल्याण नहीं होता – यह बात बिलकुल गलत है। अगर सन्तान होनेसे कल्याण होता तो सूकरीके ग्यारह और सर्पिणीके एक सौ आठ बच्चे होते हैं, फिर उनका तो कल्याण हो ही जाना चाहिये ! ऐसे ही ज्यादा बच्चेवालोंका कल्याण जल्दी होना चाहिये, पर वह होता नहीं।

सन्तान हो अथवा न हो, मनुष्यको केवल भगवान्में ही लगना चाहिये; भगवान्के परायण होकर भगवान्का भजन करना चाहिये। अगर पुत्रकी इच्छा न मिटती हो तो निःसन्तान मनुष्यको चाहिये कि वह श्रीरामललाको, श्रीकृष्णललाको अपना पुत्र मान ले और पुत्र-भावसे उनका लाड़-प्यार करे। वह पुत्र (भगवान्) जैसी सेवा करेगा, वैसी सेवा पैदा किया हुआ पुत्र कर ही नहीं सकता ! वह पुत्र तो लोक-परलोकका सब काम कर देगा।

यह लेख गीता प्रेस की मशहूर पुस्तक “गृहस्थ कैसे रहे ?” से लिया गया है. पुस्तक में विचार स्वामी रामसुख जी के है. एक गृहस्थ के लिए यह पुस्तक बहुत मददगार है, गीता प्रेस की वेबसाइट से यह पुस्तक ली जा सकती है. अमेजन और फ्लिप्कार्ट ऑनलाइन साईट पर भी चेक कर सकते है.

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