एक्सटेंडेड वारंटी घाटे का सौदा क्यों? कंपनियों के लिए ‘चाँदी’ क्यों?

एक्सटेंडेड वारंटी होती क्या है?

एक्सटेंडेड वारंटी वह अतिरिक्त सुरक्षा योजना है जो आपको प्रोडक्ट की कंपनी या डीलर, सामान्य कंपनी वारंटी खत्म होने के बाद के समय के लिए बेचते हैं।​
आप इसके लिए अलग से पैसा देते हैं और बदले में वादा मिलता है कि अगर तय समय के अंदर प्रोडक्ट में खराबी आई तो उसकी मरम्मत या रिप्लेसमेंट कम या बिना लागत पर होगी।​


ग्राहक के लिए घाटे का सौदा क्यों?

  1. लगभग उतना ही खर्च, जितना एक रिपेयर
    कई सर्वे बताते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक्स और गैजेट्स पर ली जाने वाली एक्सटेंडेड वारंटी की कीमत अक्सर एक औसत रिपेयर के खर्च के आसपास ही होती है या उससे बहुत थोड़ी ही अलग होती है।​
    कारों पर किए गए सर्वे में पाया गया कि लोगों ने एक्सटेंडेड वारंटी पर जितना खर्च किया, उन्हें उसके बदले औसतन उससे कम लाभ मिला, यानी नेट घाटा हुआ।​
  2. ज्यादातर लोग कभी उपयोग ही नहीं करते
    कार वारंटी पर किए गए एक बड़े सर्वे में यह सामने आया कि लगभग 40% से ज़्यादा लोगों ने जो एक्सटेंडेड ऑटो वारंटी खरीदी, उसे कभी इस्तेमाल ही नहीं किया।​
    यानी उन्होंने केवल “शांति” के नाम पर हजारों रुपये दे दिए, लेकिन वारंटी अवधि में कोई बड़ी खराबी आई ही नहीं, तो पैसा डूब गया।​
  3. प्रोडक्ट उतने खराब होते ही नहीं, जितना डर दिखाया जाता है
    रिसर्च से पता चलता है कि उपभोक्ता प्रोडक्ट के खराब होने की संभावना को हकीकत से कहीं ज़्यादा मान लेते हैं, जबकि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स और कारें सामान्य तौर पर वारंटी के बाद के शुरुआती वर्षों में कम ही फेल होती हैं।​
    अगर प्रोडक्ट इतनी जल्दी खराब होने लगे तो कंपनी की साख और मार्केट शेयर दोनों गिर जाते, इसलिए निर्माता आम तौर पर पर्याप्त विश्वसनीय प्रोडक्ट ही बेचते हैं।​
  4. बहुत सारी शर्तें और अपवाद
    एक्सटेंडेड वारंटी में अक्सर फाइन प्रिंट में दर्जनों शर्तें होती हैं – क्या कवर होगा, क्या नहीं, कहाँ से मरम्मत करवानी है, कौन-कौन से पार्ट शामिल नहीं हैं, क्लेम के लिए कितने कागज़, निरीक्षण आदि।​
    कई बार वास्तविक खराबी उसी हिस्से में आ जाती है जो वारंटी में शामिल ही नहीं होता, या दावा अस्वीकार कर दिया जाता है, जिससे ग्राहक को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता।​
  5. कैश फ्लो और विकल्प की आज़ादी का नुकसान
    जब आप पहले से ही 5–10% तक अतिरिक्त पैसा वारंटी में दे देते हैं, तो यह पैसा आपकी जेब से निकलकर कंपनी के पास चला जाता है, जिसे आप भविष्य में सच में खराबी आने पर भी, अपनी शर्तों पर खर्च नहीं कर पाते।​
    अगर उसी रकम को अपनी बचत में रखा जाए, तो जरूरत पड़ने पर आप बेहतर सर्विस सेंटर, तेज़ सेवा या यहां तक कि नया प्रोडक्ट लेने तक की आज़ादी रख सकते हैं।​

कंपनियों के लिए ‘चाँदी’ क्यों?

  1. बहुत ऊँचा मुनाफा (हाई मार्जिन)
    रिसर्च और इंडस्ट्री रिपोर्ट्स के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक सामान और कार डीलरों के लिए एक्सटेंडेड वारंटी सबसे ज़्यादा लाभ देने वाले प्रोडक्ट्स में से एक है, क्योंकि इसका बड़ा हिस्सा साफ मुनाफा होता है।​
    कार डीलरों पर किए गए एक सर्वे में औसतन हर एक्सटेंडेड वारंटी पर अच्छी-खासी रकम सीधे डीलर की कमाई के रूप में दर्ज हुई, जबकि क्लेम comparatively बहुत कम निकलते हैं।​
  2. क्लेम की संभावना कम, प्रीमियम तय समय पर पक्का
    कंपनियाँ बड़े डेटा के आधार पर जानती हैं कि कितने प्रोडक्ट कब तक खराब हो सकते हैं, इसलिए वे वारंटी की कीमत ऐसी रखती हैं कि कुल मिलाकर लिए गए पैसों में से केवल एक हिस्सा ही क्लेम पर खर्च हो और बाकी सीधा प्रॉफिट बन जाए।​
    क्योंकि ज्यादातर ग्राहक या तो क्लेम करते ही नहीं या छोटा-मोटा रिपेयर खुद करवा लेते हैं, क्लेम रेशियो कम रहता है और कंपनी या बीमा प्रदाता का मार्जिन बहुत ऊँचा होता है।​
  3. अतिरिक्त रेवन्यू स्ट्रीम और क्रॉस-सेल
    आज कई ब्रांड और रिटेलर वारंटी को एक अलग बिज़नेस लाइन की तरह देखते हैं, जिससे उन्हें प्रोडक्ट की बिक्री के अलावा अतिरिक्त रेवन्यू मिलता है।​
    वारंटी बेचते समय वे आपको दूसरी सेवाएँ भी बेच सकते हैं (AMC, एसेसरी, बीमा आदि), जिससे कुल बिल और मुनाफा दोनों बढ़ जाते हैं।​
  4. कस्टमर लॉयल्टी और डेटा
    जब ग्राहक एक्सटेंडेड वारंटी लेता है, तो अक्सर उसे बाद में उसी कंपनी के सर्विस सेंटर पर आना पड़ता है, जिससे कंपनी को लगातार बिज़नेस और ग्राहक का डेटा मिलता है।​
    क्लेम के समय अगर अनुभव ठीक ठाक भी रहा तो ग्राहक के मन में यह छवि बनती है कि “इस ब्रांड ने साथ दिया”, जिससे वह अगली बार भी उसी ब्रांड का प्रोडक्ट लेने के लिए तैयार रहता है।​

इलेक्ट्रॉनिक सामान के संदर्भ में

टीवी, लैपटॉप, मोबाइल, रेफ्रिजरेटर, वॉशिंग मशीन आदि पर कंपनियाँ अक्सर 1 साल की मैन्युफैक्चरर वारंटी के साथ 2–4 साल की एक्सटेंडेड वारंटी ऑफर करती हैं।​
अध्ययनों में पाया गया कि इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसों की एक्सटेंडेड वारंटी की औसत कीमत प्रोडक्ट प्राइस का लगभग चौथाई हिस्सा तक हो सकती है, जबकि असली रिपेयर की लागत अक्सर उससे बहुत कम निकलती है।​

कई रिपोर्ट यह भी बताती हैं कि:

  • अक्सर जो खराबी जल्दी आएगी, वह पहले साल की कंपनी वारंटी में ही पकड़ में आ जाती है।​
  • बाद के वर्षों में खराबी की संभावना उतनी नहीं होती, जितनी मार्केटिंग के समय दिखाकर डराया जाता है।​

कारों की एक्सटेंडेड वारंटी

कारों के मामले में भी तस्वीर काफी हद तक यही है: अधिकतर मालिकों ने जितना पैसा अतिरिक्त वारंटी पर दिया, उन्हें उतने की सर्विस या पार्ट रिप्लेसमेंट का लाभ नहीं मिल पाया।​
कई सर्वे में यह बात सामने आई कि सिर्फ अल्पसंख्या को ही असल में नेट फायदा हुआ, बाकी या तो बराबरी पर रहे या फिर घाटे में रहे।​

हाँ, कुछ खास स्थितियों में कार की एक्सटेंडेड वारंटी थोड़ी समझदारी हो सकती है:

  • बहुत हाई-एंड, जटिल या कम भरोसेमंद मॉडल, जिनकी रिपेयर लागत बहुत अधिक होती है।​
  • वह कार जो आप लंबे समय तक (6–8 साल) रखने वाले हैं और जिसमें पहले से खराबियों का इतिहास दिख रहा हो।​

लेकिन आम, भरोसेमंद ब्रांड की कार और सामान्य ड्राइविंग पैटर्न में, केवल डर या सेल्समैन की बात मानकर महँगी वारंटी ले लेना अक्सर आर्थिक रूप से तर्कसंगत नहीं होता।​


कब एक्सटेंडेड वारंटी पर विचार किया जा सकता है?

पूरी तरह “कभी मत लो” भी सही नहीं है, कुछ स्थितियों में एक्सटेंडेड वारंटी उपयोगी हो सकती है।​

इन मामलों में सोचना ठीक है:

  • बहुत महंगी चीज़ (जैसे बड़ा OLED टीवी, प्रीमियम फ्रिज, लग्ज़री कार) जिसकी रिपेयर लागत प्रोडक्ट कीमत के बड़े हिस्से जितनी हो सकती है।​
  • ऐसा गैजेट जो बहुत रफ उपयोग में आता है, जैसे स्मार्टफोन जिसे आप अक्सर गिरा देते हैं; यहाँ accidental damage या स्क्रीन प्रोटेक्शन प्लान कुछ लोगों को लाभ दे सकता है।​
  • ऐसे मॉडल या ब्रांड जिनकी विश्वसनीयता रिपोर्ट में कमजोर बताई गई हो और पार्ट्स बहुत महंगे हों।​

फिर भी इन मामलों में भी शर्तें, कवर, डिडक्टिबल, सर्विस नेटवर्क, क्लेम प्रक्रिया आदि को अच्छी तरह पढ़ना ज़रूरी है, ताकि बाद में धोखा महसूस न हो।​


समझदारी भरा विकल्प: खुद की ‘वारंटी फंड’

कई वित्तीय विशेषज्ञ और उपभोक्ता संगठनों की राय है कि ज्यादातर लोगों के लिए सबसे अच्छी रणनीति यह है कि हर बड़े खरीद पर एक्सटेंडेड वारंटी की जगह वैसी ही रकम या उसका बड़ा हिस्सा अपनी बचत में रख लें।​
इसे आप अपना छोटा “रिपेयर या रिप्लेसमेंट फंड” मानकर चलें; अगर दो–तीन साल तक कोई बड़ी खराबी नहीं आई, तो यह पैसा आपका ही रहकर आपकी संपत्ति बढ़ाएगा, जबकि वारंटी लेने पर यह पैसा हमेशा के लिए जा चुका होता।​


निष्कर्ष: डर कम, गणित ज़्यादा देखें

  • कंपनियाँ एक्सटेंडेड वारंटी इसलिए इतने जोश से बेचती हैं क्योंकि वे उन्हें स्थिर, ऊँचा और काफी हद तक जोखिम-मुक्त मुनाफा देती हैं।​
  • उपभोक्ताओं के लिए यह ज्यादातर समय ऐसा “इंश्योरेंस” बन जाती है जिसका प्रीमियम लगभग एक रिपेयर जितना है, लेकिन क्लेम की संभावना कम और शर्तें ज्यादा हैं, इसलिए दीर्घकाल में आमतौर पर घाटा ही होता है।​

इसलिए इलेक्ट्रॉनिक सामान, कार आदि लेते समय एक्सटेंडेड वारंटी को भावनाओं या डर के बजाय सादा गणित मानकर देखें:
कितना अतिरिक्त पैसा देना है, खराबी की वास्तविक संभावना क्या है, रिपेयर की अनुमानित लागत कितनी होगी, और वही पैसा अगर बचत में रखा जाए तो कितने मामलों में आपको ज्यादा फायदा होगा।​
ज्यादातर साधारण स्थितियों में जवाब यही निकलता है – ग्राहक के लिए घाटे का सौदा, और कंपनियों के लिए शुद्ध चाँदी।​

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