Exam या Interview में घबरा जाते हैं, उस समय क्या Mindset रखें ? Bhajan Marg

परीक्षा या इंटरव्यू में घबराहट खत्म कैसे करें? महाराज जी की सीख पर आधारित 1000 शब्दों का लेख

प्रश्न: मैं मेहनत से पढ़ता हूँ, क्लास में हर सवाल का उत्तर दे देता हूँ, लेकिन एग्जाम या इंटरव्यू के समय घबरा जाता हूँ और गलती कर देता हूँ। ऐसे समय में धैर्य और सही मानसिकता कैसे रखूँ?

1. नाम जप से धैर्य और निर्भयता

  • महाराज जी कहते हैं कि घबराहट का मूल इलाज हरि-नाम जप है; नाम जप मन को स्थिर करता है और अंदर से साहस देता है।
  • वे प्रह्लाद जी का उदाहरण देते हैं कि पाँच वर्ष का बालक होते हुए भी आग, विष, सर्प, हाथी, समुद्र और पहाड़ जैसी विपत्तियों में भी नहीं डरा, क्योंकि लगातार हरि-नाम चल रहा था।
  • मीरा बाई को कितना सताया गया, फिर भी वे नहीं घबराईं, क्योंकि उनके अंदर लगातार नाम का प्रवाह था; इससे परीक्षा जैसी छोटी स्थिति सामान्य लगती है।

2. ब्रह्मचर्य: आत्मविश्वास और जीत का मूल आधार

  • महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि ब्रह्मचर्य में एक विशेष जोश होता है, एक उन्माद और जिद होती है कि हार स्वीकार ही न हो।
  • ब्रह्मचारी का स्वभाव ऐसा होता है कि जहाँ हारने का भाव उत्पन्न होता है, वहीं वह विजय प्राप्त करने के लिए खड़ा हो जाता है।
  • वे बताते हैं कि जब ब्रह्मचर्य नष्ट होता है, तब वीर्य-शक्ति क्षीण होकर स्मृति कमजोर होती है, आत्मविश्वास गिरता है और उसी से घबराहट जन्म लेती है।
  • परशुराम जी और अर्जुन का उदाहरण देकर समझाते हैं कि उनका तेज, साहस और निर्णय शक्ति ब्रह्मचर्य से ही उपजी थी, और वही शक्ति आज के युवाओं में कम होती जा रही है।

3. अभ्यास, तपस्या और शरीर का अनुशासन

  • महाराज जी कहते हैं कि ठंडी में पहले बहुत ठंड लगती थी तो वे गंगाजी में खड़े हो जाते, मंत्र जप करते और धीरे–धीरे शरीर को ठंड और हवा की आदत पड़ गई; इसे वे अभ्यास और योग की शक्ति कहते हैं।
  • इसी तरह विद्यार्थी को भी अपने विषय का रोज अभ्यास करना चाहिए, जैसे सैनिक रोज दौड़ता, छलांग लगाता और शरीर को तैयार करता है।
  • वे सलाह देते हैं कि थोड़ा व्यायाम, दंड-बैठक, अनुशासित दिनचर्या और सात्विक भोजन से शरीर और मन दोनों मजबूत होते हैं, जिससे घबराहट कम होती है।

4. घबराहट का वास्तविक कारण: आत्मविश्वास की कमी

  • महाराज जी कहते हैं कि घबराहट तब पैदा होती है जब हमारी वीर-शक्ति और स्मृति क्षीण होने लगती है और हमें अपने ऊपर विश्वास नहीं रहता।​
  • जब अंदर से आवाज आती है कि “शायद मैं फेल हो जाऊँगा”, “लोग क्या कहेंगे”, “माता-पिता ने इतना पैसा लगाया” – यही विचार दिमाग पर प्रेशर बनाते हैं और पढ़ा हुआ भी भूल जाता है।
  • वे बताते हैं कि अगर विद्यार्थी पहले ही तय कर ले कि पास या फेल होने की चिंता नहीं, मैं बस अपना सर्वश्रेष्ठ दूँगा, तो आधी घबराहट वहीं खत्म हो जाती है।

5. समाज और माता-पिता के डर से कैसे मुक्त हों

  • विद्यार्थी अक्सर कहते हैं कि एक साल की मेहनत, माता-पिता के पैसे और समाज की बात का डर उन्हें दबा देता है; इस पर महाराज जी कहते हैं कि “समाज क्या सोचेगा” यह विचार पहले ही दिमाग से निकालो।
  • वे सलाह देते हैं कि परीक्षा से पहले मन को पूरी तरह फ्री करो – “फेल होंगे या पास, मुझे कोई चिंता नहीं, मैं मस्त होकर पेपर दूँगा”; इस हल्के भाव से दिया गया पेपर अधिक सफल होता है।
  • वे चेतावनी देते हैं कि समाज और माता-पिता की अपेक्षाओं को अत्यधिक मन में बैठा लेने से बच्चा डिप्रेशन तक चला जाता है, जबकि जीवन मस्त और अवसरों से भरा है, एक परीक्षा से जीवन खत्म नहीं होता।

6. सात्विक आहार, स्वच्छ आचरण और स्मृति-शक्ति

  • महाराज जी कहते हैं कि गंदा भोजन, नशा, मांसाहार और गलत आचरण से हमारी स्मृति-शक्ति कमजोर होती जाती है और दिमाग की रिकॉर्डिंग क्षमता घटती है।
  • अगर व्यक्ति सात्विक भोजन, संयमित व्यवहार और अच्छे संस्कारों के साथ रहे, तो वे कहते हैं कि “एक बार कोई बात सही ढंग से बता दो, पचास साल बाद भी याद रहेगी।”
  • स्मृति जागृत हो जाए तो कई जन्मों की स्मृति तक जागृत हो सकती है, लेकिन वर्तमान जीवन में हम अपनी ही बुद्धि को गंदे विचारों और आदतों से दबाते जा रहे हैं।

7. उत्तर देने की कला: सिंहवत और कट्टरता से

  • महाराज जी कहते हैं कि उत्तर देना भी एक साधना है; लूज, ढीला स्वभाव नहीं रखना, बल्कि सिंहवत उत्तर देना सीखना चाहिए।
  • वे सुझाव देते हैं कि दीवार को टीचर मानकर खुद से प्रश्न–उत्तर का अभ्यास करो; जो अध्याय पढ़ा है, उसी पर संभावित प्रश्न बनाकर जोर से बोलकर उत्तर दो।
  • जब किसी चैप्टर पर पूरा विश्वास हो जाए और अभ्यास पक्का हो जाए, तभी परीक्षा में उत्तर देते समय वह सिंहवत दृढ़ता आती है।

8. असफलता की चिंता नहीं, प्रयास की चिंता करो

  • महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि फेल हो गए तो क्या हुआ, “फिर पढ़ेंगे, फिर पास होंगे”, जीवन केवल पढ़-लिखकर नौकरी करने तक सीमित नहीं है, व्यापार, खेती, मजदूरी – कई रास्ते हैं।
  • वे बताते हैं कि असली समस्या फेल होना नहीं, बल्कि घबराहट में पढ़ा हुआ भूल जाना है; इसलिए पहले घबराना छोड़ो, फिर पढ़ाई का पूरा उपयोग होगा।
  • विद्यार्थी को यह भाव रखना चाहिए कि मनुष्य-जीवन मिला है, कमजोरियाँ नहीं पालनी, प्रमाद नहीं करना, परन्तु पढ़ाई के साथ मस्ती नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और संयम के साथ आगे बढ़ना है।

9. कुसंग, नशा और बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड की प्रवृत्ति से सावधान

  • महाराज जी बताते हैं कि 10वीं–12वीं तक बच्चे माता-पिता के शासन में रहते हैं, लेकिन बाहर कोचिंग या कॉलेज जाते ही कुसंग के कारण सिगरेट, नशा और बॉयफ्रेंड–गर्लफ्रेंड के चक्कर में फँस जाते हैं।
  • उनके अनुसार आज 80–90 प्रतिशत युवाओं का पतन वहीं से शुरू होता है, जहाँ वे “रिलैक्सेशन” के नाम पर गलत संग और गलत आदतों में उलझ जाते हैं।
  • वे कहते हैं कि यह समय ब्रह्मचर्य और पढ़ाई का है, न कि विषय-भोग का; गृहस्थी का समय बाद में आएगा, तब पति–पत्नी, परिवार, बच्चे – सब कुछ मिलेगा, अभी का समय लक्ष्य-प्राप्ति का है।

10. आत्म–नियंत्रण: खुद को बचाने की जिम्मेदारी खुद की

  • महाराज जी कहते हैं कि आज न तो माता-पिता का शासन माना जा रहा है, न शास्त्रों का, इसलिए व्यक्ति को स्वयं अपने मन और इंद्रियों पर शासन करना सीखना होगा।
  • वे साफ कहते हैं कि “हमें कोई और बचा लेगा” ऐसी आशा मत रखो; अगर तुम खुद अपने को बचाना चाहो तो कोई तुम्हें गिरा नहीं सकता, और अगर खुद गिरना चाहो तो किसी भी माहौल में गिर जाओगे।
  • इसलिए विद्यार्थी को नशा, व्यभिचार, गलत संग, बुरी आदतों से दूर रहकर अपने चरित्र को मजबूत बनाना चाहिए, यही घबराहट मिटने और सफलता पाने का असली आधार है।

11. माता-पिता और समाज के प्रति सही दृष्टि

  • महाराज जी याद दिलाते हैं कि “विद्या विनयं ददाति” – शिक्षा का फल विनय है; मां और पिता को भगवान के समान मानकर उनके प्रति विनम्र व्यवहार करना चाहिए।
  • वे आज की स्थिति पर दुःख व्यक्त करते हैं कि बच्चे माता-पिता को धमकी देते हैं, मारते हैं, घर से निकाल देते हैं; यह शिक्षा का पतन है, जबकि सच्चा ज्ञान दूसरों की माताओं–बहनों को भी पवित्र दृष्टि से देखना सिखाता है।
  • वे कहते हैं कि आज लोग दूसरे की बेटी को छेड़ते हैं, वीडियो बनाते हैं लेकिन बचाने नहीं जाते; यह कायरता और अधर्म का लक्षण है, इससे समाज और स्वयं दोनों का चरित्र गिरता है।

12. सदाचरण, सत्संग और वैश्विक दृष्टि

  • अंत में महाराज जी कहते हैं कि चाहे आप भारत में हों या ऑस्ट्रेलिया जैसे किसी भी राष्ट्र में, “सकल भूमि गोपाल की है”, सारी धरती भगवान की है।
  • वे बताते हैं कि विदेशों में बसे कई परिवार अच्छी शिक्षा, अच्छे पद और व्यवसाय होने के बावजूद सत्संग और एकांत भजन से जीवन में गहरा परिवर्तन अनुभव कर रहे हैं।
  • संदेश यह है कि जहाँ भी रहो, अपने धर्म को पहचानो, निष्ठा से उसका पालन करो, भगवान का नाम जप करो और अच्छे आचरण वाले बनो – तभी परीक्षा, इंटरव्यू और जीवन की हर कसौटी में मन स्थिर और निडर रह पाएगा।

यह लेख महाराज जी की कही बातों का सार है; आप चाहें तो हर बिंदु को अपने जीवन की “चेकलिस्ट” बनाकर धीरे–धीरे लागू कर सकते हैं।

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