परीक्षा से पहले डर क्यों लगता है? महाराज जी का समाधान (EN)

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परीक्षा से पहले डर और घबराहट होना आज के विद्यार्थियों की आम समस्या है। 29 जून 2025 के श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के सत्संग में इस विषय पर विस्तार से चर्चा हुई। महाराज जी ने विद्यार्थियों को परीक्षा के भय से उबारने के लिए कई अमूल्य बातें कहीं, जो हर विद्यार्थी के जीवन में मार्गदर्शक बन सकती हैं।

महाराज जी के अनुसार परीक्षा का डर क्यों आता है?

    डर का मुख्य कारण प्रमादमहाराज जी कहते हैं कि परीक्षा का डर तब आता है जब हमने अपनी पढ़ाई में प्रमाद किया होता है, यानी सही ढंग से तैयारी नहीं की होती। अगर हमने पूरे वर्ष ईमानदारी से अध्ययन किया है, तो डरने की कोई आवश्यकता नहीं है।

    “हमें डर तब लगता है जब हमने अपने कार्य में प्रमाद किया, पढ़ाई को सही ढंग से नहीं पढ़ा।”

    सिलेबस के बाहर प्रश्न नहीं आतेमहाराज जी स्पष्ट करते हैं कि परीक्षा में वही प्रश्न आते हैं जो हमारे चैप्टर में होते हैं।

    “क्लास के चैप्टर के अंतर्गत ही प्रश्न आते हैं, बाहर के नहीं।”

    नेगेटिव सोच सबसे बड़ा दुश्मनडर और घबराहट से नेगेटिव सोच जन्म लेती है, जो विद्यार्थियों को और कमजोर बना देती है।

    “नेगेटिव सोच सबसे ज्यादा कमजोर कर देती है।”

    परीक्षा का डर कैसे दूर करें? महाराज जी के अमूल्य सूत्र

    ब्रह्मचर्य का पालन करेंमहाराज जी के अनुसार ब्रह्मचर्य से बुद्धि तेज होती है, स्मृति शक्ति बढ़ती है और आत्मविश्वास आता है।

    “ब्रह्मचर्य एक वो पावर है कि बुद्धि को एकदम प्रकाशित कर देगा… ब्रह्मचर्य के बिना स्मृति शक्ति नष्ट हो जाती है।”

    नशा, व्यभिचार और गलत संगति से बचेंमहाराज जी विद्यार्थियों को गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड, नशा, व्यभिचार जैसी आदतों से दूर रहने की सलाह देते हैं, क्योंकि ये जीवन और करियर दोनों को बर्बाद कर देती हैं।

    “गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड ये तुम्हारा नाश कर देगा… जब तक ब्याह ना हो तब तक ब्रह्मचारी रहना।”

    सकारात्मक सोच रखेंअगर दुर्भाग्यवश फेल भी हो जाएं तो निराश न हों, बल्कि अगले साल बेहतर तैयारी करें।

    “अगर मैं फेल भी हो गया तो अगले वर्ष तैयारी करूंगा और अच्छे से पास हो जाऊंगा, ऐसा भाव रखना चाहिए।”

    नियमित व्यायाम और प्राणायाम करेंब्रह्म मुहूर्त में उठकर व्यायाम, दौड़ और प्राणायाम करने से दिव्यता आती है और पढ़ा हुआ याद रहता है।

    “ब्रह्म मुहूर्त में व्यायाम करो, दौड़ो, प्राणायाम करो… फिर देखो जो पढ़ोगे वो याद रहेगा।”

    विद्यार्थी जीवन में विनय और अनुशासनविद्यार्थी जीवन तपस्वी जीवन है, इसमें विनम्रता, शुद्ध आचरण और माता-पिता व गुरुजनों का सम्मान जरूरी है।

    “विद्या विनयम ददाति… विद्यार्थी जीवन में विनय और गंभीरता होनी चाहिए।”

    समाज और माता-पिता के लिए संदेश

    • बच्चों को समय दें, मित्रवत व्यवहार करें और उनकी समस्याओं को समझें।

    • नशा, व्यभिचार और गलत संगति से बच्चों को बचाना समाज की जिम्मेदारी है।

    • अध्यात्म और नाम जप से जीवन में सकारात्मकता और शक्ति आती है।

    निष्कर्ष:परीक्षा से डरना स्वाभाविक है, लेकिन महाराज जी के अनुसार सच्ची तैयारी, ब्रह्मचर्य, सकारात्मक सोच और शुद्ध जीवन से यह डर स्वतः समाप्त हो जाता है। विद्यार्थी जीवन को तपस्वी जीवन मानें, नकारात्मकता से दूर रहें और आत्मविश्वास से परीक्षा का सामना करें – सफलता निश्चित है।

    1. https://www.youtube.com/watch?v=Ps2Qg3-NaHg

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