भारत में 1000 करोड़ का ब्रांड कैसे बनता है? शिव शिवकुमार से स्टार्टअप फाउंडर्स के लिए सीख

1.भूमिका: भारत, स्टार्टअप्स और 1000 करोड़ का सवाल

  • भारत में लाखों छात्र पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन उनमें से सिर्फ लगभग 54% ही “एम्प्लॉयबल” माने जाते हैं, यानी जिनके पास नौकरी के लायक स्किल हैं।
  • देश तेजी से बढ़ रहा है, स्टार्टअप्स का बूम है, पर अच्छी क्वालिटी के लोग और रियल‑वर्ल्ड स्किल अभी भी कमी में हैं।
  • ऐसे माहौल में सवाल यह है कि कौन‑सी सोच, कौन‑सी स्ट्रैटेजी और कौन‑सा लीडरशिप स्टाइल वो ब्रांड बना पाएगा, जो 1000 करोड़ से भी बड़े बनें और सालों टिके रहें।

भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जहाँ एक तरफ यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स बन रहे हैं और दूसरी तरफ सिर्फ लगभग 54% स्टूडेंट्स ही एम्प्लॉयबल हैं। इसका मतलब है कि अवसर बहुत हैं, पर सही स्किल और सही लीडरशिप की भारी कमी है। ऐसे माहौल में यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि 1000 करोड़ का ब्रांड बनाने के लिए सिर्फ आइडिया या फंडिंग ही काफी नहीं, बल्कि सही बोर्ड, सही टीम, सही स्पीड और सही तरीके से ग्राहकों को समझने की जरूरत है।[listennotes]​youtube+1


2.शिव शिवकुमार कौन हैं और क्यों सुनना चाहिए

  • शिव शिवकुमार ने हिंदुस्तान यूनिलीवर, फिलिप्स, नोकिया, पेप्सिको इंडिया और आदित्य बिरला ग्रुप जैसी कंपनियों में लीडरशिप रोल निभाए हैं।
  • उन्होंने FMCG, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, मोबाइल हैंडसेट्स और टेलीकॉम जैसे अलग‑अलग इंडस्ट्री में बिज़नेस रन किए हैं, जिससे उन्हें “रेंज” और “एडैप्टेबिलिटी” दोनों मिले।youtube+1
  • अब वे कई कंपनियों के बोर्ड मेंबर और एडवाइज़र हैं, जहाँ उनकी भूमिका स्ट्रेटेजी, गवर्नेंस और सक्सेशन प्लानिंग जैसे क्रिटिकल मैटर्स पर गाइडेंस देना है।[facebook]​[youtube]​

शिव शिवकुमार सिर्फ एक कॉर्पोरेट एग्जीक्यूटिव नहीं, बल्कि कई इंडस्ट्रीज़ में काम कर चुके एक बहुआयामी लीडर हैं। हिंदुस्तान यूनिलीवर से लेकर फिलिप्स, नोकिया, पेप्सिको इंडिया और आदित्य बिरला ग्रुप तक, उन्होंने ऐसे बिज़नेस चलाए हैं जो अलग‑अलग बिज़नेस मॉडल, कस्टमर प्रोफाइल और चैलेंजेस के साथ आते हैं। यही वजह है कि जब वे बोर्ड, ब्रांड या लीडरशिप की बात करते हैं, तो वह सिर्फ थ्योरी नहीं बल्कि प्रैक्टिकल, जमीन से जुड़े हुए अनुभव पर आधारित होती है।


3. बोर्ड ऑफ़ एडवाइज़र्स की असली भूमिका

  • अच्छे बोर्ड मेंबर मिलना “रेपुटेशन” पर निर्भर करता है; अगर आपका काम और आपकी ईमानदारी जानी जाती है, तो कंपनियाँ खुद आपको बोर्ड में बुलाती हैं।
  • बोर्ड मेंबर की पहली जिम्मेदारी यह है कि कंपनी अच्छा करे और वह भी सही गवर्नेंस के दायरे में रहे – क़ानून, रेग्युलेशन, ESG, मिनिमम वेज, पीपल पॉलिसीज सबका पालन हो।[youtube]​
  • बोर्ड का काम “आगे देखना” है, जबकि मैनेजमेंट अक्सर दिन‑रात ऑपरेशंस में फंसा रहता है और हेड‑डाउन मोड में काम करता है।[youtube]​
  • अच्छे बोर्ड मेंबर ट्रेंड्स पकड़ते हैं, फिर उन पर सवाल पूछकर मैनेजमेंट को सोचने पर मजबूर करते हैं – “तुमने इस नए अवसर के बारे में सोचा है या नहीं?”
  • बोर्ड का एक बड़ा रोल पीपल कैपेबिलिटी, ट्रेनिंग और सक्सेशन प्लानिंग पर भी होता है – अगला लीडर कौन होगा, अगली लाइन तैयार है या नहीं।

किसी भी कंपनी का बोर्ड सिर्फ औपचारिकता नहीं होता, बल्कि वही असली गार्डरेल होता है जो कंपनी को सही दिशा में और सही तरीक़े से आगे बढ़ाता है। बोर्ड के सदस्य यह सुनिश्चित करते हैं कि बिज़नेस अच्छा चले, पर साथ ही सभी गवर्नेंस, क़ानूनी और एथिकल नियमों का पालन भी हो। मैनेजमेंट जहाँ रोज़मर्रा के लक्ष्य, सेल्स, ऑपरेशन और फायरफाइटिंग में उलझा रहता है, वहीं बोर्ड का काम होता है “सर उठाकर क्षितिज देखना” – आने वाले अवसर, रिस्क और ट्रेंड्स को पहले से पहचानना और मैनेजमेंट को उन पर सोचने के लिए चैलेंज करना।[youtube]​


4. भारत में बोर्ड्स और इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स का बड़ा अवसर

  • भारत में लगभग 5200 लिस्टेड कंपनियाँ हैं, जो दुनिया में सबसे ज़्यादा है; अमेरिका में यह संख्या लगभग 3300 के आसपास है।[listennotes]​[youtube]​
  • हर कंपनी को औसतन 8–12 बोर्ड मेंबर चाहिए और उनमें से कम से कम 4 इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स होते हैं, जिनमें एक महिला डायरेक्टर की नियामकीय आवश्यकता भी है।[listennotes]​[youtube]​
  • इसका मतलब है कि अच्छी रेपुटेशन, सही अनुभव और इंटेग्रिटी रखने वाले प्रोफेशनल्स के लिए बोर्ड्स में काम करने का बहुत बड़ा स्पेस और डिमांड है।
  • लेकिन इस अवसर का लाभ वही लोग उठा पाएँगे जो अपना नाम, काम और नैतिकता – तीनों को सुरक्षित और मज़बूत रखते हैं।

भारत में जितनी तेज़ी से कंपनियाँ लिस्ट हो रही हैं, उतनी ही तेज़ी से अच्छे बोर्ड मेंबर्स की भी ज़रूरत बढ़ रही है। लगभग 5200 लिस्टेड कंपनियों और हर कंपनी में 8–12 बोर्ड मेंबर्स की आवश्यकता को देखें तो साफ़ दिखता है कि इंडिपेंडेंट डायरेक्टर्स की डिमांड बहुत बड़ी है, खासकर उन लोगों के लिए जो लंबा अनुभव, गहरी समझ और बेदाग रेपुटेशन लेकर आते हैं। पर इस मौके तक पहुँचने के लिए प्रोफेशनल्स को अपने करियर के शुरू से ही अपनी ईमानदारी, प्रोफेशनलिज़्म और वैल्यू‑एड को लगातार प्रोटेक्ट और इन्वेस्ट करना होगा।facebook+1[youtube]​


5. केस‑स्टडी: पेंगुइन पब्लिशिंग हाउस

  • पेंगुइन भारत में पब्लिशिंग इंडस्ट्री का मार्केट लीडर है, पर इंडस्ट्री खुद बहुत तेज़ नहीं बढ़ रही।
  • देश में लगभग 5200 बुकस्टोर्स और करीब 10,000 ऑथर्स हैं; हर कोई खुद को अगला “महान लेखक” मानता है, जिससे सबको पब्लिश करना प्रैक्टिकली संभव नहीं।
  • एक किताब पर ब्रेक‑ईवन तक पहुँचने के लिए लगभग 2000 कॉपीज़ बेचनी होती हैं, जो ज्यादातर टाइटल्स के लिए मुश्किल है।[youtube]​
  • बोर्ड में डिस्कशन के दौरान सुझाया गया कि जो भी नया लेखक पब्लिश होना चाहता है, उससे 2000 कॉपीज़ के लिए लगभग 4 लाख रुपये डिपॉज़िट लिए जाएँ।[youtube]​
  • अगर 2000 कॉपीज़ बिक जाती हैं तो यह डिपॉज़िट वापस कर दिया जाएगा; लेकिन एडिटोरियल क्वालिटी चेक वही रहेंगे, खराब किताब सिर्फ पैसे के दम पर पब्लिश नहीं होगी।
  • इस साधारण दिखने वाले स्ट्रक्चर से सीरियस और कैज़ुअल राइटर्स में नेचुरल फ़िल्टर बनता है और कंपनी की फाइनेंशियल रिस्क भी कंट्रोल में रहती है।[youtube]​

शिव शिवकुमार पेंगुइन पब्लिशिंग हाउस का उदाहरण देते हैं कि कैसे एक अच्छा बोर्ड कंपनी को सही सवाल पूछने के लिए मजबूर कर सकता है। भारत में 5200 बुकस्टोर्स और लगभग 10,000 ऑथर्स के बीच, हर किसी को पब्लिश करना न तो बिजनेस के लिए संभव है और न ही फाइनेंशियली सस्टेनेबल, खासकर जब एक किताब पर ब्रेक‑ईवन के लिए 2000 कॉपीज़ बेचना जरूरी हो। बोर्ड के स्तर पर यह आइडिया आया कि जो भी नया लेखक पब्लिश होना चाहता है, वह 4 लाख रुपये का डिपॉज़िट रखे, और अगर 2000 कॉपीज़ बिकती हैं तो पैसा वापस कर दिया जाए – इससे एक तरफ सीरियस ऑथर्स ही आगे आएँगे और दूसरी तरफ कंपनी का रिस्क भी नियंत्रित रहेगा, जबकि एडिटोरियल क्वालिटी पर कोई समझौता नहीं होगा।


4.6 छोटे बनाम बड़े: स्पीड बनाम साइज

  • बड़े कंपनियों में किसी भी नए आइडिया को अप्रूव होने में कई‑कई महीने लग जाते हैं – रिसर्च, प्रेज़ेंटेशन, इवैल्यूएशन, रिस्क‑मीटिंग्स, कई तरह के साइन‑ऑफ।youtube+1
  • एक एंटरप्रेन्योर या छोटी कंपनी अक्सर दो महीने में ही आइडिया से मार्केट तक पहुँच जाती है – इसलिए असली कंपटीशन “फास्ट बनाम स्लो कंपनी” का है, न कि “बिग बनाम स्मॉल कंपनी” का।[instagram]​[youtube]​
  • शिव का कहना है कि “किसी बड़े कंपनी ने कभी किसी छोटे कंपनी को नहीं हराया, बल्कि तेज़ कंपनी ने धीमी कंपनी को हराया है; बड़ी कंपनियाँ अक्सर छोटी कंपनी को खरीद लेती हैं, हराती नहीं।”[instagram]​[youtube]​
  • छोटे फाउंडर्स के लिए सबसे बड़ा हथियार “स्पीड” है – मार्केट के सिग्नल्स को जल्दी पकड़ना, फ़ैसले तुरंत लेना और तेजी से इटरेट करना।

बड़ी और छोटी कंपनियों की लड़ाई में अक्सर लोग मान लेते हैं कि “बड़ा हमेशा जीतेगा”, लेकिन शिव शिवकुमार इसे पूरी तरह गलत मानते हैं। उनके मुताबिक असली फर्क कंपनी के साइज नहीं बल्कि उसकी स्पीड में है – बड़ी कंपनियाँ जहाँ एक आइडिया पर साल भर चर्चा करती रहती हैं, वहीं एक स्टार्टअप दो–तीन महीने में उसे मार्केट में टेस्ट कर लेता है। इसलिए छोटे फाउंडर्स को समझना चाहिए कि उनका असली हथियार मार्केट में जल्दी उतरना, जल्दी सीखना और जल्दी पिवट करना है; अगर वे यही बढ़त बनाए रखें तो बड़ी से बड़ी कंपनी भी सिर्फ पैसे के दम पर उन्हें हर नहीं पाएगी, अधिकतम उन्हें खरीदने की कोशिश करेगी।


4.7 हाइरार्की, पावर और ब्लॉकिंग‑टैक्लिंग

  • बड़े संगठनों में लोग खुद को “फंक्शन का बॉस” मानते हैं – हेड ऑफ़ सेल्स, हेड ऑफ़ मार्केटिंग, हेड ऑफ़ फाइनेंस – और पूरे कंपनी के ओनर की तरह नहीं सोचते।
  • जैसे‑जैसे कंपनी बड़ी होती है, “डिपार्टमेंटल फाइट्स” बढ़ती हैं – सेल्स बनाम मार्केटिंग, मार्केटिंग बनाम फाइनेंस, फाइनेंस बनाम सप्लाई‑चेन; सब अपना‑अपना अजेंडा लेकर चलते हैं।
  • ऐसे माहौल में पावर का स्रोत एक नई चीज़ को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि दूसरे के प्रपोज़ल को रोकना बन जाता है – इसे शिव “ब्लॉकिंग और टैक्लिंग” कहते हैं.
  • इंडिया जैसे हाई‑पावर‑डिस्टेंस कल्चर में बॉस अक्सर अपनी पोज़िशन के ज़रिए तय करता है कि बाकी लोग कितने “नीचे” हैं और उससे कितने “डरकर” या “सर कहकर” बात करेंगे।
  • नतीजा यह होता है कि बहुत से अच्छे आइडिया सिर्फ इसलिए मर जाते हैं, क्योंकि किसी शक्तिशाली व्यक्ति की ईगो या असुरक्षा उन्हें आगे नहीं बढ़ने देती।

जैसे‑जैसे कोई कंपनी बड़ी होती है, उसके भीतर की राजनीति और पावर‑गेम भी उतनी ही जटिल हो जाती है। शिव शिवकुमार बताते हैं कि भारत जैसे हाई‑पावर‑डिस्टेंस देश में लोगों की पहचान अक्सर उनके टाइटल और हाइरार्की से जुड़ जाती है, जिससे वे खुद को पूरे संगठन के ओनर की बजाय सिर्फ अपने डिपार्टमेंट के “मालिक” के रूप में देखने लगते हैं। ऐसी स्थिति में इनोवेशन का सबसे बड़ा दुश्मन वह कल्चर बनता है जिसमें पावर का एहसास किसी आइडिया को सपोर्ट करने से नहीं, बल्कि दूसरे के आइडिया को रोकने से आता है, और यही “ब्लॉकिंग‑टैक्लिंग” बड़े संगठनों को धीमा और डरपोक बना देती है।


4.8 युवाओं का नज़रिया और फीडबैक की भूख

  • आज के युवा सोशल मीडिया की दुनिया में बड़े हुए हैं – वे रोज़ाना लाइक और डिस्लाइक दोनों देखते हैं, इसलिए आलोचना से उतना नहीं डरते।
  • पुरानी पीढ़ी के लीडर्स अक्सर आलोचना से असहज रहते हैं; वे टाइटल और पोज़िशन को “क्रिटिसिज़्म से इम्यूनिटी” की तरह देखते हैं
  • युवा कर्मचारी चाहते हैं कि उन्हें रोज़ या कम से कम बहुत फ्रीक्वेंट फीडबैक मिले – चाहे पॉज़िटिव हो या नेगेटिव; उनके लिए “नो फीडबैक” मतलब “नो कनेक्शन” है।
  • कई पुराने टाइप की कंपनियों में साल भर भी बॉस से कोई फीडबैक नहीं मिलता, पर लोग नौकरी बची रहे तो खुश रहते हैं; यह अब नई पीढ़ी को स्वीकार नहीं।
  • शिव के अनुसार, अगर आपकी टीम आपसे लगातार फीडबैक मांग रही है, तो वे असल में आपसे “कनेक्शन और इन्गेजमेंट” मांग रहे हैं।

फीडबैक के मामले में नई और पुरानी पीढ़ी के बीच बहुत बड़ा गैप है। सोशल मीडिया युग में पले‑बढ़े युवा रोज़ाना सार्वजनिक तारीफ और आलोचना दोनों के बीच रहते हैं, इसलिए वे नकारात्मक फीडबैक से डरने की बजाय उसे अपने सुधार का इनपुट मानते हैं, जबकि पुरानी पीढ़ी के कई लीडर्स अपने टाइटल और सीनियरिटी को आलोचना से बचाव की ढाल बना लेते हैं। यही वजह है कि आज की टीमों के लिए सबसे बड़ी शिकायत यह नहीं है कि “बॉस ने डाँटा”, बल्कि यह है कि “बॉस बात ही नहीं करता”, क्योंकि उनके लिए लगातार फीडबैक ही असली कनेक्शन और केयर का सबूत बन चुका है।[instagram]​[youtube]​



6. छोटे फाउंडर्स क्या नहीं समझते – बड़ी कंपनियों की असली ताकत

  • शिव के मुताबिक, छोटे फाउंडर्स अक्सर ये मान लेते हैं कि “बड़ी कंपनियाँ सिर्फ स्लो और ब्यूरोक्रेटिक हैं, उनमें विज़न नहीं होता,” जबकि हक़ीक़त ये है कि बड़ी कंपनियाँ किसी भी अवसर पर बहुत बड़ा सोच सकती हैं.
  • बड़ी कंपनियों के पास डाटा, रिसर्च, कंसल्टेंट्स और मार्केट इनसाइट्स की भरमार होती है, इसलिए वे अवसर की साइज, रिस्क और लॉन्ग‑टर्म इम्पैक्ट को कहीं ज़्यादा गहराई से समझ सकती हैं।
  • दिक्कत ये है कि इतनी जानकारी को सिंथेसाइज़ करने, इंटरनल अलाइनमेंट बनाने और सबको कन्विन्स करने में समय लग जाता है, जो उनकी स्पीड को धीमा कर देता है।
  • छोटी कंपनियाँ फील्ड के बहुत पास होती हैं, लेकिन उनके पास बड़े लेवल का डेटा और रिसर्च नहीं होता; वे अपनी समझ, इंट्यूशन और सीधे कस्टमर‑कॉन्टैक्ट के आधार पर फ़ैसले लेती हैं।
  • इसलिए शिव की सलाह है – छोटे फाउंडर्स को अपनी स्पीड बरकरार रखते हुए, बड़ी कंपनियों की जैसी सोचने की आदत (स्केल, डाटा, रिस्क‑ए.ngल) सीखनी चाहिए।

अक्सर स्टार्टअप फाउंडर्स बड़ी कंपनियों को “सिर्फ स्लो और बेढंगे डायनासोर” की तरह देखते हैं, लेकिन शिव शिवकुमार बताते हैं कि ये नज़रिया अधूरा है। बड़ी कंपनियों की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे किसी भी मौके को बहुत बड़े स्केल पर सोचने की क्षमता रखती हैं और उनके पास रिसर्च, कंसल्टेंट्स और इंटरनल डाटा की ऐसी पहुँच होती है, जो किसी भी छोटे प्लेयर के लिए लगभग असंभव है। हाँ, इस जानकारी को सिंथेसाइज़ करने और सबको कन्विन्स करने की प्रोसेस उन्हें स्लो बना देती है, लेकिन यही वो चीज़ है जो उनके फ़ैसलों को लंबी अवधि के लिए टिकाऊ भी बनाती है – छोटे फाउंडर्स को चाहिए कि वे अपनी स्पीड को बचाए रखते हुए, इस गहराई से सोचने की आदत भी सीखें।


7. फीडबैक का खेल – कैसे इंसान और कंपनियाँ बेहतर बनती हैं

  • बातचीत में शिव यह पॉइंट लाते हैं कि आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया के कारण रोज़ाना “फीडबैक लूप” में रहती है – हर पोस्ट पर लाइक, कमेंट, आलोचना सब दिखता है।
  • इस वजह से युवा कर्मचारी यह उम्मीद करते हैं कि उनके बॉस भी उन्हें लगातार बताते रहें कि वे सही कर रहे हैं या गलत, और अगर दो‑तीन महीने फीडबैक नहीं मिले तो उन्हें लगता है कि बॉस “डिस्कनेक्टेड” है।[facebook]​
  • शिव उदाहरण देते हैं कि अगर आप अपनी टीम को 10 दिन लगातार कड़ा या नेगेटिव फीडबैक भी दें, तो भी वे “नो फीडबैक” से ज़्यादा खुश होंगे, क्योंकि कम से कम उन्हें पता तो चलता है कि आप जुड़े हुए हैं।[facebook]​
  • वे कहते हैं, फ़ीडबैक सिर्फ “शाबाशी” नहीं है; असली फीडबैक वही है जो आपको बेहतर बनने के लिए असहज सवाल पूछे और आपकी कमियों पर रोशनी डाले।
  • लीडर्स के लिए सीख यह है कि फीडबैक को “पावर गेम” की तरह न देखें, बल्कि इसे दो‑तरफा बातचीत बनाएं, जहाँ जूनियर भी सीनियर को ईमानदारी से पॉइंट‑आउट कर सके – वरना केवल “हाँ‑में‑हाँ” वाली संस्कृति कंपनी को लंबे समय में नुकसान पहुँचाती है।

सोशल मीडिया के दौर ने हमारी फीडबैक की भूख को पूरी तरह बदल दिया है, खासकर युवाओं के लिए। शिव बताते हैं कि जिस पीढ़ी ने इंस्टाग्राम, यूट्यूब और ट्विटर पर रोज़ाना ओपिनियन और जजमेंट के बीच खुद को एक्सपोज़ किया है, उसके लिए नकारात्मक फीडबैक भी सामान्य हो चुका है, इसलिए वे बॉस से भी यही उम्मीद रखते हैं कि वह खुलकर और लगातार बोले – चाहे तारीफ हो या तंज। यहाँ सबसे बड़ा खतरा उन संगठनों में पैदा होता है जहाँ सीनियर लीडर्स सिर्फ “हाँ सर, ग्रेट सर” सुनने के आदी हैं; ऐसे में ईमानदार फीडबैक की कमी लोगों को बेहतर बनने से रोक देती है और कंपनी धीरे‑धीरे औसतपन की तरफ़ खिसकने लगती है।linkedin+1


8. इंडिया को क्यों चाहिए “रियलिटी और क्रिटिसिज़्म” की डोज़

  • शिव साफ़ कहते हैं कि भारत को, खासकर उसके लीडर्स को, “रियलिटी और क्रिटिसिज़्म” की अच्छी‑खासी डोज़ की ज़रूरत है।
  • वे बताते हैं कि हाई‑पावर‑डिस्टेंस कल्चर के कारण हम बचपन से “हाँ जी, सर जी, बहुत बढ़िया” जैसी भाषा में पले हैं, जहाँ असहमति को बदतमीज़ी या बगावत समझ लिया जाता है।
  • बोर्ड मीटिंग्स में वे खुद जानबूझकर ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से डिसेंट (असहमति) करने को कहते हैं, ताकि सब एंगल्स सामने आ सकें और ग्रुप‑थिंक से बचा जा सके।
  • वे अपने अनुभव से बताते हैं कि कई टॉप लीडर्स फीडबैक माँगते तो हैं, लेकिन असल में वे सिर्फ तारीफ सुनना चाहते हैं; जैसे ही आप ईमानदारी से सुधार की बात करते हैं, वे नाराज़ हो जाते हैं।
  • यह “इम्पोस्टर सिंड्रोम” और “पावर” का मिश्रण है – जितना बड़ा पद, उतना ज़्यादा डर कि कहीं मेरी कमज़ोरी पकड़ी न जाए, इसलिए क्रिटिसिज़्म से बचाव की दीवार बना ली जाती है।​

भारत जैसे समाज में जहाँ “बड़ों की इज़्ज़त” को अक्सर “बड़ों से सवाल न पूछना” मान लिया जाता है, वहाँ स्वस्थ आलोचना की संस्कृति बनाना बेहद मुश्किल काम है। शिव शिवकुमार मानते हैं कि अगर हम सच में मजबूत कंपनियाँ और लीडर्स बनाना चाहते हैं, तो हमें बोर्डरूम से लेकर टीम‑मीटिंग तक, हर जगह ईमानदार असहमति को स्पेस देना ही होगा, क्योंकि सही सवाल और कड़ा फीडबैक ही बड़े निर्णयों को मजबूत बनाता है। वरना हम ऐसे माहौल में फँसे रहते हैं जहाँ हर कोई सिर्फ “ग्रेट सर” कहता है, लेकिन असली समस्याएँ नीचे ही सड़ती रहती हैं और ऊपर तक कभी पहुँच ही नहीं पातीं।


9. इंडियन, अमेरिकन और चाइनीज़ कस्टमर्स – तीन अलग दुनिया

यह हिस्सा आप आर्टिकल में अलग सेक्शन की तरह रख सकते हैं, क्योंकि यह खुद में बहुत पावरफुल है।

  • इंडियन कस्टमर:
    • इंडियन ग्राहक किसी भी प्राइस पॉइंट पर “वैल्यू” चाहते हैं – यानी उन्हें महसूस होना चाहिए कि उन्होंने अच्छा सौदा किया है।
    • वे बहुत बुरी तरह बार्गेन करते हैं; चाहे एक लाख की चीज़ खरीद रहे हों, फिर भी 10% डिस्काउंट की मांग करेंगे, ताकि मन में संतोष रहे कि “मैंने पैसे बचाए।”
    • इंडियन कस्टमर प्राइस‑सेंसिटिव हैं, लेकिन सिर्फ सस्तेपन से खुश नहीं होते; वे चाहते हैं कि प्रॉडक्ट टिकाऊ भी हो, रिलायबल भी हो, और “पैसे वसूल” फील भी दे।
  • अमेरिकन कस्टमर:
    • अमेरिकन कस्टमर की सबसे यूनिक चीज़ है रिटर्न पॉलिसी – वे कुछ भी खरीद कर अगर पसंद न आए तो बिना सवाल, फुल रिफंड से लौटा सकते हैं।
    • इस वजह से उनका खरीदने का व्यवहार “ट्रायल‑एंड‑एरर” पर आधारित है; वे नए प्रॉडक्ट्स तेजी से आज़माते हैं, क्योंकि उन्हें भरोसा रहता है कि समस्याएँ आएँ तो ब्रांड खड़ा रहेगा।
    • इंडियन ग्राहक की तरह वे हर चीज़ में सौदेबाजी नहीं करते, बल्कि सर्विस, कंवीनियंस और रिटर्न आश्वासन को ज़्यादा वैल्यू देते हैं।
  • चाइनीज़ कस्टमर:
    • चाइनीज़ ग्राहक इनोवेशन और वैल्यू का अनोखा संयोजन हैं – वे जापानी कस्टमर्स की तरह इनोवेशन को भी वैल्यू देते हैं और इंडियन की तरह वैल्यू‑फॉर‑मनी भी चाहते हैं।
    • वे नए प्रॉडक्ट्स और टेक्नोलॉजी को तेजी से अपनाते हैं, बशर्ते उन्हें लगे कि उसमें प्रैक्टिकल बेनिफिट और सही कीमत दोनों हैं।
    • शिव के अनुभव में, तीनों में से भारत का कस्टमर सर्व करना सबसे कठिन है, क्योंकि यहाँ वैल्यू, प्राइस, भरोसा और सर्विस – सब एक साथ डिलीवर करना पड़ता है।

जब बात ग्लोबल ब्रांड‑बिल्डिंग की आती है, तो एक ही प्रॉडक्ट को तीन मार्केट में एक जैसे बेचना लगभग नामुमकिन है। शिव बताते हैं कि इंडियन कस्टमर जहाँ हर प्राइस पॉइंट पर पैसे की पूरी वसूली चाहता है और सौदेबाजी के बिना संतुष्ट नहीं होता, वहीं अमेरिकन कस्टमर ज़्यादा कंवीनियंस‑ड्रिवन है और मजबूत रिटर्न पॉलिसी के भरोसे नए प्रॉडक्ट जल्दी‑जल्दी ट्राई कर लेता है। दूसरी तरफ़ चाइनीज़ कस्टमर इनोवेशन और वैल्यू दोनों की डिमांड एक साथ रखता है – वे तेज़ी से नए प्रॉडक्ट अपनाते हैं, लेकिन अगर उन्हें लगे कि प्राइस के मुकाबले वैल्यू नहीं मिल रही तो तुरंत छोड़ भी देते हैं, इसीलिए इन बाज़ारों में सफल होने के लिए एक‑सा “ग्लोबल टेम्प्लेट” नहीं, बल्कि लोकल कस्टमर की नब्ज़ पकड़ने की क्षमता चाहिए।​


10. लो‑इंकम कंज्यूमर को महँगा फोन कैसे बेचा?

  • पॉडकास्ट में एक दिलचस्प चर्चा होती है कि बहुत लो‑इनकम कस्टमर, जिनकी महीने की कमाई ही सीमित है, उन्हें 10–15 हज़ार का फोन खरीदने के लिए कैसे कन्विन्स किया जाता है।
  • ऐसे कस्टमर के लिए 10–15 हज़ार का फोन सिर्फ एक गैजेट नहीं, बल्कि 10–15 दिन या कभी‑कभी पूरे महीने की ज़िंदगी का सवाल होता है; वे इसे “फूड बनाम फोन” के ट्रेड‑ऑफ की तरह देखते हैं।
  • कंपनी के नज़रिए से, उन्हें यह समझना होता है कि यह फोन उनके लिए किस तरह “इनकम‑जेनरेटिंग” एसेट बन सकता है – जैसे ऑनलाइन काम, UPI, कंटेंट क्रिएशन, जॉब सर्च, लर्निंग, आदि।
  • ब्रांड को अपनी कम्युनिकेशन में यह दिखाना पड़ता है कि फोन सिर्फ खर्च नहीं, बल्कि “इन्वेस्टमेंट” है – जो शिक्षा, नौकरी, अतिरिक्त कमाई या सामाजिक स्टेटस में रिटर्न दे सकता है।
  • शिव के अनुभव से, जब आप कस्टमर को उसकी भाषा में ये दिखा देते हैं कि यह प्रॉडक्ट उसकी ज़िंदगी में मापने योग्य सुधार ला सकता है, तब ही वह इतना बड़ा फाइनेंशियल फैसला लेता है।

लेख के लिए पैराग्राफ

सबसे चुनौतीपूर्ण लेकिन सबसे इनाम देने वाला सेगमेंट वह होता है जहाँ ग्राहक की आय लिमिटेड होती है, पर उसके सपने बड़े होते हैं। शिव बताते हैं कि भारत के छोटे शहरों और कस्बों में जब आप किसी ऐसे इंसान को 10–15 हज़ार का स्मार्टफोन बेचने की कोशिश करते हैं, जिसकी महीने की आधी सैलरी उसी में चली जाएगी, तो वह इसके बारे में सिर्फ “प्रॉडक्ट खरीद” की तरह नहीं, बल्कि “ज़िंदगी के बड़े रिस्क” की तरह सोचता है – क्या यह फोन मेरे लिए रोज़गार, सीखने और बेहतर भविष्य का रास्ता खोलेगा या नहीं। जो ब्रांड इस सवाल का ईमानदार और कंविन्सिंग जवाब दे पाते हैं, वही सच में लो‑इनकम सेगमेंट में मजबूत ब्रांड बना पाते हैं।[


11. कौन‑से निचे 1000 करोड़ के ब्रांड बना सकते हैं?

शिव तीन बड़े निचे पर जोर देते हैं, जहाँ आने वाले सालों में बहुत बड़े ब्रांड बन सकते हैं।

  1. हेल्थ और फिटनेस से जुड़े निचे
  • “कुछ भी जो मुझे फिट, हेल्दी, बेहतर दिखने वाला और कॉन्फिडेंट बनाता है, वह बड़ा बिज़नेस है” – शिव इस लाइन में हेल्थ‑फूड, हाई‑प्रोटीन, मिलेट्स, सप्लीमेंट्स, हेयर ग्रोथ, स्किन‑केयर सबको शामिल करते हैं।
  • लोग अपने हेल्थ, बॉडी और लुक्स में पहले से कहीं ज़्यादा इन्वेस्ट करने को तैयार हैं; टियर‑2 और टियर‑3 शहरों में भी यह ट्रेंड तेज़ी से बढ़ रहा है।
  • यहाँ असली अवसर “स्पेसिफिक प्रॉब्लम सॉल्विंग” में है – जैसे पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, बाल झड़ना, मोटापा, माइग्रेन, लो‑एनर्जी आदि जैसे कंस्यूमर‑स्पेसिफिक प्रॉब्लम के लिए टेलर्ड सॉल्यूशन्स।
  1. टाइम को सेव या मल्टिप्लाई करने वाले बिज़नेस
  • शिव कहते हैं, “टाइम खुद में एक डाइमेंशन है” – जो भी बिज़नेस लोगों का समय बचाता है, उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ाता है या उन्हें वही समय बेहतर क्वालिटी‑ऑफ‑लाइफ में खर्च करने देता है, वह बड़ा बिज़नेस बन सकता है।
  • इसमें ऑन‑डिमांड सर्विसेज, क्विक‑कॉमर्स, ऑटोमेशन टूल्स, AI‑असिस्टेड प्रोडक्टिविटी, टाइम‑मैनेजमेंट ऐप्स वगैरह सब शामिल हैं।[youtube]​
  • जैसे‑जैसे इनकम बढ़ती है, लोग “पैसे से समय खरीदने” के लिए ज़्यादा तैयार हो जाते हैं – यानी वे ज़्यादा पेमेंट कर के घरेलू काम, रिसर्च, बुकिंग्स, प्लानिंग जैसी चीज़ें आउटसोर्स करना चाहते हैं।[youtube]​
  1. स्पेसिफिक टार्गेट ग्रुप्स (खासकर महिलाओं के लिए सॉल्यूशन्स)
  • शिव सुझाव देते हैं कि हम अगर महिलाओं की रोज़मर्रा की खास समस्याओं और ज़रूरतों को गहराई से समझें – सेफ्टी, हेल्थ, केयरवर्क, करियर‑ब्रेक, फाइनेंस, मेंटल‑लोड – तो यहाँ बहुत बड़े, हाई‑मार्जिन निचे बन सकते हैं।[youtube]​
  • कई मार्केट्स में महिलाएँ इच्छा के बावजूद सही प्रॉडक्ट न मिलने की वजह से सर्विस्ड नहीं हैं; जो ब्रांड इस गैप को समझकर भरोसे के साथ हल दे पाएँगे, वे तेजी से स्केल कर सकते हैं।[music.youtube]​[youtube]​

1000 करोड़ का ब्रांड बनाने के लिए सिर्फ “कूल आइडिया” काफी नहीं, बल्कि ऐसा प्रॉब्लम चुनना पड़ता है जो लोगों की ज़िंदगी के कोर में बैठा हो। शिव के मुताबिक, हेल्थ‑फिटनेस, टाइम‑मैनेजमेंट और स्पेसिफिक टार्गेट ग्रुप्स – खासकर महिलाओं की अनदेखी जरूरतों – जैसे तीन बड़े एरिया आने वाले कई सालों तक नए ब्रांड्स के लिए गोल्डमाइन बने रहेंगे, बशर्ते आप सतही ट्रेंड्स के पीछे भागने की बजाय असली दर्द को समझें और लगातार वैलिडेट करते हुए सॉल्यूशन बनाएं।


आगे का हिस्सा इसी स्टाइल में जोड़ रहा हूँ, ताकि आप तीनों पार्ट्स मिलाकर पूरा बड़ा लेख बना सकें।


12. नोकिया और ब्लैकबेरी – दो अलग तरह की असफलताएँ

  • शिव दो बड़े ब्रांड्स की चर्चा करते हैं – नोकिया और ब्लैकबेरी – जो एक समय दुनिया पर राज कर रहे थे और आज लगभग गायब हैं।
  • नोकिया की गलती ज़्यादातर स्ट्रैटेजिक थी: उन्होंने स्मार्टफोन के दौर में एंड्रॉइड की बजाय विंडोज़ ऑपरेटिंग सिस्टम पर दांव लगा दिया, जो मार्केट की मेनस्ट्रीम चॉइस नहीं बन पाया।[youtube]​[businesstoday]​
  • शिव साफ़ कहते हैं, “यह सीईओ और बोर्ड, दोनों की स्ट्रैटेजिक मिस्टेक थी,” क्योंकि ऑपरेटिंग सिस्टम की पसंद ने ही नोकिया की पूरी दिशा तय कर दी।[businesstoday]​
  • दूसरी तरफ ब्लैकबेरी के पास प्रॉडक्ट‑लेवल पर जबरदस्त एडवांटेज था – सिक्योर ईमेल, रियल‑टाइम कम्युनिकेशन और BBM जैसी मैसेजिंग सर्विस, जिसे यूज़र्स बहुत पसंद करते थे।
  • समस्या यह हुई कि ब्लैकबेरी ने अपनी सफलता को सिर्फ “ईमेल डिवाइस” की कहानी से जोड़कर देखा, जबकि कस्टमर धीरे‑धीरे सोशल, मैसेजिंग और ऐप‑बेस्ड इकोसिस्टम की तरफ जा रहा था।
  • शिव बताते हैं कि BBM असल में व्हाट्सऐप से पहले ही “प्राइवेट, वन‑टू‑वन सोशल कम्युनिकेशन” का ज़बरदस्त प्लेटफॉर्म था, लेकिन कंपनी ने इसे बड़े लेवल पर स्केल और ओपन नहीं किया।

मोबाइल इंडस्ट्री की दो सबसे दिलचस्प कहानियाँ नोकिया और ब्लैकबेरी की हैं, जो दोनों ही अपनी‑अपनी तरह से असफल हुए। नोकिया का गिरना मुख्य रूप से एक स्ट्रैटेजिक फैसले की वजह से था – स्मार्टफोन क्रांति के समय दुनिया एंड्रॉइड की तरफ मुड़ रही थी, लेकिन नोकिया ने विंडोज़ पर दांव लगाकर खुद को उसी इकोसिस्टम में बांध लिया, जो कस्टमर और डेवलपर्स दोनों की पसंद नहीं बन पाया। ब्लैकबेरी की कहानी अलग है; उसके पास ईमेल और BBM जैसे शानदार प्रोडक्ट थे, पर कंपनी ने अपने आपको सिर्फ “कॉरपोरेट ईमेल डिवाइस” के रूप में देखना जारी रखा और यह नहीं समझा कि यूज़र अब सुरक्षित ईमेल से आगे बढ़कर चैट, ग्रुप्स, स्टेटस और मल्टीमीडिया शेयरिंग जैसे सोशल बिहेवियर की तरफ़ बढ़ रहा है।


13. यूनिलीवर की एक जीत, एक हार – इनोवेशन से सीखी गई सीख

13.1 सैशे – जिसने पूरा मार्केट बदल दिया

  • शिव FMCG इंडस्ट्री में “सैशे” को एक ऐसी इनोवेशन मानते हैं जिसने भारत जैसे देशों में प्रोडक्ट कंजम्प्शन का पैटर्न ही बदल दिया।
  • पहले ज्यादातर प्रॉडक्ट्स बड़ी पैकिंग में आते थे; सैशे ने पहली बार “फिक्स्ड प्राइस पॉइंट” का कॉन्सेप्ट लाया – 1 रुपये, 2 रुपये, 5 रुपये पर छोटा पैक।
  • यूनिलीवर और अन्य कंपनियों ने यह समझा कि लो‑इनकम या ग्रामीण कस्टमर के लिए “कुल कीमत” नहीं, बल्कि “एक बार में देने वाली रकम” ज़्यादा मायने रखती है – उन्हें एक‑एक बार में छोटी रकम देनी सुविधाजनक लगती है।
  • शिव बताते हैं कि कोलगेट ने जब छोटे पैकिंग का कॉन्सेप्ट टेस्ट किया, तो दो मैसेजिंग रखी:
    • “ये छोटा पैक है, आप गरीब हैं इसलिए ये खरीदिए।”
    • “ये छोटा पैक है, इसे इस्तेमाल करना ‘फन’ और आसान है।”
      कस्टमर ने दूसरी, पॉज़िटिव और “फन” वाली पोजिशनिंग पसंद की।
  • आज लगभग 40% FMCG बिज़नेस प्राइस‑पॉइंट बेस्ड पैक्स पर चलता है, जिसकी जड़ें इसी सैशे इनोवेशन से जुड़ी हैं।

यूनिलीवर की सबसे बड़ी जीतों में से एक “सैशे” इनोवेशन है, जिसने भारत जैसे देशों में खपत का लोकतंत्रीकरण कर दिया। पहले जहाँ शैंपू, ब्यूटी प्रॉडक्ट या टूथपेस्ट जैसी चीज़ें ज़्यादातर मिडिल और अपर‑मिडिल क्लास की पहुँच में थीं, वहीं 1–2 रुपये के सैशे ने लो‑इनकम कस्टमर को भी उन्हें आज़माने और रेगुलर यूज़र बनने का मौका दिया। इस इनोवेशन की असली समझ यह थी कि गरीब ग्राहक “कुल सालाना खर्च” नहीं, बल्कि “आज की जेब से कितना जा रहा है” के आधार पर फैसला लेते हैं – फिक्स्ड प्राइस‑पॉइंट सैशे ने उनकी यह दिक्कत दूर कर दी और कंपनियों के लिए भी वॉल्यूम और मार्केट शेयर के नए दरवाज़े खोल दिए।

13.2 जब इनोवेशन नहीं आई – डिजिटल में चूक

  • शिव यह भी स्वीकार करते हैं कि हाल के सालों में बड़ी कंपनियाँ, खासकर कुछ यूनिलीवर जैसे दिग्गज, डिजिटल इनोवेशन के मामले में पीछे रह गए हैं।[youtube]​
  • वे कहते हैं कि कई सालों से “डिजिटल‑टू‑कंज्यूमर, ई‑कॉमर्स, डायरेक्ट‑टू‑कस्टमर” जैसे शब्द मीटिंग्स में खूब बोले गए, पर ज़मीन पर उतनी सार्थक, डिसरप्टिव इनोवेशन नहीं दिखी।[youtube]​
  • “लास्ट फाइव‑सिक्स ईयर्स में कोई ढंग की, वैल्यू‑ऐडिंग इनोवेशन नहीं आई” – यह बात वे बतौर क्रिटिकल फ्रेंड कहते हैं; यानी अंदर से समझने वाले व्यक्ति के तौर पर।[youtube]​
  • उनका पॉइंट यह है कि प्रेज़ेंटेशन में “डिजिटल, डेटा, डायरेक्ट” बोलना आसान है, लेकिन जब तक कंज्यूमर के लिए रियल, मेज़रबल वैल्यू न बने, तब तक इसे इनोवेशन नहीं कहा जा सकता।[youtube]​

लेख के लिए पैराग्राफ

जिस तरह सैशे जैसी इनोवेशन ने यूनिलीवर को मार्केट लीडरशिप दी, उसी तरह डिजिटल की नई दुनिया में इनोवेशन की कमी उन्हें चुनौती दे रही है। शिव साफ़ शब्दों में कहते हैं कि कई वर्ष से डिजिटल, डायरेक्ट‑टू‑कंज्यूमर और ई‑कॉमर्स के नाम पर बहुत बातें तो हुईं, पर कंज्यूमर की नज़र से देखें तो पिछले पाँच‑छह साल में कोई ऐसी इनोवेशन नहीं आई जो मार्केट को उसी तरह हिला दे, जैसे कभी सैशे ने किया था। यह सीख हर बड़ी कंपनी के लिए है – अतीत की इनोवेशन पर जीना आसान है, लेकिन आज की दुनिया में जीतने के लिए लगातार नई, सच्ची और कंज्यूमर‑सेंट्रिक इनोवेशन लानी ही होगी।[youtube]​


14. कैपिटल बनाम लोग – असली कमी कहाँ है?

  • पॉडकास्ट में शिव एक बहुत अहम बात कहते हैं – “आज के जमाने में आइडिया और कैपिटल, दोनों ही स्कार्स नहीं हैं; असली कमी अच्छे लोगों की है।”
  • वे बताते हैं कि लंबे समय तक अमेरिका और यूके जैसे देशों में इंटरेस्ट रेट लगभग 0–1% रहे, जिससे सस्ता कैपिटल एशिया और खासकर भारत जैसे देशों की तरफ आया।
  • इन्वेस्टर्स कम ब्याज पर पैसा उठाकर, यहाँ 8–10% रिटर्न से भी खुश थे; यानी लॉजिकल तौर पर कैपिटल की कमी नहीं थी, बल्कि प्रॉडक्टिव, टिकाऊ बिज़नेस मॉडल की कमी थी।[open.spotify]​[youtube]​
  • शिव का कहना है कि “आइडियाज़ डजन‑ए‑डाइम हैं” – आइडिया मिलना बहुत आसान है; मुश्किल यह है कि ऐसे लोग मिलें जो उस आइडिया को दिन‑रात की मेहनत, ईमानदारी और अनुशासन के साथ सालों तक खींचकर ले जाएँ।[open.spotify]​[youtube]​
  • स्टार्टअप इकोसिस्टम में भी बहुत से फाउंडर्स शुरू में फंडिंग ले आते हैं, लेकिन सही टीम न होने, गवर्नेंस की कमी या पर्सनल डिसिप्लिन न रहने से बिज़नेस स्केल होने से पहले ही टूटने लगता है।[open.spotify]​

आज का ग्लोबल फाइनैंसियल सिस्टम इस बात का सबूत है कि अगर आपका बिज़नेस मॉडल भरोसेमंद हो, तो पैसा कहीं‑न‑कहीं से मिल ही जाता है। शिव शिवकुमार याद दिलाते हैं कि अमेरिका और यूके जैसे देशों में जब इंटरेस्ट रेट 0–1% पर टिके रहे, तब सारा सस्ता पैसा एशियन मार्केट्स में रिटर्न के लिए भागा, पर इस आसान कैपिटल के बावजूद कोई बहुत बड़ी संख्या में “टिकाऊ, प्रॉडक्टिव बिज़नेस” नहीं खड़े हो पाए। इसका सीधा मतलब है कि समस्या आइडिया या कैपिटल की कमी नहीं, बल्कि अच्छे और ईमानदार लोगों की कमी है – ऐसे लोग जो लंबे समय तक फोकस्ड रहकर टीम बनाएँ, सिस्टम खड़े करें और मुश्किल समय में भी रास्ते पर टिके रहें।businesstoday+1[youtube]​


15. 54% एम्प्लॉयबिलिटी – भारत की स्किल रियलिटी

  • शिव “इंडिया स्किल्स रिपोर्ट” का हवाला देते हैं, जिसके मुताबिक:
    • लगभग 76–78% MBAs एम्प्लॉयबल हैं।timesofindia.indiatimes+1[youtube]​
    • लगभग 74% इंजीनियर्स एम्प्लॉयबल हैं।[timesofindia.indiatimes]​[youtube]​
    • लगभग 51% आर्ट्स और साइंस ग्रेजुएट्स एम्प्लॉयबल हैं।[timesofindia.indiatimes]​[youtube]​
    • ओवरऑल मिलाकर, सिर्फ लगभग 54% लोग “जॉब‑रेडी” हैं – यानी जिनके पास कंपनी के हिसाब से बेसिक स्किल्स हैं।[wheebox]​[youtube]​
  • वे यह भी समझाते हैं कि “स्टडी कर रहे 250 मिलियन” में से अगर आधे भी हर साल एम्प्लॉयबल हों, तो आने वाले सालों में जॉब क्रिएशन का प्रेशर कितना बड़ा होगा।[wheebox]​[youtube]​
  • शिव के हिसाब से यह समस्या कई चीज़ों के मेल से बनी है:
    • कोर्स और सिलेबस आउटडेटेड हैं।[wheebox]​[youtube]​
    • टीचिंग‑मेथड्स अभी भी एनालॉग हैं, जबकि दुनिया डिजिटल हो चुकी है।[youtube]​
    • इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग, इंटर्नशिप और रियल‑लाइफ प्रोजेक्ट्स पर कम जोर है।[wheebox]​[youtube]​
  • वे साफ़ कहते हैं – “हम डिजिटल दुनिया में जी रहे हैं, लेकिन बच्चों को आज भी एनालॉग स्किल्स सिखा रहे हैं; ऐसे में वे डिजिटल जॉब के लिए कैसे तैयार होंगे?”youtube+1

भारत की डेमोग्राफिक स्टोरी अक्सर “यंग पॉप्युलेशन” के रूप में बेची जाती है, लेकिन शिव शिवकुमार इस पर एक ज़रूरी रियलिटी चेक लगाते हैं। इंडिया स्किल्स रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि MBA और इंजीनियरिंग जैसे प्रोफेशनल कोर्सेज़ में भी लगभग एक‑चौथाई स्टूडेंट्स जॉब‑रेडी नहीं हैं, जबकि आर्ट्स और साइंस जैसे स्ट्रीम्स में तो आधे से भी कम स्टूडेंट्स को इंडस्ट्री तुरंत काम पर रखने लायक मानती है। जब आप यह देखते हैं कि कुल मिलाकर सिर्फ लगभग 54% लोग ही एम्प्लॉयबल हैं, तो समझ आता है कि “युवा आबादी” अगर सही स्किल से लैस न हो, तो डेमोग्राफिक डिविडेंड की बजाय डेमोग्राफिक बोझ भी बन सकती है – और यही वह मुश्किल है जिसे भारत को तेज़ी से एड्रेस करना होगा।timesofindia.indiatimes+1[youtube]​


16. जॉब क्रिएशन, इन्वेस्टमेंट और पॉलिसी – सब कैसे जुड़े हैं

  • शिव समझाते हैं कि हर साल लाखों‑करोड़ों युवा जॉब मार्केट में आते हैं; अगर हम चाहते हैं कि वे प्रॉडक्टिव जॉब में लगें, तो हमें लगातार नए जॉब्स क्रिएट करने होंगे।[timesofindia.indiatimes]​[youtube]​
  • जॉब क्रिएशन सीधा‑सीधा इन्वेस्टमेंट से जुड़ा है – जब तक प्राइवेट और पब्लिक, दोनों तरह का इन्वेस्टमेंट न बढ़े, नई फैक्ट्रियाँ, सर्विस कंपनियाँ, स्टार्टअप्स और प्रोजेक्ट्स नहीं बनेंगे।[wheebox]​[youtube]​
  • इन्वेस्टमेंट को खींचने के लिए पॉलिसीज़, प्रोसेसेज़ और रेग्युलेटरी माहौल ऐसा होना चाहिए जो:
    • प्रेडिक्टेबल हो
    • ट्रांसपेरेंट हो
    • और लंबे समय के लिए भरोसा देने वाला हो।[wheebox]​[youtube]​
  • अगर पॉलिसी अस्थिर, टैक्सेशन जटिल और रेग्युलेशन अनिश्चित हों, तो इन्वेस्टर “लो‑रिस्क मार्केट्स” की तरफ भाग जाते हैं, जिससे जॉब क्रिएशन धीमा पड़ता है।[wheebox]​
  • इसलिए शिक्षा, स्किल, इन्वेस्टमेंट और पॉलिसी – चारों को एक साथ देखकर ही असली समाधान निकलेगा; सिर्फ एक लेवल पर काम करने से पूरी चेन मजबूत नहीं होती।[wheebox]​[youtube]​

एम्प्लॉयबिलिटी की बहस को सिर्फ “कॉलिज क्या पढ़ा रहे हैं” तक सीमित कर देना आसान है, लेकिन शिव इसको एक बड़े इकॉनॉमिक फ्रेम में रखकर देखते हैं। वे याद दिलाते हैं कि हर साल सैकड़ों लाख युवा ग्रेजुएट होते हैं, और उन्हें प्रॉडक्टिव काम देने के लिए हमें लगातार बड़े स्तर पर इन्वेस्टमेंट आकर्षित करना होगा – ऐसी फैक्ट्रियाँ, सर्विस हब्स, टेक पार्क, मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर और स्टार्टअप इकोसिस्टम जो लाखों नई नौकरियाँ पैदा कर सके। यह इन्वेस्टमेंट तभी आएगा जब हमारे पॉलिसीज़ और प्रोसेसेज़ इन्वेस्टर‑फ्रेंडली, प्रेडिक्टेबल और ट्रांसपेरेंट हों; यानी स्किल और एजुकेशन रिफॉर्म के साथ‑साथ हमें पॉलिसी और गवर्नेंस के लेवल पर भी उतनी ही गंभीरता से काम करना होगा।[


अब इस आख़िरी पार्ट में मैं आपकी कहानी को पूरा कर रहा हूँ, ताकि तीनों हिस्से मिलाकर आप लगभग 6000+ शब्द का पूरा लेख आसानी से बना सकें।


17. एक बिज़नेस को डॉमिनेट कीजिए, सबकुछ नहीं

  • पॉडकास्ट के लगभग 1:00:39 वाले हिस्से में शिव यह पॉइंट उठाते हैं कि फाउंडर्स अक्सर बहुत सारे बिज़नेस एक साथ पकड़ लेते हैं और किसी में भी पूरी तरह नंबर‑1 नहीं बन पाते।[youtube]​[indian-podcasts]​
  • उनका कहना है कि अगर आप एक‑दो बिज़नेस में सच‑मुच “कैटेगरी लीडर” बन जाएँ, तो बाद में आस‑पास की कैटेगरी में जाना आसान होता है, क्योंकि आपके पास ब्रांड, डिस्ट्रीब्यूशन और सिस्टम पहले से होता है।indian-podcasts+1
  • बहुत से एंटरप्रेन्योर्स “डाइवर्सिफिकेशन” को जल्दी शुरू कर देते हैं – थोड़ा यहाँ, थोड़ा वहाँ – इससे फोकस और एक्सीक्यूशन दोनों कमजोर हो जाते हैं।[indian-podcasts]​
  • शिव उदाहरणों के ज़रिए समझाते हैं कि जो कंपनियाँ पहले एक कैटेगरी में गहराई से जीतती हैं, वही आगे जाकर दूसरे सेगमेंट में भी मज़बूती से उतर पाती हैं; जो शुरुआत से ही सब कुछ बनना चाहें, वे अंत में कुछ भी खास नहीं बन पातीं।music.youtube+1

स्टार्टअप दुनिया में “मल्टीपल रिवेन्यू स्ट्रीम्स” और “डाइवर्सिफिकेशन” जैसे शब्द बहुत आकर्षक लगते हैं, लेकिन शिव शिवकुमार एक अलग दृष्टि रखते हैं। उनके मुताबिक, 1000 करोड़ का ब्रांड बनाने के लिए सबसे पहले आपको एक चुने हुए बिज़नेस में इतनी गहराई से उतरना होगा कि आप वहाँ निर्विवाद लीडर बन जाएँ – यानी आपके नाम के बिना उस कैटेगरी की बात ही न हो सके। जब आप यह स्टेटस हासिल कर लेते हैं, तभी आपका ब्रांड, डिस्ट्रीब्यूशन और प्रोसेस आपको नई कैटेगरीज़ में नैचुरल एडवांटेज देते हैं; लेकिन अगर आप शुरुआत से ही पाँच दिशाओं में भागते रहेंगे, तो न फोकस बचेगा, न एनर्जी और न ही क्लियर ब्रांड आइडेंटिटी।music.youtube+1


18. लो‑ट्रस्ट सोसायटी में ट्रस्ट कैसे बनाते हैं?

18.1 इंडिया – एक लो‑ट्रस्ट सोसायटी

  • शिव कहते हैं कि भारत मूलतः एक “लो‑ट्रस्ट सोसायटी” है – यहाँ लोग नए इंसान, नए ब्रांड और नई कंपनी पर जल्दी भरोसा नहीं करते।[indian-podcasts]​[youtube]​
  • हमारे इतिहास, सिस्टम और करप्शन की कहानियों ने लोगों को सिखा दिया है कि “कागज़ दिखाओ, प्रूफ दिखाओ, रेफरेंस दिखाओ,” तभी वे मानते हैं।indian-podcasts+1
  • लो‑ट्रस्ट सोसायटी में हर नया रिलेशनशिप – चाहे ग्राहक‑ब्रांड का हो या एम्प्लॉयी‑कंपनी का – डिफ़ॉल्ट रूप से “संदेह” से शुरू होता है, न कि ट्रस्ट से।music.youtube+1

18.2 ऐसे माहौल में भरोसा कैसे बनाया जाए?

शिव कुछ प्रैक्टिकल पॉइंट्स बताते हैं:

  • कंसिस्टेंसी:
    • ट्रस्ट अचानक बड़े ऐड कैम्पेन से नहीं बनता, बल्कि रोज़मर्रा की छोटी‑छोटी इंटरैक्शन में बनता है – प्रॉमिस किया था तो समय पर डिलीवर करना, कस्टमर‑सर्विस में ईमानदारी से जवाब देना, रिटर्न या वारंटी में बहाने न बनाना आदि।
  • ऑथेंटिसिटी (सच‑मुच वही होना जो दिखाते हैं):
    • ब्रांड जितना दिखावा करते हैं और उतना डिलीवर नहीं करते, उतनी ही जल्दी पकड़े जाते हैं; सोशल मीडिया हर गलती को तुरंत वायरल कर देता है।
    • अगर आप किसी वैल्यू की बात करते हैं – जैसे सस्टेनेबिलिटी, जेंडर इक्विटी या ट्रांसपेरेंसी – तो उसे अपने इंटरनल सिस्टम में भी जीना पड़ेगा, वरना लोग आपको “हिपोक्रिट” मान लेते हैं।
  • रीलेवेंस:
    • ट्रस्ट सिर्फ “ईमानदार” होने से नहीं बनता; आपको कस्टमर की असली ज़रूरत, लाइफ‑स्टेज और कॉन्टेक्स्ट को भी समझना होगा।
    • जो ब्रांड लोगों की ज़िंदगी में सही समय पर, सही सॉल्यूशन के रूप में आते हैं, उनके लिए कस्टमर नैचुरली पॉज़िटिव फील करता है – “ये मेरी लाइफ समझते हैं।”

भारत जैसे लो‑ट्रस्ट सोसायटी में ब्रांड‑बिल्डिंग सिर्फ “अच्छा प्रॉडक्ट + अच्छा मार्केटिंग” का खेल नहीं रह जाता, बल्कि भरोसे का लंबा सफर बन जाता है। शिव के मुताबिक, यहाँ कस्टमर डिफ़ॉल्ट रूप से शंका से शुरू करता है – उसे लगता है कि शायद कंपनी उसे धोखा दे दे, सर्विस में टालमटोल करेगी या वादे के मुताबिक डिलीवर नहीं करेगी, इसलिए जो ब्रांड रोज़ाना की डिलिवरी, सर्विस और कम्युनिकेशन में कंसिस्टेंट, ऑथेंटिक और कस्टमर‑रीलेवेंट रहते हैं, वही धीरे‑धीरे ज़्यादा भरोसेमंद बनते हैं। आज के सोशल मीडिया युग में जहाँ हर छोटी गलती भी तुरंत वायरल हो जाती है, वहाँ “भरोसा” सबसे बड़ा एसेट और सबसे ज़्यादा वल्नरेबल रिसोर्स दोनों बन गया है।youtube+1indian-podcasts+2


19. CEO का सबसे बड़ा डर – हर 24 घंटे में ट्रस्ट की परीक्षा

  • जब राज उनसे पूछते हैं कि “बिलियन‑डॉलर CEOs की रोज सुबह सबसे बड़ी चिंता क्या होती है,” तो शिव एक लाइन में जवाब देते हैं – “रेपुटेशनल रिस्क, पर्सनल भी और इंस्टीट्यूशनल भी।”youtube+1
  • वे कहते हैं, “आज के दौर में ट्रस्ट हर 24 घंटे में जीता और हारा जाता है” – एक दिन में लिया गया गलत फैसला, एक गलत बयान, या एक गलत हैंडल किया हुआ क्राइसिस सालों की मेहनत पर पानी फेर सकता है।youtube+1
  • सोशल मीडिया, 24×7 न्यूज़ और व्हाट्सऐप यूनिवर्स ने CEOs को हर वक्त “स्क्रीन” पर ला दिया है – कोई भी लीक, इनसाइड स्टोरी या अफ़वाह फौरन पब्लिक डोमेन में पहुँच जाती है।[instagram]​
  • इसलिए आज अच्छे CEOs की सबसे बड़ी चिंता “प्रॉफिट कितना कमाया” नहीं, बल्कि “क्या हमने आज भी अपना भरोसा बचाया” बन चुकी है।[instagram]​[youtube]​

बड़े कॉरपोरेट हाउस के लीडर्स के बारे में अक्सर सोचा जाता है कि उनकी सबसे बड़ी चिंता रेवेन्यू, प्रॉफिट या स्टॉक प्राइस होगी, लेकिन शिव शिवकुमार इस मिथ को तोड़ते हैं। उनके मुताबिक, आज किसी भी बिलियन‑डॉलर CEO की सुबह की सबसे बड़ी फिक्र यह होती है कि “कहीं आज कोई ऐसा फैसला या घटना न हो जाए जो कंपनी और मेरी व्यक्तिगत रेपुटेशन को चोट पहुँचा दे,” क्योंकि 24×7 कनेक्टेड दुनिया में भरोसा एक दिन में भी जीता और हारा जा सकता है। यही कारण है कि आधुनिक लीडरशिप के लिए रेपुटेशन मैनेजमेंट, एथिकल डिसीज़न‑मेकिंग और ट्रांसपेरेंसी पहले से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण कौशल बन गए हैं।youtube+2[instagram]​


20. जैसे‑जैसे देश विकसित होता है, कौन‑से सेक्टर सबसे तेज़ बढ़ते हैं?

  • शिव इस पर भी बात करते हैं कि किसी देश की डेवलपमेंट जर्नी में कौन‑से सेक्टर सबसे तेज़ी से ग्रो करते हैं।[youtube]​[indian-podcasts]​
  • शुरुआती दौर में ध्यान अक्सर “बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर” पर रहता है – सड़कें, बिजली, पानी, कनेक्टिविटी, बेसिक बैंकिंग, आदि।[indian-podcasts]​
  • जैसे‑जैसे इनकम लेवल बढ़ते हैं, लोग ज़्यादा पैसा “कंजम्प्शन और सर्विसेज़” पर खर्च करने लगते हैं – FMCG, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, ट्रैवल, एंटरटेनमेंट, एजुकेशन, हेल्थ‑केयर।music.youtube+1
  • इसके बाद अगला फेज़ आता है जहाँ “एक्सपीरियंस‑बेस्ड” और “टाइम‑सेविंग” सर्विसेज़ – जैसे क्विक‑कॉमर्स, प्रीमियम हेल्थ, पर्सनल वेलनेस, फाइनेंसियल प्रोडक्ट्स – तेज़ी से बढ़ने लगते हैं।[music.youtube]​
  • शिव का तर्क है कि भारत इस समय “कंसम्पशन + सर्विसेज़” वाले स्टेज में है, जहाँ हेल्थ, टाइम और वेलनेस से जुड़े ब्रांड्स के पास सबसे ज़्यादा स्पेस है।[youtube]​[music.youtube]​

लेख के लिए पैराग्राफ

किसी भी देश के विकास को अगर सेक्टर‑वाइज़ देखें, तो साफ़ दिखता है कि शुरुआत में फोकस खाने‑पीने, रहने‑सहने और बुनियादी सुविधाओं पर होता है, लेकिन इनकम बढ़ने के साथ‑साथ लोग अपना ज़्यादा हिस्सा “क्वालिटी ऑफ लाइफ” पर खर्च करने लग जाते हैं। शिव के मुताबिक, भारत अभी उसी मोड़ पर खड़ा है जहाँ बेसिक ज़रूरतों के साथ‑साथ हेल्थ, एजुकेशन, वेलनेस, ट्रैवल, डिजिटल सर्विसेज़ और टाइम‑सेविंग प्रोडक्ट्स तेजी से ग्रो कर रहे हैं – यही वे सेगमेंट हैं जहाँ अगले कुछ सालों में कई नए 1000 करोड़ के ब्रांड खड़े हो सकते हैं।[youtube]​indian-podcasts+1


21. छोटे फाउंडर्स और युवा लीडर्स के लिए समेकित सीख

आख़िर में, अगर आप इस पूरे पॉडकास्ट से छोटे फाउंडर्स और युवा लीडर्स के लिए एक प्रैक्टिकल “चेकलिस्ट” निकालना चाहें, तो वो कुछ ऐसी दिखेगी:

  1. स्पीड आपका सबसे बड़ा हथियार है
  • बड़ी कंपनियाँ स्लो हैं; आप उन्हें कैपिटल या नेटवर्क से नहीं, बल्कि स्पीड और एगिलिटी से हरा सकते हैं – जल्दी सीखिए, जल्दी बदलिए, जल्दी लॉन्च कीजिए।[open.spotify]​[youtube]​
  1. एक बिज़नेस में गहराई से जीतिए
  • शुरू में सबकुछ मत कीजिए; एक चुने हुए बिज़नेस में इतनी गहराई से जाइए कि आप वहाँ कैटेगरी डेफाइन कर दें, फिर आस‑पास की कैटेगरी में जाएँ।[indian-podcasts]​
  1. अच्छे बोर्ड और मेंटर्स से खुद को घेरिए
  • सही बोर्ड, सही सवाल पूछकर आपको सिर उठाकर आगे देखने पर मजबूर करता है; अकेले फाउंडर का परस्पेक्टिव अक्सर ऑपरेशनल डिटेल में फँस जाता है।[youtube]​
  1. ट्रस्ट को रोज कमाइए, अतीत पर मत जीइए
  • भरोसा हर 24 घंटे में जीता और हारा जाता है; एक क्राइसिस, एक गलत जवाब सालों की मेहनत मिटा सकता है, इसलिए कंसिस्टेंसी, ऑथेंटिसिटी और ट्रांसपेरेंसी बनाए रखिए।youtube+1
  1. लोगों में इन्वेस्ट कीजिए – सिर्फ आइडिया और फंडिंग में नहीं
  • आइडिया और कैपिटल दोनों आज ओवर‑सप्लाई में हैं; असली दुर्लभता अच्छे, ईमानदार, स्किल्ड लोगों की है जो आपके साथ सफर पूरा चलें।youtube+1
  1. कस्टमर की नब्ज़ समझिए, न कि सिर्फ डेटा
  • इंडियन, अमेरिकन और चाइनीज़ कस्टमर तीन अलग तरह से सोचते हैं; वैल्यू, रिटर्न, इनोवेशन – हर जगह उनकी प्राथमिकताएँ अलग हैं, इसलिए “वन‑साइज‑फिट्स‑ऑल” एप्रोच से बचिए।[linkedin]​[youtube]​
  1. क्रिटिसिज़्म से डरिए मत, उसे आमंत्रित कीजिए
  • अपनी टीम, बोर्ड और कस्टमर – तीनों से ईमानदार फीडबैक माँगिए और सच‑मुच सुनिए; सिर्फ “ग्रेट सर” सुनने की चाह, लंबे समय में कंपनी को कमजोर बना देती है।[podcasts.apple]​[youtube]​

राज शमानी के साथ इस बातचीत में शिव शिवकुमार सिर्फ 1000 करोड़ का ब्रांड बनाने की रेसिपी नहीं देते, बल्कि एक ऐसी सोच सिखाते हैं जो किसी भी स्केल पर बिज़नेस और करियर दोनों को मजबूत बना सकती है। बोर्डरूम से लेकर क्लासरूम और स्टार्टअप गली तक, उनकी बातें हमें याद दिलाती हैं कि अंत में खेल उसी का है जो सही लोगों को साथ लेकर, तेज़ी से पर सीख‑समझकर चल सके, भरोसा रोज़‑रोज़ कमा सके और ज़रूरत पड़ने पर खुद पर सबसे पहले सवाल उठा सके। अगर आप भी ऐसा ब्रांड या करियर बनाना चाहते हैं जो सिर्फ वैल्यूएशन में नहीं, बल्कि लोगों के भरोसे और समाज के योगदान में भी बड़ा हो, तो यह पॉडकास्ट आपके लिए एक तरह का रोडमैप बन सकता है।youtube+2linkedin+1


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