पत्रकार अंशुमन तिवारी ने बताया देश की अर्थव्यवस्था का सच जो कोई नहीं बताएगा


1. पत्रकार अंशुमन तिवारी का वीडियो किस बारे में है?

वरिष्ठ पत्रकार अंशुमन तिवारी ने Budget 2026 और Economic Survey में छुपे कुछ “खतरनाक सच” समझाए हैं। बात सीधी है – भारत की अर्थव्यवस्था चमक भी रही है और अंदर ही अंदर कुछ ऐसे रिस्क भी बढ़ रहे हैं, जिन्हें आम लोग अक्सर नहीं देख पाते।

सरकार एक तरफ बड़े-बड़े विकास के दावे कर रही है, लेकिन दूसरी तरफ कर्ज, ब्याज का बोझ और सरकारी खर्च का तरीका ऐसे मोड़ पर पहुँच रहा है कि अगर सावधानी नहीं रखी गई तो भारत को अर्जेंटीना और ग्रीस (एथेंस) जैसे संकट की मिसालों से जोड़कर देखा जा सकता है। वीडियो इन्हीं जोखिमों को आसान भाषा में खोलता है।


2. Budget 2026: आम आदमी के लिए इसका मतलब क्या है?

Budget 2026 सरकार की वह सालाना योजना है जिसमें बताया जाता है कि अगले साल कितना पैसा कहाँ से आएगा और कहाँ खर्च होगा। कागज़ पर सब कुछ साफ-सुथरा दिखता है – राजस्व बढ़ेगा, विकास होगा, गरीबों के लिए योजनाएँ होंगी, इंफ्रास्ट्रक्चर बनेगा।

लेकिन आम आदमी के लिए असली सवाल ये हैं:

  • क्या मेरी जेब पर टैक्स का बोझ बढ़ेगा?
  • क्या महंगाई कंट्रोल में रहेगी या फिर से जेब ढीली करेगी?
  • क्या नौकरी के अवसर बढ़ेंगे या बस कागज़ों पर ही “रोजगार” दिखाया जाएगा?
  • क्या सरकार का कर्ज बढ़ने से आगे चलकर मेरे बच्चों पर बोझ पड़ेगा?

वीडियो का फोकस इसी पर है कि Budget और Economic Survey की बारीक लाइनों में छुपे आंकड़े हमें भविष्य का क्या संकेत दे रहे हैं।


3. Economic Survey का “विस्फोटक सच” क्या है?

Economic Survey बजट से एक दिन पहले आता है और यह देश की आर्थिक सेहत की रिपोर्ट कार्ड जैसा होता है। इस बार के सर्वे में कुछ ऐसी बातें लिखी हैं जिन्हें वीडियो में “विस्फोटक सच” कहा गया है, क्योंकि ये आम चर्चा में नहीं आतीं, लेकिन बहुत गंभीर हैं।

मुख्य बातें:

  • भारत का सार्वजनिक कर्ज (Public Debt) बड़ा और बढ़ता हुआ दिख रहा है।
  • Fiscal Deficit यानी सरकार की आमदनी और खर्च का घाटा ऊँचे स्तर पर बना हुआ है।
  • कई राज्यों की वित्तीय हालत कमज़ोर है, जो पूरे देश की आर्थिक स्थिरता के लिए खतरा बन सकती है।
  • अगर कर्ज और घाटे को समझदारी से न संभाला गया, तो आगे चलकर अर्थव्यवस्था पर बहुत दबाव पड़ सकता है – जैसे अर्जेंटीना या ग्रीस में हुआ था।

यानी, बाहर से हम तेज़ी से भागती अर्थव्यवस्था लगते हैं, लेकिन इंजन पर तापमान ज़्यादा है और गेज की सुई खतरे की तरफ बढ़ रही है।


4. Public Debt: सरकार का कर्ज, आपकी चिंता

Public Debt यानी सरकार पर कुल कितना कर्ज है – केंद्र सरकार + राज्य सरकारें। कर्ज लेना अपने आप में गलत नहीं होता, लेकिन चिंता तब होती है जब:

  • कर्ज बहुत तेज़ी से बढ़ने लगे,
  • कर्ज पर ब्याज चुकाने में ही सरकारी आमदनी का बड़ा हिस्सा चला जाए,
  • जो पैसा कर्ज से लिया जा रहा है, वह उत्पादन बढ़ाने वाले कामों में न लगकर सिर्फ रोज़मर्रा के खर्च में जल जाए।

Economic Survey में साफ लिखा है कि भारत पर कर्ज का बोझ चिंता की बात बन रहा है और इसे संभालना जरूरी है। अगर समय रहते इलाज न किया गया तो आगे चलकर सरकार के पास लोगों के काम आने वाले खर्च (स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार योजनाएँ) के लिए पैसे कम बचेंगे, क्योंकि बहुत सारा पैसा तो पहले से लिए गए कर्ज का ब्याज चुकाने में चला जाएगा।


5. Fiscal Deficit: हर साल का घाटा

Fiscal Deficit वह अंतर है जो सरकार की कुल आमदनी और कुल खर्च के बीच होता है। आम भाषा में, सरकार जितना कमा रही है उससे ज्यादा खर्च कर रही है और यह अतिरिक्त पैसा उसे कर्ज लेकर पूरा करना पड़ता है।

भारत में पिछले कुछ सालों से:

  • खर्च ज्यादा, आमदनी कम,
  • चुनावी सालों में और भी ज्यादा स्कीमें, सब्सिडी और रियायतें,
  • टैक्स वसूली बढ़ाने की कोशिशें, लेकिन साथ ही राहत देने के वादे भी

इन सबका नतीजा यह है कि Fiscal Deficit आराम से कम नहीं हो पा रहा। इसका असर यह होता है कि:

  • सरकार को लगातार ज्यादा कर्ज लेना पड़ता है,
  • इससे बाजार में ब्याज दरों पर दबाव पड़ता है,
  • RBI को महंगाई और ब्याज दर के बीच कठिन संतुलन साधना पड़ता है।

6. RBI की नीतियाँ और बजट की खींचतान

RBI (Reserve Bank of India) की जिम्मेदारी है कि वह महंगाई को कंट्रोल में रखे और साथ ही विकास के लिए पर्याप्त लिक्विडिटी और सस्ती फाइनेंसिंग भी उपलब्ध रहे। इसके लिए RBI ब्याज दरें तय करता है, बैंकों की लिक्विडिटी को नियंत्रित करता है और आर्थिक संकेतकों पर नज़र रखता है।

लेकिन समस्या तब बढ़ जाती है जब:

  • सरकार बहुत ज्यादा कर्ज ले रही हो,
  • बाजार में सरकारी बॉन्ड की भारी सप्लाई हो,
  • महंगाई पहले से ही ऊँची हो या ऊँची होने का डर हो।

ऐसी स्थिति में:

  • अगर RBI ब्याज दरें घटाए, तो महंगाई और कर्ज दोनों का खतरा बढ़ता है।
  • अगर RBI ब्याज दरें बढ़ाए, तो विकास और रोजगार पर चोट पड़ती है।
  • साथ ही सरकार के लिए भी कर्ज महंगा हो जाता है, यानी ब्याज का बोझ और बढ़ता है।

वीडियो का एक अहम पॉइंट यही है कि Budget की दिशा और RBI की नीतियाँ आपस में टकराव की स्थिति में पहुँच सकती हैं, जिससे अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा।


7. अर्जेंटीना और एथेंस (ग्रीस) की याद क्यों?

Economic Survey में जिस तरह के रिस्क की बात की गई है, उससे विश्लेषकों को अर्जेंटीना और ग्रीस जैसे देशों के संकट याद आने लगे हैं।

इन देशों में क्या हुआ था, सरल भाषा में:

  • सरकारों ने सालों तक ज्यादा खर्च और ज्यादा कर्ज पर भरोसा किया।
  • चुनावी राजनीति में लोकप्रिय योजनाएँ चलती रहीं, मेहनत कम, वादे ज्यादा।
  • कर्ज इतना बढ़ गया कि उसे चुकाने की क्षमता कम होती गई।
  • अंत में स्थिति यहाँ तक पहुँची कि:
    • मुद्रा की कीमत गिर गई,
    • महंगाई आसमान पर चली गई,
    • लोगों की बचत और पेंशन की वैल्यू घट गई,
    • सरकार को सख्त कटौतियाँ (Austerity) करनी पड़ीं – यानी आम आदमी पर बड़ा बोझ पड़ा।

भारत की स्थिति अभी वहाँ नहीं पहुँची है, लेकिन जिस तरह के रिस्क का इशारा Survey कर रहा है, वह एक चेतावनी है कि अगर हमने समय रहते सुधार नहीं किए तो भविष्य में मुश्किलें बढ़ सकती हैं।


8. क्या भारत किसी “जाल” में फँस रहा है?

वीडियो में यह सवाल उठता है कि क्या भारत का बजट किसी जाल में फँस गया है – यानि एक ऐसी स्थिति जहाँ:

  • सरकार कर्ज के बिना बजट बना ही न पाए,
  • ब्याज भुगतान बजट का बहुत बड़ा हिस्सा खा जाए,
  • जनकल्याण और विकास पर वास्तविक खर्च सिकुड़ता जाए,
  • और फिर भी जनता को दिखाने के लिए कागज़ पर “बड़ी-बड़ी योजनाएँ” जारी रहें।

यह जाल तीन चीजों से बनता है:

  1. लगातार ऊँचा Fiscal Deficit
  2. बढ़ता हुआ Public Debt
  3. सरकारी नीतियों में Political Compulsion – यानी चुनावी मजबूरियाँ, आर्थिक विवेक से बड़ी हो जाएँ

Survey बताता है कि अगर हम कर्ज और घाटे पर लगाम नहीं लगाएंगे, तो आगे चलकर सरकार के हाथ बंधे हुए होंगे – न वह टैक्स कम कर पाएगी, न ज्यादा खर्च कर पाएगी, न अर्थव्यवस्था को झटकों से बचा पाएगी।


9. राज्यों की स्थिति: कमजोर कड़ी

भारत जैसे संघीय ढांचे में केवल केंद्र सरकार की सेहत देखना काफी नहीं है, राज्यों की हालत भी बहुत मायने रखती है। Economic Survey में साफ लिखा गया है कि कई राज्यों की वित्तीय स्थिति तनाव में है।

चुनौतियाँ:

  • कुछ राज्यों का कर्ज जीडीपी के मुकाबले काफी ऊँचा है।
  • वेतन, पेंशन और ब्याज चुकाने में ही बजट का बड़ा हिस्सा चला जाता है।
  • विकास के लिए उनके पास कम पैसा बचता है।
  • कई राज्यों में चुनावी सालों में मुफ्त योजनाओं की होड़ और बढ़ जाती है, जिससे भविष्य में और कर्ज उठाना पड़ता है।

अगर किसी बड़े राज्य की वित्तीय स्थिति बहुत खराब हो जाए, तो उसका असर पूरे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है – जैसे किसी बड़ी कंपनी के डूबने से पूरे सेक्टर में संकट आ जाता है।


10. आम आदमी की जेब पर असर

ये सब बातें सुनकर अक्सर लगता है कि यह तो “बड़े लोगों” और “इकोनॉमिस्ट्स” का विषय है, हम आम आदमी पर क्या फर्क पड़ता है? लेकिन असल में असर सीधा आपकी जेब पर होता है।

संभावित असर:

  • महंगाई: अगर कर्ज और घाटा ज्यादा होगा तो सरकार को पैसे पूरे करने के लिए या तो टैक्स बढ़ाने होंगे या नोट छापने पड़ेंगे – दोनों ही हालत में महंगाई बढ़ सकती है।
  • टैक्स: भविष्य में आयकर, जीएसटी या अन्य टैक्स बढ़ाने की मजबूरी हो सकती है, या रियायतें घट सकती हैं।
  • सेवाएँ: स्वास्थ्य, शिक्षा, सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट जैसी चीजों पर सरकारी खर्च घटाया जा सकता है।
  • नौकरी और व्यवसाय: ब्याज दरें ऊँची रहने से लोन महंगे हो सकते हैं, जिससे बिजनेस निवेश और नई नौकरियों पर असर पड़ेगा।

यानी ये सारे “मैक्रो” रिस्क अंत में “माइक्रो” लेवल पर – आपके परिवार के बजट पर – असर डालते हैं।


11. क्या केवल सरकार जिम्मेदार है?

सारा दोष सिर्फ सरकार पर डालकर भी हम पूरी तस्वीर नहीं समझ पाते। आर्थिक स्थिति पर कई चीजों का मिलाजुला असर होता है:

  • वैश्विक हालात: युद्ध, तेल की कीमतें, डॉलर की मजबूती, दुनिया भर में ब्याज दरों का स्तर।
  • घरेलू राजनीति: हर सरकार चाहती है कि जनता को तुरंत फायदा दिखे, जबकि कठिन आर्थिक फैसलों के फायदे देर से दिखते हैं।
  • हमारी अपनी अपेक्षाएँ: हम सब चाहते हैं कि टैक्स भी कम हो, सरकारी सुविधाएँ भी ज्यादा मिलें, पेट्रोल-डीजल भी सस्ता हो, और विकास भी तेज़ हो – ये सब एक साथ हमेशा संभव नहीं होता।

लेकिन यही वजह है कि Economic Survey जैसे दस्तावेज चेतावनी देते हैं कि हमें लंबी दूरी की सोच रखनी होगी, नहीं तो छोटी-छोटी “लोकप्रिय” चीजें आगे चलकर बड़े संकट की वजह बन सकती हैं।


12. आगे क्या करना जरूरी है?

वीडियो का संदेश यह नहीं है कि भारत कल ही अर्जेंटीना या ग्रीस बन जाएगा, बल्कि यह कि अगर हमने अभी सही कदम नहीं उठाए तो आगे मुश्किल बढ़ सकती है।

ज़रूरी कदम, सरल भाषा में:

  • सरकारी खर्च में प्राथमिकता तय हो: खर्च वहां हो जहाँ से भविष्य में आमदनी और प्रोडक्टिविटी बढ़े – जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी, स्किल डेवलपमेंट।
  • फिजूल और सिर्फ वोट पाने वाली योजनाओं पर ब्रेक लगे।
  • कर्ज की रफ्तार पर लगाम लगे, खासकर उन राज्यों में जो पहले से बहुत बोझ में हैं।
  • टैक्स सिस्टम स्थिर और भरोसेमंद बने, बार-बार नियम बदलने से निवेशक और आम करदाता दोनों परेशान होते हैं।
  • RBI को स्वतंत्रता और समय दिया जाए ताकि वह महंगाई और विकास के बीच संतुलन संभाल सके।

13. आम नागरिक क्या कर सकता है?

आप सोच सकते हैं कि ये सब तो सरकार और RBI के काम हैं, हम क्या कर सकते हैं? कुछ चीजें फिर भी हमारे हाथ में हैं:

  • जानकारी रखें: बजट और इकोनॉमिक सर्वे की मुख्य बातें समझने की कोशिश करें, केवल क्या सस्ता हुआ–क्या महंगा हुआ तक सीमित न रहें।
  • वोट सोच-समझकर दें: केवल मुफ्त की योजनाओं से प्रभावित हुए बिना, यह देखें कि कौन पार्टी और नेता लंबे समय की आर्थिक सेहत पर बात करते हैं।
  • अपनी वित्तीय योजना मजबूत करें: कर्ज सोच-समझकर लें, बचत और निवेश पर ध्यान दें, ताकि अगर आगे चलकर महंगाई या ब्याज दरें बढ़ें तो आप पूरी तरह असुरक्षित न रहें।
  • चर्चा में भाग लें: सोशल मीडिया हो या परिवार की बैठक, आर्थिक मुद्दों पर बात करें – जितनी जागरूक जनता होगी, उतना ही सरकार पर जिम्मेदार फैसले लेने का दबाव होगा।

14. निष्कर्ष: चमकते आँकड़े, छुपे खतरे

भारत की अर्थव्यवस्था आज भी दुनिया के सबसे तेज़ बढ़ने वाले बड़े देशों में है – यह बात सही है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि Fiscal Deficit, Public Debt, राज्यों की कमज़ोर वित्तीय स्थिति और चुनावी राजनीति की मजबूरियाँ मिलकर एक ऐसा दबाव बना रही हैं जिसे नजरअंदाज करना खतरनाक होगा।

Economic Survey ने जिस “विस्फोटक सच” की ओर इशारा किया है, वह असल में एक चेतावनी है – अगर हम आज समझदारी से फैसले नहीं लेंगे, तो कल हालात हमारे हाथ से निकल सकते हैं। आम आदमी के लिए ज़रूरी है कि वह सिर्फ आज की रियायतों पर खुश न हो, बल्कि आने वाले कल की आर्थिक सुरक्षा पर भी सवाल पूछे।

यही इस वीडियो और इस ब्लॉग का सार है – चमकते पोस्टरों के पीछे की असली तस्वीर देखना, ताकि हम एक मजबूत और स्थिर भारत की तरफ बढ़ सकें, सिर्फ कागज़ी विकास नहीं, बल्कि टिकाऊ विकास की ओर।

फ्री स्टॉक मार्किट और म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश करने वाले को क्या करना चाहिए ?

सबसे पहले बात साफ रखिए: अभी के मैक्रो रिस्क (कर्ज, फिस्कल डेफिसिट वगैरह) का मतलब ये नहीं कि आपको शेयर बाज़ार या म्यूचुअल फंड से भाग जाना चाहिए, लेकिन आँखें बंद करके भी नहीं रहना है।finshots+3

1. घबराएँ नहीं, प्लान बदलें

  • लम्बी अवधि (5–10 साल) का पैसा शेयर/इक्विटी म्यूचुअल फंड में रखना अभी भी ठीक है, क्योंकि भारत की ग्रोथ अच्छी दिख रही है और कॉरपोरेट कमाई का ट्रेंड पॉज़िटिव है।mutualfund.adityabirlacapital+2
  • शॉर्ट टर्म (1–3 साल) के पैसे को ज़्यादा रिस्क वाले फंड या शेयर में मत फँसाइए, वहाँ डेपॉज़िट, शॉर्ट-टर्म डेट फंड या बैलेंस्ड ऑप्शन बेहतर है।finnovate+1

2. एसेट एलोकेशन को तुरंत ट्यून करें

एक साधारण ढांचा (अपनी उम्र, रिस्क क्षमता के हिसाब से बदल सकते हैं):

  • अगर आपकी उम्र 30 के आस-पास है: लगभग 60–70% इक्विटी फंड/शेयर, 20–30% डेट/बॉन्ड फंड, 5–10% गोल्ड या गोल्ड फंड।mutualfund.adityabirlacapital+1
  • अगर 45–50 से ऊपर हैं: इक्विटी 40–50%, डेट 40–50%, गोल्ड 10–15% तक रखिए, ताकि झटके सहने की क्षमता बनी रहे।assetmanagement.hsbc+2

हर साल एक बार पोर्टफोलियो को री‑बैलेंस जरूर कीजिए (जहाँ ज्यादा बढ़ा है वहाँ से थोड़ा प्रॉफिट लेकर जो कम है उसमें डालिए)।mutualfund.adityabirlacapital+1

3. SIP जारी रखें, टाइमिंग से बचें

  • SIP बंद करना या मार्केट गिरने के डर से रुक जाना सबसे आम गलती है; गिरावट में ही SIP सस्ते यूनिट दिलाती है और लम्बी अवधि में रिटर्न बेहतर बनते हैं।mutualfund.adityabirlacapital+1
  • अगर फिस्कल डेफिसिट और सरकारी कर्ज को लेकर शोर बढ़े भी, तब भी अगर अर्थव्यवस्था पॉज़िटिव ग्रोथ दे रही है, तो डिसिप्लिन्ड SIP इन्वेस्टर को फायदा ही होता है।grantthornton+3

4. किस तरह के फंड/शेयर पर ज़्यादा फोकस?

  • अभी की स्थिति में बड़े और मज़बूत कंपनियों (लार्जकैप) और लार्जकैप/फ्लेक्सी‑कैप फंड पर ज़्यादा जोर रखना समझदारी है; बहुत ज़्यादा स्मॉल‑कैप या थीमेटिक फंड में ओवरएक्सपोज़र से बचें।assetmanagement.hsbc+2
  • डेट फंड चुनते समय क्रेडिट रिस्क कम रखिए, यानि हाई क्वालिटी गवर्मेंट/AAA बॉन्ड फंड, क्योंकि फिस्कल प्रेशर के दौर में भी ये अपेक्षाकृत सुरक्षित रहते हैं।indiabudget+1

5. रिस्क मैनेजमेंट के 5 आसान नियम

  • इमरजेंसी फंड: कम से कम 6–9 महीने के खर्च बैंक/लिक्विड फंड में अलग रखें, ताकि मार्केट क्रैश के समय आपको घाटे में बेचने की मजबूरी न हो।[mutualfund.adityabirlacapital]​
  • एक शेयर में 5–7% से ज्यादा न रखें, एक ही थीम/सेक्टर में फँसने से बचें।mutualfund.adityabirlacapital+1
  • लेवरेज (मार्जिन, पर्सनल लोन लेकर निवेश) से दूर रहें, क्योंकि मैक्रो अनिश्चितता के समय ये सबसे पहले पोर्टफोलियो तोड़ता है।economictimes+1
  • रिटर्न की हकीकत समझें: 11–14% लम्बी अवधि इक्विटी रिटर्न अच्छा मानिए; 20–30% हर साल वाला टारगेट रखेंगे तो गलत फैसले होंगे।assetmanagement.hsbc+2
  • साल में कम से कम एक बार अपना पूरा पोर्टफोलियो लिख कर देखिए – कहाँ ज्यादा रिस्क है, कहाँ बैलेंस चाहिए।mutualfund.adityabirlacapital+1

6. मन को कैसे स्थिर रखें?

एक छोटा फॉर्मूला याद रखें:

  • “अगले 10 दिन” नहीं, “अगले 10 साल” सोचकर इक्विटी में पैसा लगाएँ।
  • जब भी बहुत डर लगे, नई खरीद रोक दीजिए, लेकिन पुरानी SIP और अच्छे फंड/शेयर को बस यूँ ही डर से बेचिए मत।mutualfund.adityabirlacapital+1

अगर चाहें तो अपना मोटा‑मोटी पोर्टफोलियो (कितने पैसे, कितनी उम्र, कितने साल के लिए) बता दीजिए, मैं आपको उसी के हिसाब से एक सरल ढांचा लिख कर दे दूँगा।

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