अरबपतियों का मस्तिष्क Vs आपका मस्तिष्क

यहां Dr Sweta Adatia और Raj Shamani के पॉडकास्ट (Figuring Out, एपिसोड FO403) पर आधारित एक विस्तृत हिंदी लेख प्रस्तुत है, जिसमें अरबपतियों के दिमाग, सामान्य दिमाग, मॉर्निंग रूटीन, ब्रेन हेक्स, स्ट्रेस, न्यूरोसायंस और प्रैक्टिकल ब्रेन फिटनेस तकनीकों को सरल भाषा में समझाया गया है।


भूमिका

हर व्यक्ति जीवन में सफलता, मानसिक शक्ति और शांति चाहता है। परंतु, क्या सच में सफल लोगों के दिमाग अलग होते हैं? क्या अरबपतियों के मस्तिष्क का डिज़ाइन या एक्टिवेशन बाकियों से अलग होता है? Dr Sweta Adatia, सुप्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट और Limitless Brain Lab की फाउंडर, इस गहरे प्रश्न का जवाब देती हैं, साथ ही अपने अनुभव से प्रैक्टिकल ब्रेन फिटनेस हैक्स और रोचक वैज्ञानिक शोधों का आसान भाषा में विश्लेषण करती हैं।


मस्तिष्क के मुख्य प्रकार की वेव्ज़ (Brain Waves)

मनुष्य का मस्तिष्क अलग-अलग वेव्ज़ पर काम करता है:

  • डेल्टा वेव: गहरी नींद और रिपेयर के लिए जिम्मेदार।
  • थीटा वेव: जब हम हल्की नींद या ध्यान में होते हैं।
  • अल्फा वेव: रिलैक्सेशन, हल्के ध्यान, सुबह उठते समय या शांत स्थिति में।
  • बीटा वेव: एक्टिव बातचीत, समस्या समाधान, सतर्कता, ब्रेकफास्ट के बाद की फोकस्ड अवस्था।
  • गामा वेव: हाई-लेवल प्रोसेसिंग, लर्निंग, इनोवेशन के दौरान।

सुबह उठते ही तुरंत बीटा मोड में जाने से शरीर और दिमाग पर झटका पड़ता है। आधुनिक विज्ञान में बताया गया है कि डेल्टा से बीटा तक पहुंचने का स्वाभाविक क्रम जरूरी है। सुबह अल्फा और थीटा वेव्स को ‘हैक’ करना बेहद फायदेमंद साबित होता है। इसका अर्थ है—सुबह उठकर तुरंत मोबाइल, शोर या कैफीन नहीं, बल्कि थोड़ी देर शांतिपूर्वक आँखें बंद करके विज़ुअलाइज़ेशन, मेडिटेशन, सकारात्मकता और सांस पर ध्यान देना।


MOVERS – पावरफुल मॉर्निंग रूटीन (Morning Routine)

Dr Sweta ने “MOVERS” नामक तकनीक बताई, जिससे ब्रेन फिटनेस सुनिश्चित हो सकती है:

  • M for Meditation (ध्यान)– आँखें बंद कर कुछ मिनट गहरी सांस लें।
  • O for Oxygenation (ऑक्सीजन, ब्रीदिंग एक्सरसाइज)– प्राणायाम, डीप ब्रीदिंग।
  • V for Visualisation (दृश्य-कल्पना)– अपने टारगेट्स, प्लान्स, खुशियों की कल्पना।
  • E for Exercise (व्यायाम)– हल्की स्ट्रेचिंग, योग, वॉक, रनिंग आदि।
  • R for Reading (सकारात्मक पढ़ाई या ऑडियो)– किताब, आर्टिकल या ग्रोथ पॉडकास्ट।
  • S for Scribing (लिखना, कैथार्सिस)– क्या चीज़ें अब साथ नहीं चाहिए, उन्हें लिखकर मन से बाहर निकालना।

आदर्श रूप में हर एक्टिविटी को 5 मिनट दें। ज़रूरी नहीं कि सब काम एक साथ करें—जो सबसे आसान लगे, उसे रोज़ ऊपर-नीचे कर लें। रोज़ धूप में समय बिताना अत्यंत फायदेमंद है क्योंकि सूर्य की किरणें हमारे “suprachiasmatic nucleus” (बॉडी का मास्टर क्लॉक) को रीसेट करती हैं और सर्कैडियन रिद्म को संतुलित करती हैं।youtube


फ्रंटल कॉर्टेक्स की शक्ति (The Power of Frontal Cortex)

मानव मस्तिष्क की 40% संरचना फ्रंटल कॉर्टेक्स से बनी है, जबकि अन्य प्रजातियों में यह कहीं कम (चूहों में 7%) होती है। फ्रंटल कॉर्टेक्स ही भावनात्मक नियंत्रण, विकल्प चुनने, कमांड, प्रतिबद्धता, लॉजिक और आत्म-नियंत्रण का केंद्र है। उच्च-प्रदर्शनकर्ता (Peak Performers), अरबपति, वैज्ञानिक, अथलीट आदि इसी हिस्से का प्रयोग ज़्यादा करते हैं। यही कारण है कि वे चुनौतियों का सामना धैर्य, सूझबूझ और कम स्ट्रेस के साथ कर पाते हैं।

आम लोग प्रायः ‘लिंबिक सिस्टम’ (आतंरिक डर, फाइट-फ्लाइट-फ्रीज रिस्पांस) का शिकार हो जाते हैं, जिससे गुस्सा, चिंता, डर जैसी नेगेटिव भावनाएं हावी रहती हैं। लेकिन जैसे ही फ्रंटल कॉर्टेक्स सक्रिय होता है, भावनाओं की हलचल थमती है और स्पष्ट निर्णय लेने की ताकत उत्पन्न होती है।


बच्चों और युवाओं के दिमाग की विकास-यात्रा

उत्तरदायित्व, चयन, मोटिवेशन, जिद, रेज़िलिएंस आदि फ्रंटल कॉर्टेक्स के विकास पर निर्भर करते हैं। जन्म से 5 वर्ष की आयु दिमाग़ के विकास की ‘क्रिटिकल विंडो’ होती है—इस समय हर सेकेंड लगभग 700 साइनैप्टिक कनेक्शन बनते हैं। 13 से 20 वर्ष की उम्र में ब्रेन विशेष रूप से प्रभावित हो सकता है; इस दौरान अच्छी आदतों, अनुशासन, और जिज्ञासा को बढ़ाना अत्यंत लाभदायक है।

25 से 40 वर्ष की उम्र वाले लोगों के लिए भी ‘न्यूरोप्लास्टिसिटी’ एक वरदान है—चाहे बचपन की ट्रेनिंग छूट जाए, इच्छाशक्ति से मस्तिष्क को फिर से प्रशिक्षित किया जा सकता है।


सफल अरबपतियों और टॉप परफॉर्मर का ब्रेन हैक: विज़ुअलाइज़ेशन और विश्वास

कई अंतरराष्ट्रीय शोधों के अनुसार, विज़ुअलाइज़ेशन का अभ्यास दिमाग में न्यूरल नेटवर्क बना सकता है, जैसे असल में वे काम किए जा रहे हों। पियानो की एक स्टडी में—एक ग्रुप ने असल में प्रैक्टिस की और दूसरे ग्रुप ने सिर्फ कल्पना की। तीन महीने बाद दोनों के ब्रेन में लगभग समान परिवर्तन मिले। इसी तरह, छोटे रेजॉल्यूशन के साथ जर्नलिंग, ‘फीलिंग’ के साथ विज़ुअलाइजेशन, और सेल्फ-प्राइमिंग, माइंड को सफलता के लिए प्रोग्राम करता है।

फॉर्मूला: “First you become here (माइंड में), then you become here (रियलिटी में)”—यानी, पहले सोच में सफलता आती है, फिर दुनिया में।


आदत, रिचुअल, और मॉर्निंग रूटीन में अंतर

Dr Sweta कहती हैं कि ‘रिचुअल्स’ पूरी जागरूकता, डेडिकेशन और इरादे से किए जाते हैं (जैसे पूजा, योग, उद्देश्यपूर्ण मेडिटेशन), जबकि ‘हैबिट्स’ सबकॉन्शियस रूटीन होती हैं (जैसे ब्रश करना)। जो व्यक्ति अपनी सुबह को उद्देश्य के साथ शुरू करता है, उसका दिमाग़ दिनभर अलर्ट और पॉजिटिव बना रहता है।

टॉप परफॉर्मर्स की सुबह का पहला घंटा जानबूझकर चुने गए रिचुअल्स के नाम रहता है—मेडिटेशन, अफरमेशन, पढ़ाई, व्यायाम या साइलेंस। इन्हें ‘MOVERS’ तकनीक में ढालकर, कारगर बना सकते हैं।


शरीर घड़ी, ब्रह्म मुहूर्त और नींद

दिमाग़ और शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक (सरकेडियन रिद्म) के लिए सुबह के समय ‘ब्राह्म मुहूर्त’ (सनराइज़ के लगभग 90 मिनट पहले) सबसे उपयुक्त माना गया है। इस समय दिमाग़ का केमिकल बैलेंस, एंडोर्फिन, न्यूरोट्रांसमीटर सबसे उच्च स्तर पर होते हैं—जिसे सही आदतों से भुनाया जा सकता है। इसकी उपयोगिता आधुनिक विज्ञान ने भी मानी है। मॉर्निंग में कैफीन (कॉफी, चाय) से दूर रहना लाभदायक है, क्योंकि यह बीटा वेव को पहली घड़ी में ही ट्रिगर कर देती है, जिससे शरीर की प्राकृतिक शांति और एक्टिवेशन गड़बड़ा जाता है।

‘पिलो टॉक पावर’—सोने से पहले मन में सुबह उठने का समय प्रोग्राम करना भी क्लीनिकल ट्रायल्स में असरकारक माना गया है। इस “प्राइमिंग” से कई लोग बिना अलार्म खुद जाग सकते हैं।


फीमेल बनाम मेल ब्रेन

डॉ. स्वेता के अनुसार, पुरुषों और महिलाओं में एक मुख्य अंतर है: महिलाओं का ‘वर्बल सेंटर’ (बोलने-सुनने की क्षमता) औसतन बड़ा होता है, जिससे वार्तालाप, बातचीत, और भावनाओं की अभिव्यक्ति में महिलाएं आगे निकल जाती हैं। वहीं पुरुष अक्सर संवाद में शांत या रिट्रीटेड पाए जाते हैं। पर दोनों ब्रेन अपनी-अपनी तरह से डिज़ाइन किए गए, स्ट्रेस को सम्भालने के लिये।


एडिक्शन, नेगेटिव सेल्फ टॉक, और मेंटल डिटॉक्स

स्ट्रेस, चिंता, एंग्ज़ायटी या डिप्रेशन में फंसना सामान्य है। मोबाइल, कैफीन, एडिक्टिव सब्सटेंस दिमाग को बीटा वेव्स में डाल देते हैं, जिससे शांति और क्रिएटिविटी में बाधा आती है। साइकोलॉजिकल डिटॉक्स (सेल्फ जर्नलिंग, माइंडफुलनेस, डिजिटल डिटॉक्स, किसे छोड़ना है ये लिखना आदि) तथा खुद से बात करना, डेली इमोशन/थॉट/रिस्पॉन्स का ऑडिट करना जरूरी है। नियंत्रण न किए गए सुस्त अनुभव या नेगेटिव विचार लिंबिक सिस्टम में बार-बार घूमते रहते हैं और आगे की ग्रोथ रोक देते हैं।

“ब्रेन लूप” को तोड़ना इसीलिए आवश्यक है ताकि 90% दिमाग़ की RAM पहचानने, समझने एवं प्रोग्रेस प्लान पर काम करने के लिए तैयार हो पाए।


ब्रेन स्ट्रेंथ बढ़ाने वाले व्यायाम

  • क्रॉस लेटरल ट्रेनिंग: अलग-अलग हाथ-पैरों से, संतुलन बनाकर शरीरिक एक्टिविटी।
  • स्ट्रेंथ एक्सरसाइज: मसल्स मजबूत करें—अच्छी ग्रिप और कोऑर्डिनेशन का सीधा सम्बन्ध याददाश्त से है।
  • कोऑर्डिनेशन और बैलेंस: एक पैर पर खड़े रहकर कमांड सेंटर को निर्देशित करना।
  • एरोबिक वर्कआउट—हृदय और मस्तिष्क दोनों के लिए फायदेमंद।
  • हैंड ग्रिप एक्सरसाइज: नई रिसर्च के मुताबिक, मजबूत ग्रिप से डिमेंशिया और याददाश्त की प्रॉब्लम का रिस्क कम होता है।

अल्फा-बेटा वेव्स को सक्रिय करने के प्रैक्टिकल टिप्स

  • दैनिक 5-15 मिनट बिना विकर्षण आँख बंद करें—माइंड को ‘अल्फा’ और ‘थीटा’ वेव मोड पर जाने दें।
  • बाइनोरल बीट्स या म्यूजिक—अल्फा की फ्रीक्वेंसी का म्यूजिक सुनना भी ब्रेन वेव्स को मॉडुलेट करता है। कई कंपनियां बड़े स्तर पर “ब्रेन न्यूट्रल” स्पेस/लाउंज बना रही हैं जहाँ सिर्फ 5 मिनट की साउंड थेरेपी ब्रेन को रीसेट कर सकती है।
  • ग्राउंडिंग—पृथ्वी के संपर्क में रहना (ज़मीन पर नंगे पाँव चलना), दिमाग में स्थिरता लाता है।
  • अच्छी संगत, इमोशनल एनवॉयरमेंट—वातावरण बहुत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि ‘मिरर न्यूरॉन्स’ भावनाओं को ट्रांसफर करते हैं। क्रिएटिव, पॉजिटिव, चयनित संगत का असर सीधा आलोकिक ऊर्जा में दिखता है।

ब्रेन की शक्ति, ‘वॉटर प्राइमिंग’, और प्लेसीबो इफेक्ट

Dr Sweta ने जापानी वैज्ञानिक ‘Dr. Emoto’ के पानी पर किए गए प्रभावशाली शोध का ज़िक्र किया, जिसमें हमारे विचार, शब्द और भावनाएँ भी पानी (और शरीर) की ऊर्जा को बदल सकती हैं। इसी तरह, केवल चीनी की गोली देने से ही अगर मरीज ठीक हो जाए, तो वह ‘प्लेसीबो इफेक्ट’ कहलाता है—यह दर्शाता है कि मन की शक्ति से बायोलॉजी, इम्यूनिटी, और हार्मोन्स बदल सकते हैं।


स्ट्रेस कंट्रोल, फोकस और सर्च्युल रेसिलियंस

सक्सेस का मूलमंत्र है—आत्मनियंत्रण, रेज़िलियेंस, स्थिरता, चुनौतियों में टिके रहना। जब मन बार-बार फेल होता है, डिप्रेशन, रूमिनेशन आदि आते हैं, तो दिमाग ट्रेनिंग से लौट सकता है। हर असफलता के बाद पुनः उठकर आगे बढ़ना, दिमाग को ‘फेलियर-प्रूफ’ बनाना, यही अरबपति और टॉप परफॉर्मर की असली हैबिट है।youtube


ध्यान, रचनात्मकता और ध्यान की आदर्श अवधि

रोज़ 5-15 मिनट मेडिटेशन, ध्यान, मूवमेंट या आंखें बंद करके रहना अल्फा वेव्स को तेज करता है, जिससे कंसंट्रेशन (एकाग्रता), समस्या सुलझाने की क्षमता, रचनात्मकता, और खुशी बढ़ती है। ‘जितना अधिक आराम, उतनी अधिक रचनात्मकता’ का सूत्र आधुनिक रिसर्च में भी प्रमाणित है।


निष्कर्ष: अरबपति माइंडसेट, टेक्नोलॉजी और समर्पण

  • शारीरिक जागरूकता: “मूडर्स” तकनीक, व्यायाम, अच्छी आदतें—दिनकर अनुशासन।
  • मानसिक जागरूकता: विज़ुअलाइज़ेशन, जर्नलिंग, माइंडफुलनेस।
  • इमोशनल एनवॉयरमेंट: संगत, सरकंस्टांस, सकारात्मकता।
  • डिजिटल हैक्स: मॉर्निंग में डिजिटल डिटॉक्स, सेलेक्टिव कंटेंट, ब्रेन फ्रेंडली पॉडकास्ट्स, बाइनोरल बीट्स।
  • प्राकृतिक हैक्स: सूरज की रोशनी, ग्राउंडिंग, छलांग वाली एक्टिविटी।
  • अनुभूतियों का ऑडिट: ‘डे ऑडिट’, ‘इमोशन ऑडिट’, दैनिक नोट-राइटिंग।

हर किसी की ब्रेन फिटनेस यात्रा अलग है, लेकिन मूल बात वही है—दैनिक चोटी के प्रदर्शन का रहस्य है पूरी तरह से इरादतन ब्रेन ट्रेनिंग। भाग्य, जेनेटिक्स, बचपन की परिस्थितियां प्राथमिक अवरोध नहीं हैं। आज भी अपने जीवन में नई सुपरह्यूमन संभावनाओं की शुरुआत की जा सकती है।youtube


क्या यह विज्ञान-सिद्ध है?

हाँ। न्यूरोप्लास्टिसिटी, ब्रेन वेव्स, फ्रंटल कॉर्टेक्स ट्रेंनिंग, विज़ुअलाइजेशन के वैज्ञानिक प्रमाण विश्व के अग्रणी विश्वविद्यालयों से लगातार सामने आ रहे हैं। आधुनिक न्यूरोसाइंस यह मानता है कि आदतें, ध्यान, पॉजिटिविटी दिमाग़ की स्ट्रक्चर, केमिस्ट्री, और पावर को उच्चतम स्तर तक ले जा सकते हैं।youtube


अंतिम संदेश

मानव मस्तिष्क की वास्तविक शक्ति का सीमांकन केवल सोच, आदत और वातावरण पर निर्भर करता है। अरबपति, वैज्ञानिक या साधक—हर कोई ब्रेन हेक्स, माइंडफुल टेक्नोलॉजी, और अनुशासित सुबह की मदद से अपने ब्रेन को अल्ट्रा सक्सेसफुल बना सकता है। यह यात्रा एक सच्चे निर्णय—’मुझे अपने मस्तिष्क की फ्रंटल कॉर्टेक्स को रोज़ जागरूकता के साथ मजबूत करना है’—से शुरू होती है और आदतों, रूटीन, विज़ुअलाइजेशन, और वातावरण के चयन से मुकम्मल होती है।


(यह लेख Dr Sweta Adatia के पॉडकास्ट, रिसर्च, और आधुनिक न्यूरोसाइंस के तथ्यों का व्यावहारिक अनुवाद है)।

  1. https://www.youtube.com/watch?v=fHBR1j1kJ1I

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