सबसे बड़ा अपराध, सबसे बड़ी कमजोरी, सबसे बड़ा बल और उसे कैसे प्राप्त करें? – श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के प्रवचनों के आधार पर

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सबसे बड़ा अपराध क्या है?

श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के अनुसार, मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा अपराध है – भगवान को भूल जाना। जब जीव भगवान से विमुख हो जाता है, तब उसके जीवन में अपराध, विपत्ति और पाप ही पाप रह जाते हैं। भगवत विमुखता ही सभी गलतियों, पापों और जीवन की सबसे बड़ी हानि की जड़ है।

“जब तक भगवान का सुमिरन, भजन नहीं किया जाता – वही सबसे बड़ा अपराध है, वही सबसे बड़ी हानि है।”नाम स्मरण, भजन और भगवान की ओर झुकाव ही परम लाभ है। यदि नाम छूट गया, तो सब अपराध ही अपराध हैं। जो भगवान के सनमुख रहता है, वह निष्पाप हो जाता है; जो विमुख रहता है, वही पाप करता है1।

सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?

महाराज जी के अनुसार, मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है – भगवान के बल को हृदय में धारण न करना और अहंकार करना।अपने बल, ज्ञान, विद्वता या धर्म का अभिमान रखना सबसे बड़ी कमजोरी है। अहंकार के कारण ही मनुष्य माया के एक झटके में गिर जाता है।”जिसने अपने को विद्वान, ज्ञानी, धर्मात्मा, महात्मा माना – वह माया के एक थप्पड़ में फैल के गिर गया। जिसने अपने को अधम, नीच, असरण माना और भगवान की शरण में चला गया – वह भगवान के परम पद को प्राप्त हो गया।”अहंकार ही समस्त दुखों और कमजोरी का मूल है। देहाभिमान के कारण ही दुर्गति होती है12।

सबसे बड़ा बल क्या है?

महाराज जी स्पष्ट करते हैं – सबसे बड़ा बल है भगवान का बल।भगवान के बल का स्मरण, भगवान का आश्रय और शरणागति ही सच्चा बल है।”भगवान का बल हृदय में स्मरण चल रहा है, तो हर कार्य अपने आप होगा। भगवान के बल से युक्त हैं, तो माया भी कुछ नहीं बिगाड़ सकती। भगवान का बल नहीं, तो माया चौपट कर ही देगी।”रामायण के प्रसंग में अंगद जी का उदाहरण देते हुए महाराज जी बताते हैं कि राम बल से ही असंभव भी संभव हो जाता है। भगवान का बल, भगवान का नाम, और भगवान की शरण में रहना – यही सबसे बड़ा बल है13।

भगवान का बल कैसे प्राप्त करें?

भगवान का बल प्राप्त करने के लिए महाराज जी ने कुछ प्रमुख उपाय बताए हैं:

संतों का संग:
“भगवान के मार्ग में चलना है, तो प्रथम संत महात्माओं का खूब संग करो।”
संतों का संग मन को भगवान की ओर प्रेरित करता है।भगवान के चरित्र और भक्तों की कथा सुनना:
“खूब भक्तों के चरित्र सुनो, खूब भगवान के चरित्र सुनो।”
इससे श्रद्धा और भक्ति दृढ़ होती है।गुरु चरणों का आश्रय:गुरु की शरण में जाने से मार्गदर्शन और आंतरिक शक्ति मिलती है।मंत्र जाप और नाम स्मरण:
“नाम जप करो, सत्संग सुनते रहो, बुद्धि सशक्त होती जाएगी।”
नाम स्मरण से माया का प्रभाव कम होता है और पाप नष्ट होते हैं12।शरणागति और अहंकार का त्याग:
“शरणागत हुए तो अहंकार नष्ट हो जाता है, दैन्यता आती है।”
शरणागति में अहंकार समर्पित होता है, और भक्ति की दृष्टि में दोष टिक नहीं सकते।विवेक और संयम:
विषयों के आकर्षण में जो जलन होती है, उसे सहन करना – यही सबसे बड़ी तपस्या है।
“काम, क्रोध आदि के अवसर पर हृदय में जो जलन होती है, उसे चुपचाप सह जाना – वही महात्मा हो जाता है।”

निष्कर्ष

श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज के अनुसार,

  • सबसे बड़ा अपराध: भगवान को भूलना, भगवत विमुखता

  • सबसे बड़ी कमजोरी: अहंकार, अपने बल का अभिमान

  • सबसे बड़ा बल: भगवान का बल, भगवान की शरणागति

इनसे उबरने का उपाय है – संतों का संग, नाम स्मरण, गुरु चरणों का आश्रय, भक्ति और शरणागति।
भगवान का बल हृदय में धारण कर लें, तो माया, पाप, कमजोरी, अपराध – सबका नाश हो जाता है।
सच्ची शक्ति, शांति और सफलता – सब भगवान की शरण में ही है132।

आइए, भगवान का नाम स्मरण करें, अहंकार त्यागें और शरणागति को अपनाएं – यही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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