भगवान शिव वैरागी होने पर भी धन‑वैभव देने वाले देवता हैं, इसलिए उनसे अच्छा घर, गाड़ी, धन आदि माँगना गलत नहीं है; बस उससे आसक्ति न बने, यही महत्त्वपूर्ण है।
1. प्रश्न का मूल भाव क्या है?
- प्रश्नकर्ता कहती हैं कि वे भगवान शिव की भक्त हैं और जानते हैं कि शिवजी वैरागी हैं।
- उनका संदेह है कि ऐसे वैरागी भगवान से यदि वे अच्छा घर, गाड़ी और पैसे कमाने की इच्छा रखें तो क्या यह गलत होगा।
- महाराज जी पहले उदाहरण देकर समझाते हैं कि शिवजी बाहरी रूप से वैरागी दिखते हैं, परन्तु देने की क्षमता और दानशीलता में अत्यन्त समृद्ध हैं।
2. रावण को स्वर्णमयी लंका किसने दी?
- महाराज जी तुरंत पूछते हैं – “रावण को लंका किसने दी थी?” और स्वयं उत्तर देते हैं कि लंका तो बैरागी शिवजी ने ही दी थी।
- वे बताते हैं कि वह पूरी सोने की लंका थी, ईंट भी नहीं लगी थी, केवल स्वर्णमयी नगरी थी।
- इससे वे सिद्ध करते हैं कि जो स्वयं चिता‑भस्म लगाते हैं, व्यावहारिक रूप से वैरागी हैं, वही इतनी भारी ऐश्वर्य‑संपदा भी देने में समर्थ हैं।
3. शिवजी का बाहरी वैराग्य और भीतर की दानशीलता
- महाराज जी कहते हैं कि शिवजी चिता की भस्म लगाते हैं, वटवृक्ष के नीचे रहते हैं, सर्पों की माला धारण करते हैं, जिससे लगता है कि उनके पास कुछ नहीं है।
- वहीं वे बताते हैं कि ब्रह्मा जी भी उनके चरणों की वंदना करते हैं, सनकादि ऋषि भी उनकी शरण में बैठते हैं, इससे उनकी दिव्य महिमा और सामर्थ्य प्रकट होती है।
- निष्कर्ष यह कि वैरागी होना “न दे सकने” का सूचक नहीं, बल्कि “स्वयं आसक्त न होना” है, जबकि वे चाहें तो जगत को वैभव दे सकते हैं।
4. कुबेर और शिवजी का संबंध
- महाराज जी शिवजी के मित्र कुबेर का उदाहरण देते हैं, जो भगवान शंकर के चरण‑सेवक और सख्य भाव के उपासक हैं।
- कुबेर को त्रिभुवन का धनी बना दिया गया, उन्होंने कई बार कैलाश पर्वत को उठा‑उठाकर शिवजी को प्रसन्न किया।
- यह प्रसंग दर्शाता है कि शिवजी से सच्ची भक्ति और सेवा करने वाले को वे अपार धन‑वैभव भी प्रदान कर देते हैं।
5. वैभव देने में शिव और हरि का अंतर
- महाराज जी स्पष्ट कहते हैं – “वही सब वैभव देते हैं, वैभव शिव ही देते हैं।”
- वे जोड़ते हैं कि “हरि तो जब कृपा करते हैं तो सब वैभव छीन लेते हैं।”
- इसका तात्पर्य यह है कि शिवजी संसार का वैभव देने वाले हैं, जबकि हरि (भगवान विष्णु/कृष्ण) कृपा करके वैभव का राग ही हटा लेते हैं, ताकि भक्त भोगों से हटकर प्रेम और भजन में रमे।
6. वैभव तो मिलता है, राग हटाना असली कृपा है
- महाराज जी कहते हैं कि जब भगवान (हरि) कृपा करते हैं तो भीतर से वैभव का राग हटा देते हैं।
- वे समझाते हैं कि वैभव बना रह सकता है, पर उसके प्रति आसक्ति और मोह समाप्त हो जाता है, वही बंधन‑कारक राग नष्ट होता है।
- इस प्रकार धन‑वैभव होना अधर्म नहीं, पर उसके प्रति चिपकाव और अहंकार ही बंधन है, जिसे कृपा के द्वारा हटाया जाता है।
7. शिवजी के “औढानी” और “आशुतोष” स्वरूप की व्याख्या
- महाराज जी बताते हैं कि भगवान शिव को “औढानी” भी कहा गया है, अर्थात् जो बहुत अधिक विचार‑विमर्श नहीं करते, शीघ्र ही दान दे देते हैं।
- शिवजी का एक नाम “आशुतोष” है, जिसका अर्थ है शीघ्र प्रसन्न होने वाले।
- वे कहते हैं कि शिवजी तो एक बिल्वपत्र, चुल्लू भर जल से भी प्रसन्न हो जाते हैं; इतने सरल और दयालु देवता त्रिभुवन में दूसरा नहीं है।
8. वृकासुर/भस्मासुर की कथा से क्या शिक्षा मिलती है?
- महाराज जी वृकासुर (भस्मासुर) की कथा सुनाते हैं, जिसने कठोर तपस्या करके शिवजी को प्रसन्न किया।
- शिवजी ने उसके अत्यधिक कष्ट देखकर, और आशुतोष होने के कारण, बिना अधिक विचार किए उसे वरदान दे दिया कि जिसके सिर पर हाथ रखेगा, वह भस्म हो जाएगा।
- यह उदाहरण दिखाता है कि शिवजी कितने उदार और दानी हैं, कि राक्षस को भी कठोर तप देखकर महान शक्ति दे देते हैं।
9. विष्णु जी द्वारा भस्मासुर‑विनाश की लीला
- महाराज जी बताते हैं कि वरदान पाकर भस्मासुर पहले शिवजी पर ही हाथ रखकर उन्हें भस्म करना चाहता है, जिससे शिवजी स्वयं अपने वरदान से संकट में पड़ जाते हैं।
- शिवजी कृष्ण को पुकारते हैं कि “मायावी है, किसी भी लोक में जाऊँगा, पीछा नहीं छोड़ेगा, अब तुम ही समाधान करो।”
- भगवान कृष्ण ब्रह्मचारी का रूप धरकर भस्मासुर को छलपूर्वक समझाते हैं कि पहले अपने ऊपर हाथ रखकर देखो, यदि वरदान सत्य है तो दोनों मिलकर हँसेंगे, और वह स्वयं भस्म हो जाता है।
10. शिव और हरि की परस्पर आराधना
- कथा के अंत में कृष्ण और शिव परस्पर प्रणाम करते हैं, कृष्ण उन्हें “जगतगुरु” कहकर सलाह देते हैं कि वरदान सोच‑समझकर दिया करो।
- महाराज जी बताते हैं कि दोनों एक‑दूसरे को अपना इष्ट मानते हैं; भगवान राम रामेश्वर की स्थापना कर शिवजी का पूजन करते हैं।
- वहीं शिवजी हनुमान रूप में (एकादश रुद्र के रूप में) श्रीराम की चरण‑सेवा करते हैं, इस प्रकार दोनों परम उदार, परम दानी और परस्पर प्रेम से जुड़े हैं।
11. निष्कर्ष: धन‑वैभव मांगना गलत है या नहीं?
- महाराज जी स्पष्ट रूप से कहते हैं कि “आप चिंता मत करो, बहुत ठिकाने से लगी हो।”
- यदि वैभव चाहिए तो “शिव‑शिव रटो और उनकी सेवा करो”, अर्थात शिवजी से धन‑वैभव माँगना दोष नहीं है, वे तो स्वयं वैभव‑दाता हैं।
- असली साधना यह है कि धन मिले तो उसका राग न रहे, उसका उपयोग धर्म, कर्तव्य और भजन की सहायता के लिए हो, न कि केवल भोग और अहंकार के लिए।
12. व्यावहारिक शिक्षा भक्त के लिए
- भक्त यदि गृहस्थ हैं और कर्तव्य‑पालन के लिए अच्छा घर, गाड़ी, धन चाहते हैं, तो शिवजी से यह सब माँगना उचित है, बशर्ते भक्ति और धर्म न छूटे।
- वैराग्य का अर्थ यह नहीं कि संसार छोड़कर जंगल भाग जाएँ, बल्कि यह कि भीतर से धन‑वैभव के मोह से मुक्त होकर उसे प्रभु की संपत्ति मानकर उपयोग करें।
- शिवजी के वैरागी‑स्वरूप के पीछे यही संदेश छिपा है कि वे स्वयं भोग नहीं माँगते, पर सच्चे भक्त को आवश्यक भौतिक वैभव और आध्यात्मिक अनुग्रह दोनो देने में कृपण नहीं हैं।






