भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति को लेकर जो धारणा बना दी गई है कि वे बहुत कठिन परीक्षाएँ लेते हैं और परिवार तथा आर्थिक संपत्ति भी छीन लेते हैं, इस पर पूज्य प्रेमानंद जी महाराज बहुत स्पष्ट, प्रेमपूर्ण और तर्कयुक्त ढंग से समझाते हैं कि यह धारणा मूलतः गलत है और भगवान भक्त का अहित नहीं, बल्कि कल्याण ही करते हैं।
गलत धारणा कहाँ से आती है
कई भक्त प्रश्न करते हैं कि अनेक संतों के श्रीमुख से सुनते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण की प्राप्ति के लिए भक्ति करना बहुत कठिन है, क्योंकि भगवान बहुत कठिन परीक्षा लेते हैं।
यह भी कहा जाता है कि वह परिवार वालों को, आर्थिक संपत्ति को, और भौतिक वस्तुओं को भक्त से दूर कर देते हैं, मानो भक्ति का अर्थ ही सब कुछ छीन लिया जाना हो।
महाराज जी बताते हैं कि यदि ऐसा ही होता, तो जिन महापुरुषों को भगवान ने स्वयं संरक्षण दिया, वे सब दरिद्र और निराश्रित हो जाते, जबकि गाथाएँ इससे उलटी दिखाई देती हैं।
भगवान संपत्ति नहीं, आसक्ति नष्ट करते हैं
महाराज जी उदाहरण देकर कहते हैं कि यदि भगवान भक्तों की आर्थिक संपत्ति का नाश ही कर देते, तो राजा अम्बरीष जैसे चक्रवर्ती सम्राट के पास कुछ भी न बचता।
भगवान ने विभीषण को एक कल्प तक का राज्य दिया, प्रह्लाद को सिंहासन पर विराजमान किया, ध्रुव को अटल पद पर स्थापित किया; यह सब भगवद् कृपा के ही फल हैं, न कि संपत्ति-नाश के।
वे स्पष्ट कहते हैं कि भगवान ममता और आसक्ति का नाश करते हैं, पापाचरण का नाश करते हैं, दुर्बुद्धि का नाश करते हैं; स्वयं भगवान सुख प्रदान करने वाले मंगल भवन हैं, इसलिए उनके द्वारा अनर्थ कैसे हो सकता है।
भक्त के जीवन में वास्तविक अनुभव क्या है
महाराज जी अपने जीवन का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि यदि भगवान केवल दुख ही देते, सब कुछ नष्ट कर देते, तो आज भक्तों के पास क्या बचा है, यह स्वयं सामने दिख रहा है।
पहले जीवन केवल चार–पाँच परिवारजनों के बीच सीमित होता, आज हजारों की सभा में प्रेम, आदर और स्नेह मिल रहा है, यह सब भगवान की शरण में आने का ही फल है।
वे कहते हैं कि यदि भगवान केवल परीक्षा ही लेते होते, तो उनके अपने जीवन में भी केवल परीक्षा ही दिखती, जबकि उन्होंने अपने जीवन में भगवान का प्रेम, सहयोग और दुलार ही अधिक देखा है, न कि केवल कठोर परीक्षा।
“परीक्षा” नहीं, “पुष्टता” – प्रशिक्षण की उपमा
महाराज जी एक पहलवान और उसके चेले का सुंदर उदाहरण देते हैं।
पहलवान अपने शिष्य को कुश्ती के लिए तैयार करते समय पहले यह देखता है कि वह कहाँ कमजोर है, फिर उसी स्थान पर बार-बार अभ्यास करवाकर उसे इतना मजबूत बना देता है कि बाद में वहाँ प्रहार होने पर भी उसे चोट न लगे।
इसी प्रकार श्रीकृष्ण जगद्गुरु हैं, वे भी अपने चेले की कमजोरी देखते हैं और जहाँ कमजोर हैं, वहीँ पर कसकर साधते हैं, ताकि वह भीतर से परिपक्व और मजबूत बन जाए।
प्रतिकूलता–अनुकूलता से अंतःकरण की तैयारी
महाराज जी कहते हैं कि बिना अनुकूलता और प्रतिकूलता दोनों को झेले, अंतःकरण प्रेम के योग्य नहीं होता।youtube
अनुकूल परिस्थितियों में फूलकर अहंकार न हो, और प्रतिकूल परिस्थितियों में टूटकर दुखी न हो — इस संतुलन तक पहुँचने के लिए दोनों प्रकार की स्थितियाँ सहनी पड़ती हैं।
वे शीशे का उदाहरण देते हैं: साधारण शीशे पर कंकड़ मारो तो टूट जाता है, लेकिन जब उसी कांच को गरम–ठंडा करके विशेष प्रक्रिया से बनाया जाता है, तो वह बुलेटप्रूफ बन जाता है और गोली से भी नहीं टूटता।
इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्त को ऐसा बुलेटप्रूफ बनाते हैं कि माया के काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अपमान आदि उसका बाल भी बाँका न कर सकें।
परीक्षा या पुष्टता – दृष्टिकोण की भिन्नता
महाराज जी कहते हैं कि जिसे लोग “भगवान की कठोर परीक्षा” कहते हैं, वे उसे “पुष्टता” कहते हैं।
भगवान अपने भक्त को परिपक्व और पुष्ट करते हैं, ताकि वह माया के आघातों से सुरक्षित रह सके और स्थिर प्रेम का पात्र बन सके।
इसलिए यह धारणा गलत है कि कृष्ण भक्ति करना कठिन है, क्योंकि कृष्ण कठिन परीक्षाएँ लेते हैं।
संसार की भक्ति कठिन, कृष्ण भक्ति सरल
महाराज जी कहते हैं कि उन्हें तो ऐसा लगता है कि संसार की भक्ति करना कठिन है।youtube
संसार में सब छलिया, स्वार्थी, कपटी दिखाई देते हैं; सच्चा प्रेम करने वाला कहीं नहीं दिखता, सच्चा प्रेमी तो श्रीकृष्ण ही हैं, उनकी भक्ति कठिन कैसे हो सकती है।
वे श्रोताओं से पूछते हैं: वास्तव में कठिन क्या है? गंदे आचरणों को छोड़ना, गंदी आदतों को छोड़ना, खराब खान–पान, अशुद्ध दृश्य, बुरे भोग–विलास को छोड़ना कठिन लगता है; इसी कारण लोगों को लगता है कि भक्ति कठिन है।
तुलसीदास जी और बादशाह का किस्सा
महाराज जी तुलसीदास जी का प्रसंग सुनाते हैं।
सम्राट अकबर ने जब तुलसीदास जी के सामने अपना ताज उतारकर रखा, तो तुलसीदास जी की आँखों में आँसू आ गए।
भक्तों ने पूछा – क्या बादशाह के प्रणाम से आनंद के आँसू हैं? तुलसीदास जी ने कहा – जब तुलसी राम का नहीं था, तब भीख में टुकड़े नहीं मिलते थे; आज राम का है, तो बादशाह ताज उतारकर रखता है।youtube
महाराज जी इससे यह संकेत करते हैं कि भगवान की भक्ति से कमी नहीं, बल्कि मान, सम्मान और कृपा बढ़ती है; कठिनाई माया के भोगों को छोड़ने में है, न कि भजन में।youtube
भक्ति की वास्तविक कठिनाई क्या है
महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि श्रीकृष्ण की भक्ति में कठिनाई नहीं है, कठिनाई माया के भोगों को छोड़ने में है।youtube
गंदा आचरण, गंदा भोजन, गंदे दृश्य, बुरे कर्म और पापाचरण को छोड़ना कठिन है; इसी कारण भक्ति कठिन जान पड़ती है।
वे कहते हैं कि भगवान का नाम मधुर–मधुर है; “कृष्ण कृष्ण, राधा राधा” स्मरण करना कहाँ कठिन है? जो भी मिला, भगवान को भोग लगाकर ग्रहण कर लो, वही भक्ति बन जाती है।youtube
भक्ति का अर्थ कर्म छोड़ना नहीं
महाराज जी इस धारणा का खंडन करते हैं कि भजन केवल घर–परिवार छोड़ने के बाद ही किया जा सकता है।youtube
वे कहते हैं कि यह बिल्कुल गलत बात है; भगवान ने कहीं नहीं कहा कि अपने कर्म छोड़ दो, भक्ति का अर्थ कर्म छोड़ना नहीं है।
जो जिस मार्ग में है, अपने कर्तव्य पर डटा रहे, अपना कर्म करता रहे और नाम जप करते हुए अपने कर्म को भगवान को अर्पित कर दे – वही भक्ति है, इसमें क्या कठिनाई है।
त्याग का सही अर्थ – मन का परिवर्तन
महाराज जी “त्याग” की सही परिभाषा देते हैं कि त्याग का मतलब वस्त्र या स्थान छोड़ना नहीं, बल्कि मन को भगवान में लगाना और जगत से हटाना है।
यदि मन वस्त्र, लंगोटी, कमंडल, बाहरी साधनों में फँस जाए, तो वहीं दुर्गति होती है; और यदि मन भगवान में लग जाए, तो पूरा राजपाट और वैभव भी बाधा नहीं बनता।
वे श्लोक की भावभूमि में कहते हैं कि “सर्व मन कृष्ण पदारविन्दो” — बात मन को श्रीकृष्ण के चरणों में लगाने की है।youtube
भगवान की भक्ति का सार भागने में नहीं, उद्देश्य परिवर्तन में है – मन जगत से हटाकर भगवान में लगाना, यही वास्तविक त्याग है।
गृहस्थ और विरक्त – दोनों के लिए एक ही कसौटी
महाराज जी कहते हैं कि भगवान का चिंतन करना ही सबसे श्रेष्ठ है, चाहे वह गृहस्थ हो या विरक्त।
यदि कोई विरक्त होकर भी भगवान का भजन न करे, भगवान का चिंतन न करे, अपने कर्तव्य का पालन न करे, तो वह भी पतन की ओर ही जाएगा, केवल बाहरी विरक्ति से स्वर्ग नहीं मिल जाता।
वे दोहराते हैं कि बात भगवान से चित्त जोड़ने की है, न कि केवल बाबा या गृहस्थ के बाहरी रूप की।
“आप बाबा जी क्यों हो गए?” – भाग्य और मार्ग
जब कोई पूछता है – “फिर आप बाबा जी क्यों हो गए?”, तो महाराज जी विनम्रता से कहते हैं कि यह हमारे भाग्य में लिखा था, हमारे कपारे में लिखा था कि हमें बाबा जी बनकर ही जीवन व्यतीत करना है।
लेकिन वे यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि भगवान की प्राप्ति के लिए मूल आवश्यकता हृदय का समर्पण है – भजन, प्रेम और ममता–आसक्ति को समेटकर भगवान में लगा देना ही वास्तविक साधना है।
वे कहते हैं कि बाहरी बातों पर अधिक ध्यान मत दो; यदि बाहरी संसार से ही बचना हो, तो बताओ ऐसी कौन सी गुफा है जो पूरी तरह माया-रहित हो, जहाँ पहुँचकर माया समाप्त हो जाए।
भागो नहीं, उद्देश्य बदलो
अंत में महाराज जी समझाते हैं कि संसार से भागने की जरूरत नहीं है, देश परिवर्तन या कर्तव्य परिवर्तन की भी आवश्यकता नहीं है।
आवश्यक है तो केवल उद्देश्य परिवर्तन – वही काम, वही परिवार, वही संसार, लेकिन मन और उद्देश्य भगवान के लिए हो जाए, तो वही जीवन भजन मार्ग बन जाता है।
इस प्रकार वे स्पष्ट कर देते हैं कि “भगवान कृष्ण बहुत कठिन परीक्षाएँ लेते हैं और परिवार तथा आर्थिक संपत्ति भी छीन लेते हैं” – यह धारणा अधूरी समझ पर आधारित है; वास्तविकता यह है कि भगवान भक्त का अहित नहीं, बल्कि उसकी आसक्ति, पाप और दुर्बुद्धि को दूर कर उसे मजबूत, प्रेमयोग्य और कृपा के योग्य बनाते हैं।






