ऐसे चार महापाप से बचो, जाने महापाप करने वालों के साथ रहने वालों का क्या होता है ? (EN)

ऐसे चार महापाप से बचो, जाने महापाप करने वालों के साथ रहने वालों का क्या होता है ?

ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः ।

महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ॥

‘ब्राह्मणकी हत्या करना, मदिरा (शराब) पीना, स्वर्ण आदि की चोरी (मनुस्मृति ११।५४) करना और गुरु पत्नी के साथ व्यभिचार करना-ये चार महापाप हैं। इन चारों में से किसी भी महापापको करने वाले के साथ कोई तीन वर्ष तक रहता है, उसको भी वही फल मिलता है, जो महापापी को मिलता है।’*

(* स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबश्श्च गुरोस्तल्पमावसन्ब्रह्महा चैते पतन्ति चत्वारः पञ्चमश्चाचरःस्तैरिति ॥ (छान्दोग्य० ५।१०।९))

१. ब्रह्महत्या

चारों वर्णां का गुरु ब्राह्मण है—’वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः’ शास्त्रीय ज्ञानका जितना प्रकाश ब्राह्मण-जातिसे हुआ है, उतना और किसी जातिसे नहीं हुआ है। अतः ब्राह्मण की हत्या करना महापाप है। इसी तरह जिससे दुनिया का हित होता है, ऐसे हितकारी पुरुषोंको, भगवद्भक्त को तथा गाय आदिको मारना भी महापाप ही है। कारण कि जिसके द्वारा दूसरों का जितना अधिक हित होता है, उसकी हत्या से उतना ही अधिक पाप लगता है।

२. मदिरापान

मांस, अण्डा, सुल्फा (गाँजे की तरह चिलम में भरकर पी जाने वाली तंबाकू), भाँग आदि सभी अशुद्ध और नशा करनेवाले पदार्थों का सेवन करना पाप है; परंतु मदिरा पीना महापाप है। कारण कि मनुष्यके भीतर जो धार्मिक भावनाएँ रहती हैं; धर्म की रुचि, संस्कार रहते हैं, उनको मदिरापान नष्ट कर देता है। इससे मनुष्य महान् पतनकी तरफ चला जाता है। मदिरा के निर्माण में असंख्य जीवोंकी हत्या होती है। गंगाजी सबको शुद्ध करने वाली है ; परन्तु यदि गंगाजी में मदिरा का पात्र डाल दिया जाएं तो वह शुद्ध नहीं होता. जब मदिरा का पात्र (जिसमे मदिरा डाली जाती है) इतना अशुद्ध हो जाता है तब मदिरा को पीने वाला कितना अशुद्ध हो जाता है-इसका कोई ठिकाना नहीं है. मुसलमान के धर्म की यह बात मैंने सुनी है कि शरीर के जिस अंग में मदिरा लग जाए, उस अंग की चमड़ी काटकर फेंक देनी चाहिए.

३. चोरी

किसी भी चीज की चोरी करना पाप है; परंतु सोना, हीरा आदि बहुमूल्य चीजों की चोरी करना महापाप है। तात्पर्य है कि जो वस्तु जितनी अधिक मूल्यवान् होती है, उसकी चोरी करने पर उतना ही अधिक पाप लगता है।

४. गुरुपत्नीगमन

वीर्य (ब्रह्मचर्य)-नाश के जितने उपाय हैं, वे सभी पाप हैं*, परंतु गुरुपत्नीगमन करना महापाप है। कारण कि हमें विद्या देने वाले हमारे जीवन को निर्मल बनाने वाले गुरु की पत्नी माँ से बढ़कर होती है। अतः उसके साथ व्यभिचार करना महापाप है।

परस्त्रीगमन करना भी महापाप है, इसलिये इसको व्यभिचार अर्थात् विशेष अभिचार (हिंसा) कहा गया है। अगर पुरुष परस्त्रीगमन करता है अथवा स्त्री परपुरुषगमन करती है तो माँ- बाप, भाई-बहन आदि को तथा ससुरालमें पति, सास-ससुर, देवर आदिको महान् दुःख होता है। इस प्रकार दो परिवारोंको दुःख देना पाप है और निषिद्ध भोग भोगकर शास्त्र, धर्म, समाज, कुल आदि की मर्यादाका नाश करना भी पाप है। ये दोनों पाप एक साथ बनने से परस्त्रीगमन अथवा परपुरुषगमन करना विशेष अभिचार है, महापाप है। एक बुद्धिमान् सज्जन ने अपना अनुभव बताया था कि परस्त्रीगमन करने से हृदयका आस्तिकभाव नष्ट हो जाता है और नास्तिक भाव आ जाता है, जो कि महान अनर्थ का मूल है।

हिन्दू, मुसलमान, ईसाई आदि कोई भी क्यों न हों, सभीको ऐसे महापापोंका त्याग करना चाहिये। मनुष्य-शरीर मिला है तो कम-से-कम महापापोंसे तो बचना ही चाहिये; जिससे आगे दुर्गति न हो, भूत-प्रेत आदि योनियों की प्राप्ति न हो।

* वीर्यकी एक बूँदमें हजारों जीव होते हैं। स्त्री-संगसे जो वीर्य नष्ट होता है, उसमें से जो जीव गर्भाशय में रजके साथ चिपक जाता है, वही गर्भ बनता है। शेष सब जीव मर जाते हैं, जिनकी हिंसा का पाप लगता है। हाँ केवल सन्तानोत्पत्तिके उद्देश्यसे ऋतुकाल में स्त्री-संग करनेसे पाप नहीं लगता (पाप होता तो है, पर लगता नहीं); क्योंकि यह शास्त्र की, धर्मकी आज्ञा के अनुसार है-‘स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्’ (गीता १८।४७ ) ‘धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि’ (गीता ७।११) । परंतु केवल भोगेच्छा से स्त्रीका संग करनेसे उस हिंसाका पाप लगता ही है। इसलिये कहा है-

एक बार भग भोग ते, जीव हतै नौ लाख ।

जन मनोर नारी तजी, सुन गोरख की साख ।।

यह लेख गीता प्रेस की मशहूर पुस्तक “गृहस्थ कैसे रहे ?” से लिया गया है. पुस्तक में विचार स्वामी रामसुखदास जी के है. एक गृहस्थ के लिए यह पुस्तक बहुत मददगार है, गीता प्रेस की वेबसाइट से यह पुस्तक ली जा सकती है. अमेजन और फ्लिप्कार्ट ऑनलाइन साईट पर भी चेक कर सकते है.

स्वामी रामसुखदास जी का जन्म वि.सं.१९६० (ई.स.१९०४) में राजस्थानके नागौर जिलेके छोटेसे गाँवमें हुआ था और उनकी माताजीने ४ वर्षकी अवस्थामें ही उनको सन्तोंकी शरणमें दे दिया था, आपने सदा परिव्राजक रूपमें सदा गाँव-गाँव, शहरोंमें भ्रमण करते हुए गीताजीका ज्ञान जन-जन तक पहुँचाया और साधु-समाजके लिए एक आदर्श स्थापित किया कि साधु-जीवन कैसे त्यागमय, अपरिग्रही, अनिकेत और जल-कमलवत् होना चाहिए और सदा एक-एक क्षणका सदुपयोग करके लोगोंको अपनेमें न लगाकर सदा भगवान्‌में लगाकर; कोई आश्रम, शिष्य न बनाकर और सदा अमानी रहकर, दूसरोकों मान देकर; द्रव्य-संग्रह, व्यक्तिपूजासे सदा कोसों दूर रहकर अपने चित्रकी कोई पूजा न करवाकर लोग भगवान्‌में लगें ऐसा आदर्श स्थापित कर गंगातट, स्वर्गाश्रम, हृषिकेशमें आषाढ़ कृष्ण द्वादशी वि.सं.२०६२ (दि. ३.७.२००५) ब्राह्ममुहूर्तमें भगवद्-धाम पधारें । सन्त कभी अपनेको शरीर मानते ही नहीं, शरीर सदा मृत्युमें रहता है और मैं सदा अमरत्वमें रहता हूँ‒यह उनका अनुभव होता है । वे सदा अपने कल्याणकारी प्रवचन द्वारा सदा हमारे साथ हैं । सन्तोंका जीवन उनके विचार ही होते हैं ।

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