क्या भगवान के अनेक विग्रहों की पूजा करने पर अधिक फल मिलता है?

भगवान के अनेक विग्रहों की पूजा करने पर अधिक फल नहीं मिलता, फल आपके प्रेम, निष्ठा और एकाग्रता पर निर्भर करता है। महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि भगवान एक ही हैं, रूप अनेक हैं, और अनन्य भाव से किसी एक रूप में प्रेम और पूजा करने वाला साधक ही वास्तविक आध्यात्मिक लाभ पा लेता है।


प्रश्न और मूल जिज्ञासा

राहुल जी पूछते हैं कि घर के मंदिर में भगवान के बहुत सारे विग्रह हैं, माता जी बारी-बारी से सबकी पूजा करती हैं, अपने कमरे में भी दो विग्रह रखे हैं। उनकी जिज्ञासा यह है कि क्या केवल एक विग्रह की पूजा करने से उतना फल नहीं मिलेगा, जितना सब विग्रहों की पूजा करने से मिलेगा।[youtube]​

महाराज जी इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान के स्वरूप, भक्त के भाव और अनन्य निष्ठा के सिद्धांत को अत्यंत सरल शब्दों में स्पष्ट करते हैं। उनके उत्तर में भक्ति, वेदांत और संत-वाणी तीनों का सार झलकता है।[youtube]​


भगवान एक, रूप अनंत

महाराज जी कहते हैं, “भगवान तो एक ही है। अब उनके 100 200 नहीं, अनंत रूप है। आप जितने रूप चाहो विराजमान करके पूजा करो, फल तो एक ही मिलेगा।” यहां वे यह भाव जगा रहे हैं कि बाहरी रूप, विग्रहों की संख्या, मूर्तियों की बहुलता से फल में वृद्धि नहीं होती, क्योंकि उपास्य तो एक ही परमात्मा है।[youtube]​

वे आगे समझाते हैं, “आप मान लो हजार भगवान की पूजा की और एक भगवान को विराजमान के पूजा की।” फिर इस उदाहरण के माध्यम से बताते हैं कि यदि कोई साधक हजार जगह अपना भाव बांट रहा है, तो उसकी भाव-गाढ़ता उस स्तर की नहीं रहेगी, जो एक ही स्थान या एक ही रूप में लगाई गई निष्ठा में रहती है।[youtube]​

इस प्रकार, अनेक विग्रहों की स्थापना और उनकी पूजन-विधि का महत्व तभी है जब उसके पीछे का भाव सम्यक रहे। केवल संख्या बढ़ाने से फल में गुणात्मक वृद्धि नहीं होती, क्योंकि भगवान की सत्ता एकरस और अखंड है।[youtube]​


भाव बंटने से फल कम

महाराज जी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं, “आप हजार जगह भाव बांटे हुए हो तो आपका भाव उस कोटि का नहीं जितना एक पूजा में भाव लगाए हुए हैं, तो आपका कम रहेगा।” इसका अर्थ यह है कि भक्ति का असली बल भाव की एकाग्रता में है, न कि बाह्य क्रिया की बहुलता में।[youtube]​

वे निष्कर्ष देते हैं, “हजार जगह पूजा करने पर भी आपका फल कम रहेगा और एक जगह पूजा करता है, बाजी मार ले जाएगा।” यहां “बाजी मार ले जाएगा” वाक्य से वे यह बताना चाहते हैं कि जो साधक अपने प्रेम और भक्ति को एक रूप में समर्पित कर देता है, उसका साधन अधिक प्रभावी और फलदायक हो जाता है।[youtube]​

इस तर्क का आधार यह है कि प्रेम बहुत जगह नहीं होता, व्यवहार बहुत जगह होता है। प्रेम स्वभावतः एकनिष्ठ होता है, और जहां प्रेम है वहां स्वाभाविक रूप से अनन्यता आती है।[youtube]​


संतों के उदाहरण से पुष्टि

अपने कथन को और दृढ़ करने के लिए महाराज जी संत-महापुरुषों के उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं, “क्योंकि भगवान तो एक है ना, किसी एक रूप की, जैसे रामकृष्ण परमहंस जी ने मां काली… वह मां में ही कृष्ण को देखा, मां में ही राम को देखा, मां में ही सबको देखा।”[youtube]​

इसी प्रकार वे तुलसीदास जी का स्मरण करते हैं, “तुलसीदास जी राम जी तो राम जी, ‘सिया राम में सब जग जानी, सब में सिया राम देखना’।” यहां वे दिखा रहे हैं कि तुलसीदास जी ने भी एक ही आराध्य, सिया-राम में समस्त जगत को देखा।[youtube]​

फिर गोपियों का भाव बताते हैं, “गोपियों ने श्री कृष्ण को देखा तो ‘जित देखूं तित श्याम मयी’।” यह उदाहरण इस बात को पुष्ट करता है कि जब हृदय एक में लग जाता है, तब वही एक सर्वत्र दृष्टिगोचर होने लगता है।[youtube]​

इन सब उदाहरणों का सार यही है कि प्रेम एक जगह होता है, बहुत जगह व्यवहार होता है। प्रेम की प्रकृति ही ऐसी है कि वह केंद्रित रहकर ही प्रगल्भ होता है।[youtube]​


अनन्य निष्ठा और गीता का सिद्धांत

महाराज जी आगे कहते हैं, “तो भगवान से यदि प्रेम करना है तो भगवान के किसी एक रूप को आप स्वीकार कर लो और उन्हीं का नाम जप करो। उन्हीं का ध्यान करो। उन्हीं की पूजा करो।” यहां वे साधक के लिए स्पष्ट मार्ग बताते हैं कि अनेकता से चलकर भी अंत में एकता की ओर आना ही भक्ति का शिखर है।[youtube]​

वे गीता का श्लोक स्मरण कराते हैं, “इसीलिए गीता में भगवान ने कहा है ‘अनन्य चिंतयन्तो मां ये जना: परयुपासते’, अनन्य चिंतन की मांग भगवान ने की।” अनन्य का अर्थ वे स्वयं स्पष्ट करते हैं, “अनन्य माने फिर एक में लग जाना।”[youtube]​

फिर वे एक सुंदर पंक्ति के माध्यम से भाव को और सजीव करते हैं, “एक भरोसो, एक बल, एक आस, विश्वास, एक राम घनश्याम हे, चातक तुलसीदास।” वे चातक पक्षी का उदाहरण देते हैं कि “चातक गंगा जी में भी गिरे तो चोंच नहीं मारेगा, प्यासा मर जाएगा, वो पिएगा तो सिर्फ स्वाति की बूंद को ही पिएगा।”[youtube]​

इसी उपमा से वे कहते हैं कि साधक का मन भी ऐसा ही हो जाए – “एक भगवान में रहती हो जाए, राम जी में, श्याम जी में, माता जी में, पिताजी में, जहां भी एक मान लो उनको और एक मान के पूजा करो।” यहां मुख्य बिंदु यह है कि अंतिम लक्ष्य ‘एक में स्थित हो जाना’ है, भले प्रारंभ अनेक से हो।[youtube]​


प्रारंभ अनेक से, अंत एक में

महाराज जी यह भी मानते हैं कि हर साधक प्रारंभ से ही अनन्य नहीं हो पाता। वे कहते हैं, “पर प्रारंभ अनेक से होती है।” फिर अपने ही जीवन का संकेत देते हुए कहते हैं, “जैसे हम लोग भी थे ना, तो प्रारंभ शिव चालीसा, हनुमान चालीसा, राम रक्षा स्तोत्र, ये-ये सब करते-करते धीरे… पढ़ाई यहीं से शुरू होती है।”[youtube]​

वे बताते हैं, “धीरे-धीरे-धीरे-धीरे… धीरे-धीरे वो क्रम बाय क्रम फिर ऐसा कि अब फिर एक में रह जाता है।” इस प्रक्रिया को वे “अनन्य निष्ठा जागृत हो जाती है” कहकर संक्षेप में बताते हैं।[youtube]​

फिर बड़ी ही मधुर पंक्तियां उद्धृत करते हैं, “कि रसना कटो जो अन रटो, निरखन फुटो नैन, श्रवण फूटो जो अन सुनो, बिन राधा जस बस, श्री राधा, श्री राधा, श्री राधा।” यहां वे यह भाव दे रहे हैं कि जब निष्ठा किसी एक नाम में, एक रूप में जम जाती है, तब जिह्वा, नेत्र, श्रवण सब उसी में रम जाते हैं।[youtube]​

इस प्रकार, अनेक देवताओं, अनेक विग्रहों, अनेक स्तोत्रों से यात्रा शुरू हो सकती है, लेकिन सिद्धि और रस की पराकाष्ठा एकनिष्ठ, अनन्य भक्ति में ही है।[youtube]​


निष्ठा: भगवान में और गुरु में

महाराज जी आगे निष्ठा के दो रूपों की ओर संकेत करते हैं – भगवान में निष्ठा और गुरु में निष्ठा। वे कहते हैं, “निष्ठा आप में लग जाए तो आपके सिवा कुछ और… निष्ठा गुरु में लग जाए तो बस चाहिए।”[youtube]​

फिर वे एक अत्यंत मार्मिक वाक्य कहते हैं, “बहुत कम है, बहुत कम है जिसका गुरु में प्यार हो जाए, बहुत कम भाग्यशाली होते हैं ऐसे लोग, गुरु से प्यार होना तो बहुत कठिन है भाई।” इसका भाव यह है कि जैसे भगवान के किसी एक रूप में प्रेम होना कठिन है, वैसे ही साकार गुरु में परब्रह्म भाव से प्रेम करना भी दुर्लभ है।[youtube]​

वे आगे कहते हैं, “गुरु हमारे जैसे दिखते हैं। गुरु बहुत संत हैं, ऐसा मान, लेकिन गुरु साक्षात परम ब्रह्म।” फिर प्रसिद्ध पंक्तियां उद्धृत करते हैं, “गुरुर ब्रह्मा, गुरुर विष्णु, गुरुर देव महेश्वरा, गुरु साक्षात परब्रह्म, तस्मै श्री गुरु…”[youtube]​

यहां से वे भक्ति के चरम का संकेत देते हैं, “तो अब किस भगवान की प्राप्ति करनी, मेरे भगवान तो मेरे सामने बैठे हैं। मैं अपने भगवान को रोज देखता हूं, रोज उनसे बात करता हूं। मैं तो मुक्त हो गया, क्योंकि मेरे भगवान मिल गए मुझे गुरु रूप में।”[youtube]​


मोक्ष का मूल: गुरु कृपा

महाराज जी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं, “तो मोक्ष मूलम गुरु कृपा, गुरु कृपा से मुक्त।” वे यह भी मानते हैं कि “गुरु में प्रेम होना हम ये कहते हैं कठिन है। गुरु में प्रेम होना कठिन है।”[youtube]​

तथापि वे आश्वस्त भी करते हैं, “अगर गुरु में प्रेम हो गया तो भगवान अधीन हो जाएंगे। गुरु में प्रेम हो जाए तो भगवान अधीन हो जाएंगे।” यानी जो साधक गुरु में अनन्य प्रेम कर लेता है, वह स्वयं भगवान को भी अपने प्रेम के अधीन कर लेता है।[youtube]​

इसका एक सुंदर जीवंत उदाहरण वे श्री सीताराम ओंकारनाथ जी महाराज के माध्यम से देते हैं। वे कहते हैं, “श्री सीताराम ओंकारनाथ जी महाराज एक बहुत बड़े संत हुए। वो रात-दिन अपने गुरु की चरण पादुका छाती में बांधे रहते थे।”[youtube]​


गुरु-प्रेम की चरम अवस्था

महाराज जी बताते हैं, “हर समय गुरु का दिया हुआ नाम जप करते थे। अपनी छाती में ऐसे गुरु जी की चरण पादुका, लकड़ी की खड़ाऊं, ऐसे उनके कपड़े से रात-दिन बांधे रहते थे। गुरु-गुरु के सिवा तो…” इस वर्णन से वे यह दिखाते हैं कि उनके जीवन का केंद्र बिंदु केवल गुरु ही थे।[youtube]​

वे उन्हें “बड़े सिद्ध महापुरुष” कहकर सम्मानित करते हैं और कहते हैं, “सीताराम ओमकारनाथ जी महाराज, तो कोई ऐसे बिरले जन होते हैं जो गुरु से प्रेम करते हैं और उनका जीवन धन्य हो जाता है जो गुरु से प्रेम करते हैं।”[youtube]​

इस पूरी चर्चा से महाराज जी मूल भाव यही स्थापित करते हैं कि:

  • भगवान एक हैं, रूप अनंत हैं।[youtube]​
  • अनेक विग्रहों की पूजा से फल संख्या के अनुपात में नहीं बढ़ता।[youtube]​
  • प्रेम और भाव की गहराई एकनिष्ठता में ही मिलती है, बिखराव में नहीं।[youtube]​
  • गीता का “अनन्य चिंतन” भक्ति का मर्म है।[youtube]​
  • अनन्य निष्ठा भगवान के किसी एक रूप में हो या गुरु में, वही साधक को सिद्धि और मोक्ष तक पहुंचाती है।[youtube]​

निष्कर्ष: व्यावहारिक संकेत

महाराज जी की बातों का व्यावहारिक सार यह है कि घर में अनेक विग्रह हों तो उन्हें सम्मान दें, पर हृदय की मूल निष्ठा किसी एक रूप में, किसी एक आराध्य में स्थिर करें। जो रूप हृदय को सबसे अधिक आकृष्ट करता है, वही आपका मुख्य आश्रय और साधन का केंद्र बने।[youtube]​

वे संकेत देते हैं कि शुरुआत अनेक देवताओं, अनेक पाठों से हो सकती है, पर साधक यदि ‘एक भरोसो, एक बल, एक आस’ की ओर बढ़ता है तो उसका भजन गाढ़ा और फलदायक हो जाता है। इसी अनन्य निष्ठा में भक्ति का रस, साधना की सिद्धि और जीवन की सार्थकता निहित है।[youtube]

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