मनको पवित्र और संयत करने का एक बड़ा सुन्दर और सफल साधन (EN)

६२-मनको पवित्र और संयत करनेका एक बड़ा सुन्दर और सफल साधन है-सत्संगमें रहकर निरन्तर भगवान्‌की अतुलनीय महिमा और पवित्र लीला-कथाओंका सुनना और फिर उनका भलीभाँति मनन करते रहना।

६३-भगवान्की महिमा और लीला-कथाओंके सुनते रहनेसे हृदयके सारे पाप धुलकर वह निर्मल हो जाता है। पाषाणहृदयकी कठोरता भी गल जाती है और असाधु स्वभावमें विलक्षण परिवर्तन होकर सच्ची साधुता आ जाती है।

जैसे इसे

६४-भगवान्‌का मंगलमय मधुर गुणगान सुनते और करते समय जिसका चित्त तदाकार हो जाता है, शरीर पुलकित हो जाता है, गला भर आता है और नेत्रोंसे शीतल जलकी धारा बहने लगती है, वही पुरुष धन्य है।

६५-सच्चा ज्ञान तो वही है, जो आचरणमें उतर आया हो। नहीं तो, ग्रंथोंके रट लेनेसे क्या होता है। गधा चन्दनका भार ढोता है, पर उसे उसके महत्त्वका कुछ भी पता नहीं होता।

६६-जगत्का नाम-रूप बन्धनकारक और भगवान्‌का नाम-रूप

मुक्तिदायक है। वह यदि बन्धनकारक है तो इसी अर्थमें कि उससे अपने नाम-रूपके प्रेमी भक्तके प्रेम-बन्धनमें भगवान् स्वयं बँध जाते हैं।

जिन बाँध्यो सुर-असुर नाग नर प्रबल कर्मकी डोरी। सोइ अबिच्छिन्न ब्रह्म जसुमति हठि बाँध्यो सकत न छोरी ।।

६७-यह कभी मत समझो कि तुम जबतक शुद्ध नहीं हो जाओगे, तबतक भगवान् तुम्हें ग्रहण नहीं करेंगे, क्या माता मलभरे बच्चेके लिये यह प्रतीक्षा करती है कि वह नहाकर आवेगा तब मैं उसे छूऊँगी।

६८-जैसे स्नेहमयी माता बच्चेकी करुण पुकार सुनते ही दौड़ती है और उसे मलमें भरा देखकर अपने हाथों उठाकर, धोतीसे साफ करती, नहलाती और सुन्दर वस्त्र पहनाकर हृदयसे लगा लेती है, वैसे ही अनन्त स्नेह-सुधा-समुद्र भगवान् भी तुम्हें अपने हाथों विशुद्ध

बनाकर हृदयसे लगानेको तैयार हैं। बस निर्भरतायुक्त अनन्य पुकारकी आवश्यकता है।

६९-जिसने अपना कारोबार किसीको दान कर दिया, उसे कारोबार देन-लेन साफ नहीं करना पड़ेगा। उसे तो वही साफ करेगा जिसने कारोबार लिया है। इसी प्रकार भगवान्के प्रति आत्मसमर्पण करनेपर हमारे अंदरके पाप-तापोंको स्वयं भगवान् ही दूर कर देंगे।

७०-अर्जुनसे भगवान्ने कहा था कि ‘तू सब धर्मोंको छोड़कर एक मेरी शरणमें आ जा, मैं तुझे सब पापोंसे छुड़ा दूँगा। तू चिन्ता मत कर।’ इससे सिद्ध है कि शरणमें आनेके पहले सर्वथा निष्पाप हो जाना अनिवार्य नहीं है। पाप तो शरणमें आनेपर वैसे ही कट जाते हैं जैसे सूर्योदय होते ही अन्धकारका नाश सहज ही हो जाता है।

७१-दूसरोंकी उन्नति और सुख-सम्पत्ति न देख सकना बहुत बड़ा दोष है। इसमें महान् नीच वृत्ति और चरम सीमाका स्वार्थ भरा होता है। वह भाग्यवान् पुरुष है, जो दूसरोंकी सुख-सम्पत्ति देखकर प्रसन्न होता है।

७२-अपनी न्यायकी थोड़ी कमाईपर भी प्रसन्न होना चाहिये और दूसरेकी कभी आशा नहीं करनी चाहिये।

७३-अपनेको किसी भी क्षेत्रमें बड़ा दिखलानेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये। जो बड़ा दिखलानेके फेरमें पड़ जाता है, वह वस्तुतः कभी बड़ा बन नहीं सकता।

७४-मनुष्यको सदा अपनी शक्तिपर भरोसा करना चाहिये, जो उसे परमात्माकी कृपासे मिली है। दूसरेका भरोसा समयपर ऐसा धोखा देता है कि फिर वहाँ मनुष्यको सर्वथा असहाय, निरुपाय और निराश हो जाना पड़ता है।

७५-सुननी चाहिये सबकी, और उनपर विचार भी करना चा परन्तु करनी चाहिये वही बात, जो भगवान्‌की प्रेरणासे अपनी सर्वोत्तम लगती हो।

७६-क्रोधको वैसे ही दूर रखना चाहिये, जैसे साँप और बिच्छू दूर फेंका जाता है। इसी प्रकार लोभको भी।

७७-दूसरेके दोषोंको खोद-खोदकर निकालना समयका दुरुपयोग करना है और साथ ही अपनी हानि भी।

७८-बुरी आदतका दृढ़ताके साथ त्याग करना चाहिये और अच्छी आदतको प्रतिज्ञापूर्वक निबाहना चाहिये।

७९-उस प्रतिज्ञाको तोड़ना धर्म है, जो बुद्धिमें पाप छा जानेपर की गयी हो और जिससे पापकी वृद्धि होती हो, जैसे व्यभिचार, हिंसा, चोरी और नास्तिक आदिकी प्रतिज्ञा।

८०-मनुष्य अपनी बुराईका आप जिम्मेवार है। तुम उसकी बुराईको अपने मत्थे मढ़कर उसे फल चखानेकी चेष्टा मत करो। इससे तुम्हारे अन्दर भी बुराई आ जायगी।

८१-पापीके पापसे घृणा करनी चाहिये न कि पापीसे। उससे तो प्रेम करना चाहिये और अपनेको बचाते हुए ऐसी चेष्टा करनी चाहिये, जिससे वह पापसे मुक्त हो जाय।

८२-दण्ड इसलिये दिया जाता है कि मनुष्यके पापका अभ्यास छूट जाय। दण्ड देनेमें दयाका भाव होना चाहिये न कि द्वेषका। जो लोग किसीको कष्ट पाते या तबाह होते देखकर प्रसन्न होते हैं, वे दयालु नहीं हैं। वे तो द्वेषी हैं और इसलिये वे निश्चय ही पापके भागी होते हैं।

८३-किसीकी सहायता करके उस सहायताको भूल जाना चाहिये। यदि रहे तो उसे वैसे ही छिपाना चाहिये, जैसे कमजोर दिलका आदमी अपना पाप छिपाता है।

८४-जो मनके सर्वथा अनुकूल परिस्थिति प्राप्त करके सुखी होनेका स्वप्न देखते हैं, वे कभी सुखी होंगे ही नहीं, क्योंकि संसारकी प्रत्येक परिस्थितिमें कुछ-न-कुछ प्रतिकूलता तो रहेगी ही।

८५-अपूर्ण जगत्के अपूर्ण भोगोंमें कभी कहीं भी पूर्णता नहीं मिल सकती।

८६-प्रणाली कोई भी सर्वथा पूर्ण नहीं हुआ करती। प्रणाली बनती है और जबतक उसमें खास बुराई नहीं आती, तबतक चलती है। वड आते ही प्रतिक्रिया होती है और प्रणाली बदल जाती है- यही प्रकृतिका

नियम है। ८७-सत्य एक और पूर्ण होता है, वह कभी बदल नहीं सकता। सत्य सदा ही एकरस और एकरूप है।

या सदा ही, पफिरते, उठते-बैठते, खाते-पीते, स्वासके द्वारा नाम जपका अभ्यास सभी समय किया जा सकता है और अभ्यास सिद्ध हो जानेपर तो नाम-जप सदा-सर्वदा अपने-आप चलता है।

८९-साधना अधिकारी-भेदसे तीन चालोंसे चलती है-चींटीको चाल, बन्दरकी चाल और पक्षीकी चाल। चींटी धीरे-धीरे चलती है और अनेक बाधा-विघ्नोंका सामना करती हुई बहुत देरमें लक्ष्यतक पहुँच पाती है। बहुत दूरकी यात्रा तो उसके लिये बड़ी कठिन होती है।

बन्दर एक पेड़से दूसरे पेड़पर कूद जाता है और बहुत जल्दी रास्ता तै करता है; परन्तु वह भी पेड़ोंमें दूरका फासला होनेपर अटक जाता है।

पक्षी अविराम गतिसे उड़कर बहुत शीघ्र अपने लक्ष्य स्थानपर पहुँच जाता है।

९०-यह नियम नहीं है कि मनुष्यमात्रको इसी जीवनमें पूर्णता प्राप्त हो जायगी।

९१-हजारों मनुष्योंमें कोई एक ही इस पथपर आता है और आनेवालोंमें भी अन्ततक अविराम गतिसे चलकर लक्ष्यतक पहुँचनेवाले तो बहुत ही थोड़े-कोई बिरले ही होते हैं।

९२-संसारके प्रलोभन इतने प्रबल होते हैं कि वे बुद्धिमान् पुरुषकी बुद्धिमें भ्रम पैदा करके उसे संसारमें फँसा देते हैं।

९३-सूर्यकी किरणें सभी जगह पड़ती हैं, परन्तु वे किसीको भी जला नहीं सकतीं। वे ही किरणें जब आतशी शीशेपर पड़ती हैं, तब बहुत-सी एक ही केन्द्रमें इकट्ठी हो जाती हैं और उनसे ऐसी दाहिकाशक्ति प्रकट होती है, जो शीशे के उस पार रहे हुए तृण-वस्त्र आदि को जला देती है. इसी प्रकार एकाग्र मन पर जब भगवन की चैतन्य ज्योति प्रकाश पड़ता है, तब उसमें से ज्ञान की अग्नि पैदा हो जाती है, जो समस्त अज्ञानराशि को जला देती है.

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