चुनाव आयोग विवाद पर मैं क्या सोचता हूं
उत्तर प्रदेष में पिछले साल 2025 की सर्दियों में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही थी। मैं गाजियाबाद के इंदिरापुरम इलाके में रहता हूं। मेरी सोसाइटी में बीएलओ साहब आए। उन्होंने एक फार्म भरने और साथ में कुछ दस्तावेज लगाने को कहा। मैंने आधार कार्ड की फोटो कॉपी दे दी और षायद चेक बुक के पहले पेज जिस पर मेरे नाम और पता था, उसकी कॉपी भी दे दी।
कुछ दिनों बाद बीएलओ साहब का फोन आया, कहने लगे कि सोसाइटी के कम्युनिटी हॉल में बैठा हूं, अरे 2002 की मतदाता सूची में ंआपका नाम होने का आपके पास कोई प्रूफ है। मैंने कहा, ढूंढता हूं। मैंने घर में तलाषी षुरू की। दरअसल मेरा दिल्ली का पुराना वोटर पहचान पत्र खो गया था, उसकी कोई फोटोकॉपी भी नहीं मिल रही थी। मैं बीएलओ साहब के पास गया, उनके साथ उनके सहयोगी भी थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि दिल्ली की कौन सी विधानसभा सीट पर आपका वोट था। मुझसे ढंग से याद भी नहीं था, मैंने पहले कहा, गोल मार्केट फिर कहा शीला दीक्षित किस विधानसभा से लड़ती थी। फिर कहा, नई दिल्ली। निर्माण भवन में वोट डालता था, जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी वोट डालती थी। (कुछ गर्व से बोला, क्योंकि ये वीआईपी इलाके की सीट थी, वहां स्थाई निवास नहीं था, लेकिन जब भी घमंड रहता था कि मैं जीवन के 30 वर्ष उस इलाके में रहा।)
बीएलओ के सहयोगी ने अपने मोबाइल पर चुनाव आयोग से जुड़े एक वेबसाइट पोर्टल पर नई दिल्ली, गोल मार्किट विधानसभा की मतदाता सूची में मेरा नाम खंगाला। फिर मेरे नाम धीरज कनोजिया से खंगाला। फिर मेरे पिता जी के नाम से खंगाला। फिर शायद मेरे बूथिंग सेंटर निर्माण भवन की मतदाता सूची पर खंगाला। काफी मशक्कत के बाद वो 2002 की मतदाता सूची में मेरा नाम षामिल होने का सबूत नहीं खोज पाए। मैं भी परेषान हो गया। सहयोगी ने कहा, अरे भाईसाहब मिल ही नहीं रहा। फिर शायद माता जी के नाम से खंगाला। फिर भी कुछ हाथ नहीं लगा। सहयोगी बोले-अब कैसे होगा। मैंने कहा, अब क्या मुझे बांग्लादेषी घोषित कर दिया जाएगा। (मजाक में)
सोचने लगा, अब क्या करूं। फिर मुझे बड़े भाई साहब का ध्यान आया। मैंने सोचा, उससे पूछता हूं कि हमारी विधानसभा सीट का नाम क्या था? भाई को फोन लगाया और बताया। उसने जो बताया, उससे बहुत सुख मिला और एकदम से काले बादल छंट गए।
दरअसल, भाई ने कहा कि अरे उसने 2002 की मतदाता सूची में हमारे पूरे परिवार के नामों को ढंूढ कर पूरी डिटेल निकाल ली है और वह मुझे देना चाहते थे, लेकिन देना भूल गए। क्योंकि कुछ दिन पहले ही मैं भाई के घर गया था।
मैंने यह बात बीएलओ सहयोगी को बताई तो उन्होंने तुरंत कहा, अरे तुरंत डिटेल भेजो भाई, वह अपने पास रखके क्या कर रहे है, भाई ने सेंकड में व्हाट्सअप पर मतदाता सूची में हमारे परिवार के नामों का स्क्रीन शॉट भेज दिया। सहयोगी ने डिटेल को अपने मोबाइल पर खुले पोर्टल की विंडो पर सर्च किया और तुरंत मेरा नाम वेरिफाई हो गया, उसने डिटेल लिखी, मेरे फार्म पर कुछ लिखा और काम हो गया। मैं बहुत खुश हुआ।
अब कहने के लिए मैं कह सकता हूं कि मुझे बेवजह परेशान किया गया। मेरा नाम तो था ही 2002 की मतदाता सूची में, फिर भी परेषान किया। मगर यह बताओ कि डिटेल आने के बाद ही साबित हुआ कि मैं 2002 में वोटर था, उससे पहले तो चुनाव अधिकारी भी मेरा नाम खोजने की पूरी कोशिश कर रहे थे। वह भी नहीं चाह रहे थे कि मेरा नाम कटे। उन्होंने सभी तरह से मेरा नाम वेरीफाई करने की भरसक कोशिश की।
मुझे लगता है कि जैसे मैं खुषनसीब रहा, वैसे वो लोग नहीं रहे जिनका नाम मतदाता सूची से कट गया। लेकिन अगर मेरी डिटेल नहीं मिलती तो शायद मेरा नाम भी कट सकता या फिर मुझे अन्य दस्तावेज आगे की सुनवाई मे ंदेने पड़ते। आगे की प्रक्रिया का पालन करना पड़ता। हो सकता है कि मैं भी उस परीस्थिति में चुनाव आयोग पर अपना नाम काटने को लेकर गुस्सा हो जाता। गरियाता और धोखाधड़ी करने का आरोप लगा सकता था। वो बात अलग है कि यह बात मैं अपने परिवार और दोस्तों के बीच ही बोलता, मीडिया में नहीं बोलता।
खैर, यह मेरा अनुभव था। चुनाव आयुक्त ज्ञानेष कुमार पर वोट चोरी के आरोपों को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। आषा है कि कोर्ट इस मुद्दे पर जल्द सुनवाई करेगा और आयोग के प्रमुख पर गंभीर आरोपों की सच्चाई जल्द सामने लाएगा।
नई दिल्ली के जंतर मंतर समेत देश के तमाम हिस्सों पर हो रहे धरने प्रदर्षनों के आधार पर मेरे लिए कोई नतीजा निकालना मुष्किल होगा। इसलिए आषा है कि कोर्ट जल्द ही एक बेहतर फैसला लेकर आशंकाओं को हटाने का काम करेगा। इसके अलावा एक मीडिया रिपोर्ट के आधाार पर एक संवैधानिक संस्था के प्रमुख को दोेषी नहीं ठहराया जा सकता।
श और ष में कृतिदेव फॉण्ट में कुछ टेक्नीकल गलती हो सकती है, कृपया कॉमन सेन्स से समझ लेना.







