यह वीडियो INDmoney के यूट्यूब चैनल पर निकिता और राहुल जैन के बीच एक पॉडकास्ट है, जिसमें राहुल बताते हैं कि कैसे एक साधारण सैलरी से शुरुआत करके उन्होंने 36 साल की उम्र में लगभग 5 करोड़ का कॉर्पस बना लिया और फिर भी सादगी भरी जिंदगी जी रहे हैं।
नीचे पूरा लेख इसी वीडियो/पॉडकास्ट की कहानी पर आधारित है और अंत में स्रोत का उल्लेख भी किया गया है।
शुरुआत: एक आम नौकरी, बड़ा सपना
राहुल जैन मध्यप्रदेश के एक छोटे से कस्बे से निकलकर आईटी सेक्टर में काम करने वाले एक आम मध्यमवर्गीय युवा की तरह दिखते हैं, लेकिन उनकी वित्तीय यात्रा उन्हें भीड़ से अलग बनाती है। बचपन हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ाई, साधारण माहौल, सीमित संसाधन, और करियर के नाम पर सिर्फ इतना सपना कि किसी दिन एक अच्छी कंपनी में नौकरी लग जाए और परिवार को स्थिर जीवन मिल जाए।
2010 में टीसीएस (TCS) में उनकी पहली नौकरी लगी। उनकी शुरुआती वार्षिक सैलरी लगभग 3 लाख रुपये के आसपास थी, यानी महीने के लगभग 22,000 रुपये। ज्यादातर लोग इस दौर में पूरी सैलरी खर्च कर देते हैं, पर राहुल ने यहीं से अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण आदत शुरू की – नियमित निवेश और SIP।
पहली सैलरी से SIP तक की कहानी
राहुल बताते हैं कि उन्होंने अपनी पहली जॉब की पहली सैलरी मिलते ही निवेश के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण थे उनके पिता, जो स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में काम करते थे और समय‑समय पर शेयर बाज़ार में भी निवेश करते थे।
उनके बचपन की एक याद यह है कि पिता उन्हें ब्रोकिंग ऑफिस ले जाया करते थे, जहां पेपर शेयर, रेवेन्यू स्टैम्प और फ़िजिकल सर्टिफिकेट्स के ज़रिए ट्रेडिंग होती थी। शाम को दूरदर्शन पर 8 बजे आने वाली शेयर बाज़ार की खबरें, दलाल स्ट्रीट की बिल्डिंग के दृश्य, और वहां खड़ी भीड़ ने राहुल के मन में बहुत पहले से यह बीज बो दिया था कि “पैसा सिर्फ कमाया नहीं जाता, उसे बढ़ाया भी जाता है।”
मुंबई में जॉब लगने के बाद उनकी एक और इच्छा पूरी हुई – दलाल स्ट्रीट जाना। वे बस बिल्डिंग देखने गए थे, लेकिन संयोगवश वहीं किसी कंपनी का एक सेमिनार चल रहा था, जिसमें “Systematic Investment Plan – SIP” के बारे में समझाया जा रहा था। वहां उन्होंने पहली बार गंभीरता से सुना कि अगर कोई 15–20 साल तक अनुशासन के साथ SIP करता रहे, तो लंबी अवधि में कितना बड़ा कॉर्पस तैयार हो सकता है।
उस समय उन्हें लगा कि शायद कोई “स्कीम बेचने” की कोशिश हो रही है, इसलिए तुरंत शुरुआत नहीं की। लेकिन यह विचार उनके दिमाग में बैठ गया – “अगर मुझे सीधे शेयर नहीं समझ आते, तो किसी अच्छे फंड मैनेजर के ज़रिए म्यूचुअल फंड्स में निवेश करना एक बेहतर तरीका हो सकता है।”
यहीं से उनकी SIP यात्रा शुरू हुई। 2010 से लेकर 2024 तक, यानी लगभग 14 साल में उन्होंने एक भी SIP इंस्टॉलमेंट मिस नहीं की।
सैलरी ग्रोथ: 3 लाख से 1 करोड़ तक
राहुल की सैलरी ग्रोथ कोई रातों‑रात हुई कहानी नहीं है। शुरुआती 10 साल तक उनकी आय बहुत साधारण तरीके से बढ़ी – 3 लाख से 3.6 लाख, फिर 4.2 लाख, और इसी तरह क्रमिक इंक्रीमेंट।
एक बड़ा मोड़ आया 2015 के आसपास, जब वे अमेरिका (US) गए और वहां चार साल काम किया। भारत में जहां उनकी सैलरी 70,000 रुपये प्रति माह के आसपास थी, वहीं US में वही सैलरी इंडियन रुपीज टर्म में लगभग 60 लाख सालाना हो गई। लेकिन खर्च भी डॉलर में होने के कारण नेट सेविंग लगभग 1.25 लाख रुपये प्रति माह के आसपास रहती थी।
US में रहते हुए उन्होंने सिर्फ पैसा ही नहीं कमाया, बल्कि पश्चिमी दुनिया के काम करने के तरीके, करियर ग्रोथ और सेल्फ‑ब्रांडिंग के बारे में भी बहुत कुछ सीखा। वापस भारत लौटने के बाद कोविड का समय चल रहा था। उसी दौरान एक कॉलेज फ्रेंड से बातचीत ने उनके माइंडसेट को झकझोर दिया – उस मित्र ने 3 महीने के अंदर ही 35 लाख के CTC से सीधे 75 लाख का पैकेज हासिल कर लिया था।
इस घटना ने राहुल को यह महसूस कराया कि “30% हाइक” जैसा कोई फिक्स स्टैंडर्ड नहीं होता, असली बात आपकी वैल्यू और स्किल सेट है। उन्होंने अपने स्किल्स पर काम किया, खासकर Data & AI क्षेत्र में, और अंततः उन्हें करीब 3x जंप के साथ एक नई नौकरी मिली, जिसमें उनका पैकेज लगभग 1 करोड़ रुपये सालाना के आसपास पहुंच गया।
आज वे Snowflake में Data & AI Manager के रूप में काम कर रहे हैं और उनकी सैलरी करीब 1 करोड़ रुपये प्रति वर्ष के आसपास है।
5 करोड़ का कॉर्पस: 14 साल की अनुशासित SIP
राहुल बताते हैं कि 1 करोड़ नेटवर्थ तक पहुंचने में सबसे ज्यादा समय लगा, लेकिन उसके बाद कंपाउंडिंग की ताकत ने उनके पोर्टफोलियो को तेज गति से बढ़ाना शुरू किया।
वर्तमान में वे करीब 2 लाख रुपये प्रति माह की SIP कर रहे हैं और उनका कुल निवेश कॉर्पस लगभग 5 करोड़ रुपये के आसपास पहुंच चुका है। उन्होंने 2010 से आज तक एक भी SIP मिस नहीं की, और यही अनुशासन उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
उनका मानना है कि:
- निवेश को “बहुत बोरिंग” प्रक्रिया बनाना चाहिए – यानी बार‑बार बदलाव नहीं, सिर्फ नियमित ऑटोमैटिक निवेश।
- कंपाउंडिंग तभी काम करती है, जब आप समय और अनुशासन दोनों दे सकें।
- बड़ा कॉर्पस होते ही रिस्क प्रोफाइल और पोर्टफोलियो कंसर्वेशन पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
घर खरीदना या किराए पर रहना: उनका दृष्टिकोण
राहुल के पास पुणे में खुद का घर है, लेकिन वे फिलहाल किराए के घर में रहते हैं, जिसका रेंट लगभग 42,000 रुपये प्रति माह है। उनका खुद का घर ऑफिस से काफी दूर है, जिससे रोज आने‑जाने में 2 से 2.5 घंटे तक का समय लग जाता था।
उन्होंने दो महीने यह रूटीन निभाया और महसूस किया कि यह जीवन‑शैली लंबे समय तक चलाना मुश्किल है। न केवल उनकी प्रोडक्टिविटी कम हो रही थी, बल्कि उनकी छोटी बेटी के साथ समय भी कम मिलता था।
इसलिए उन्होंने निर्णय लिया:
- ऑफिस के पास एक बड़ा घर किराए पर लेना,
- अपने खुद के घर को किराए पर दे देना,
- HRA बेनिफिट, कम्यूट कॉस्ट सेविंग और रेंट इनकम – तीनों को मिलाकर देखा जाए तो यह निर्णय वित्तीय और जीवन दोनों स्तर पर फायदेमंद साबित हुआ।
उनका कहना है कि घर के साथ भावनात्मक लगाव जरूर होता है, लेकिन अगर उसी शहर में बेहतर लोकेशन पर किराए के घर से समय, सुविधा और टैक्स बेनिफिट मिल रहे हों, तो इसे भी एक तार्किक विकल्प की तरह देखना चाहिए।
टैक्स प्लानिंग: परिवार को “टैक्स एंटिटी” बनाना
राहुल उच्च टैक्स ब्रैकेट (30%) में आते हैं, इसलिए उन्हें टैक्स प्लानिंग पर भी अच्छे से काम करना पड़ा। वे बताते हैं कि उन्होंने अपने परिवार के सदस्यों को अलग‑अलग “टैक्स पेइंग एंटिटी” की तरह स्ट्रक्चर किया है –
- पत्नी का PAN,
- बेटी का PAN और बैंक/डीमैट अकाउंट,
- मां (Senior Citizen) का PAN,
- यहां तक कि उनकी दादी (जो अब नहीं हैं) का भी PAN था, जबकि उनकी कोई इनकम नहीं थी।
उनका कहना है कि अगर आप परिवार में टैक्स पेइंग एंटिटीज की संख्या बढ़ा देते हैं, तो विभिन्न निवेशों से आने वाला कैपिटल गेन और इंटरेस्ट अलग‑अलग नामों में बांटा जा सकता है, जिससे कुल टैक्स आउटगो कम हो जाता है।
बेटी के लिए फाइनेंशियल प्लान: जन्म से ही
राहुल की बेटी अभी 2 साल की है, लेकिन उन्होंने उसके लिए तीन स्तर पर योजना बना रखी है।
- बर्थ सर्टिफिकेट और बैंक अकाउंट – जैसे ही बेटी एक माह की हुई, उन्होंने उसका बर्थ सर्टिफिकेट बनवाया और बैंक अकाउंट खुलवा लिया।
- सुकन्या समृद्धि योजना – बेटी के नाम से सुकन्या समृद्धि योजना शुरू की, जो 18 साल की उम्र के आसपास मैच्योर होगी और एक अच्छा लम्पसम अमाउंट देगी।
- SIP और मनी‑बैक पॉलिसी –
- बेटी के नाम से अलग SIP चल रही है,
- एक मनी‑बैक स्कीम ली है जिसमें वे 7 साल तक प्रीमियम देंगे और आठवें साल से हर साल बेटी के नाम से पैसे मिलना शुरू हो जाएंगे, जो उसकी पढ़ाई, एक्टिविटीज और पॉकेट मनी के लिए उपयोग होंगे।
इसके लिए उन्होंने बेटी का PAN और डीमैट अकाउंट भी खुलवा लिया है, जो आज के डिजिटल माहौल में मात्र 20 मिनट की प्रक्रिया है, बशर्ते डॉक्यूमेंट्स तैयार हों।
भविष्य का विजन: 50 तक 50 करोड़
राहुल अपने लक्ष्य के बारे में बहुत स्पष्ट हैं। अभी वे 36 वर्ष के हैं और उन्होंने बैक‑कैल्कुलेशन करके दो प्रमुख लक्ष्य तय किए हैं:
- 45 वर्ष की उम्र तक 20 करोड़ का कॉर्पस,
- 50 वर्ष की उम्र तक 50 करोड़ का कॉर्पस (जिसे वे “50 by 50” कहते हैं)।
वे यह भी कहते हैं कि अगर पैसा सही गति से कंपाउंड होता रहा और अनुशासन बना रहा, तो 50 के बाद 55 में 100 करोड़, 60 में 200 करोड़ और 65 में 400 करोड़ तक का कॉर्पस भी गणित के स्तर पर संभव है। लेकिन उनका फोकस सिर्फ नंबर पर नहीं, बल्कि “फ्रीडम” पर है – यानी बिना किसी EMI, बिना कर्ज, और बिना लाइफस्टाइल प्रेशर के जीवन जीना।
वे आज भी अपनी 6 साल पुरानी हैचबैक कार चलाते हैं और कहते हैं कि उन्हें कार अपग्रेड करने में कोई खास वैल्यू दिखाई नहीं देती, इसलिए वे उस पर पैसा खर्च नहीं करते।
खर्च करने का फिलॉसफी: जहां वैल्यू दिखे, वहां दिल खोलो
राहुल का मानना है कि पैसा सिर्फ बचाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने के लिए भी होता है। वे एक उदाहरण देते हैं कि हाल ही में वे 16 दिनों की UK ट्रिप पर गए – 5 दिन लंदन, 10 दिन स्कॉटलैंड, परिवार के साथ घूमना, अनुभव लेना – और इस यात्रा में उन्होंने 6–8 लाख रुपये खर्च किए।
उनका कहना है कि यात्रा, अनुभव और माइंड‑रिफ्रेशमेंट जैसी चीजें उन्हें वैल्यू देती हैं, इसलिए वे वहां पैसे खुशी‑खुशी खर्च करते हैं। लेकिन कार जैसी चीज, जिसे अपग्रेड करने से उनकी लाइफ क्वालिटी में कोई बड़ा बदलाव नहीं आता, वहां वे खर्च टाल देते हैं।
वे एक पुराने आर्टिकल का जिक्र करते हैं – “The Pleasure of Walking Tall” – जो उन्होंने 1970 के आसपास के किसी अखबार में एक वेल्थ मैनेजमेंट कंपनी के विज्ञापन के रूप में पढ़ा था। उसमें लिखा था कि आपकी सेविंग्स आपके चलने का अंदाज़, आपका कॉन्फिडेंस, आपकी आवाज़ और आपके संपूर्ण व्यक्तित्व पर असर डालती हैं; बिना सेविंग वाला व्यक्ति हमेशा भागता रहता है, पहली जॉब ऑफर स्वीकार कर लेता है, और सुरक्षा की कमी के कारण निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो जाती है। यह लेख आज भी उन्हें प्रेरित करता है।
मेनिफेस्टेशन: “एक करोड़ करना है” से “5 करोड़ हो गए” तक
राहुल सिर्फ अनुशासन और गणित की बात नहीं करते, वे “मेनिफेस्टेशन” पर भी भरोसा रखते हैं। नौकरी के शुरुआती दिनों में वे सोचते थे कि क्या कभी जीवन में उनके पास 1 करोड़ रुपये होंगे, और अगर होंगे तो शायद जीवन के बहुत अंतिम चरण में। धीरे‑धीरे उन्होंने अपने दिमाग में यह वाक्य बैठा लिया – “एक करोड़ करना है, एक करोड़ करना है…”
वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता वे कितने साल जिएंगे, लेकिन वे यह जरूर जानते थे कि 1 करोड़ का टारगेट हासिल करना है। 32 साल की उम्र तक उन्होंने यह लक्ष्य हासिल कर लिया।
इसके बाद उन्होंने “पॉडकास्ट में अपनी कहानी बताने” का भी मेनिफेस्टेशन किया – कोविड के समय से वे लगातार पॉडकास्ट देखते थे और सोचते थे कि कभी वे भी अपनी कहानी इस तरह शेयर कर पाएंगे या नहीं। आज वे INDmoney के इस पॉडकास्ट में बैठकर अपनी यात्रा बता रहे हैं, जिसे वे मेनिफेस्टेशन का ही परिणाम मानते हैं।
सबसे बड़ा चैलेंज: छोटा शहर, हिंदी मीडियम, अंग्रेज़ी का डर
राहुल मानते हैं कि अगर आज कोई उन्हें देखे, तो शायद यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो कि वे कितने शर्मीले और संकोची बैकग्राउंड से आते हैं। वे एक छोटे से टाउन में पले‑बढ़े, जहां उन्होंने पूरी पढ़ाई हिंदी मीडियम स्टेट बोर्ड स्कूल से की।
उनके लिए सबसे बड़ा डर था – अंग्रेज़ी में बोलना और क्लाइंट के सामने कम्युनिकेशन करना। लेकिन TCS जैसी MNC में जॉब करते हुए, जहां ज्यादातर क्लाइंट्स बाहर के थे, उन्हें खुद को बदलना पड़ा। उन्होंने बैक सीट लेने की बजाय कॉल ड्राइव करने का फैसला किया, रिस्क लिया और धीरे‑धीरे अपनी कम्युनिकेशन स्किल्स को बेहतर बनाया। US जाने के बाद इस आत्मविश्वास को और मजबूती मिली।
25 साल के युवाओं के लिए संदेश
पॉडकास्ट के अंत में निकिता उनसे पूछती हैं कि अगर कोई 25 साल का युवा है, जिसकी सैलरी 50,000 रुपये प्रति माह है, तो वह क्या करे ताकि वह भी वित्तीय रूप से बढ़ सके।
राहुल का जवाब बहुत स्पष्ट है:
- सबसे पहले इन्फ्लेशन समझो – अगर आप पैसे सिर्फ बचत खाते में रखते हो, तो वास्तविक मूल्य लगातार घटता रहेगा।
- डेट, फिक्स्ड इनकम और इक्विटी जैसे बेसिक कॉन्सेप्ट्स समझो – यह कोई बहुत कठिन गणित नहीं है।
- टिप्स के पीछे मत भागो – “कोई अच्छा स्टॉक बता दो” वाली मानसिकता की जगह “प्रोसेस समझो कि स्टॉक मार्केट कैसे काम करता है” वाली मानसिकता अपनाओ।
- शुरुआत में सिर्फ 5% सैलरी से ही सही, लेकिन प्रोसेस में घुसो – एक छोटी SIP शुरू करो, अलग‑अलग इंस्ट्रूमेंट्स का अनुभव लो।
- 20s में जितनी गलती करनी है, कर लो – क्योंकि इस समय आपके पास खोने के लिए ज्यादा नहीं, लेकिन सीखने के लिए बहुत कुछ है।
वे कहते हैं कि फाइनेंस के बेसिक्स – गणित, अनुशासन, कंपाउंडिंग, और थोड़ा‑सा माइंडसेट – समझ लेना ही आधी लड़ाई जीत लेने जैसा है।
लेख का स्रोत
यह पूरा लेख निम्नलिखित वीडियो/पॉडकास्ट पर आधारित है:
वीडियो का शीर्षक:
“How He Built Wealth with SIPs for 14 years | Journey to Financial Freedom”
चैनल: INDmoney (YouTube)
लिंक: https://www.youtube.com/watch?v=YB7lqlTrBEk






