सबसे पहले यह साफ समझ लेना ज़रूरी है कि लखनऊ के कोचिंग सेंटर हादसे जैसी त्रासदियाँ सिर्फ़ “दुर्घटना” नहीं, बल्कि लापरवाही और कमज़ोर सिस्टम का नतीजा होती हैं। माता–पिता अगर सजग, संगठित और सख़्त रुख अपनाएँ, तो देश भर के कोचिंग सेंटर बच्चों के लिए कहीं ज़्यादा सुरक्षित बन सकते हैं।[ndtv]
1. हालिया घटनाओं से सीख – समस्या कहाँ है?
- लखनऊ के अलीगंज इलाके में एक व्यावसायिक बिल्डिंग में चल रहे कोचिंग सेंटर में आग लगने से 14–15 छात्रों की मृत्यु हुई और कई गंभीर रूप से घायल हुए।
- अधिकांश बच्चों की मौत धुएँ से दम घुटने और बाहर निकलने का रास्ता न मिलने के कारण हुई, कई छात्रों को जान बचाने के लिए ऊपर से कूदना पड़ा।
- शुरुआती रिपोर्टों में सामने आया कि बिल्डिंग में गेम ज़ोन, शोरूम आदि के साथ कोचिंग चल रही थी, जहाँ आग और सुरक्षा के पर्याप्त इंतज़ाम नहीं थे।
- इस तरह की घटनाएँ नई नहीं हैं; इससे पहले दिल्ली के ओल्ड राजिंदर नगर में पानी से भरे बेसमेंट में कोचिंग चलने के दौरान कुछ छात्रों की मौत हुई, जिसके बाद दिल्ली सरकार ने सख़्त नियम बनाने की प्रक्रिया शुरू की।
- दक्षिण दिल्ली के कई कोचिंग हब में फायर एग्ज़िट नहीं, खुले तार, संकरे रास्ते जैसी गंभीर खामियाँ मीडिया रिपोर्टों में सामने आती रही हैं।
इन घटनाओं से यही स्पष्ट होता है कि माता–पिता अगर पहले से ही सुरक्षा की जाँच करें और प्रशासन पर दबाव बनाएँ, तो कई हादसे टाले जा सकते हैं।
2. कोचिंग चुनने से पहले माता–पिता की जिम्मेदारियाँ
कोचिंग जॉइन करने से पहले सिर्फ़ रिज़ल्ट और फ़ीस न देखें, बल्कि सुरक्षा और कानूनी अनुपालन को सबसे ऊपर रखें।
- बिल्डिंग की लोकेशन और स्ट्रक्चर देखें
- क्या कोचिंग किसी भीड़–भाड़ वाले कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स, बेसमेंट या बिना वेंटिलेशन के फ्लोर पर तो नहीं है।
- क्या प्रवेश और निकास के रास्ते पर्याप्त चौड़े और साफ़ हैं या सामान से भरे हुए हैं।[timesofindia.indiatimes]
- फायर सेफ्टी की बुनियादी जाँच
- क्या बिल्डिंग में फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट लगा है और वैध तारीख़ तक है।[theprint]
- क्या फायर–एक्सटिंग्विशर, फायर अलार्म, स्मोक डिटेक्टर आदि लगे हैं और काम कर रहे हैं।[theprint]
- क्या आपातकालीन सीढ़ियाँ (इमरजेंसी एग्ज़िट) हैं और उन पर ताला तो नहीं लगा।[indiatoday]
- क्लासरूम की भीड़ और वेंटिलेशन
- बेसमेंट या ऊपर के फ़्लोर में चल रही कोचिंग से सावधान
- बेसमेंट में पानी भरने, बिजली के झटके और दम घुटने के जोखिम ज़्यादा होते हैं, जैसा कि दिल्ली हादसे में हुआ।[timesofindia.indiatimes]
- बहुत ऊँचे फ़्लोर पर, बिना सही इमरजेंसी एग्ज़िट के, बच्चों को भेजना जोखिम भरा है क्योंकि आग या धुएँ में नीचे उतरना मुश्किल हो जाता है।[newsonair.gov]
- रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस की जानकारी
- संबंधित राज्य/ज़िले के नियमों के अनुसार कोचिंग का रजिस्ट्रेशन नंबर और लाइसेंस दिखाने को कहें।[indiatoday]
- अगर संस्था टाल–मटोल करे या दस्तावेज़ दिखाने से मना करे, तो ऐसे कोचिंग से दूर रहें।[theprint]
3. प्रशासनिक नियम समझें और लागू करवाएँ
भारत सरकार और कई राज्य सरकारें अब कोचिंग सेंटर के लिए अलग–अलग गाइडलाइंस और नियम बना रही हैं। माता–पिता को इनके बारे में जानकारी लेकर संस्था से अनुपालन की माँग करनी चाहिए।[indiatoday]
- केंद्र सरकार की गाइडलाइंस (सामान्य बिंदु)
- नई गाइडलाइंस के अनुसार कोचिंग सेंटरों को बिल्डिंग सेफ्टी, फायर सेफ्टी और अन्य मानकों का पालन करना अनिवार्य है।[theprint]
- प्रत्येक सेंटर/ब्रांच का अलग–अलग रजिस्ट्रेशन और आवश्यक सर्टिफिकेट होना चाहिए।[theprint]
- गलत–भ्रामक विज्ञापन, रिज़ल्ट की गारंटी आदि पर रोक लगाई गई है, ताकि विद्यार्थियों और माता–पिता को झूठे दावों से बचाया जा सके।[theprint]
- दिल्ली जैसे बड़े शहरों में प्रस्तावित कड़े नियम
- कोचिंग सेंटरों को रजिस्ट्रेशन के साथ फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट, बिल्डिंग स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट, साफ़–सुथरे वॉशरूम, पीने के पानी और फर्स्ट–एड की सुविधा अनिवार्य रूप से देनी होगी।[indiatoday]
- बेसमेंट में कोचिंग चलाने पर कड़ाई से प्रतिबंध या बेहद कड़े सुरक्षा मानक लागू किए जा रहे हैं।[timesofindia.indiatimes]
- माता–पिता क्या करें
- अपने शहर/ज़िले की शिक्षा विभाग या नगर निगम की वेबसाइट/ऑफिस से कोचिंग से जुड़े स्थानीय नियम पता करें।[indiatoday]
- जिस कोचिंग में आपका बच्चा पढ़ रहा है, वहाँ इन नियमों के पालन की लिखित पुष्टि माँगें।
- अगर कोई कमी दिखे तो लिखित शिकायत ज़िला शिक्षा अधिकारी, नगर निगम, फायर विभाग या उप–जिलाधिकारी (SDM) को दर्ज करवाएँ।[timesofindia.indiatimes]
4. रोज़ाना की निगरानी – बच्चों से क्या पूछें, क्या देखें?
सिर्फ़ एडमिशन के समय नहीं, बल्कि पूरी साल भर माता–पिता को सतर्क रहना होगा।
- बच्चे से नियमित फीडबैक लें
- रोज़ या सप्ताह में कम से कम एक–दो बार बच्चे से पूछें – क्लास में भीड़ कैसी है, धूप/गर्मी/घुटन महसूस होती है या नहीं, आने–जाने के रास्ते पर कोई खतरा तो नहीं।
- यदि बच्चा कहे कि उसे घुटन लगती है, धुआँ/जलने की बदबू आती है, या कहीं पर हमेशा पानी जमा रहता है, तो इसे तुरंत गंभीरता से लें।[timesofindia.indiatimes]
- अचानक विज़िट करें
- बिना बताए कोचिंग के समय अचानक जाकर देखें कि असल में क्या माहौल है – भीड़, सुरक्षा, अनुशासन, बिजली की वायरिंग, कॉरिडोर की स्थिति आदि।[timesofindia.indiatimes]
- सिर्फ़ ऑफिस या रिसेप्शन न देखें, क्लासरूम तक जाकर निरीक्षण करने की कोशिश करें।
- ट्रायल–इवैकुएशन और डेमो की माँग
- कोचिंग से यह लिखित नीति माँगें कि आग या आपदा की स्थिति में बच्चे कैसे बाहर निकलेंगे।
- स्कूलों की तरह कोचिंग में भी समय–समय पर “फायर ड्रिल” या इमरजेंसी ड्रिल कराई जाए, यह माँग सामूहिक रूप से माता–पिता रखें।[indiatoday]
- इलेक्ट्रिकल सेफ्टी और जुगाड़ से सावधान
- कई जगह सस्ते मल्टी–प्लग, ओवरलोडेड एक्सटेंशन बोर्ड और खुले तार आग का बड़ा कारण बनते हैं, जैसा कि कई रिपोर्टों में सामने आया।[firstpost]
- यदि आप ऐसे जुगाड़ देखें तो तुरंत प्रशासन और कोचिंग मैनेजमेंट दोनों का ध्यान इस पर दिलाएँ।
5. सामूहिक ताकत – पेरेंट्स ग्रुप और एक्शन प्लान
एक–दो माता–पिता की बात कई बार अनसुनी हो जाती है, लेकिन संगठित ग्रुप की आवाज़ को नज़रअंदाज़ करना मुश्किल होता है।
- व्हाट्सऐप/टेलीग्राम पेरेंट्स ग्रुप बनाना
- जिस कोचिंग में आपका बच्चा पढ़ता है, उसी बैच/क्लास के माता–पिता का एक ग्रुप बनाएं।
- उसमें सेफ्टी, पढ़ाई, फीस, टीचर्स, समय–समय पर होने वाली समस्याओं पर खुलकर बात हो।
- सामूहिक लिखित प्रतिनिधित्व
- अगर कोई सुरक्षा कमी दिखे – जैसे फायर एग्ज़िट बंद, बेसमेंट में पानी, ओवरक्राउडिंग, इमरजेंसी लाइट की कमी – तो 10–15 माता–पिता मिलकर कोचिंग को लिखित आवेदन दें।[timesofindia.indiatimes]
- एक तय समय सीमा में सुधार न होने पर यही पत्र स्थानीय प्रशासन, फायर विभाग और मीडिया तक पहुँचाएँ।[indiatoday]
- मीडिया और सोशल मीडिया का ज़िम्मेदार इस्तेमाल
- बड़ी लापरवाही होने पर, स्थानीय रिपोर्टर या ऑनलाइन पोर्टल को तथ्यात्मक जानकारी दें, इससे प्रशासन पर तुरंत दबाव बनता है।[timesofindia.indiatimes]
- सोशल मीडिया पर पोस्ट करते समय बच्चों की पहचान और संवेदनशील जानकारी सुरक्षित रखें, फर्जी/अफवाह वाली जानकारी न फैलाएँ।
6. बच्चों के लिए जागरूकता – उन्हें क्या सिखाएँ?
कई हादसों में देखा गया कि बच्चों को यह पता ही नहीं होता कि आग लगने या पानी भरने पर क्या करना है, किस रास्ते से निकलना है।[timesofindia.indiatimes]
- फायर सेफ्टी की बेसिक ट्रेनिंग
- घर पर ही बच्चों को समझाएँ – धुआँ भरने पर झुककर चलना है, नज़दीकी एग्ज़िट की तरफ जाना है, लिफ्ट के बजाय सीढ़ियों का इस्तेमाल करना है।[newsonair.gov]
- कोचिंग बिल्डिंग का नक्शा बच्चे के साथ देख लें, कौन–सा रास्ता सबसे तेज़ बाहर ले जाता है, यह उसे याद कराएँ।
- रिस्क न लेने की सलाह
- आग, शॉर्ट–सर्किट, धुएँ, तेज़ बदबू, पानी भरने, छत से पानी टपकने, दीवारों में क्रैक जैसी चीज़ें दिखें तो बच्चा तुरंत आपको बताए और टीचर को भी अलर्ट करे।[firstpost]
- अगर बच्चा कहीं पर खतरनाक स्थिति देखे, तो “क्लास मिस हो जाएगी” के डर से चुप न रहे; सुरक्षा हमेशा रिज़ल्ट से बड़ी है – यह बात बार–बार समझाएँ।
- मोबाइल और इमरजेंसी नंबर
- बड़ी कक्षाओं के बच्चों के पास कम से कम इतना बैलेंस और डेटा रहे कि वह इमरजेंसी में घर या हेल्पलाइन कॉल कर सकें।
- बच्चा लोकल पुलिस, फायर ब्रिगेड और पैरेंट्स के नंबर याद रखे या सुरक्षित Note में रखे।[newsonair.gov]
7. कोचिंग से लिखित नीतियाँ और रिकॉर्ड माँगें
सिर्फ़ मुँह–ज़बानी आश्वासन काफी नहीं, क्योंकि हादसे के बाद कोई ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता।[timesofindia.indiatimes]
- सेफ्टी पॉलिसी डॉक्युमेंट
- कोचिंग से लिखित सेफ्टी पॉलिसी और इमरजेंसी रिस्पॉन्स प्लान माँगें – आग, भूकंप, पानी भरने या अन्य आपदा की स्थिति में उनका प्रोटोकॉल क्या है।[indiatoday]
- यह दस्तावेज़ पेरेंट्स के लिए आसानी से उपलब्ध होना चाहिए, वेबसाइट या रिसेप्शन पर।
- नियमित मेंटेनेंस और ऑडिट रिपोर्ट
- फायर–एक्सटिंग्विशर की सर्विसिंग, इलेक्ट्रिकल चेक–अप, बिल्डिंग इंस्पेक्शन आदि का रिकॉर्ड साल में कितनी बार बनता है, यह पूछें।[timesofindia.indiatimes]
- कम से कम साल में एक बार फायर विभाग या अधिकृत एजेंसी से सेफ्टी ऑडिट करवाया गया हो, इस तरह का प्रमाण माँगें।[theprint]
- क्लास साइज और टीचर–स्टूडेंट रेशियो
- कितने छात्रों पर एक टीचर/सुपरवाइज़र है, क्या आपात स्थिति में बच्चों को संभालने के लिए पर्याप्त स्टाफ है।[timesofindia.indiatimes]
- ज़रूरत से ज़्यादा भीड़ वाली क्लास से हमेशा परहेज़ करें, चाहे रिज़ल्ट जितना भी अच्छा क्यों न हो।
8. भावनात्मक और मानसिक सुरक्षा भी ज़रूरी
सरकार की नई गाइडलाइंस में केवल फिजिकल सेफ्टी नहीं, बल्कि बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य भी एक बड़ा मुद्दा माना गया है।[theprint]
- अत्यधिक दबाव और डर का माहौल
- कुछ कोचिंग संस्थान “रैंक–गारंटी”, “टार्गेट–बैच” के नाम पर बच्चों पर अत्यधिक दबाव डालते हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है।[theprint]
- ऐसे माहौल में बच्चे समस्या होने पर भी बोलने से डरते हैं, जिसकी वजह से सेफ्टी इश्यू समय रहते सामने नहीं आते।
- काउंसलर और सपोर्ट सिस्टम
- खुला संवाद
- घर में ऐसा माहौल बनाएं कि बच्चा कोचिंग से जुड़े तनाव, डर या किसी भी असुरक्षा की बात आसानी से साझा कर सके।
- सिर्फ़ मार्क्स और रैंक पर बात करने के बजाय, रोज़ के अनुभव और सुरक्षा–सम्बंधी फीडबैक भी सुनें।
9. अगर आपके कोचिंग में कोई हादसा/खतरा दिखे तो क्या करें?
माता–पिता को प्रैक्टिकल एक्शन प्लान तैयार रखना चाहिए, ताकि कुछ भी संदिग्ध दिखने पर तुरंत कदम उठाया जा सके।
- तुरंत बच्चे को वहाँ से हटा लें
- घटना के दिन या उससे पहले–बाद, अगर आपको बिल्डिंग में आग, शॉर्ट–सर्किट, पानी भरने, दीवार में बड़े क्रैक, या अन्य खतरा दिखे, तो बिना देरी बच्चे को वहाँ से निकाल लें।[timesofindia.indiatimes]
- “फीस चली जाएगी” या “क्लास मिस हो जाएगी” जैसी सोच से ऊपर उठकर बच्चे की जान को प्राथमिकता दें।
- 100/112, फायर ब्रिगेड और लोकल प्रशासन को सूचना
- अगर लापरवाही स्पष्ट है, तो सिर्फ़ कोचिंग मैनेजमेंट के भरोसे न रहें; पुलिस कंट्रोल रूम, फायर ब्रिगेड और स्थानीय प्रशासन को कॉल या लिखित शिकायत करें।[newsonair.gov]
- बाद में आप जैसे अन्य माता–पिता के साथ मिलकर सामूहिक FIR और RTI के माध्यम से कार्रवाई की मॉनिटरिंग कर सकते हैं।
- पीड़ित परिवारों के साथ खड़े रहें
- किसी भी मामले में यदि बच्चों की मृत्यु या गंभीर चोट हो जाती है, तो पीड़ित परिवारों के साथ खड़े होना, कानूनी सहायता और मीडिया–सपोर्ट देना भी हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है।[ndtv]
- कई बार अधिकारों की आवाज़ मजबूत होने पर ही प्रशासन सिस्टम सुधारने के लिए मजबूर होता है।[indiatoday]
10. लंबी अवधि के लिए क्या बदलाव माँगें?
सिर्फ़ एक–दो कोचिंग नहीं, पूरे सिस्टम को सुरक्षित बनाने के लिए माता–पिता और समाज को मिलकर कुछ बड़ी माँगें लगातार उठानी होंगी।
- राष्ट्रीय स्तर पर एक समान कोचिंग रेगुलेशन
- अभी अलग–अलग राज्यों में अलग नियम हैं; माता–पिता को चाहिए कि वे जागरूक संगठनों के साथ मिलकर पूरे देश के लिए एक समान, सख़्त और लागू करने योग्य कोचिंग रेगुलेशन की माँग करें।[indiatoday]
- नियमित सेफ्टी ऑडिट और पब्लिक रिपोर्ट
- हर कोचिंग के लिए साल में कम से कम एक बार सरकारी या थर्ड–पार्टी सेफ्टी ऑडिट अनिवार्य हो, और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध हो।[indiatoday]
- कोचिंग डेटा का सार्वजनिक पोर्टल
- शहर/ज़िले की सभी रजिस्टर्ड कोचिंग का ऑनलाइन पोर्टल बने, जहाँ उनकी लोकेशन, बिल्डिंग टाइप, सेफ्टी सर्टिफिकेट, पिछले हादसों का रिकॉर्ड आदि उपलब्ध हों।[indiatoday]
- इससे माता–पिता एडमिशन से पहले रिसर्च कर सकेंगे और गलत जगह फँसने की संभावना घटेगी।
- बेसमेंट/असुरक्षित बिल्डिंग में कोचिंग पर पूर्ण रोक
- जिन स्थानों पर पहले हादसे हो चुके हैं, वहाँ विशेष ज़ोनल प्लान बनकर असुरक्षित बिल्डिंग में कोचिंग पर पूर्ण रोक लगे।[timesofindia.indiatimes]
छोटा व्यावहारिक चेक–लिस्ट (आपके ब्लॉग के लिए उपयोगी)
माता–पिता हर कोचिंग के लिए यह 10 बिंदुओं वाली लिस्ट अपने पास रखें:
- फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट देखा?
- बिल्डिंग स्ट्रक्चर, इमरजेंसी एग्ज़िट और सीढ़ियाँ सुरक्षित हैं?
- बेसमेंट या भीड़–भाड़ वाली ऊँची मंज़िल पर तो नहीं?
- इलेक्ट्रिकल वायरिंग, मल्टी–प्लग, ओवरलोडिंग कैसी है?
- क्लासरूम में भीड़, वेंटिलेशन और रोशनी ठीक है?
- रजिस्ट्रेशन/लाइसेंस नंबर और गाइडलाइंस का पालन हो रहा है?
- फायर ड्रिल या इमरजेंसी ड्रिल की व्यवस्था है?
- काउंसलिंग/मानसिक स्वास्थ्य सपोर्ट मौजूद है?
- पेरेंट्स व्हाट्सऐप ग्रुप या सामूहिक मंच बना हुआ है?
- किसी तरह की गड़बड़ी दिखने पर तत्काल शिकायत और कार्रवाई की तैयारी है?
यही चेक–लिस्ट अगर हर माता–पिता ईमानदारी से अपनाएँ, तो कोचिंग सेक्टर पर दबाव बढ़ेगा और लखनऊ जैसी दर्दनाक घटनाओं की संभावना काफी कम हो सकती है।[ndtv]






