सनातन धर्म के प्रमुख शास्त्रों में कहीं भी ऐसा स्पष्ट विधान नहीं मिलता कि “आदमी को किराए पर रहना मना है”; शास्त्रों का मूल ज़ोर इस बात पर है कि मनुष्य गृहस्थ धर्म को धर्मसम्मत तरीके से निभाए – चाहे घर अपना हो या किराए का।
शास्त्रीय दृष्टिकोण : निवास का मूल सिद्धांत
- वेद, उपनिषद और धर्मशास्त्रों में गृहस्थ आश्रम को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरुषार्थों का आधार बताया गया है; यहाँ निवास का “स्थिर और पवित्र” होना महत्वपूर्ण माना गया है, न कि यह कि घर अपनी मिल्कियत का हो या किराए का।
- अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्र जैसे ग्रंथों में “भाड़ा/किराया” का सिद्धांत भूमि-उपयोग और राज्य-राजस्व के रूप में मिलता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भुगतान देकर भूमि या घर का उपयोग करना धर्म-विरुद्ध नहीं माना गया।
वास्तु और किराए का घर
- वास्तु शास्त्र, जो वैदिक परंपरा से जुड़ा विद्या-शास्त्र है, वह भी किराए के घर के विरोध में नहीं है, बल्कि इस बात पर ज़ोर देता है कि जहाँ भी रहो, उस स्थान की दिशा-व्यवस्था (प्रवेश द्वार, रसोई, शयन कक्ष आदि) धर्मिक और सुखदायक हो।
- अनेक वास्तु-विद् भी कहते हैं कि घर अपना हो या किराए का, वास्तु का प्रभाव उस घर में रहने वालों पर ही पूर्ण रूप से पड़ता है; इसलिए किराए के घर को भी यथाशक्ति धार्मिक, पवित्र और वास्तु-अनुकूल रखना चाहिए।
गृहस्थ धर्म की मूल बातें (किराया हो या अपना)
- शरीर की रक्षा, शुद्ध-सात्त्विक जीवन, संतान को अच्छी शिक्षा और संस्कार देना, दान–धर्म, अतिथि सेवा, और त्यौहार–पूजा का पालन – ये सब गृहस्थ धर्म के केंद्रीय कर्तव्य बताए गए हैं।
- निवास-स्थान के संदर्भ में मूल बात यह कही गई है कि वहाँ नित्य पूजा–पाठ, सत्संग, पवित्रता, और जीव–सेवा का वातावरण बना रहे; इसी को शास्त्रों ने “धर्म का आधार” माना है।
किराए पर रहने वाले के लिए धार्मिक सुझाव
- किराए के घर में प्रवेश करते समय सरल गृह-प्रवेश करना, या कम से कम गणेश–लक्ष्मी तथा कुलदेवता की पूजा करना, थोड़ा-सा हवन या सत्यनारायण कथा आदि करवाना शुभ माना गया है।
- घर में एक छोटा-सा पवित्र स्थान (मंदिर/पूजा-कक्ष) अवश्य बनाएं, वहाँ स्वच्छता रखें, सात्त्विक भोजन, नित्य दीप–धूप और नामस्मरण के साथ उस जगह को अपने जीवन की धार्मिक ऊर्जा का केंद्र बनाएं।
निष्कर्ष : किराए पर रहने की धार्मिक स्थिति
- शास्त्रों का मूल संदेश यह है कि मनुष्य जहाँ भी रहे, अपनी आय धर्मिक मार्ग से कमाए, उचित ढंग से व्यय करे, और अपने निवास-स्थान को धर्म–साधना का केंद्र बनाए; केवल “किराए पर रहना” अपने आप में अधर्म नहीं है।
- यदि किराए का घर आपको शारीरिक–मानसिक सुरक्षा, सात्त्विक वातावरण, पूजा–पाठ की स्वतंत्रता और गृहस्थ धर्म निभाने की सुविधा देता है, तो सनातन दृष्टिकोण से उसमें रहना पूर्णतः उचित और स्वीकार्य माना जा सकता है।








