प्रस्तावना – ज़िंदगी का असली स्कूल
किताबें हमें डिग्री देती हैं, लेकिन असल ज़िंदगी हमें वो सबक सिखाती है जो कोई स्कूल, कॉलेज, या MBA नहीं सिखा पाता। राजेश देम्बला की कहानी भी ऐसी ही है – एक लड़का जो कभी रेलवे प्लेटफॉर्म पर भूखा सोता था, जिसने अपने पिता को बचपन में खो दिया, जिसे अपनी माँ के अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे; वही लड़का बाद में सफल प्रोफेशनल, निवेशक और financially independent इंसान बनता है।
यह सिर्फ प्रेरणा की कहानी नहीं, बल्कि बहुत practically useful सीखों का संग्रह है – खासकर हमारे जैसे कामकाजी इंडियन मिडिल-क्लास लोगों के लिए, जो रोज़ जॉब, EMI, family और future के बीच जूझते हैं।
बचपन की मार और पहला सबक: कमज़ोरी दिखाओगे तो दुनिया चोट पहुँचाएगी
राजेश 12 साल के थे जब उनके पिता का देहांत हो गया। 15 की उम्र तक हालत इतनी बिगड़ गई कि उन्हें सब कुछ छोड़कर रेलवे स्टेशन पर आना पड़ा, जहाँ उन्हें नहीं पता था आगे क्या होगा; बस इतना पता था कि रात गुज़ारनी है। अगले कई महीने वो उसी प्लेटफॉर्म पर सोए, लोगों को आते-जाते देखते रहे, और वहीं से दुनिया की असलियत समझी।
एक दिन वो बहुत भूखे थे और अनजाने में एक माँ को अपने बच्चे को खाना खिलाते हुए देखते रहे। माँ ने पति को बुलाया, राजेश को लगा शायद खाना मिलेगा, पर इसके उलट कुछ मर्द आए और उन्हें बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया—सिर्फ इसलिए कि वो “खाना घूर रहे थे।” वो रोते हुए बस पूछते रहे: “मैंने क्या ग़लत किया?” लेकिन जवाब था – तुम खाने को देख रहे थे।
यहीं से पहला बड़ा सबक:
- दुनिया हमेशा दयालु नहीं होती; कई बार लोग आपकी मजबूरी का मज़ाक बनाते हैं या आपको चोट पहुँचाते हैं।
- हर किसी से sympathy की उम्मीद करना बेकार है; अपनी हालत बदलने की ज़िम्मेदारी आपको ही लेनी पड़ती है।
उस रात के बाद वो प्लेटफॉर्म पर बैठकर दिन में सपने देखते थे – कि एक दिन वो सफल इंसान बनेंगे, और इस हालात से बाहर निकलेंगे। ये उनका पहला internal decision था: “मैं यहीं नहीं रुकूँगा।”
प्लेटफॉर्म से पहला बिज़नेस: पैसों की साइकोलॉजी और ईमानदारी की कीमत
रेलवे प्लेटफॉर्म पर ही उन्होंने अपना पहला वेंचर शुरू किया — वो भी सिर्फ 16 साल की उम्र में।
पैसा कैसे घूमता है – एक स्टेशन की क्लास
वो रोज़ देखते थे कि सुबह 3–4 बजे एक आदमी आता है, 20–30 सब्ज़ीवाले उसके पास लाइन लगाकर उससे पैसे लेते हैं। उन्हें लगता, “कितना अमीर आदमी है! सबको पैसे दे रहा है।” बाद में मालूम हुआ कि वो moneylender है – सवेरे 500 रुपये देता, दोपहर तक 550 रुपये वापस लेता – यानी 10% interest कुछ घंटों में।
यहाँ से राजेश ने दो चीज़ें सीखी:
- पैसा “काम” करके बढ़ता है; सिर्फ “बचत” नहीं, “रिटर्न” ज़रूरी हैं।
- कैश-फ्लो की ताकत: सब्ज़ीवाले 500 रुपये उधार लेकर दिन में 400–500 रुपये कमा लेते थे।
फिर उन्होंने सोचा – “मैं इस काम में कैसे जुड़ सकता हूँ?” वो अच्छे परिवार से दिखते थे, बोलना जानते थे। उन्होंने moneylender से बात की – “मैं यहीं रहता हूँ, क्या मैं आपके लिए ये collection का काम कर सकता हूँ?” कई दिनों तक उन्हें observe करने के बाद उस आदमी ने उन्हें मौका दिया: पहले 1–2 vendors से पैसे लेना, फिर धीरे-धीरे 20 vendors तक।
‘दूसरी शिफ्ट’ – आइडिया, execution और लालच की पहली गलती
सब्ज़ीवालों से बात करते-करते उन्हें समझ आया कि:
- 500 रुपये के उधार पर ये लोग दिन में 400–500 रुपये कमा लेते हैं।
- एक शिफ्ट के बाद ही ये खुश हो जाते हैं और काम बंद कर देते हैं।
राजेश ने उन्हें offer दिया – “पहली शिफ्ट ख़त्म करके वापस आओ, हम दूसरी शिफ्ट करेंगे। अगर सब्ज़ी बिक चुकी है तो फल बेचेंगे, अगर एक एरिया में बेच लिया तो दूसरे एरिया में चलेंगे। जो दूसरी शिफ्ट में कमाएँगे उसका 50% तुम्हारा, 50% मेरा।”
वो लोग डरते थे, क्योंकि moneylender को दोपहर तक पैसे चाहिए होते थे। राजेश ने moneylender से बात की और उसे convince किया कि वो पैसे शाम 5–6 बजे तक लौटा देंगे।
यहीं उन्होंने एक बड़ी गलती की – उन्होंने उसे सच नहीं बताया कि दूसरी शिफ्ट भी चलेगी और उससे extra profit होगा।
कुछ ही समय में 15–20 सब्ज़ीवाले उनकी दूसरी शिफ्ट में जुड़ गए। दूसरी शिफ्ट भी पहली जितनी profitable थी, और राजेश के पास पहली बार ज़िंदगी में “बहुत सारा पैसा” आने लगा। उन्होंने सबसे पहले एक छोटा घर किराये पर लिया और माँ व बहन को प्लेटफॉर्म से घर ले आए।
“मैं खुद पैसे दूँगा” – और सब कुछ छिन गया
धीरे-धीरे उन्होंने सोचा – “जब सिस्टम मुझे समझ में आ गया है, capital भी मेरे पास है, तो मैं खुद ही पैसे क्यों न दूँ? ये moneylender बीच में क्यों?”
उन्होंने अपना पैसा उधार देना शुरू कर दिया, moneylender की income कम होने लगी।
जब उसे सच पता चला तो उसने, जो लोकल लेवल पर बहुत powerful था, राजेश को न सिर्फ इस काम से, बल्कि पूरे रेलवे स्टेशन से ही निकलवा दिया।
राजेश कहते हैं – उस समय उन्हें लगा था कि वो smart हैं, ये उनका idea है, उनका मेहनत है, इसलिए उन्हें ज्यादा profit मिलना चाहिए। बाद में समझ आया कि:
- transparency और honesty के बिना लंबी रेस नहीं जीती जा सकती।
- जो व्यक्ति आपको मौका देता है, उसके साथ धोखा करने की कीमत आख़िरकार बहुत भारी पड़ती है।
लेकिन इस पूरी घटना ने उनमें एक core belief बैठा दिया: “मैं बिना formal education और बिना बड़े capital के भी पैसा कमा सकता हूँ।”
छोटी-छोटी नौकरियाँ, बड़ा अनुभव: असली MBA फील्ड में होता है
स्टेशन से निकलने के बाद उन्होंने पहला formal job लिया – एक ऑफिस बॉय के रूप में। जब उनसे salary expectation पूछा गया तो उन्होंने बस इतना कहा – “मुझे कॉलेज में admission दिलवा दीजिए।” तीन महीने काम के बदले मालिक ने उनकी admission fees दे दी।
सुबह 7 से 11 कॉलेज, दिन भर अलग-अलग तरह की job:
- फाइबरग्लास फैक्ट्री
- गारमेंट फैक्ट्री
- रेसकोर्स में घोड़े साफ़ करना
- steward, waiter वगैरह
इन सब कामों से उन्हें तीन बड़ी learnings मिलीं:
- अलग-अलग बिज़नेस कैसे चलते हैं, ground-level पर क्या process होती है।
- मजदूर की cost, margin, customer behaviour – जो कोई किताब detail में नहीं सिखाती।
- लोगों का mindset, विशेषकर businessmen का – negotiation, risk, decision making।
बाद में उन्हें एक अच्छी कंपनी में मौका मिला – Yellow Pages, जहाँ Bell Canada के लोग थे और उन्होंने world-class sales training दी। राजेश मानते हैं कि formal education न होने के बावजूद इन्हीं on-the-job learnings और training ने उनकी ज़िंदगी shape की।
माँ की मृत्यु और Financial Independence का कटु सबक
ज़िंदगी का सबसे दर्दनाक मोड़ तब आया जब उनकी माँ का देहांत हुआ और उनके पास अंतिम संस्कार के लिए भी पैसे नहीं थे। बॉस ने कहा था कि वो पैसे भेजेंगे, लेकिन या तो भूल गए या किसी कारणवश पैसे नहीं आए, और जिस शवयात्रा को सुबह 10 बजे होना था, वो दोपहर 3 बजे तक रुकी रही।
वो अपनी माँ के पार्थिव शरीर के पास बैठे हुए खुद से कह रहे थे – “तू एक बेटे कहलाने लायक भी नहीं, अपनी माँ की चिता के लिए भी तेरे पास पैसे नहीं हैं।”
आख़िर एक दोस्त आया, उसने पैसे दिए। उन्हें लगा पैसे office से आए हैं; बाद में पता चला कि वो दोस्त की pocket से थे।
यह घटना उनकी सोच में permanent shift ले आई:
- किसी भी कंपनी पर, किसी boss पर, किसी सिस्टम पर blindly depend करना बेहद ख़तरनाक है।
- चाहे job कितनी भी अच्छी हो, financial independence और emergency fund अनिवार्य है।
यहीं से उन्होंने पहली बार systematic saving शुरू की। पहले तक उनका pattern था – “जितना कमाओ, उतना खर्च करो, ज्यादा कमाओ तो ज्यादा खर्च करो।” अब उन्होंने सोचना शुरू किया – “बुरे दिन के लिए पैसा side में रखना ज़रूरी है।”
Justdial, Internet और Real Estate: wealth बनाने के practical steps
आगे चलकर उन्हें Justdial के साथ काम करने का मौका मिला – पहले बाहरी पार्टनर की तरह, जहाँ वो salary से कहीं ज्यादा कमा रहे थे; फिर internet boom के दौरान India.com से 1999 के आसपास करीब 60,000 रुपये base salary और बहुत perks वाला offer मिला, जो उस समय के हिसाब से बहुत अच्छा था।
इसी phase में उन्होंने कुछ bold financial decisions लिए:
ज़रूरत से बड़ी कार – और mindset का बदलाव
कभी उनके पास सिर्फ second-hand Maruti 800 थी, फिर उन्होंने Honda VTEC खरीदी जो उस समय इंडिया की second-most expensive car मानी जाती थी, करीब 10 लाख रुपये की।
उन्हें खुद भी लगता था – “मैं कौन हूँ, जो 10 लाख की कार चलाऊँ, जबकि मुझसे कहीं बड़े achievers सस्ती कार चलाते हैं?”
फिर उन्होंने अपने आप से एक जवाब लिया – “मैं decide करूँगा कि मैं कौन हूँ, मेरी journey क्या है, और मैं ये deserve करता हूँ। मैं आगे चलकर वो पैसे कमाऊँगा जो इस level की life justify करें।”
इससे उनके अंदर:
- Self-belief और high aspiration की सोच बनी।
- ये clarity आई कि “मैं अपनी identity खुद तय करूँगा, society नहीं।”
Real Estate – पहली बार असली wealth creation
Justdial के साथ सालों काम करने के दौरान उनकी salary 5 लाख प्रति माह के आसपास पहुँच गई (2008–10 के बीच), और ज़िंदगी काफी आरामदायक हो गई। लेकिन असली wealth उन्होंने तब बनानी शुरू की जब:
- उन्होंने पहली बार ज़मीन खरीदी
- फिर एक flat
- फिर दूसरा flat
उस समय bank 100% तक loan दे देती थी – 10–15% खुद से डालने की ज़रूरत कम थी, जो आज के ज़माने में मुश्किल है। उन्हें एक चीज़ का strong belief था – Real estate लंबे समय में ज़रूर बढ़ेगा। बाद में वो सही साबित हुआ: उनकी ज्यादातर properties ने 10x–15x तक returns दिए, जिससे वो better और bigger properties ले सके।
इसके बाद उन्होंने 2011 के आसपास अपना पहला startup investment किया, जो “insane” returns लेकर आया – इतने ज़्यादा कि वो number बोलना भी मुश्किल लगता है। फिर Justdial का IPO आया, जिसमें उनकी हिस्सेदारी ने उन्हें loan-free बना दिया और बड़ा corpus दे दिया।
इन सब investments – real estate + startup + IPO – ने मिलकर उनके लिए financial freedom की मजबूत नींव बनाई।
कामयाबी के बाद का सवाल: कितने पैसे “काफ़ी” होते हैं?
जब loans खत्म हो गए, corpus बन गया, passive income sources खड़े हो गए, तब उनके सामने एक नया सवाल आया – “अब आगे क्या?”
उन्होंने खुद से पूछा:
- “मैंने 10–20 साल पहले भगवान से क्या माँगा था?”
- “आज मेरे पास उससे कहीं ज़्यादा है, तो फिर भी अगर मैं हर वक़्त दौड़ता ही रहूँ तो मतलब क्या है?”
यहीं से उन्हें ये समझ आया:
- 10 लाख, 1 करोड़, 10 करोड़ – सिर्फ zero बढ़ते जाते हैं। कोई सीमा नहीं है, अगर आप बस number के पीछे भागते रहेंगे।
- असली question ये है – “मुझे सच में कितने पैसे चाहिए? मेरी और मेरे परिवार की जरूरतें किस level पर comfortably पूरी हो सकती हैं?”
उनका मानना है:
- Success को salary, घरों की गिनती, net worth से define करना अधूरा है।
- अपने जीवन को इस basis पर judge करो कि तुम कितने खुश हो, तुम्हारी health कैसी है, तुम्हारे relationships कितने गहरे हैं।
Health, Relationships और Money – Priority का सही क्रम
राजेश साफ़ कहते हैं:
- सबसे ऊपर Health
- फिर Relationships
- उसके बाद Money
अगर कोई इंसान health और relationships को ignore करके सिर्फ पैसे के पीछे भाग रहा है, तो वो बहुत बड़ी गलती कर रहा है।
1. Health: एक बार गयी तो खेल खत्म
- अगर पैसे कमाने के चक्कर में आप अपनी physical या mental health बिगाड़ लेते हैं, तो बाद में करोड़ों भी उस loss को पूरी तरह ठीक नहीं कर सकते।
- इसलिए lifestyle, stress management, regular check-up, exercise – ये सब luxury नहीं, ज़रूरत हैं।
2. Relationships और Network: असली safety net
- परिवार, दोस्त, colleagues और समाज से जुड़ाव एक emotional और practical support system बनाते हैं।
- strong network हमेशा आपके लिए नए मौके, मदद और support लेकर आता है – business में भी, career में भी, personal life में भी।
3. Money: ज़रूरी है, लेकिन ultimate नहीं
- पैसा बहुत ज़रूरी है; ये deny करना भी बेवकूफी है।
- लेकिन पैसे को सबसे ऊपर रखकर अगर आप अपने करीबियों को ignore कर देंगे, तो बाद में regret ही बचेगा।
Salary, Value और Equity – करियर के लिए ज़बरदस्त सीख
राजेश एक बहुत practical बात कहते हैं:
- आपका salary employer decide नहीं करता, आपको खुद तय करना चाहिए कि आप कितनी value create कर सकते हैं।
वो example देते हैं:
- एक ही job के लिए मैं आपको 1 रुपये भी दे सकता हूँ, 100 रुपये भी या 1000 रुपये भी।
- difference इस बात पर है कि आप return कितनी दे रहे हैं। अगर कंपनी आपको 100 रुपये दे रही है, तो ideally आपको 1000 या 5000 रुपये की value return करनी चाहिए।
इससे तीन सीधी learnings निकलती हैं:
- “मेरा friend इतना कमा रहा है, मुझे भी उतना मिलना चाहिए” – ये entitlement वाला attitude गलत है।
- सबसे ज़्यादा पैसा उसी को मिलेगा, जो सबसे ज़्यादा result दे रहा हो।
- Job change करने से पहले या salary negotiate करने से पहले ये सोचो – “मैं कंपनी को कितना extra कमा कर दूँगा?”
अगर मैं आज 25–28 साल का होता तो क्या करता?
राजेश खुद कहते हैं – अगर वो आज के ज़माने में फिर 25–28 साल के होते, तो:
- हर महीने जितना भी possible हो, उतना equities में invest करते।
- अच्छे, fundamentally strong companies में लंबे समय के लिए पैसा लगाकर भूल जाते – बीच में निकालकर holiday, car या gadgets पर खर्च नहीं करते।
आज उनकी income almost पूरी तरह passive है:
- 30–35% real estate से
- 60–65% capital markets, unlisted companies और startups से
- कुछ rent, mutual funds, startup exits से cash flow
वो किसी कंपनी से salary नहीं लेते, क्योंकि अब वो अपना time “बेचना” नहीं चाहते।
Bad Times, Gita और Patience – जब पूरी दुनिया खिलाफ लगे
उनका कहना है कि जिंदगी में कई बार ऐसा लगा कि “पूरी दुनिया मेरे खिलाफ है, सब कुछ टूट रहा है।” रेलवे प्लेटफॉर्म से लेकर बाद के कई phases तक ये feeling आई।
ऐसे समय के लिए उनकी simple philosophy:
- “ये तुम्हारा time नहीं है – बस इतना मान कर बैठे रहो, लेकिन सही काम करते रहो।”
- भगवद्गीता हमें सिखाती है – कुछ भी permanent नहीं है; न success, न failure। दोनों phase आते-जाते रहते हैं।
- जब हालात बुरे हों, तब घबराकर गलत काम मत करो, बस धैर्य रखो और अपने goals की दिशा में काम करते रहो।
आज वो ये भी मानते हैं कि जो कुछ भी उन्हें मिला है, उसमें उनकी मेहनत के साथ-साथ ऊपरवाले की मेहरबानी और बहुत सारे अच्छे लोगों की दुआएँ भी शामिल हैं।
Happiness की definition बदलती रहती है – हर stage पर नया मतलब
वो एक खूबसूरत example देते हैं:
- रेलवे प्लेटफॉर्म वाले समय में, दिन में दूसरी बार खाना मिल जाना ही उनके लिए सबसे बड़ी खुशी थी।
- आज, जब उनके पास financial freedom है, एक simple 6 दिन की father–daughter trip किसी South-East Asian country में, जहाँ वो बस घूमते हैं, खाना खाते हैं, बातें करते हैं – वही उनके लिए highest level की happiness बन जाती है।
यानी:
- उम्र और हालात के साथ happiness का meaning बदलता रहता है।
- लेकिन हर stage पर money सिर्फ एक enabling factor है; आख़िर में असली खुशी relationships, experiences और inner peace से आती है।
इस कहानी से निकलने वाले Practical Lessons (आपके लिए)
इस वीडियो से एक working Indian के लिए कुछ बहुत clear, action-oriented points निकलते हैं:
- अपने हालात को excuse मत बनाइए
- चाहे बचपन कितना भी tough हो, financial crisis कितना भी deep हो, रास्ता निकल सकता है, अगर आप हार नहीं मानते।
- skill और experience को degree से ऊपर रखिए
- अलग-अलग type के काम, छोटे job, sales, service – सब आपको वो सिखा सकते हैं जो MBA नहीं सिखाता।
- financial emergency fund बनाइए
- कम से कम 6–12 महीने के खर्च जितना buffer रखना future के लिए shield की तरह काम करेगा।
- wealth सिर्फ income से नहीं, सही निवेश से बनती है
- real estate, equities, startups – जहाँ भी निवेश कर सकें, पहले सीखिए, फिर long-term सोच के साथ invest कीजिए।
- हमेशा value के हिसाब से salary expect कीजिए
- “मैं कितना return दे सकता हूँ?” – ये सोच रखेंगे तो career growth बहुत तेज़ होगी।
- health और relationships को पैसे से ऊपर रखिए
- नहीं तो future में पैसा होगा, पर साथ देने वाला कोई नहीं होगा या health साथ नहीं देगी।
- अपने लिए “कितना काफी है” define कीजिए
- वरना पूरी जिंदगी सिर्फ zero बढ़ाते-बढ़ाते निकल जाएगी और जीना भूल जाएँगे।
- बुरे समय में panic नहीं, patience रखिए
- हर downfall temporary है, अगर आप ethical रहकर consistent action लेते हैं।






