ड्यूटी पर मोबाइल का धमाल: एम्प्लोई की आदत, मालिक की परेशानी और समाधान का रास्ता

काम के दौरान मोबाइल पर लगातार बातें करना, खासकर सफाई कर्मी, डिलीवरी बॉय और दूसरी लेबर क्लास में, उत्पादकता, सुरक्षा और काम की गुणवत्ता – तीनों के लिए गंभीर समस्या बन रहा है। थोड़ा संतुलित इस्तेमाल ठीक है, लेकिन आदत या फैशन के रूप में हर समय फोन कान पर रखकर काम करना न तो कर्मचारी के लिए अच्छा है और न ही मालिक के लिए।

मोबाइल पर बात करके काम करने के नुकसान

  • ध्यान बंटता है और काम की रफ्तार 20–40% तक कम हो सकती है, क्योंकि बार‑बार रुकने से दिमाग को दोबारा फोकस करने में समय लगता है।
  • बार‑बार कॉल, चैट और नोटिफिकेशन से दिमाग थक जाता है, तनाव बढ़ता है और गलती करने की संभावना बढ़ती है।
  • चलती सड़क, सीढ़ियां, कूड़ा उठाते समय, मशीन चलाते समय या डिलीवरी करते समय फोन पर बात करना दुर्घटना और चोट का बड़ा कारण बनता है।
  • ग्राहक से बात करते समय या काम की जगह पर हर समय फोन पर लगे रहने से संस्था की इमेज खराब होती है और लोग इसे गैर‑पेशेवर व्यवहार मानते हैं।
  • टीम वर्क कमजोर होता है, क्योंकि कर्मचारी साथियों या सुपरवाइज़र की बात से ज्यादा बाहर के दोस्तों‑रिश्तेदारों से जुड़ा रहता है।
  • समय पर काम पूरा न होने से ओवरटाइम, झगड़े, चेतावनी और कई बार नौकरी जाने तक की नौबत आ सकती है।

क्या कोई फायदे भी हैं?

  • आपातकाल या परिवार की जरूरी स्थिति में फोन तुरंत संपर्क का माध्यम बनता है, खासकर उन कर्मचारियों के लिए जो बाहर फील्ड में काम करते हैं।
  • डिलीवरी, लोकेशन, पेमेंट, ओटीपी, जीपीएस, या काम से जुड़े निर्देश के लिए स्मार्टफोन उपयोगी औजार की तरह काम कर सकता है।
  • सही तरह से उपयोग करने पर फोन से शेड्यूल, रूट, फोटो‑प्रूफ, रिपोर्टिंग आदि आसान हो जाती है, जिससे कुछ जगहों पर उत्पादकता बढ़ भी सकती है।

लेबर क्लास में यह आदत क्यों ज्यादा दिखती है?

  • लंबे, थकाऊ और अक्सर अकेलेपन वाले काम (जैसे सफाई, गार्ड ड्यूटी, डिलीवरी) में लोग बोरियत दूर करने के लिए फोन पर लगातार बातें करते हैं।
  • कई बार इन्हें लगता है कि “मैं तो काम कर ही रहा हूँ, साथ‑साथ फोन पर बात कर लेने में क्या बुराई है”, यानी नुकसान दिखाई नहीं देता।
  • स्पष्ट कंपनी नियम न होने या सुपरवाइज़र के ढीले रवैये के कारण मोबाइल पर बात करना सामान्य और स्वीकार्य व्यवहार बन जाता है।
  • दोस्तों‑रिश्तेदारों के ग्रुप कॉल और सोशल मीडिया से जुड़ाव इतना मजबूत हो जाता है कि काम के दौरान भी आदत छूटती नहीं, यह हल्का‑सा व्यसन जैसा रूप ले लेता है।

मालिक/प्रबंधन क्या करें?

  • साफ, लिखित मोबाइल उपयोग नीति बनाएं:
    • काम के घंटों में निजी कॉल कम से कम हों, जरूरी निजी बात केवल ब्रेक या तय “कॉल टाइम” में हो।
    • मशीन, वाहन, सीढ़ी, सड़क पार करते समय फोन पर बात करना सख्ती से प्रतिबंधित हो।
  • नए और पुराने सभी कर्मचारियों को छोटी‑छोटी ट्रेनिंग के जरिए समझाएं कि मोबाइल की वजह से उत्पादकता और सुरक्षा पर क्या असर पड़ता है, उदाहरण और वीडियो दिखाकर बात समझाएं।
  • सुपरवाइज़र/फोरमैन को अधिकार दें कि वे बार‑बार समझाने, चेतावनी और जरूरत पड़ने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकें।
  • जहां संभव हो, लॉकर या तय जगह पर मोबाइल रखने की व्यवस्था करें और केवल ब्रेक में फोन चेक करने की अनुमति दें, खासकर हाई‑रिस्क जगहों पर।
  • काम से जुड़े कॉल, ऐप या जीपीएस के लिए यदि फोन जरूरी है तो छोटे‑छोटे स्पष्ट नियम बनाएं कि किस तरह और कितनी देर के लिए फोन का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस ट्रेंड को कम करने के व्यावहारिक तरीके

  • शुरुआत में लक्ष्य रखें कि “पूरी तरह बंद” की बजाय “कंट्रोल और सीमित उपयोग” हो, ताकि कर्मचारियों को यह बदलाव स्वीकार्य लगे।
  • हर शिफ्ट में 2–3 तय “फोन ब्रेक” (जैसे हर 2–3 घंटे बाद 5 मिनट) दें, ताकि लोग जरूरी कॉल वहीं निपटा लें और काम के समय फोन पर न लगे रहें।
  • जिन कामों में ज्यादा हादसे का जोखिम है (सफाई मशीन, ड्राइविंग, ऊंचाई पर काम, लोडिंग‑अनलोडिंग), वहां “नो फोन ज़ोन” का बोर्ड और सख्त निगरानी रखें।
  • अच्छा व्यवहार दिखाने वालों को मौखिक प्रशंसा, छोटी‑मोटी इनाम/इंसेंटिव या “सेफ्टी स्टार” टाइप पहचान देकर सकारात्मक माहौल बनाएं।
  • अगर किसी में फोन की लत जैसी स्थिति दिखे तो निजी तौर पर समझाएं, उसका कारण पूछें, और जरूरत हो तो काउंसलिंग‑टाइप मदद की पेशकश करें।

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