एक पति द्वारा अपनी पत्नी के बदले हुए स्वभाव पर हास्यप्रद कविता। Bhajan Marg

लेख में वीडियो की शुरुआत से लेकर हास्य कविता, और अंत में पूज्य प्रेमाानंद महाराज जी के सारे उपदेश और विचार विस्तार से शामिल किए गए हैं।


भूमिका

समाज में पति-पत्नी के संबंधों की गहराई और उनके बीच की मिठास को दर्शाने वाले इस वीडियो में, एक गृहस्थ पुरुष अपनी पत्नी के बदलते व्यवहार पर सवाल करते हुए संत-महाराज से संवाद करता है। यह संवाद हास्य, कविता, एवं गूढ़ धार्मिक उपदेशों का सुंदर मिश्रण है, जो दर्शकों को मानव रिश्तों में छिपी छोटी बड़ी बातों तथा सनातन धर्म की जीवनशैली की झलक दिखाता है।


प्रारंभिक संवाद: प्रश्न और पत्नी के प्रति भाव

ललित कुमार जी राधे-राधे करते हुए महाराज जी से अपनी प्रसन्नता के लिए एक प्रश्न पूछते हैं। वे बताते हैं कि वे और उनकी धर्मपत्नी दोनों एक-दूसरे के प्रति आदर और प्रेम रखते हैं। पत्नी उनके स्वास्थ्य का हमेशा ध्यान रखती है पर पति अकसर उसे पूरी तरह समझ नहीं पाते।

एक उदाहरण देते है: “एक दिन बुखार महसूस हो रहा था। शरीर गर्म था। मैंने चाय मांगी तो ठंडा पानी और शरबत ला दिया। कहने लगी शरबत पीने से बुखार ठीक हो जाएगा…”

यहां गृहस्थ जीवन की छोटी-मोटी उलझनें, हंसी-ठिठोली के साथ दिखाई गई हैं।


हास्यप्रद कविता: पति-पत्नी के बदलते तेवर

इसके बाद पति द्वारा अपने अनुभवों पर एक हास्य कविता सुनाई जाती है:

  • आँसू आने पर पनीर की जगह टिंडा सामने आ जाता,
  • मीठा मांगने पर नमकीन दे देती है,
  • पहली तारीख को सारी तनख्वाह ले लेती है,
  • कोई प्रश्न पूछो, तो तुरंत जवाब देती है, “क्या बोला क्या बोला?”
  • पति कहता, “तुम प्राण से प्यारी हो।”

समय का ऐसा चक्र चलता है कि पत्नी टीवी खोलती है, उसमें कोई संत दिखते हैं। पति बताता है कि “बाबा प्रेमानंद जी हैं।” बाबा जी का वचन सुनकर पत्नी के जीवन में बदलाव आ जाता है। “यह पति ही तेरा ईश्वर है। जिसे तू इधर-उधर ढूंढती है वही तेरा परमेश्वर है।”

फिर दिन ऐसे बदल जाते हैं:

  • अब बिना बोले दौड़कर आती है।
  • शक्कर मांगने पर हलवा बना लाती है।
  • मुख से मिश्री घोलने लगी है।
  • पति के घर आने पर राधे-राधे बोलती है।
  • जो बोले उससे दो कदम आगे चलती है।

यह परिवर्तन धर्ममयी जीवन, श्रद्धा और गृहस्थी की सही समझ से आता है।


महाराज जी के उपदेश: सनातन गृहस्थ धर्म

महाराज जी कहते हैं–

  • भगवत भाव जागे तो समर्पित भाव जागता है।
  • सनातन धर्म में पत्नी को अर्धांगिनी, पति को परमेश्वर माना गया है।
  • आज यह सिद्धांत समाज में कमजोर हो रहे हैं जिससे गृहस्थी में विघटन आ रहा है।
  • पति-पत्नी में विश्वास नहीं, धर्म से हट कर क्रियायें हो रही हैं, यही परेशानी की जड़ है। यदि धर्ममय जीवन जिये जाए, तो सबसे अच्छी गृहस्थी बनती है।

वह ऐतिहासिक कथाओं के उदाहरण भी देते हैं:

  • सती अनुसूया जी ने भगवान अत्रि को परमेश्वर माना, ब्रह्मा-विष्णु-महेश को 6 महीने के बालक बना दिया।
  • सावित्री जी ने अपने पति सत्यवान को भगवान माना, यमराज से उसके जीवन की रक्षा की।

इन उदाहरणों से यह दिखता है कि भारतीय संस्कृति में पति-पत्नी का रिश्ता कितनी गहराई, श्रद्धा और पवित्रता से देखा जाता है।


आधुनिक समाज की समस्याएं और समाधान

महाराज जी आधुनिक समाज की तुलना पूर्ववर्ती समाज से करते हैं:

  • पहले गाँवों में ब्याह बिना फोटो, बिना मोबाइल के होता था, आजीवन निर्वाह चलता था, डिवोर्स का नाम नहीं था।
  • आज लव मैरिज, कुछ ही समय में रिश्ता टूटना, यही कारण है कि धर्म से दूर होने पर समस्याएँ आती हैं।
  • पत्नी पति पर विश्वास रखे, पति पत्नी पर विश्वास रखे, तभी बच्चों का सही विकास, अच्छा परिवार और राष्ट्र सेवा संभव है।

महाराज जी सुखी गृहस्थ जीवन की झलक देते हैं:

  • पति थका-हारा आये, पत्नी मुस्कुराकर स्वागत करे, पानी दे, कोई शिकायत न हो, घर में मिठास बनी रहे।

गुरु, सम्मान और परम्पराएँ

महाराज जी बताते हैं कि:

  • गुरु का नाम बड़े संकोच, श्रद्धा और मर्यादा के साथ लिया जाता था।
  • पति का नाम भी सांसारिक सम्मान व श्रद्धा से लिया जाता है।
  • आज इन सब का महत्व कम होता जा रहा है। पति-पत्नी के रिश्ते में सम्मान, समर्पण की भावना कम हो रही है, जिससे गृहस्थ धर्म को हानि पहुँच रही है।

सनातन धर्म की गृहस्थी और प्रेम की व्याख्या

महाराज जी आगे समझाते हैं:

  • सनातन धर्म में गृहस्थी में मिठास, पवित्रता, और प्रेम होता है।
  • आज के समय में ‘प्यार’ शब्द की शुद्धता खो गई है, असली प्यार वही है जिसमें एक-दूसरे के लिए मन, विश्वास, समर्पण हो।
  • केवल शारीरिक आकर्षण या बाहरी आकर्षण असली प्रेम नहीं, जीवन उसे चुनना चाहिए जिससे पूरी तरह जुड़े रहें और साथ जीवनभर निभा सके।

संयम, विवेक, और धर्म पालन का संदेश

महाराज जी अंत में कहते हैं:

  • संयम से रहिए, भगवन नाम जप कीजिए।
  • बुद्धि को धर्म के अनुसार चलाने की चेष्टा कीजिए।
  • गलती सब से हो जाती है, दोबारा ना हो यही प्रयास रखें।

यह उपदेश गृहस्थ जीवन को सुखी, पवित्र और शांतिपूर्ण बनाने का आधार है।


निष्कर्ष

इस वीडियो में दर्शाया गया है कि व्यस्त और तनावपूर्ण गृहस्थ जीवन में हास्य, सहनशीलता, और धार्मिकता किस प्रकार बदलाव ला सकती है। महाराज जी के उपदेश जीवन पथ दिखाते हैं कि यदि पति-पत्नी दोनों धर्म, विश्वास, और प्रेम की नींव पर अपने संबंध रखें, तो गृहस्थी स्वर्ग बन सकती है।

अतः, पति-पत्नी के सौहार्द की शुद्धता, श्रद्धा और प्राचीन भारतीय सोच का पालन करना ही गृहस्थ धर्म का वास्तविक मार्ग है।


यह लेख वीडियो के कंटेंट के हर हिस्से – प्रश्न, कविता, बदलाव का अनुभव, और महाराज जी के उपदेश – को विस्तार से प्रस्तुत करता है, जिससे पाठक को गृहस्थ जीवन के आनंद, समस्याएं तथा समाधान का सुचिंतित उपदेश मिलता है।

  1. https://www.youtube.com/watch?v=ouCWwHpW8go

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