भगवान् प्रेम है और प्रेम ही भगवान् है, , तृतीय माला

भगवान् प्रेम है और प्रेम ही भगवान् है, , तृतीय माला

४३-जहाँ देखता है, वहीं श्याम – एक तो यह अवस्था होती है। दूसरे प्रकारकी अवस्था यह है कि श्यामके सिवा और कुछ सुहाता ही नहीं। दोनों अवस्थाएँ पवित्रतम हैं, पर बाहरी लीलामें भेद होता है।

४४-कहीं तो श्यामसुन्दर नहीं दीखते और उनके लिये अभिसार होता है तथा कहीं यह भाव होता है- यहाँ भी वही, वहाँ भी वही – ‘जित देखूँ तित स्याममयी है।’ ये दोनों भाव वस्तुतः दो नहीं-एक ही भगवत्प्रेमकी दो अवस्थाएँ हैं।

४५-भगवत्प्रेममें एक बात तो निश्चय ही होगी कि प्रेमास्पद भगवान् और प्रेमके बीचमें किसी दूसरेके लिये स्थान नहीं रहेगा।

४६-प्रेम दोमें नहीं होता। वह एकहीमें होता है और एक ही प्रेमास्पद सब जगहसे प्रेमकी दृष्टिको छा लेता है। एक ही प्रेमास्पद सर्वत्र फैल जाता है।

४७-प्रेमका विकास होनेपर सर्वत्र भगवान् दीखते हैं।

४८-प्रेमास्पद भगवान्‌का रूप अनन्त होनेसे प्रेमीकी प्रेममयी अवस्था भी अनन्त है। प्रेमियोंकी न मालूम क्या-क्या अवस्थाएँ होती हैं।

४९-प्रेम अखण्ड होता है।

५०-भगवान् प्रेम है और प्रेम ही भगवान् है।

५१-प्रेम भगवत्स्वरूप है, मन-वाणीका विषय नहीं। इसकी व्याख्या हो ही नहीं सकती। यह तो अनुभवकी वस्तु है।

५२-जहाँसे स्वार्थका त्याग होता है, वहींसे भगवत्प्रेमका आरम्भ होता है। स्वार्थ और प्रेम-दोनों एक साथ रह ही नहीं सकते।

५३-सांसारिक प्रेममें भी, यह निश्चित है कि जहाँ त्याग नहीं है, वहाँ प्रेम नहीं है। जहाँ प्रेम है, वहाँ त्याग होगा ही।

५४-जैसे-जैसे भगवान्के प्रति प्रेम बढ़ता जायगा, वैसे-वैसे स्वार्थका त्याग होता चला जायगा।

५५-जहाँ अपनी चाह है, परवा है, त्यागकी तैयारी नहीं है, वहाँ प्रेम कहाँ ?

५६-मामूली किसी मनुष्यसे प्रेम कीजिये, उसमें भी त्यागकी आवश्यकता होगी।

५७-माँका अपने बच्चेके लिये प्रेम रहता है। देखिये, वह बच्चेके लिये कितना त्याग करती है। इसी प्रकार गुरु-शिष्य, पति-पत्नी-जहाँ भी प्रेमका सम्बन्ध है, वहाँ त्याग है ही।

५८-प्रेम हुए बिना असली त्याग नहीं होता।

५९-सब प्रकारका सहन (तितिक्षा) प्रेममें होता है। प्रेम करना आरम्भ कर दे, फिर तितिक्षा तो अपने-आप आ जायगी।

माँ बीमार है, पर बच्चा परदेशसे आ गया; माँ उठ खड़ी होगी,

उस बीमारीकी अवस्थामें ही बच्चेके लिये भोजन बनाने लगेगी। यह तितिक्षा प्रेमने ही उत्पन्न कर दी है।

६०-यह सत्य है कि प्रेमका वास्तविक और पूर्ण विकास भगवत्प्रेममें होता है; पर जहाँ कहीं भी इसका आंशिक विकास देखा जाता है, वहाँ-वहाँ ही त्याग साथ रहता है। गुरु गोविन्दसिंहके बच्चोंमें धर्मका प्रेम था, उन्होंने उसके लिये हँसते-हँसते प्राणोंकी बलि चढ़ा दी। सतीत्वमें प्रेम होनेके कारण अनेक आर्य रमणियोंने प्राणोंकी आहुति दे दीं।

६१-प्रेम होनेपर त्याग करना नहीं पड़ता, अपने-आप हो जाता है और उसीमें आनन्दकी उपलब्धि होती है।

६२-प्रेममें पवित्रता भी अपने-आप आ जाती है, क्योंकि छल-कपट, बेईमानी आदि स्वार्थमें ही रहते हैं और प्रेममें स्वार्थ रहता नहीं।

६३-जहाँ विशुद्ध प्रेम है, वहाँ मन विशुद्ध है ही।

६४-भगवान्‌के प्रति प्रेम बढ़ाइये, अपने-आप अन्तःकरण शुद्ध होगा।

६५-असली प्रेममें पाप नहीं रह सकता। पाप होते हैं कामनाके कारण और प्रेममें कामना रहती नहीं। जब कामना ही नहीं, तब पाप कैसे रहें।

६६-प्रेम तपरूप है।

६७-जो दे नहीं सकता वह प्रेमी नहीं। उत्सर्ग प्रेममें स्वभावसे ही रहता है।

६८-भगवत्प्रेम अन्तिम – चरम और परम पुरुषार्थ है।

६९-विषयोंका प्रेम प्रेम नहीं है।

७०-मोक्षका परित्याग विषयकामी भी करता है और भगवत्प्रेमी भी, परन्तु दोनोंके त्यागमें महान् अन्तर है।

७१-विषयकामीको मोक्ष मिलता नहीं, पर भगवत्प्रेमीको त्याग देनेपर भी मोक्ष नित्य प्राप्त रहता है।

७२-भगवत्प्रेम अत्यन्त दुर्लभ होनेपर भी सहज ही प्राप्त हो सकता है, यदि कोई इसके लिये भगवान्पर निर्भर हो जाय।

७३-प्रेम प्राप्त करनेके लिये त्याग आवश्यक है। बिना त्यागके प्रेम नहीं मिलता।

७४-यदि हम सचमुच चाहें तो भगवान् कृपा करके अपने-आप त्याग करवा देते हैं। पर सच्ची बात यह है कि हम त्याग (जागतिक विषयोंके प्रेमका त्याग) करना नहीं चाहते।

७५-हम चाहते हैं हमें प्रेम मिल जाय, पर विषय छोड़ना चाहते नहीं। विषयोंमें सुखकी भ्रान्ति ही इसका कारण है।

७६-विषयासक्ति प्रेममें बड़ी बाधक है।

७७-वास्तविक रूपमें देखें तो समस्त चीजें भगवान्‌की हैं, इनपर उन्हींका अधिकार है। आपको तो मिथ्या ममत्व त्यागना है। चीजें भगवान्‌की होकर आपके पास ही रहेंगी।

७८-जो विषय-जो पदार्थ अभी जलाते हैं, वे ही भगवान्‌के बना दिये जानेपर, उनमेंसे आसक्ति निकल जानेपर सुख देनेवाले हो जायँगे।

उनमें ममता और आसक्ति ही हमें जलाती है।

७९-भगवत्प्रेम प्राप्त होनेपर मनुष्य जहाँ भी रहे, सुखी ही रहता है।

८०-प्रेमीका अपना कुछ रहता नहीं, सब भगवान्‌का हो जाता है।

पुत्र, धन, प्रतिष्ठा ज्यों-के-त्यों रहते हैं, कहीं चले नहीं जाते, पर ममताका स्थान बदल जाता है। समस्त जगत्से ममता निकलकर एक स्थानमें – केवल भगवान्में जाकर ठहर जाती है।

८१-प्रेमीकी दृष्टिमें सब कुछ प्रेमास्पद ही हो जाता है; उसकी दृष्टि जहाँ जाती है, उसे प्रेमास्पद ही दीखते हैं।

८२-प्रेमीके लिये सदा सर्वत्र आनन्द-ही-आनन्द है।

८३-जहाँ ‘स्व’ भगवान्में जाकर मिला कि प्रेमी बन गये।

८४-यह नियम है-जहाँ प्रेमी रहता है, वहाँ सुख है ही तथा जहाँ द्वेष है, वहाँ दुःख रहेगा ही।

८५-प्रेमीके लिये वैरका स्थान, वैरका कोई पात्र रहता ही नहीं-

अब हौ कासों बैर करौं।

कहत पुकारत प्रभु निज मुख ते हौं घटघट बिहरौं ।॥

उसके मनकी ऐसी दशा हो जाती है।

८६-प्रेम का उत्तरोत्तर विकास होना ही मनुष्यकी वास्तविक उन्नति है।

८७-आज जगत्में ‘स्व’ इतना संकुचित हो गया है कि प्रायः ‘परिवार’ का अर्थ किया जाता है हम और हमारी स्त्री। इससे ठीक विपरीत, भारतवर्षके ऋषियोंका सिद्धान्त तो अत्यन्त विशाल है- ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, स्वयं भगवान् ‘सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि’ इस प्रकारका अनुभव करनेकी प्रेरणा करते हैं।

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