दस महाव्रत [५]- अपरिग्रह (१)

दस महाव्रत [५]-

अपरिग्रह

(१)

‘अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासम्बोधः ।’*

* अपरिग्रहकी स्थिति हो जानेपर पूर्वजन्म कैसे हुए थे? इस बातका भलीभाँति ज्ञान हो जाता है।

(योगदर्शन २।३९)

समाचारपत्रोंमें कई बार ऐसे बच्चोंका वर्णन मैंने पढ़ा है, जो अपने पूर्वजन्मकी स्मृति रखते हैं। अपने पूर्वजन्मके माता-पिता, घर प्रभृतिको पहचान भी लेते हैं। मेरे पड़ोसमें आज डिप्टी श्रीरमाशंकरजी चतुर्वेदी आये हैं। मैंने इनकी कन्याके सम्बन्धमें पढ़ा था कि वह भी पूर्वजन्मकी स्मृति रखती है। मैंने अपने यहाँके साप्ताहिक पत्र ‘निगम’ की पुरानी प्रतियोंको उलटने-पलटनेमें बहुत समय व्यतीत किया और अन्तमें वह प्रति प्राप्त कर ली, जिसमें डिप्टी साहबकी पुत्री कुमारीकलाके पूर्वजन्मकी स्मृतिका विवरण दिया गया था।

डिप्टी साहब फैजाबादसे बदलकर परसों मथुरा आये हैं और ठहरे हैं मेरे पड़ोसके बँगलेमें। बड़े सज्जन हैं। कल संध्या-समय स्वयं मेरे यहाँ टहलते आये और बड़ी देरतक इधर-उधरकी बातें करते रहे। उनके जानेपर मुझे उनकी कन्याके सम्बन्धमें समाचारपत्रोंमें निकले समाचारका ध्यान आया।

कलकी भेंटने संकोचको दूर कर ही दिया था, मैं स्वयं डिप्टी साहबके यहाँ पहुँचा। बँगलेके सामने घासपर कुर्सी डाले वे बैठे थे। मुझे देखते ही हाथ जोड़कर उठ खड़े हुए। ‘नमस्कार डाक्टर बाबू!’ मैंने उनके अभिवादनका उत्तर दिया और उनके पास ही नौकरद्वारा लायी हुई कुर्सीपर बैठ गया।

‘आपसे कुछ जानने आया हूँ।’

‘कहिये क्या ?’

उनके आग्रहके उत्तरमें मैंने ‘निगम’ की प्रति खोलकर उनके हाथमें दे दी और उस समाचारकी ओर संकेत कर दिया।

‘यह प्रति कबकी है?’ उन्होंने समाचारका शीर्षकमात्र देखकर फिर अपने प्रश्नके साथ कवर-पृष्ठ देखा और तब हँसकर बोले-‘आप इतना पुराना समाचार कहाँसे ढूँढ़ लाये हैं? यह तो दो वर्षकी पुरानी प्रति है और अब तो कला सब भूल-भाल गयी है।’ उन्होंने पत्र मुझे लौटा दिया।

‘क्या बच्चीको बुला देंगे!’ उनकी उदासी मुझे अखरी। मैंने अपनी उत्सुकताको बिना दबाये हुए आग्रह किया।

‘क्यों नहीं’- उन्होंने लड़कीको पुकारा और ‘आयी पिताजी !’ कहनेके एक मिनट बाद ही दस वर्षकी एक भोली बालिका उनके पास आ गयी।

‘यही है’- डिप्टी साहबने उसे मेरे सामने कर दिया हाथ पकड़कर। लड़कीने मुझे प्रणाम किया। मैंने उसे पास बुला लिया। वह संकोचसे सिकुड़ी जाती थी।

‘बच्ची ! तुम्हारा नाम क्या है?’ इस प्रकार परिचय बढ़ानेके लिये मैंने उससे कई प्रश्न किये। उसने सबका उत्तर दिया। प्रश्नोंके ही क्रममें मैंने पूछा- ‘तुम बता सकती हो कि इससे पहले तुम्हारा जन्म कहाँ हुआ था ?’ लड़की चुप हो गयी। कई बार पुचकारकर मैंने और डिप्टी साहबने पूछा, तब कहीं उसने कहा- ‘काशीमें’।

‘काशीमें किसके घर ?’ लड़कीको और कुछ भी स्मरण नहीं था। वह आगे कुछ भी बता नहीं सकी।

डिप्टी साहब जैसे सम्पन्न, सरल और धार्मिक व्यक्ति भला समाचारपत्रोंमें क्यों झूठा आडम्बर करेंगे? अतः उस साप्ताहिक पत्रके विवरणको डिप्टी साहबके स्वीकार कर लेनेके पश्चात् संदिग्ध समझनेका कोई कारण नहीं था। यह एक समस्या अवश्य थी कि बच्चे बड़े होकर उस पूर्वजन्मकी स्मृतिको क्यों विस्मृत हो जाते हैं ? डिप्टी साहबके पास भी इसका कोई समाधान नहीं था।

(२)

जाड़ेके दिन थे और संध्याका समय। मैं डिप्टी रमाशंकर चतुर्वेदीके साथ टहलने निकला था। बँगलेसे थोड़ी दूर आगे चलकर हम दोनोंने पक्की सड़क छोड़ दी और पगडण्डीसे एक तालाबकी ओर चले।

तालाब कभी अच्छा रहा होगा; किंतु आज तो वह नामके लिये ही तालाब है। उसमें शरद् ऋतुमें भी जल नहीं रहता। गहराई भी उसकी अब कमरभर रह गयी है। उसके आस-पास कुछ कदम्बके वृक्ष हैं। चारों कोनोंपर टूटी हुई बुर्जे हैं और घाट अब भी बैठने योग्य हैं। एकान्त होनेके कारण हम सब कभी-कभी यहाँ आकर थोड़ी देर बैठते हैं।

व्रजमें साधु तो आते ही रहते हैं। उनमें हमारा कोई विशेष आकर्षण नहीं। फिर भी इस नितान्त एकान्तमें घाटकी एक शिलापर इतनी सर्दीमें भी केवल कौपीन लगाये मजेसे आधे लेटे, दुबले-पतले, साँवले रंगके साधुने हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया। हमें अपनी ओर आते देखकर वे बैठ गये। हम दोनोंने अभिवादन किया और उनके समीप ही एक शिलापर हमें भी बैठनेका संकेत हुआ।

साधुके समीप परमार्थचर्चा तो चलेगी ही। प्रसङ्गवश पुनर्जन्मकी चर्चा आ गयी। महात्माजीने बतलाया कि वे पिछले जन्ममें अयोध्याके समीप सरयू-किनारे एक मन्दिरके पुजारी थे। वहाँ कुछ अपराध हो गया और उसीके कारण उन्हें पुनः इस शरीरको धारण करना पड़ा।

मैं विस्तारमें जाना नहीं चाहता। महात्माजीसे उनके पूर्वजन्मके सम्बन्धमें हम दोनोंने बहुत कुछ पूछा और उन्होंने भी बहुत कुछ बताया। अन्तमें मैंने पूछा- ‘शरीरत्यागके पश्चात् और इस शरीरधारणके पूर्व मध्यमें क्या-क्या हुआ ?’ महात्माजी पहलेहीसे कुछ उकताहट दिखला रहे थे। अँधेरा भी हो रहा था। उन्होंने कहा- ‘प्रश्न पर्याप्त गम्भीर और महत्त्वका है, मुझे अभी नित्यकर्मसे निवृत्त होना है।’ डिप्टी साहब भी अँधेरेके कारण लौटनेको उत्सुक थे। उन्होंने बीचमें ही कहा- ‘इसे कलपर रहने दीजिये।’ इच्छा न होनेपर भी उन लोगोंका रुख देखकर मुझे अनुमोदन करना पड़ा। हम दोनों वहाँसे लौट आये। बहुत आग्रह करनेपर भी महात्माजीने न तो बस्तीमें चलना स्वीकार किया और न कुछ ग्रहण करना ही।

दूसरे दिन महात्माजीको अपने घर भिक्षा करानेको निमन्त्रित कर आया था। लगभग दस बजे नौकरको भेजा तो वहाँ उनका कोई पता नहीं लगा। सोचा- ‘साधु ठहरे, कहीं टहल गये होंगे।’ एक-दो बार नौकर भेजा और संध्याको डिप्टी साहबके साथ वहीं घूमने गया। साधु होते हैं रमते राम। वे एक स्थानसे खिसके तो फिर भला कौन उनका पता पाता है।

(३)

कालिन्दीके किनारे एक झोपड़ी पड़ी थी। मैं अकेले टहलते उधरसे निकला तो एक बार उसमें झाँककर देखेनेकी इच्छा हुई। ‘यह क्या ? ये तो वही पूर्वपरिचित महात्माजी हैं?’ महात्माजी रुग्ण दिखायी देते थे। थोड़ा पुआल पड़ा था और उसीपर एक कम्बलमें लिपटे वे पड़े थे। पासमें दो तूंबियाँ रखी थीं और सम्भवतः एक कपड़ेका छोटा टुकड़ा भी।

मेरी आहट पाकर उन्होंने मुख खोला। अभिवादन करके मैं पास ही बैठ गया। उन्होंने देखते ही मुझे पहचान लिया। शरीरके सम्बन्धमें पूछनेपर ज्ञात हुआ कि इधर कुछ दिनोंसे आँवके दस्त होते थे, फिर ज्वर हो गया। ज्वर छूट गया है; किंतु आँव अभी गयी नहीं। यह झोपड़ी पासके ग्रामवालोंने उनके लिये बना दी है।

मैंने पहले जैसा अनुमान किया था, महात्माजी उतने दुर्बल थे नहीं। वे उठकर बैठ गये और सत्सङ्ग होने लगा। मैंने वही पुराना प्रश्न दुहराया कि शरीरत्यागके पश्चात् क्या होता है ? किंतु मुझे निराश होना पड़ा। उन्होंने कहा- ‘भैया ! उसी दिन बता देता तो बता भी देता। वहाँ मच्छरोंने बहुत तंग किया। उठकर यमुनाजीकी ओर आ गया। बड़ी भली चाँदनी थी। चलनेमें आनन्द प्रतीत होता था। पैर बढ़ते गये और दूर निकल गया। जाकर भला कहाँ लौटा जाता है। तब तो यह बाधा हुई और अब वे सब बातें विस्मृत हो गयीं। तुमलोगोंसे मैंने क्या-क्या बतलाया, यह भी स्मरण नहीं।’

मुझे डिप्टी साहबकी लड़कीके विस्मरणका ध्यान हुआ। मैंने पूछा- ‘आपको यह पूर्वजन्मकी स्मृति जन्मसे थी ?’

‘नहीं’, महात्माजीने स्वभावके अनुसार समझाना प्रारम्भ किया-‘पूर्वजन्मकी स्मृति तो संस्कारोंसे होती है। संस्कार सबके भीतर हैं; पर बाहरी वस्तुओंके संग्रहसे मन जब उनमें आसक्त हो जाता है, तब वह अन्तर्मुख होकर भीतरके संस्कारोंको ग्रहण नहीं कर पाता। मैंने जबसे बाहरी वस्तुओंका सचमुच संग्रह छोड़ा था, तभीसे मुझे पूर्वजन्मकी स्मृति हुई थी और जब मैंने उनका संग्रह किया तो वह स्मृति क्षीण हो गयी।’

‘आपके पास तो अब भी कोई संग्रह नहीं!’ मैंने पूछा। ‘संग्रह केवल पदार्थोंका थोड़े ही होता है। पदार्थ भला कैसे छोड़े

जायँगे ? नगरमें रहोगे तो मकान रहेंगे। यहाँ भी ईंट, पत्थर, पेड़, पशु बहुत हैं। इनसे भागकर कोई कहाँ जायगा ? संग्रह छोड़ना है इनमें आसक्तिका। इनकी अपेक्षा करना ही संग्रह है। शरीर रुग्ण होनेके कारण कम्बल, तुम्बी आदि अपेक्षित हैं। इनके बिना कष्ट होगा। इनमें कुछ आसक्ति भी हो ही गयी है। यही आसक्ति इनका संग्रह हो गयी।

अन्यथा राजा भी अपरिग्रही हो सकता है।’

‘तब तो अपरिग्रहका अर्थ हुआ अनासक्ति।’ मैंने जिज्ञासा की।

‘थोड़ा अन्तर है’, महात्माजीने बतलाया ‘अपरिग्रह धनका होता है और अनासक्ति धन-जन दोनोंमें।’

‘ये बालक जो पूर्वजन्मकी स्मृतिवाले कहीं-कहीं पाये जाते हैं, वे तो अपरिग्रही नहीं ?’

‘पूर्वजन्ममें मृत्युसे पूर्व रोगके कारण या किसी भी कारणसे धन (पदार्थ-पशु प्रभृति) से आसक्ति दूर हो जानेपर ही उन्हें इस जन्ममें पूर्वजन्मकी स्मृति होती है और परिग्रह होते ही वह क्षीण हो जाती है।’

आज जाकर मैं उस लड़कीके पूर्वजन्मकी बातोंके विस्मरण-रहस्यको जान सका।

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