माता-पिता की सेवा का तात्पर्य क्या है? (EN)

प्रश्न- माता-पिताकी सेवा का तात्पर्य क्या है?

उत्तर-माता-पिताकी सेवा का तात्पर्य कृतज्ञता में है। माता- पिताने बच्चेके लिये जो कष्ट सहे हैं उसका पुत्रपर ऋण है। उस ऋणको पुत्र कभी उतार नहीं सकता। माँने पुत्रकी जितनी सेवा की है, उतनी सेवा पुत्र कर ही नहीं सकता। अगर कोई पुत्र यह कहता है कि मैं अपनी चमड़ीसे माँके लिये जूती बना दूँ तो दिया, उससे हम पूछते हैं कि यह चमड़ी तुम कहाँसे लाये ? यह भी तो माँने ही दी है! उसी चमड़ीकी जूती बनाकर माँको दे दी तो कौन-सा बड़ा काम किया? केवल देनेका अभिमान ही किया है! ऐसे ही शरीर खास पिताका अंश है। पिताके उद्योगसे ही पुत्र पढ़-लिखकर योग्य बनता है, उसको रोटी कपड़ा मिलता है। इसका बदला कैसे चुकाया जा सकता है! अतः केवल माता- पिताकी सेवा करनेसे, उनकी प्रसन्नता लेनेसे वह ऋण अदा तो नहीं होता, पर माफ हो जाता है।

यह लेख गीता प्रेस की मशहूर पुस्तक “गृहस्थ कैसे रहे ?” से लिया गया है. पुस्तक में विचार स्वामी रामसुख जी के है. एक गृहस्थ के लिए यह पुस्तक बहुत मददगार है, गीता प्रेस की वेबसाइट से यह पुस्तक ली जा सकती है. अमेजन और फ्लिप्कार्ट ऑनलाइन साईट पर भी चेक कर सकते है.

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