कहानी का सार: 5 LPA से 2.5 करोड़ पोर्टफोलियो तक
- अभिनव ने रिलायंस में 5 LPA सैलरी से करियर शुरू किया, लगभग 10 साल काम करके 13 LPA पर कॉर्पोरेट जॉब छोड़ी।
- शानू ने जॉब बदलते हुए 8 LPA से 55 LPA तक तेजी से इनकम ग्रोथ की।
- दोनों ने मिलकर डिसिप्लिन्ड इन्वेस्टिंग और फ्रूगल (कम खर्च वाली) लाइफस्टाइल से 2.5 करोड़ का म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो खड़ा किया, जिसमें लगभग 80% इक्विटी, 12–13% डेBT और 7–8% गोल्ड–सिल्वर एक्सपोजर है।
- वे अभी लगभग 1.5 लाख प्रति महीना SIP करते हैं (लगभग 40K अभिनव, 1.1L शानू), साथ में PPF में भी सालाना 1.5–1.5 लाख डालते हैं।
यह पूरा सेटअप वैसे ही है जैसा एक सक्षम फाइनेंशियल प्लानर / म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर अपने क्लाइंट के लिए डिजाइन करता है – गोल बेस्ड, एसेट अलोकेशन बेस्ड और रिस्क-ऐडजस्टेड रिटर्न पर फोकस्ड।
₹20K SIP से 1 करोड़ – व्यवहारिक गणित और माइंडसेट
अभिनव एक उदाहरण लेते हैं: कोई व्यक्ति 50,000 रुपये मासिक कमाता है और 20,000 रुपये SIP कर सकता है और 10 साल में 1 करोड़ बनाना चाहता है।
- वह मानते हैं कि SIP रिटर्न की गणना 12% मानकर करनी चाहिए; इससे ज्यादा मिले तो बोनस समझो, कम मिले तो भी प्लानिंग रियलिस्टिक रहती है।
- 12% CAGR पर लगभग 10–12 साल की लंबी SIP, नियमित टॉप-अप्स और बीच में पैसे न छूने की आदत से 1 करोड़ तक जाना व्यवहारिक रूप से संभव हो जाता है।
यहां म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर की भूमिका क्या हो सकती है:
- क्लाइंट की इनकम, खर्च और रिस्क प्रोफाइल देखकर रियलिस्टिक टाइम फ्रेम समझाना – 1 करोड़ 5 साल में नहीं, 10–12 साल में रियलिस्टिक है।
- सही रिटर्न असम्पशन (उदाहरण: 12%) सेट कराना ताकि क्लाइंट ओवर-प्रॉमिस या अवास्तविक उम्मीदों के शिकार न हों।
- SIP टॉप-अप स्ट्रेटेजी बनवाना – सैलरी बढ़े तो SIP भी बढ़े, ताकि लक्ष्य जल्दी और कम रिस्क में पूरा हो सके।
फाइनेंशियल प्लानर जैसा फ्रेमवर्क: इस कपल की रणनीति
अभिनव ने खुद एक तीन-स्टेप फ्रेमवर्क बताया है जो बिलकुल फाइनेंशियल प्लानर जैसा है।
1. उद्देश्य और समय सीमा तय करना
- वह सबसे पहले हर निवेश का “पर्पज़” सेट करते हैं – किस गोल के लिए, कितने साल बाद, लगभग कितनी रकम चाहिए।
- समय सीमा (3 साल, 5 साल, 15–20 साल) तय होते ही यह साफ हो जाता है कि कितनी रिस्क ली जा सकती है और कौन सी कैटेगरी के फंड चुनने हैं।
यहीं पर म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर असल में “फाइनेंशियल प्लानर” बनता है:
- क्लाइंट के साथ बैठकर गोल चार्ट बनवाना:
- 0–3 साल (गाड़ी, शादी, इमरजेंसी)
- 5–8 साल (हाउस डाउन पेमेंट, बच्चों की शिक्षा का पहला फेज)
- 15–20 साल (रिटायरमेंट, बच्चों की हायर एजुकेशन)
- हर गोल के लिए अलग फंड कैटेगरी सुझाव देना, ताकि पैसा सही टाइम पर सही रिस्क के साथ ग्रो हो सके।
2. सही कैटेगरी चुनना (टाइम फ्रेम के आधार पर)
वीडियो में स्पष्ट गाइडलाइन दी गई है, जो प्लानिंग का कोर है।
- 1 साल से कम के गोल:
- इक्विटी में नहीं जाते, डेBT या आर्बिट्राज फंड प्रिफर करते हैं।
- 3–5 साल के गोल:
- बैलेंस्ड एडवांटेज फंड (BAF) या हाइब्रिड फंड का उपयोग, ताकि वोलैटिलिटी कंट्रोल में रहे।
- 7–8 साल के गोल:
- मल्टी कैप / फ्लेक्सी कैप फंड, यानी इक्विटी लेकिन डाइवर्सिफाइड और रीबैलेंसिंग की सुविधा।
- 15–20 साल जैसे लॉन्ग टर्म गोल:
- इक्विटी में अच्छी एक्सपोजर, जिसमें स्मॉल और मिडकैप की भी हिस्सेदारी हो सकती है।
एक प्रोएक्टिव डिस्ट्रीब्यूटर / प्लानर की जिम्मेदारी:
- हर गोल के लिए अलग फंड मैप तैयार करना (उदाहरण: चाइल्ड एजुकेशन – 18 साल बाद, रिटायरमेंट – 25 साल बाद)।
- क्लाइंट को यह समझाना कि “हर SIP एक गोल के नाम से हो” तो बीच में रिडेम्प्शन की संभावना कम होती है, जैसा कि अभिनव भी कहते हैं कि पर्पज़ जोड़ोगे तो बीच में पैसा छेड़ोगे नहीं।
3. क्वांटिटेटिव + क्वालिटेटिव एनालिसिस
अभिनव फंड चुनते समय दो तरह का एनालिसिस बताते हैं।
- क्वांटिटेटिव:
- रिटर्न की हिस्ट्री, कंसिस्टेंसी, वोलैटिलिटी, क्या फंड ने रिटर्न “ज्यादा रिस्क” लेकर बनाए या सही एसेट अलोकेशन से।
- क्वालिटेटिव:
- फंड मैनेजर का अनुभव, स्टाइल (वैल्यू / ग्रोथ), क्या फंड का व्यवहार उसकी घोषित स्टाइल से मैच करता है या नहीं।
डिस्ट्रीब्यूटर/प्लानर की प्रोफेशनल वैल्यू यहीं सबसे ज्यादा दिखाई देती है:
- सभी क्लाइंट खुद Moneycontrol, Value Research या अन्य डेटा साइट्स पर डीटेल एनालिसिस नहीं कर पाते; प्लानर यह काम कर के फ़िल्टर कर सकता है।
- स्टाइल ड्रिफ्ट (कागज पर वैल्यू, पोर्टफोलियो में ग्रोथ) पकड़ना रिटेल इन्वेस्टर के लिए मुश्किल होता है; एक सक्षम प्लानर इन चीजों को रेगुलर मॉनिटर करके क्लाइंट को समय पर फंड स्विच की सलाह दे सकता है।
एसेट अलोकेशन, रिस्क मैनेजमेंट और डिस्ट्रीब्यूटर की भूमिका
इस कपल का 2.5 करोड़ का पोर्टफोलियो सिर्फ “अच्छा फंड चुनने” से नहीं, बल्कि एसेट अलोकेशन और रिस्क मैनेजमेंट से बना है।
1. इक्विटी–डेBT–गोल्ड मिक्स
- लगभग 80% पोर्टफोलियो इक्विटी में, जिसमें 75% इंडियन इक्विटी और 5% इंटरनेशनल इक्विटी है।
- 12–13% डेBT, 7–8% गोल्ड–सिल्वर – और यह सब इंडियन म्यूचुअल फंड्स के जरिए ही लिया गया है।
फाइनेंशियल प्लानर इस तरह मदद कर सकता है:
- क्लाइंट की उम्र, इनकम स्टेबिलिटी, फैमिली रिस्पॉन्सिबिलिटी देखकर इक्विटी का प्रतिशत तय करना (उदाहरण: युवा कपल के लिए 70–80% इक्विटी, रिटायरमेंट के पास 40–50% आदि)।
- इंटरनेशनल डाइवर्सिफिकेशन की जरूरत समझाना, ताकि देश-विशेष रिस्क कम हो सके, जैसा कि 5% इंटरनेशनल एलोकेशन से दिखता है।
2. रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न पर फोकस
- अभिनव बैलेंस्ड एडवांटेज फंड्स को निफ्टी 50 से कंपेयर करते हैं, यह देखने के लिए कि कम इक्विटी (50–55%) के साथ क्या वे निफ्टी के करीब रिटर्न दे पा रहे हैं या नहीं।
- जो BAF फंड 75–80% इक्विटी लेकर भी निफ्टी जैसा ही रिटर्न दे रहे हैं, उन्हें वह हटा देते हैं; यानी ज्यादा रिस्क लेकर भी “एक्स्ट्रा” कुछ नहीं मिला तो फायदा नहीं।
डिस्ट्रीब्यूटर/प्लानर के लिए यह एक क्लासिक प्रिंसिपल है:
- क्लाइंट को सिर्फ “हाई रिटर्न” नहीं, “रिस्क-एडजस्टेड रिटर्न” का कॉन्सेप्ट समझाना – कम वोलैटिलिटी, बेहतर स्लीप क्वालिटी।
- पोर्टफोलियो लेवल पर एक साथ सब फंड देखना – ओवरलैप, मार्केट कैप मिक्स, सेक्टर कंसन्ट्रेशन – और जरूरत पड़ने पर रिबैलेंस सजेस्ट करना।
3. फंड की संख्या सीमित रखना
- वह कहते हैं कि आम तौर पर 5 इक्विटी स्कीम और 1–2 हाइब्रिड या डेBT फंड काफी हैं; 10–12 फंड्स रखने से सिर्फ कंफ्यूजन और ओवरलैप बढ़ता है, वैल्यू नहीं।
यही एक अच्छे प्लानर की प्रैक्टिकल गाइडेंस है:
- क्लाइंट को हर नए ऐड कैंपेन और “टॉप परफॉर्मर” लिस्ट देखकर नया फंड खरीदने से रोकना।
- 5–7 अच्छे फंड्स में ही पर्याप्त डाइवर्सिफिकेशन देना, ताकि मॉनिटरिंग आसान और रिटर्न क्लीन रहे।
इमरजेंसी फंड, इंश्योरेंस और कैशफ्लो – holistic प्लानिंग
यह कपल सिर्फ SIP नहीं कर रहा, पूरा होलिस्टिक फाइनेंशियल प्लान फॉलो कर रहा है – जैसा कि एक फाइनेंशियल प्लानर क्लाइंट के लिए डिजाइन करता है।
1. इमरजेंसी फंड और क्रेडिट लाइन
- उनके पास लगभग 6 लाख रुपये का इमरजेंसी फंड है।
- दोनों के पास 10–10 लाख लिमिट वाले क्रेडिट कार्ड, और म्यूचुअल फंड्स को प्लेज करके 20 लाख की अतिरिक्त क्रेडिट लाइन भी है।
यह सेटअप दिखाता है कि लिक्विडिटी प्लानिंग सही है:
- इमरजेंसी में फंड्स बेचने के बजाय क्रेडिट लाइन से काम चलाना और बाद में इनकम से कवर करना – लंबी अवधि के कंपाउंडिंग को बचाता है।
- एक फाइनेंशियल प्लानर क्लाइंट के साथ यह पूरी “इमरजेंसी प्रोटेक्शन स्ट्रक्चर” डिजाइन कर सकता है।
2. टर्म और हेल्थ इंश्योरेंस
- दोनों के पास टर्म इंश्योरेंस और पर्सनल हेल्थ इंश्योरेंस है; अभिनव के पास 5 करोड़ तक का हेल्थ कवरेज बताया गया है।
डिस्ट्रीब्यूटर/प्लानर की भूमिका:
- क्लाइंट को यह समझाना कि “सिर्फ SIP काफी नहीं; बिना प्रॉपर इंस्योरेंस के कोई भी मेडिकल या लाइफ रिस्क आपके पूरे पोर्टफोलियो को मिटा सकता है।”
- सम-इंश्योर्ड, राइडर्स, वेटिंग पीरियड आदि पर गाइड करके सही पॉलिसी चुनने में मदद करना।
3. कैशफ्लो, क्रेडिट कार्ड और खर्च नियंत्रण
- लगभग 1–1.5 लाख महीना खर्च (रेंट, हेल्थ, ग्रोसरी, बेटी, ट्रैवल) और इसके ऊपर 1.5 लाख SIP, यानी इनकम का बड़ा हिस्सा निवेश में जा रहा है।
- वे लगभग पूरा खर्च क्रेडिट कार्ड के माध्यम से करते हैं और अमेज़न वाउचर जैसी ट्रिक्स से 12–15% तक सेविंग निकालते हैं।
- बड़े खर्च (50,000–1 लाख) से पहले पति–पत्नी बैठकर डिस्कस करते हैं कि वाकई जरूरत है या नहीं; फिजूलखर्ची से बचते हैं।
फाइनेंशियल प्लानर यहां:
- क्लाइंट को “cash flow planning” सिखाता है –
- फिक्स्ड खर्च, वेरिएबल खर्च, टैक्स, EMIs और SIP को बैलेंस करना।
- क्रेडिट कार्ड्स को पॉइंट्स/कैशबैक के लिए प्रोडक्टिव तरीके से उपयोग करना, लेकिन रोलओवर और हाई इंटरेस्ट से बचने के लिए क्लियर गाइडलाइन देना।
माइंडसेट, बहीवियर और MFD की कोचिंग भूमिका
अभिनव बार-बार कहते हैं कि यह सब “luck” नहीं, माइंडसेट और डिसिप्लिन का परिणाम है।
1. “पहले इन्वेस्ट, बाद में खर्च”
- उन्होंने 2016 में 50,000 सैलरी पर 20,000 की SIP शुरू की और साथ में स्टॉक्स में भी इन्वेस्ट करते रहे।
- उनकी फिलॉसफी है – पहले निवेश ऑटोमेट करो, बचा हुआ खर्च करो; यही मैजिकल SIP डिसिप्लिन है।
यह वही आदत है जो एक अच्छा डिस्ट्रीब्यूटर लोगों को सिखाता है:
- ऑटो-डेबिट SIP, सैलरी डेट के तुरन्त बाद – ताकि पैसा खाते में पड़े–पड़े खर्च न हो जाए।
- साल-दर-साल SIP टॉप-अप प्लान – 10–15% सालाना इनक्रीमेंट के साथ SIP भी बढ़ती रहे।
2. मार्केट क्रैश से डर नहीं, तैयारी
- शानू को चिंता रहती है कि पूरा पैसा मार्केट में है, क्रैश हुआ तो क्या होगा।
- अभिनव का दृष्टिकोण है कि अगर पोर्टफोलियो 50% भी गिर कर 2.5 से 1.25 करोड़ हो जाए, तब भी लाइफस्टाइल पर असर नहीं पड़ना चाहिए; इसी सोच के साथ फ्रूगल खर्च करते हैं।
डिस्ट्रीब्यूटर/प्लानर ऐसे समय में “behavioral coach” बनता है:
- क्लाइंट को पहले से समझाना कि इक्विटी में 30–50% का ड्रॉडाउन समय–समय पर नॉर्मल है, इससे घबराकर रिडीम नहीं करना चाहिए।
- क्रैश के समय क्लाइंट को फोन करके समझाना कि “अब यह डिस्काउंट पर सेल है, SIP बंद नहीं, जारी रखनी है।”
3. फ्री टिप्स बनाम प्रोफेशनल एडवाइस
- अभिनव बताते हैं कि शुरुआत में वे सिर्फ टिप्स पर ट्रेडिंग करते थे और बाद में समझ आया कि यह सही तरीका नहीं है, इसलिए उन्होंने खुद शिक्षा (जैसे CFA लेवल 1) में निवेश किया।
- वे यह भी कहते हैं कि लोग टेलिग्राम चैनल और TV एक्सपर्ट पर पैसे गंवाने को तैयार हैं, पर सही सलाह के लिए फीस नहीं देना चाहते, जबकि एक गलत सलाह पूरा कैपिटल डुबो सकती है।
यहीं से म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर की “फाइनेंशियल प्लानर” वाली वैल्यू दिखती है:
- क्लाइंट को यह समझाना कि
- फ्री टिप्स = बिना जिम्मेदारी की राय
- प्लानर = goal-based, documented प्लान, रेगुलर रिव्यू और जवाबदेही।
- फीज़/कमीशन को “कॉस्ट” नहीं, “इंश्योरेंस प्रीमियम” की तरह देखना – जो आपको बड़े और महंगे गलत फैसलों से बचाता है।
कपल फाइनेंशियल प्लानिंग: संयुक्त सोच, संयुक्त पोर्टफोलियो
वीडियो में दोनों बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि वे अपने पैसे को “कंबाइंड हाउसहोल्ड इनकम” मानते हैं, अलग-अलग नहीं।
1. एक टीम की तरह प्लानिंग
- अभिनव मजाक में कहते हैं – “वह घर की CEO हैं, मैं CFO; वह उद्देश्य डिफाइन करती हैं, मैं फिनैंस प्लान करता हूं।”
- बड़े खर्च से पहले दोनों डिसकशन करते हैं; साथ बैठकर goals और investments पर बात करते हैं।
फाइनेंशियल प्लानर कपल्स के लिए:
- दोनों पार्टनर्स को मीटिंग में बुलाना, ताकि दोनों को goals, रिस्क और प्लान का पूरा क्लैरिटी हो।
- इनकम, खर्च, SIP, इंश्योरेंस सबको “joint plan” की तरह देखना, न कि Husband vs Wife के अकाउंट की लड़ाई के रूप में।
2. अलग-अलग करियर, एक जैसा फाइनेंशियल विजन
- दोनों के करियर पाथ अलग हैं – एक स्टेबल पर धीमी ग्रोथ (अभिनव), दूसरी तेज जॉब स्विच के साथ हाई इनकम ग्रोथ (शानू)।
- लेकिन फाइनेंशियल विजन एक ही है – भारी SIP, कम लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन, और 15 करोड़ जैसा मोटा वेल्थ लक्ष्य अगले 10 साल में।
डिस्ट्रीब्यूटर/प्लानर:
- दोनों पार्टनर्स की इनकम और रिस्क टॉलरेंस समझकर प्लान बनाता है – जैसे एक का रिस्क हाई, दूसरे का लो, तो मिलाकर बैलेंस्ड पोर्टफोलियो बन सकता है।
- बच्चों की education, घर, रिटायरमेंट, और शायद जमीन/प्रॉपर्टी जैसी future खरीद (जैसा कि वे land लेने की बात करते हैं) को एक इंटीग्रेटेड प्लान में शामिल कर सकता है।
निष्कर्ष: यह कहानी, और MFD की “फाइनेंशियल प्लानर” वाली सीख
अभिनव–शानू की कहानी दिखाती है कि:
- ₹50,000 सैलरी पर ₹20,000 SIP से शुरू करके,
- नियमित इनकम बढ़ाकर SIP और टॉप-अप बढ़ाते हुए,
- गोल-बेस्ड फंड सिलेक्शन, सही एसेट अलोकेशन, इंश्योरेंस और इमरजेंसी फंड के साथ,
- और मार्केट क्रैश में घबराहट से बचते हुए,
एक कपल 8–10 साल में 1 करोड़ और आगे चलकर 2.5 करोड़, फिर 10–15 करोड़ जैसी वेल्थ बना सकता है।
यही काम एक सक्षम म्यूचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर, अगर खुद को सिर्फ “प्रोडक्ट सेलर” नहीं, बल्कि फाइनेंशियल प्लानर माने, तो हर मिडल क्लास कपल के लिए कर सकता है –
- गोल डिफाइन करना,
- सही फंड और एसेट अलोकेशन चुनना,
- SIP और कैशफ्लो को स्ट्रक्चर करना,
- इमरजेंसी और इंश्योरेंस की सुरक्षा देना,
- और सबसे ज़रूरी, मार्केट साइकिल के दौरान क्लाइंट के बिहेवियर को सही दिशा में रखना।







