प्रश्न- सरकारका आदेश होनेसे यदि डॉक्टरलोग गर्भपात, नसबन्दी, आपरेशन करते हैं तो क्या उन्हें महापाप लगेगा ? (EN)

प्रश्न- सरकारका आदेश होनेसे यदि डॉक्टरलोग गर्भपात, नसबन्दी, आपरेशन करते हैं तो क्या उन्हें महापाप लगेगा ?

उत्तर- उनको तो अवश्य ही महापाप लगेगा। लोभ पापका बाप है ही। थोड़े-से लोभके लिये वे कितने जीवोंकी हत्या कर देते हैं! ऐसा घृणित कार्य करके, महापाप करके कमाये हुए पैसोंका अन्न खानेसे उनकी बड़ी दुर्दशा होगी।

शास्त्रमें आया है कि यदि अन्नपर गर्भपात करनेवालीकी दृष्टि भी पड़ जाय तो वह अन्न अभक्ष्य (न खानेयोग्य) हो जाता है-

भ्रूणघ्नावेक्षितं चैव संस्पृष्टं चाप्युदक्यया।

पतत्रिणाऽवलीढं च शुना संस्पृष्टमेव च ॥

(मनुस्मृति ४। २०८)

‘गर्भहत्या करनेवालेका देखा हुआ, रजस्वला स्त्रीका स्पर्श किया हुआ, पक्षीका खाया हुआ और कुत्तेका स्पर्श किया हुआ अन्न न खाये।’

नौकरीमें अपना समय देकर, काम करके पैसे लिये जाते हैं, अपना धर्म, कर्तव्य, सत्कर्म देकर पैसे नहीं लिये जाते। पाप, अन्याय, हत्या, हिंसा आदि करके पैसे लेना तो कोरा पाप है। अतः यदि कोई मालिक पाप, अन्याय करनेके लिये कहे तो नौकरको चाहिये कि वह मालिकसे नम्रतापूर्वक कह दे कि ‘मैं आपके काममें घण्टा-दो-घण्टा समय अधिक दे सकता हूँ, पर अपने धर्मका नाश करके पाप, हिंसा करनेमें मैं बाध्य नहीं हूँ; आप नौकरीपर रखें, चाहे न रखें, आपकी मरजी।’

एक सज्जनने गर्भपात, नसबन्दी कार्य नहीं किया तो उसको नौकरीसे निकाल दिया गया। उसने मुकदमा किया और उसमें वह जीत गया। अतः उसको पुनः नौकरीपर रखना पड़ा। अगर सरकारका ऐसा कानून है तो वह ईसाई, मुसलमान, पारसी आदि सबके लिये होना चाहिये, केवल हिन्दुओंके लिये ही नहीं। किसी एक जातिपर, एक वर्णसमुदायपर ज्यादती करना, उसको पाप करनेके लिये बाध्य करना और पाप करनेका कानून बनाना सरकारके लिये उचित नहीं है।

यह लेख गीता प्रेस की मशहूर पुस्तक “गृहस्थ कैसे रहे ?” से लिया गया है. पुस्तक में विचार स्वामी रामसुखदास जी के है. एक गृहस्थ के लिए यह पुस्तक बहुत मददगार है, गीता प्रेस की वेबसाइट से यह पुस्तक ली जा सकती है. अमेजन और फ्लिप्कार्ट ऑनलाइन साईट पर भी चेक कर सकते है.

स्वामी रामसुखदास जी का जन्म वि.सं.१९६० (ई.स.१९०४) में राजस्थानके नागौर जिलेके छोटेसे गाँवमें हुआ था और उनकी माताजीने ४ वर्षकी अवस्थामें ही उनको सन्तोंकी शरणमें दे दिया था, आपने सदा परिव्राजक रूपमें सदा गाँव-गाँव, शहरोंमें भ्रमण करते हुए गीताजीका ज्ञान जन-जन तक पहुँचाया और साधु-समाजके लिए एक आदर्श स्थापित किया कि साधु-जीवन कैसे त्यागमय, अपरिग्रही, अनिकेत और जल-कमलवत् होना चाहिए और सदा एक-एक क्षणका सदुपयोग करके लोगोंको अपनेमें न लगाकर सदा भगवान्‌में लगाकर; कोई आश्रम, शिष्य न बनाकर और सदा अमानी रहकर, दूसरोकों मान देकर; द्रव्य-संग्रह, व्यक्तिपूजासे सदा कोसों दूर रहकर अपने चित्रकी कोई पूजा न करवाकर लोग भगवान्‌में लगें ऐसा आदर्श स्थापित कर गंगातट, स्वर्गाश्रम, हृषिकेशमें आषाढ़ कृष्ण द्वादशी वि.सं.२०६२ (दि. ३.७.२००५) ब्राह्ममुहूर्तमें भगवद्-धाम पधारें । सन्त कभी अपनेको शरीर मानते ही नहीं, शरीर सदा मृत्युमें रहता है और मैं सदा अमरत्वमें रहता हूँ‒यह उनका अनुभव होता है । वे सदा अपने कल्याणकारी प्रवचन द्वारा सदा हमारे साथ हैं । सन्तोंका जीवन उनके विचार ही होते हैं ।

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