भय मन की कल्पना है Fear is imagination of mind (EN)

भय मन की कल्पना है

जय श्री राधा जय श्री राधा

हम सोचकर देखें—हमें भय क्यों होना चाहिए. जब सब जगह अनंत शक्ति संपन्न, सब कुछ जानने वाले, हमारे प्रति अनंत सौहार्दमय प्रभु ही नित्य निरंतर अवस्थित है, तो किस प्राणी- पदार्थ से हम भय करें ?

खूब गहराई से सोचें, भय एक झूठमूठ अनादिकाल से कल्पित मन की कल्पना है. हमें मामूली-से-मामूली बात में भय होने लगता है; न जाने कितने प्रकार के भय हमें घेरे हुए है.

क्यों नहीं हम प्रत्येक प्रतिकूल (परेशानी) लगने वाली परिस्थिति में अपनी आँख प्रभु की ओर कर लेते और निरंतर पास में रहने वाले, सर्व शक्तिमय, सब कुछ जानने वाले, अनंत, अपरिसीम सौहार्दमय प्रभु पर ही सब स्थिति में सोचने लग जाएं— ‘जैसी प्रभु की इच्छा होगी, हो जाएगा. इसमें डरने की क्या बात है?’

सच मानें भय की सम्पूर्ण स्थितियों बदलने लगेंगी और हमारा मन सच्चिमय आनन्द से भरने लगेगा.

(प्रस्तुत लेख हमारे परम पूज्य श्री राधाबबा (स्वामी चक्रधरजी महाराज) की विशेष सामग्री का संकलन है. ये लेख गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित ‘आस्तिकता की आधारशीला’ से लिया गया है.)

Fear is imagination of mind

Another way to overcome difficulties

Jai Shri Radha Jai Shri Radha

Let us think and see – why should we be afraid? When the Lord, who is full of infinite power, knows everything and is always present everywhere with infinite kindness towards us, then from which creature should we fear?

Think very deeply, fear is a false imagination of the mind from time immemorial. We start feeling fear in the smallest things; Don’t know how many types of fears surround us.

Why don’t we turn our eyes towards the Lord in every adverse (troublesome) situation and start thinking about the God who is always nearby, all-powerful, all-knowing, infinite, infinitely amicable in every situation? ‘Whatever the Lord wishes, it will happen. What is there to fear in this?’

If we believe the truth, all the situations of fear will start changing and our mind will start filling with true joy.

(The presented article is a compilation of the special material of our most revered Shri Radhaba (Swami Chakradharji Maharaj ji). This article has been taken from the ‘Asthikta ki Aadharshilaaein’ published by Geeta Press.)

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