जिसकी स्त्री को विधर्मी ले गये, उस पुरुष का क्या कर्तव्य है?

प्रश्न- जिसकी स्त्री को विधर्मी ले गये, उस पुरुष का क्या कर्तव्य है?

उत्तर- पुरुष में उसको छुड़ाकर लाने की सामर्थ्य हो और वह प्रसन्नता से आना चाहे तो उसको अपने घरमें ले आना चाहिये। कारण कि उसके साथ जबर्दस्ती हुई है, अतः उसका एक पतिव्रत नहीं रहा, पर उसका धर्म नहीं बिगड़ा। धर्म तो स्वयं (अपनी इच्छासे) छोड़ने पर ही बिगड़ता है। जबर्दस्ती करके कोई भी किसी का धर्म नहीं छुड़ा सकता, उसको धर्मभ्रष्ट नहीं कर सकता। कोई जबर्दस्ती किसी के मुख में गोमांस भी दे दे, तो भी वह उसका धर्म नहीं छुड़ा सकता। अतः यदि उस स्त्री का मन नहीं बिगड़ा है उसने संग का सुख नहीं लिया है तो उसका पातिव्रतधर्म नष्ट नहीं हुआ है। इसलिये यदि वह वापिस आ जाय तो उसको गीता, रामायण भागवत आदिके पाठ द्वारा तथा गंगाजल से स्नान कराकर शुद्ध कर लेना चाहिये। यह सब करने के बाद जब वह रजस्वला हो जायगी, तब वह सर्वथा शुद्ध हो जायगी- ‘रजसा शुद्धयते नारी’।

जमदग्नि ऋषि की पत्नी रेणुका प्रतिदिन अपने पातिव्रत धर्म के प्रभावसे कपड़े में जल भरकर लाया करती थी। एक दिन उसको नदी के किनारे पर सोनेकी तरह चमकीले एवं सुन्दर बाल दीखे। उसके मनमें आया कि ये बाल इतने सुन्दर हैं तो वह पुरुष कितना सुन्दर होगा! इस तरह मन में विकार आते ही उसका धर्म नष्ट हो गया और वह पहले की तरह कपड़े में जल भरकर नहीं ला सकी।

इन्द्र ने गौतम ऋषि का रूप धारण करके अहल्या को भ्रष्ट किया तो उसका धर्म भ्रष्ट नहीं हुआ, प्रत्युत एक पतिव्रत नष्ट हुआ। यद्यपि पतिने क्रोध में आकर उसको पत्थर का बना दिया, तथापि भगवान् राम ने उसका उद्धार कर दिया; क्योंकि वह अपने धर्ममें दृढ़ थी। –

गीता प्रेस के संस्थापक श्रीजयदयालजी गोयन्दका शुद्धि एवं पवित्रताका बहुत खयाल रखा करते थे। उन्होंने भी कहा था कि विधर्मियों ने जबर्दस्ती करके जिन स्त्रियोंको भ्रष्ट किया है, उनका धर्म भ्रष्ट नहीं हुआ है। अतः यदि वे हिन्दूधर्म में आना चाहें तो उनको ले लेना चाहिये और गंगास्नान, गीता-रामायणपाठ आदिसे शुद्ध करा लेना चाहिये। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि दूसरे धर्मको माननेवाला व्यक्ति हिन्दूधर्म में आना चाहे तो उसको ले लेना चाहिये अर्थात् वह भी हिन्दू हो सकता है और हिन्दू धर्मकी पद्धतिके अनुसार जप-ध्यान, पूजा-पाठ आदि कर सकता है।

यह लेख गीता प्रेस की मशहूर पुस्तक “गृहस्थ कैसे रहे ?” से लिया गया है. पुस्तक में विचार स्वामी रामसुखदास जी के है. एक गृहस्थ के लिए यह पुस्तक बहुत मददगार है, गीता प्रेस की वेबसाइट से यह पुस्तक ली जा सकती है. अमेजन और फ्लिप्कार्ट ऑनलाइन साईट पर भी चेक कर सकते है.

स्वामी रामसुखदास जी का जन्म वि.सं.१९६० (ई.स.१९०४) में राजस्थानके नागौर जिलेके छोटेसे गाँवमें हुआ था और उनकी माताजीने ४ वर्षकी अवस्थामें ही उनको सन्तोंकी शरणमें दे दिया था, आपने सदा परिव्राजक रूपमें सदा गाँव-गाँव, शहरोंमें भ्रमण करते हुए गीताजीका ज्ञान जन-जन तक पहुँचाया और साधु-समाजके लिए एक आदर्श स्थापित किया कि साधु-जीवन कैसे त्यागमय, अपरिग्रही, अनिकेत और जल-कमलवत् होना चाहिए और सदा एक-एक क्षणका सदुपयोग करके लोगोंको अपनेमें न लगाकर सदा भगवान्‌में लगाकर; कोई आश्रम, शिष्य न बनाकर और सदा अमानी रहकर, दूसरोकों मान देकर; द्रव्य-संग्रह, व्यक्तिपूजासे सदा कोसों दूर रहकर अपने चित्रकी कोई पूजा न करवाकर लोग भगवान्‌में लगें ऐसा आदर्श स्थापित कर गंगातट, स्वर्गाश्रम, हृषिकेशमें आषाढ़ कृष्ण द्वादशी वि.सं.२०६२ (दि. ३.७.२००५) ब्राह्ममुहूर्तमें भगवद्-धाम पधारें । सन्त कभी अपनेको शरीर मानते ही नहीं, शरीर सदा मृत्युमें रहता है और मैं सदा अमरत्वमें रहता हूँ‒यह उनका अनुभव होता है । वे सदा अपने कल्याणकारी प्रवचन द्वारा सदा हमारे साथ हैं । सन्तोंका जीवन उनके विचार ही होते हैं ।

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