जो लोग आज सेंसेक्स देख कर खुश हैं वो ज़्यादा पैसे नहीं कमा पाएंगे


जो लोग आज सेंसेक्स देख कर खुश हो रहे हैं वो मार्केट से ज़्यादा पैसे नहीं कमा पाएंगे। अमेरिका के साथ टैरिफ घटने से बाज़ार उफान पर है, लेकिन ये उफान स्थायी नहीं होता। समझदार निवेशक वही होता है जो इन उतार-चढ़ावों के पार देख सके, जो शॉर्ट टर्म खुशी या डर में बहकर अपने फैसले न बदले। अगर आप वित्तीय रूप से स्वतंत्र बनना चाहते हैं, तो आपको “लॉन्ग टर्म” यानी लंबी दौड़ के घोड़े बनना होगा। यही सोच न केवल निवेश में, बल्कि जीवन में भी सफलता का मूलमंत्र है।

मार्केट का उबाल और निवेशक का जोश

सेंसेक्स या निफ्टी में तेजी आते ही सोशल मीडिया पर निवेशक खुशियां मनाने लगते हैं। हर कोई स्क्रीनशॉट डालता है—“आज मेरा पोर्टफोलियो हरे रंग में है।” लेकिन यही खुशी कई बार भ्रम पैदा करती है। असली निवेशक वो नहीं जो हर तेजी पर मुस्कुराए, बल्कि वो है जो गिरावट में भी मुस्कुराकर अपने लक्ष्य पर डटा रहे।

मार्केट में उफान का दौर हमेशा अस्थायी होता है। किसी नीति परिवर्तन, ब्याज दरों में बदलाव या किसी बड़ी कंपनी के परिणामों से बाज़ार में तेज़ उछाल आता है, लेकिन कुछ ही दिनों में वो सामान्य हो जाता है। जो लोग इस उतार-चढ़ाव के झूले में फंस जाते हैं, उनके लिए निवेश एक भावनात्मक सवारी बन जाता है—कभी आसमान, कभी जमीन।

उतार-चढ़ाव को समझें, डरें नहीं

बाज़ार का स्वभाव ही उतार-चढ़ाव वाला है। जिस तरह मौसम बदलता है, वैसे ही मार्केट की दिशा भी बदलती रहती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर बार दिशा बदलने पर हमें अपनी योजना बदलनी चाहिए।

अगर आपने किसी म्यूचुअल फंड या शेयर में लॉन्ग टर्म सोच के साथ निवेश किया है, तो छोटी-मोटी गिरावट पर बेचने का मतलब है अपनी मंज़िल से पहले ही रुक जाना। बाजार में गिरावट को एक अवसर की तरह देखें—एक छूट (discount) पर अच्छी कंपनियों के शेयर खरीदने का मौका।

लंबी दौड़ का घोड़ा कौन?

“लंबी दौड़ के घोड़े बनो”—इसका मतलब सिर्फ़ धैर्य रखना नहीं है, बल्कि अनुशासन, ज्ञान और धैर्य का संतुलन रखना है।

लंबी अवधि में निवेश इसलिए फायदेमंद है क्योंकि इसमें “compounding” यानी चक्रवृद्धि ब्याज की शक्ति काम करती है। मान लीजिए आपने हर महीने ₹5,000 किसी अच्छे इक्विटी म्यूच्युअल फंड में निवेश किया। 15–20 साल बाद यही छोटी सी राशि लाखों में बदल सकती है, क्योंकि आपका पैसा समय के साथ बढ़ता रहता है और उस पर ब्याज का ब्याज भी जुड़ता जाता है।

जैसे किसान बीज बोने के बाद रोज़ पौधा खींच कर नहीं देखता कि कितना बढ़ा, वैसे ही निवेशक को भी रोज़ अपना पोर्टफोलियो चेक नहीं करना चाहिए। समय को अपना जादू दिखाने दीजिए।

बाजार की मनोविज्ञान: भीड़ के साथ मत चलिए

ज़्यादातर नए निवेशक भीड़ के प्रभाव में आ जाते हैं। जब सब कहते हैं “मार्केट हाई पर है, अभी मत खरीदो,” या “अब तो सब गिर गया, सब बेच दो,” तो वे उसी के मुताबिक फैसला लेते हैं।

वॉरेन बफेट ने कहा था – “Be fearful when others are greedy, and be greedy when others are fearful.” यानी जब सब लालच में खरीद रहे हों तब सावधान रहो, और जब सब डर रहे हों तब मौके तलाशो।

निवेश और अध्यात्म का रिश्ता

आपने बिल्कुल सही कहा—“यह बात अध्यात्म भी कहती है।” अध्यात्म हमें सिखाता है कि परिणामों के बजाय कर्म पर ध्यान दो।

भगवद्गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं – “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” यानी तुम्हारा अधिकार सिर्फ़ कर्म करने पर है, फल पर नहीं।
निवेश भी इसी सिद्धांत पर चलता है। अगर हम लगातार अनुशासन के साथ निवेश करते रहें, तो मार्केट के उतार-चढ़ाव का असर अंततः खत्म हो जाता है, और दीर्घकाल में परिणाम अपने आप बेहतर होता है।

बिना मार्गदर्शन के निवेश का जोखिम

आज बहुत से युवा “डायरेक्ट प्लेटफॉर्म” पर निवेश कर रहे हैं—क्योंकि वहाँ कोई कमीशन नहीं, सब कुछ “डायरेक्ट” है। यह अच्छी बात है कि लोग जागरूक हो रहे हैं, लेकिन समस्याएँ तभी शुरू होती हैं जब जानकारी अधूरी होती है।

डायरेक्ट प्लेटफॉर्म घोड़े की तरह हैं—अगर आप जानकार हैं, तो वो आपको मंज़िल तक ले जाएंगे, लेकिन अगर आप अनुभवहीन हैं, तो वही घोड़ा आपको गिरा भी सकता है।

म्यूच्युअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर या रजिस्टर्ड इन्वेस्टमेंट एडवाइज़र एक “guide” की तरह काम करता है। वो न सिर्फ़ सही स्कीम चुनने में मदद करता है, बल्कि मार्केट की अस्थिरता में आपके मनोबल को भी संभालता है। एक सलाहकार आपके लिए वो करता है जो जिम का ट्रेनर आपके शरीर के लिए करता है—सही दिशा, अनुशासन और प्रेरणा।

निवेश के तीन स्तंभ: लक्ष्य, समय और जोखिम

  1. लक्ष्य (Goal):
    सबसे पहले तय करें कि आप निवेश क्यों कर रहे हैं—रिटायरमेंट, बच्चों की पढ़ाई, या घर खरीदने के लिए? लक्ष्य साफ़ होगा तो निवेश की दिशा भी साफ़ होगी।
  2. समय (Time Horizon):
    जितना लंबा समय, उतना ज़्यादा फायदा। दस साल से ज़्यादा की निवेश अवधि में इक्विटी का जोखिम काफी कम हो जाता है।
  3. जोखिम (Risk Tolerance):
    हर व्यक्ति का जोखिम सहने का स्तर अलग होता है। किसी को 10% गिरावट में नींद उड़ जाती है, तो किसी को 30% गिरावट भी परेशान नहीं करती। अपने जोखिम प्रोफाइल के अनुसार निवेश रणनीति बनाएं।

SIP – छोटा कदम, बड़ा बदलाव

Systematic Investment Plan (SIP) एक ऐसी आदत है जो समय के साथ बड़ा बदलाव लाती है। SIP से आप हर महीने एक निश्चित राशि म्यूच्युअल फंड में निवेश करके “रुपया-लागत औसत” (Rupee Cost Averaging) का लाभ उठाते हैं।

जब मार्केट नीचे जाता है, तब ज़्यादा यूनिट्स मिलती हैं, और जब ऊपर जाता है, तब कम। इस तरह औसत लागत पर रिटर्न स्थिर रहता है। SIP अनुशासन और नियमितता सिखाता है, जो निवेश में सबसे बड़ा हथियार है।

भावनाओं को नियंत्रण में रखें

निवेश का सबसे कठिन पहलू गणना नहीं, भावनाएँ होती हैं। डर और लालच – ये दोनों निवेशक के सबसे बड़े शत्रु हैं।

  • डर आपको गिरावट में बेचने पर मजबूर करता है।
  • लालच आपको तेजी में ओवरइन्वेस्ट करने पर मजबूर करता है।

संतुलन यही है कि आप अपने लक्ष्य और योजना पर टिके रहें, चाहे मार्केट कैसा भी हो।

ज्ञान ही शक्ति है

अब वक्त ऐसा है जब हर निवेशक को बुनियादी वित्तीय ज्ञान रखना चाहिए। “किस फंड में निवेश करें” से ज़्यादा जरूरी यह जानना है कि “क्यों करें और कितने समय के लिए करें।”

आप हर सलाह बिना समझे न मानें, बल्कि खुद पढ़ें, सीखें और सवाल पूछें।
विश्वसनीय स्रोत जैसे AMFI (Association of Mutual Funds in India) या SEBI के निवेशक शिक्षा पोर्टल अच्छे शुरुआती कदम हैं।

वास्तविक उदाहरण

मान लीजिए दो दोस्त हैं – राघव और निखिल।
राघव ने 2010 में हर महीने ₹5,000 का SIP शुरू किया और इसे 15 साल तक जारी रखा।
निखिल ने भी वही किया, लेकिन हर बार मार्केट गिरने पर उसने SIP बंद कर दी, और बढ़ने पर फिर शुरू की।

2025 तक राघव के निवेश की कीमत लगभग ₹25 लाख हो गई, जबकि निखिल का हुआ केवल ₹16 लाख। फर्क सिर्फ़ “अनुशासन” का था।

निष्कर्ष: यात्रा मंज़िल से बड़ी है

निवेश की दुनिया में लक्ष्य जरूरी है, लेकिन यात्रा उससे भी ज़रूरी। यह यात्रा हमें धैर्य, अनुशासन, और आत्मनियंत्रण सिखाती है।
हर उतार-चढ़ाव हमें मजबूत बनाता है। अगर हम इस यात्रा में एक मार्गदर्शक—एक म्यूच्युअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर या सलाहकार—के साथ चलें, तो गलतियों की संभावना कम हो जाती है।

कभी-कभी घोड़ा खुद चलाने की बजाय किसी अनुभवी जॉकी को लगाना ही समझदारी है। डायरेक्ट प्लेटफॉर्म पर निवेश तभी करें जब आपके पास ज्ञान, समय और धैर्य तीनों हों, वरना बेहतर है कि अनुभवी सलाहकार की मदद लें।


अंत में याद रखिए:
निवेश सिर्फ़ पैसे बढ़ाने की कला नहीं, बल्कि मन को स्थिर रखने की साधना है।
बाज़ार के शोर में अपनी दिशा न खोएँ। दीर्घकालिक दृष्टि, अनुशासन और मार्गदर्शन—यही आपकी सफलता की सच्ची कुंजी है।


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