श्राद्ध: भूखे को भोजन ही सच्चा तर्पण,यमुना बाढ़ में समोसे बांटने का अनुभव

श्राद्ध के समय दान और भोजन वितरण का विशेष महत्व है। इस पावन अवसर पर जब कोई जरूरतमंद, असहाय और बेघर व्यक्ति प्रसाद स्वरूप भोजन पाता है तो न केवल उनका पेट भरता है बल्कि उनके भीतर जीने की आशा और विश्वास भी जागता है। हाल ही में जब यमुना में बाढ़ आई और अनेक परिवारों को अपना घर-बार छोड़कर सड़कों और हाईवे पर खुले आसमान के नीचे पन्नियों और तातों के सहारे रहने को मजबूर होना पड़ा, तब हमने एक संकल्प लिया कि इन लोगों तक श्रद्धा और सेवा का संदेश भोजन वितरण के माध्यम से पहुँचाया जाए।

इस सेवा कार्य की शुरुआत हमने समोसे बाँटकर की। प्रारंभ में लोगों को पंक्ति में खड़ा कर सावधानीपूर्वक भोजन वितरण किया गया। लेकिन धीरे-धीरे भीड़ बढ़ी और बेसब्र लोग लाइन तोड़कर आगे-पीछे से समोसे लेने लगे। कुछ जगहों पर छीना-झपटी भी होने लगी। आरंभ में यह दृश्य देखकर लगा कि क्या लोग धैर्य नहीं रख सकते? क्या वे थोड़ी देर इंतजार नहीं कर सकते? परंतु जब गहराई से सोचा तो समझ में आया कि यह उनकी गलती नहीं बल्कि परिस्थितियों की मजबूरी है।

कई दिनों से खुले आसमान के नीचे जलते सूर्य की तपिश सहते हुए, भूखे-प्यासे अपनी छत से वंचित होकर जीने की पीड़ा झेलते हुए, वे लोग किसी भी तरह अपने बच्चों और परिवार के लिए भोजन पा जाना चाहते थे। अगर हम खुद उनकी जगह होते तो शायद हमारा भी यही स्वभाव हो जाता। इस अनुभव ने हमें करुणा और सहअस्तित्व का बड़ा संदेश दिया।


श्राद्ध और सेवा का संबंध

श्राद्ध केवल पितरों का तर्पण नहीं, बल्कि जीवित प्राणियों की सेवा का भी अदृश्य मार्ग है। शास्त्रों में कहा गया है – “भूखे को अन्न देना ही देवता को प्रसाद अर्पित करने के समान है।” जब हम जरूरतमंदों को भोजन कराते हैं तो वास्तव में यह हमारे पूर्वजों की आत्मा के लिए पुण्य का संचय होता है। यही कारण है कि समाज में श्राद्ध के अवसर पर गरीबों, भिखारियों और असहाय लोगों को भोजन कराने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।


बाढ़ पीड़ितों की विडंबना

यमुना की बाढ़ ने हजारों परिवारों को न केवल उनके घरों से बेदखल कर दिया बल्कि उन्हें सड़क, पुल और राजमार्गों पर धूप-बारिश में अस्थायी रूप से रहने के लिए मजबूर कर दिया।

  • घर का सुरक्षा कवच छिन जाना
  • रोजगार और जीविका छूट जाना
  • बच्चों और बुजुर्गों के सामने भूख की समस्या
  • अस्वच्छ माहौल और बीमारियों का खतरा

इन कठिनाइयों के बीच जब एक साधारण सा समोसा भी उन्हें मिलता है, तो वह उनके लिए महाभोज जैसा महत्व रखता है।


सेवा कार्य में आने वाली चुनौतियाँ

भोजन वितरण के दौरान सामने आई वास्तविक चुनौतियाँ यह सिखाती हैं कि सेवा महज़ भाव नहीं, बल्कि एक सुविचारित व्यवस्था भी है।

  • लंबी कतारें बनवाना कठिन हो जाता है।
  • बच्चों और महिलाओं को सुरक्षित ढंग से भोजन उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण बनता है।
  • भोजन सीमित हो और भीड़ अधिक, तो झगड़े की स्थिति पैदा होती है।
  • धैर्य की कमी, भूख और गर्मी लोगों को असहज कर देती है।

समाधान की दिशा में प्रयास

इन अनुभवों से सीखा जा सकता है कि सेवा कार्यों को और अधिक व्यवस्थित ढंग से कैसे किया जाए।

  • भोजन वितरण से पहले आवश्यक वस्तुओं (पानी, सूखा अनाज, फल आदि) की पर्याप्त व्यवस्था।
  • स्वयंसेवकों की टीम बनाना ताकि भीड़ को संभाला जा सके।
  • बच्चों व बुजुर्गों के लिए अलग कतार और प्राथमिकता।
  • भोजन का पर्याप्त भंडार तैयार करके वितरण करना।
  • प्रत्येक परिवार को उनकी आवश्यकता अनुसार बाँटने की प्रणाली अपनाना।

करुणा और सहानुभूति का संदेश

जब हम जरूरतमंदों को भोजन कराते हैं, तो यह केवल पेट भरने का उपाय नहीं बल्कि उनके मन को भी संबल देने का माध्यम बनता है। भूख इंसान से धैर्य छीन लेती है और मजबूरी उसे असामान्य व्यवहार की ओर ले जाती है। सेवा के इस अवसर से हमें सीख मिली कि हमें केवल भोजन नहीं बांटना, बल्कि इसे इस ढंग से करना है कि किसी को अपमानित या वंचित महसूस न हो।

भगवान से प्रार्थना है कि इन लोगों को साहस और शक्ति मिले, इन्हें मजबूती मिले और इनकी बुद्धि शुद्ध रहे ताकि ये फिर से आत्मनिर्भर जीवन जी सकें। साथ ही हमारा भी कर्तव्य है कि हम हर संभव सहयोग करें।

श्राद्ध काल सेवा और दान का सर्वश्रेष्ठ समय है। यह केवल एक धार्मिक कर्तव्य नहीं बल्कि मानवता की सबसे बड़ी परीक्षा है। यही समय है जब हम समाज के सबसे निचले तबके तक पहुँचकर उन्हें यह एहसास दिला सकते हैं कि वे अकेले नहीं हैं

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