महर्षि वाल्मीकि (भक्तमाल)

राधे राधे।

महर्षि वाल्मीकि (भक्तमाल)

श्रीरामकथाका गुणगान करनेवाले महर्षि वाल्मीकिजीका पावन चरित संक्षेपमें इस प्रकार है-

राम त्वन्नाममहिमा वर्ण्यते केन वा कथम् ।

यत्प्रभावादहं राम ब्रह्मर्षित्वमवाप्तवान् ।। *

* हे रामजी ! तुम्हारे नामकी महिमाको कौन कह सकता है, जिसके प्रभावसे मैंने ब्रह्मर्षिपद प्राप्त कर लिया!

भगवन्नामके जपसे मनुष्य क्या-से-क्या हो सकता है, इसके ज्वलन्त उदाहरण भगवान्

वाल्मीकि हैं! इनका जन्म तो अंगिरागोत्रके ब्राह्मणकुलमें हुआ था, किन्तु डाकुओंके संसर्गमें

रहकर ये लूट मार और हत्याएँ करने लगे। जो भी आता उसीको लूटते और कोई कुछ कहता तो

उसे जानसे मार देते। इस प्रकार बहुत वर्षोंतक ये इस लोकनिन्दित क्रूर कर्मको करते रहे।

इस संसारचक्रमें घूमते-घूमते जब जीवके उद्धार होनेके दिन आते हैं, तब उसे साधुसंगति प्राप्त होती है। जिसे भगवत्कृपासे साधुसंगति प्राप्त हो गयी और साधु-सन्त उसपर अहैतुकी कृपा करने लगे तब समझना चाहिये कि अब इसके उद्धारका समय आ गया। वाल्मीकिजीके भी उद्धारके दिन आ गये। एक दिन उन्होंने देखा उधरसे नारदजी चले आ रहे हैं। उन्हें देखते ही ये उनके ऊपर झपटे और बोले-‘जो कुछ है उसे रख दो, नहीं तो जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा।’

नारदजीने बड़े ही कोमल स्वरमें हँसते-हँसते कहा- ‘हमारे पास और है ही क्या? यह वीणा है, एक वस्त्र है; इसे लेना चाहो तो ले लो, जानसे क्यों मारते हो ?’

वाल्मीकिजीने कहा- ‘वीणाका क्या करते हो, थोड़ा गाकर सुनाओ।’ नारदजीने मधुर स्वरसे भगवान्‌के त्रैलोक्यपावन नामोंका कीर्तन किया। कीर्तन सुनकर वाल्मीकिका हृदय पसीजा। कठोर हृदयमें दयाका संचार हुआ और चित्तमें कुछ कोमलता आयी। देवर्षिने कृपावश उनसे कहा -‘तुम व्यर्थमें जीवहिंसा क्यों करते हो ? प्राणियोंके वधके समान कोई दूसरा पाप नहीं है।’ यह सुनकर वाल्मीकिजीने कहा- ‘भगवन्! मेरा परिवार बड़ा है, उनकी आजीविकाका दूसरा कोई प्रबन्ध नहीं। वे सब मेरे सुख-दुःखके साथी हैं, उनका भरण-पोषण मुझे करना होता है; यदि मैं लूटपाट न करूँ तो वे क्या खायँ?’ नारदजीने कहा- ‘तुम जाकर अपने परिवारवालोंसे पूछो कि वे खानेके ही साथी हैं या तुम्हारे पापमें भी हिस्सा बँटायेंगे।’

मनमें कुछ दुविधा हो गयी, इन्होंने समझा कि ये महात्मा इस प्रकार बहाना बनाकर भागना चाहते हैं। उनके मनकी बात जानकर सर्वज्ञ ऋषि बोले- ‘तुम विश्वास करो कि तुम्हारे लौटनेतक हम कहीं भी न जायँगे, इतनेपर भी तुम्हें संतोष न हो तो तुम हमें इस पेड़से बाँध दो।’ यह बात इनके मनमें बैठ गयी। देवर्षिको एक पेड़से बाँधकर ये घर चले गये और वहाँ जाकर अपने माता- पिता, स्त्री तथा कुटुम्बियोंसे पूछा- ‘तुम हमारे पापके हिस्सेदार हो या नहीं?’ सभीने एक स्वरसे कहा- ‘हमें खिलाना-पिलाना तुम्हारा कर्तव्य है। हम क्या जानें कि तुम किस प्रकार धन लाते हो, हम तुम्हारे पापोंके हिस्सेदार नहीं।’

जिनके लिये वे निर्दयतासे प्राणियोंका वध करते रहे, उनका ऐसा उत्तर सुनकर वाल्मीकिजीके ज्ञाननेत्र खुल गये। जल्दीसे जंगलमें आकर मुनिका बन्धन खोला और रोते-रोते उनके चरणोंमें लिपट गये। महर्षिके चरणोंमें पड़कर वे खूब जी खोलकर रोये। उस रुदनमें गहरा पश्चात्ताप था। नारदजीने उन्हें धैर्य बँधाया और कहा-‘अबतक जो हुआ सो हुआ, अब यदि तुम हृदयसेपश्चात्ताप करते हो तो मेरे पास राम नामरूप एक ऐसा मन्त्र है, जिसके निरन्तर जपसे तुम सभी पापोंसे छूट जाओगे। इस नामके जपमें ऐसी शक्ति है कि वह किसी प्रकार भी जपा जाय पापोंको नाश कर देता है।’ अत्यन्त दीनताके साथ वाल्मीकिजीने कहा- ‘भगवन् ! पापोंके कारण यह नाम तो मेरे ओठोंसे निकलता नहीं, अतः मुझे कोई ऐसा नाम बताइये, जिसे मैं सरलतासे ले सकूँ।’ तब नारदजीने बहुत समझ सोचकर रामनामको उलटा करके ‘मरा-मरा’ का उपदेश दिया। निरन्तर ‘मरा-मरा’ कहनेसे अपने-आप ‘राम-राम’ हो जाता है।

देवर्षिका उपदेश पाकर वे निरन्तर एकाग्रचित्तसे ‘मरा-मरा’ जपने लगे। हजारों वर्षोंतक एक ही जगह बैठकर वे नामकी रटनमें निमग्न हो गये। उनके सम्पूर्ण शरीरपर दीमकका पहाड़-सा जम गया। दीमकोंके घरको वल्मीक कहते हैं, उसमें रहनेके कारण ही इनका नाम वाल्मीकि पड़ा। पहले इनका नाम रत्नाकर था। ये ही संसारमें लौकिक छन्दोंके आदिकवि हुए, इन्होंने ही श्रीवाल्मीकीय रामायण आदिकाव्यकी रचना की। वनवासके समय भगवान् स्वयं इनके आश्रमपर गये थे। सीताजीने भी अपने अन्तिम वनवासके दिन इन्हीं महर्षिके आश्रममें बिताये थे। वहींपर लव और कुशका जन्म हुआ। सर्वप्रथम लव और कुशको ही श्रीरामायणका गान सिखाया गया। इस प्रकार निरन्तर रामनामके जपके प्रभावसे वाल्मीकिजी व्याधकी वृत्तिसे हटकर ब्रह्मर्षि हो गये। इसीलिये नाममहिमामें गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है-

जान आदिकबि नाम प्रतापू।

भयउ सुद्ध करि उलटा जापू ॥

उलटा नामु जपत जगु जाना।

बालमीकि भए ब्रह्म समाना ॥

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