सन्तका मिलना ही बड़ा दुर्लभ है, पर वे यदि मिल गये तो काम बन गया-द्वितीय माला

द्वितीय माला

१-सन्त सबकी भलाई करें, केवल इतनी ही बात नहीं है। सन्तों में ऐसी शक्ति होती है कि उस शक्तिके संस्पर्शमें जो भी आ गया, उसका परम कल्याण हो जाता है; चाहे उसे यह मालूम हो या न हो।

२-सन्तका मिलना ही बड़ा दुर्लभ है, पर वे यदि मिल गये तो काम बन गया। उनके वस्तु-गुणसे ही काम बन जाता है। श्रद्धा होनेपर काम हो, इसमें कौन बड़ी बात है।

३-अमृतका संस्पर्श हुआ कि अमर हुए, उसी प्रकार किसी तरहसे भी सन्त-संस्पर्श हो गया तो कल्याण हो ही गया। सन्तको न पहचानकर भी उनकी सेवा करनेसे, उनके दर्शनसे कल्याण तो होता ही है, उनकी अवज्ञातक करने जाकर उनके संस्पर्शमें आनेका फल भी अन्तमें कल्याण ही है। नलकूबर और मणिग्रीव देवर्षि नारदजीकी अवज्ञा करके भी भगवान्‌को पा गये।

४- श्रीमद्भागवतमें कहा गया है-

तुलयाम लवेनापि न स्वर्ग नापुनर्भवम् । भगवत्संगिसंगस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ॥

– एक ओर पार्थिव भोग, स्वर्ग और मोक्ष तथा दूसरी ओर सन्तके संगका एक क्षण; यह तुलना भी नहीं होती; ऐसा दुर्लभ सन्तोंका संग होता है।

५-सन्तका दर्शन होनेके लिये भगवान्‌की कृपा अपेक्षित है और सन्त-दर्शन होनेपर ही भगवान्‌की अनुभूति होती है।

६- ‘बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।’ भगवान्‌की कृपा हुए बिना सन्तका दर्शन नहीं होता।

७-सन्त और भगवान्में भेद नहीं है, नारदजीने यह बात कही है।

‘ तस्मिंस्तज्ञ्जने भेदाभावात्।’

८-‘भक्ति भक्त भगवंत गुरु, चतुर नाम बपु एक।’ यह है सन्तकी महिमा।

९-जिसके मनमें सच्चे सन्तसे मिलनेकी इच्छा हो, वह भगवान्से प्रार्थना करे और जो भगवान्‌की प्राप्ति चाहता हो, वह सन्तका सेवन करे।

१०-सन्तके द्वारा ही भगवान्‌का माहात्म्य, स्वरूप, गुण, लीला आदि सुननेको मिल सकते हैं। इन सबका रहस्य जाननेके लिये सन्तके सिवा और कोई दूसरा उपाय नहीं है।

११-भगवान्से प्रार्थना करनी चाहिये कि हमें सन्त मिलें और सन्त मिलनेपर उनसे प्रार्थना करे कि ‘आपको जो प्रिय-से-प्रिय वस्तु है, वही हमें भी प्राप्त हो।’ नरसीजीने भगवान् शंकरको प्राप्त कर लेनेपर उनसे यह कहा था कि ‘आपको जो सबसे प्रिय-से-प्रिय दुर्लभ वस्तु हो, उसीकी प्राप्ति हमें करा दें।’ (तमने जे वल्लभ होय जे दुर्लभ, आपो रे प्रभुजी मुने दया रे आणी।) संक्षेपमें नरसीजीकी कथा इस प्रकार है-नरसीजी कीर्तनके बड़े प्रेमी थे, घरपर देरसे लौटते थे; भौजाई कटु स्वभावकी थी, एक दिन बोली- ‘क्यों बड़े भक्त बने हो, भक्त हो तो भगवान्से क्यों नहीं मिलते ?’ नरसीजी बस, उसी समय घरसे निकल पड़े और एक शिवमन्दिरमें जाकर धरना दे दिया। चौदह दिन-रातके बाद शिवजीने दर्शन दिये। नरसीजीने उनसे प्रार्थना की और शिवजी उन्हें गोलोकधाममें ले गये। नरसीजीने वहाँ श्रीराधा-कृष्णकी दिव्य लीलाओंका दर्शन किया। इस अनुभवका स्वयं नरसीजीने अपने ग्रन्थमें वर्णन किया है।

१२-शिव एवं विष्णुमें अन्तर नहीं है, लीलाके लिये एक ही भगवान् शिव एवं विष्णु बने हुए हैं।

१३-भक्त भगवान्के प्रेमकी चर्चामें ही रमता है, मोक्ष उसे नहीं सुहाता। इस प्रकार भगवत्प्रेमको अपना सार-सर्वस्व बना लेनेवाले सन्तके कहीं दर्शन हो जायें तो फिर आनन्दका क्या कहना।

१४-सन्त मिलते हैं भगवत्कृपासे और पूर्ण भगवत्कृपा सबपर सदा है ही; बस, विश्वासकी कमी है, इसलिये सारा दुःख है।

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