दर्शकों को बहुत पसंद आ रही फिल्म ‘हनुमान अंश’ की सफलता को लेकर मीडिया में सुनने और पढ़ने को मिल रहा है कि सिर्फ 2 करोड़ की लागत से बनी फिल्म ने डेढ़ सौ करोड रुपए का कारोबार कर लिया।
एक बड़े रसिक संत पर बने सिनेमा की सफलता का पैमाना यही है कि इस पर क्या लागत आई थी और इसने कितना कमाया। दूसरा फिल्म में दिखाए गए संत जी के चमत्कारों पर ही शायद लोगों की ज्यादा दिलचस्पी है। मैंने फिल्म नहीं देखी लेकिन संत जी के चमत्कारों पर ज्यादा बातें सुनने को मिल रही है। इन दोनों बिंदुओं के अलावा बड़े और महान संत जी के जीवन, प्रवचन और अध्यात्म पर चर्चा सुनने को नहीं मिल रही है। यह मेरा निजी मत है कि फिल्म चाहे कितने कम रुपयों में बनी हो और चाहे उसने कितने करोड़ कमाए हो, चर्चा इस पर नहीं होनी चाहिए।
चर्चा संत जी के द्वारा बताए गए जीवन जीने के मार्ग पर होनी चाहिए। फिल्म को लेकर अखबार, मनोरंजन टीवी चैनल, न्यूज़ चैनल और सोशल मीडिया पर जो चर्चा हो तो बिंदु संत जी के द्वारा बताए गए अध्यात्म पर ही होनी चाहिए। संत जी एक सिद्ध संत थे। उनके प्रवचन, जीवन शैली और आध्यात्मिक ज्ञान से लोगों का जीवन सुंदर हो सकता है। हम संत जी के जीवन से जुड़े स्थलों पर भी जाएं तो आध्यात्मिक दृष्टि से ही कुछ सीखने समझने और उसे जीवन में अपनाने के मकसद से जाएं। हमें अपनी सांसारिक जरूरतों के लिए ऐसे स्थलों पर जाना नहीं चाहिए।
कुछ समय पहले यूट्यूब पर एक संत जी ने महान ग्रंथ भक्तमाल के आधार पर बड़े महापुरुषों के जीवन को बहुत खूबसुरती से पर्दे पर परोसा था। संत तुलसीदास जी, नाभा जी, संत निम्बार्क जी समेत बड़े महापुरुषों के जीवन के असल अध्यात्म को लोगों तक पहुंचाने की बहुत सुंदर कोशिश की थी। इस सीरीज का नाम था भक्तमाल गाथा। पर दुर्भाग्य से यह सीरीज कुछ ही संतों पर कार्यक्रम पेश कर पाई और बीच में बंद हो गई, क्योंकि संत जी के पास इसे चलाने के लिए और पैसे नहीं थे। सीरीज में संतों के बताए गए आम लोगों के लिए आध्यात्मिक सूत्र बहुत काम के थे। यूट्यूब पर यह सीरीज बिल्कुल मुफ्त में पेश की गई इसे देखने के लिए कोई टिकट या सब्सक्रिप्शन की जरूरत नहीं है। काफी लोगों ने इस सीरीज को पसंद किया और देखा भी पर इस पर चर्चा ज्यादा आगे बढ़ी नहीं।
आज के समय में यही दिक्कत है कि शुद्ध अध्यात्म की बातें समझ नहीं आती और करोड़ों रुपए की कमाई व चमत्कार पर खूब चर्चा होती है। पर यह सब बातें भी कुछ समय तक याद रहती हैं और इसके बाद में मीडिया और लोग सब भूल जाते हैं। करोड़ों के बिजनेस, लोकप्रियता और चमत्कार के बजाय अध्यात्म पर चर्चा आगे बढ़नी चाहिए और सतत निरंतर होनी चाहिए।








