घर खरीदना समझदारी है या सबसे बड़ी भूल?

घर खरीदना ज़िंदगी का सबसे बड़ा सपना भी हो सकता है और गलत प्लानिंग हो तो सबसे बड़ा बोझ भी बन सकता है। इस ब्लॉग में हम आसान, रोज़मर्रा की भाषा में समझेंगे कि घर खरीदना हमेशा समझदारी है या कभी–कभी यह हमारी सबसे बड़ी भूल भी साबित हो सकती है।


लोग घर क्यों खरीदते हैं? असली वजहें

ज़्यादातर भारतीय घर सिर्फ ज़रूरत की वजह से नहीं, बल्कि भावनाओं और समाज के दबाव की वजह से खरीदते हैं। अक्सर फैसला दिमाग से कम और दिल व आसपास के लोगों की बातों से ज़्यादा होता है।

कुछ आम वजहें:

  • “अपना घर होना चाहिए, तभी इज़्ज़त है” – यह सबसे आम लाइन है जो हम सुनते–सुनते मान भी लेते हैं।bajajfinserv+1
  • शादी के बाद घरवालों का दबाव – “अब बच्चा हो गया, अब तो घर ले लो” वाली सोच।[podcasts.aajtak]​
  • दूसरों को देखकर – दोस्त, रिश्तेदार, दफ़्तर के साथी घर खरीद लेते हैं तो हमें भी लगता है कि अब हमें भी ले लेना चाहिए, वरना हम पीछे रह जाएंगे।[podcasts.aajtak]​
  • रेंट से चिढ़ – हर महीने किराया देने में कई लोगों को लगता है कि “यही EMI दे दूंगा तो अपना घर हो जाएगा।”[abplive]​
  • सुरक्षा और स्थिरता की भावना – अपना घर होने से एक अलग तरह की पहचान, गर्व और सिक्योरिटी महसूस होती है।[bajajfinserv]​

समस्या तब शुरू होती है जब ये सारी वजहें मिलकर हमें जल्दबाज़ी में ऐसा बड़ा फैसला लेने पर मजबूर कर देती हैं जो हमारी जेब पर भारी पड़ सकता है।[podcasts.aajtak]​


Emotional Buying क्या है? दिल से लिया फैसला, दिमाग की कीमत

Emotional buying का मतलब है, जब आप घर जैसा बड़ा फ़ैसला ज़्यादा भावुकता, डर और दबाव में ले लेते हैं, बजाय ठंडी दिमाग से गणित देखकर। भारत में प्रॉपर्टी में emotional buying बहुत आम है, और बिल्डर व बैंक भी इस भावना को अच्छी तरह समझते और इस्तेमाल करते हैं।bajajfinserv+1

कुछ इमोशन्स जो हमें गलत दिशा में ले जाते हैं:

  • FOMO – “आज नहीं लिया तो कभी घर नहीं ले पाऊंगा”, इस डर में लोग बिना पूरा सोचे–समझे बुकिंग कर देते हैं।[podcasts.aajtak]​
  • Status की चिंता – “अगर अपना फ्लैट नहीं है तो लोग क्या कहेंगे” वाली सोच।[youtube]​
  • परिवार को खुश करने की चाह – कई लोग माता–पिता या पार्टनर को खुश करने के लिए अपनी क्षमता से ज़्यादा बड़ा लोन ले लेते हैं।[podcasts.aajtak]​
  • बच्चों का भविष्य – “बच्चों के लिए घर छोड़कर जाना है” सुनने में अच्छा लगता है, पर अगर EMI की वजह से पूरी ज़िंदगी आर्थिक तनाव में गुजर जाए तो क्या ये सच में फ़ायदा है?[podcasts.aajtak]​

Emotional buying की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि उस समय हम सिर्फ सपने देखते हैं, EMI, इंटरेस्ट, मेंटेनेंस, रिस्क – ये सब पीछे छूट जाता है।bajajfinserv+1


बिल्डर कैसे आपकी भावनाओं को बेचते हैं?

आजकल ज्यादातर प्रोजेक्ट्स में असली प्रोडक्ट “ईंट–सीमेंट” से ज़्यादा सपने होते हैं। मार्केटिंग इस तरह की जाती है कि आपको लगे, अगर आपने ये प्रोजेक्ट मिस किया तो ज़िंदगी का मौका मिस हो गया।youtube+1

बिल्डर और मार्केटिंग की कुछ आम ट्रिक्स:

  • “अपना घर, अपनी पहचान” जैसे स्लोगन – ये आपकी अहम और इज़्ज़त वाली भावना पर खेलते हैं।[bajajfinserv]​
  • शो–फ्लैट – AC, महंगे फ़र्नीचर, रोशनी, डेकोरेशन; असल में आपका फ्लैट वैसा नहीं मिलने वाला, लेकिन आपको वहीं लाइफ़स्टाइल का सपना दिखाया जाता है।[podcasts.aajtak]​
  • लिमिटेड टाइम ऑफर – “सिर्फ इस वीकेंड इतना डिस्काउंट”, “अभी बुक करो, फ्री पार्किंग”, जिससे आप बिना सोच–समझे तुरंत टोकन दे दें।[podcasts.aajtak]​
  • परिवार वाली इमेज – विज्ञापनों में खुश बच्चे, बाग में खेलते बुज़ुर्ग, जिम, पूल, क्लबहाउस – सब कुछ इतना परफ़ेक्ट दिखाया जाता है कि आप बस सोचते हैं, “यही चाहिए।”[youtube]​

असल सवाल ये नहीं है कि प्रोजेक्ट सुंदर दिख रहा है या नहीं, असल सवाल है: “क्या ये प्रॉपर्टी मेरी फाइनेंशियल स्थिति, ज़रूरत और लॉन्ग–टर्म प्लान के हिसाब से सही है या नहीं?”[podcasts.aajtak]​


अपना घर बनाम किराए का घर: क्या सच में EMI हमेशा बेहतर है?

सबसे बड़ा कन्फ्यूज़न यही है – किराया देना बेकार है या EMI ज़्यादा समझदारी है? इसका जवाब हर इंसान के लिए अलग–अलग हो सकता है, लेकिन कुछ बेसिक बातें हर किसी को समझनी चाहिए।[abplive]​

EMI और किराए की सच्चाई

  • EMI अक्सर किराए से कहीं ज़्यादा होती है, खासकर मेट्रो और बड़े शहरों में।[abplive]​
  • EMI सिर्फ प्रिंसिपल नहीं, उस पर सालों–साल ब्याज भी देना पड़ता है; कई केस में 20–25 साल के लोन में आप घर की कीमत से दोगुना तक पैसा बैंक को दे देते हैं।[abplive]​
  • किराए पर रहने से आपको फ्लेक्सिबिलिटी मिलती है – नौकरी बदली, शहर बदला तो आसानी से मूव हो सकते हैं, प्रॉपर्टी बेचने–खरीदने की झंझट नहीं।[abplive]​
  • किराये वाले घर में भी आप अच्छी लोकेशन, बेहतर स्कूल, ऑफिस के पास इलाका चुन सकते हैं, जो शायद खरीदने की क्षमता से बाहर हो।[abplive]​

कई एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर वही EMI जितना पैसा आप डिसिप्लिन से अच्छे म्यूचुअल फंड्स या दूसरे ग्रोथ एसेट्स में लगाएं, तो लंबी अवधि में आपकी नेटवर्थ ज़्यादा तेज़ी से बढ़ सकती है।[abplive]​


घर Asset है या सिर्फ Status Symbol?

बहुत लोगों के लिए घर वित्तीय एसेट से ज्यादा एक स्टेटस सिंबल बन चुका है। सोच ये हो गई है कि “3BHK अपना होना चाहिए, चाहे EMI से कमर टूट जाए।”[youtube]​

आपको खुद से ये सवाल ज़रूर पूछने चाहिए:

  • क्या ये घर मेरे लिए कैश–फ्लो पॉज़िटिव है या सिर्फ “दिखाने” के लिए है?
  • क्या मैं इस घर से किराया कमा पाऊंगा या सिर्फ खुद रहने वाला हूं?
  • अगर मैं यही पैसा कहीं और इन्वेस्ट करूं तो क्या रिटर्न ज़्यादा मिल सकता है?

जहां आप खुद रहते हैं, वो घर कई बार भावनात्मक एसेट होता है, फाइनेंशियल एसेट कम। यानी उसे बेचकर प्रॉफिट कमाने की सोच कम, उसमें रहने की शांति ज़्यादा मायने रखती है। लेकिन अगर स्टेटस दिखाने के चक्कर में आप इतनी बड़ी EMI ले लेते हैं कि बाकी ज़िंदगी की आवश्यकताएं कॉम्प्रोमाइज़ हों, तो ये एसेट से ज़्यादा बोझ बन सकता है।youtube+1


घर खरीदने से पहले खुद से पूछने वाले ज़रूरी सवाल

भावनात्मक नहीं, प्रैक्टिकल सवाल पूछना ज़रूरी है। घर की बुकिंग करने से पहले एक–एक पॉइंट पर खुद से ईमानदारी से जवाब लें।[podcasts.aajtak]​

  1. क्या सच में अभी ज़रूरत है?
    • क्या किराए पर रहकर भी आप आराम से, सुरक्षित और सम्मान के साथ जी रहे हैं?
    • क्या नौकरी/बिज़नेस स्थिर है या अभी रिस्क ज़्यादा है?
  2. EMI आपकी इनकम का कितना प्रतिशत है?
    • कोशिश करें कि कुल EMI (सिर्फ होम लोन नहीं, बाकी लोन भी) आपकी नेट इनकम के 30–35% से ज्यादा न हो।
    • अगर EMI 50–60% तक चली गई तो बाकी ज़रूरी खर्च, बच्चों की पढ़ाई, हेल्थ इमरजेंसी, रिटायरमेंट सब दांव पर लग जाते हैं।
  3. Emergency Fund है या नहीं?
    • कम से कम 6–12 महीने के खर्च के बराबर इमरजेंसी फंड होना ज़रूरी है, खासकर होम लोन लेने से पहले।
    • नौकरी चली जाए या बिज़नेस में दिक्कत आए तो कुछ महीने EMI जारी रखने लायक बफर होना चाहिए।
  4. लोकेशन और क्वालिटी पर कितना भरोसा है?
    • सिर्फ “सस्ता मिल रहा है” देख कर न लें, आस–पास की डेवलपमेंट, कनेक्टिविटी, पानी, बिजली, मार्केट, स्कूल सब देखें।[podcasts.aajtak]​
    • बिल्डर का ट्रैक रिकॉर्ड, समय पर प्रोजेक्ट डिलीवरी, लीगल क्लियरेंस, RERA आदि चेक करना भी ज़रूरी है।[podcasts.aajtak]​
  5. क्या आप 10–15 साल इस शहर में रहने वाले हैं?
    • अगर आपको ये खुद नहीं पता कि 5–7 साल बाद कहां होंगे, तो बहुत भारी EMI में फंसकर अपने आप को बाँध देना समझदारी नहीं।

समाज का दबाव बनाम आपकी जेब की सच्चाई

हमारे समाज में “किराये का घर” आज भी कई लोगों की नज़र में अधूरापन माना जाता है। रिश्तेदारों, पड़ोसियों, परिवार की बातों में अक्सर ये झलकता है – “अभी तक अपना घर नहीं लिया?”[podcasts.aajtak]​

लेकिन कोई भी एमआई आपकी जेब से जाएगी, उनके घर से नहीं।

  • समाज EMI नहीं भरेगा, आप भरेंगे।
  • समाज आपके बच्चों की फीस नहीं देगा, आप देंगे।
  • समाज आपकी रिटायरमेंट नहीं प्लान करेगा, आपको ही सोचना पड़ेगा।

इसलिए फैसला लेते समय सबसे ज़्यादा महत्व आपकी फाइनेंशियल स्थिति, आपकी प्राथमिकताओं और आपके लॉन्ग–टर्म गोल को देना चाहिए, न कि दूसरों की राय को।[podcasts.aajtak]​


गलत समय पर घर खरीदने के खतरे

घर लेना बुरा निर्णय नहीं है, गलत समय पर या गलत तरीके से घर लेना नुक़सानदायक है। अगर आपने बिना प्लानिंग के सिर्फ इमोशन में आकर बड़ा लोन ले लिया तो ये समस्याएं आ सकती हैं:[youtube]​[podcasts.aajtak]​

  • लिक्विडिटी की कमी – सारा पैसा डाउन पेमेंट और EMI में फंस गया, अब किसी अच्छे बिज़नेस, स्टॉक्स या म्यूचुअल फंड में इन्वेस्ट करने के लिए कुछ बचा ही नहीं।[podcasts.aajtak]​
  • कर्ज़–केंद्रित ज़िंदगी – हर महीने EMI का तनाव, नौकरी बदलने या रिस्क लेने का डर, फ़ाइनेंशियल फ़्रीडम दूर चली जाती है।[youtube]​
  • दूसरे गोल्स की कुर्बानी – बच्चों की हाई एजुकेशन, रिटायरमेंट, यात्रा, हेल्थ इंश्योरेंस – सब कम या लेट हो जाते हैं।[podcasts.aajtak]​
  • गलत प्रॉपर्टी में फँस जाना – गलत लोकेशन या खराब प्रोजेक्ट चुन लिया तो ना खुद आराम से रह पाते हैं, ना बेचकर निकलना आसान होता है।[youtube]​

कई लोग सालों बाद समझते हैं कि अगर वो थोड़ा और इंतज़ार कर लेते, पहले अपनी फाइनेंशियल बेस मज़बूत कर लेते, तो बाद में बेहतर लोकेशन और बेहतर प्रॉपर्टी अफोर्ड कर सकते थे।[podcasts.aajtak]​


कब घर खरीदना समझदारी मानी जा सकती है?

घर लेना अपने आप में गलत नहीं है, बस सही समय, सही प्रॉपर्टी और सही लोन स्ट्रक्चर चुनना ज़रूरी है।abplive+1

आमतौर पर ये स्थितियाँ घर लेने के लिए ज़्यादा हेल्दी मानी जा सकती हैं:

  • आपकी इनकम स्थिर है, कम से कम 3–5 साल से एक स्थिर करियर या बिज़नेस चल रहा है।
  • कुल EMI आपकी नेट इनकम के 30–35% के अंदर है, जिससे बाकी गोल्स (इंवेस्टमेंट, इंश्योरेंस, बच्चों की पढ़ाई, रिटायरमेंट) भी आराम से चल रहे हैं।
  • आपका इमरजेंसी फंड तैयार है, कम से कम 6–12 महीने का खर्च साइड में रखा हुआ है।
  • आप उस शहर/लोकेशन में कम से कम 10 साल रहने का प्लान कर रहे हैं।
  • आप लोकेशन और प्रॉपर्टी की क्वालिटी से संतुष्ट हैं, सिर्फ “सस्ता” या “दोस्त भी वहीं ले रहा है” वाली वजह नहीं है।[podcasts.aajtak]​

ऐसी स्थिति में घर खरीदने से भावनात्मक संतोष भी मिलता है और फाइनेंशियल प्लान भी ज़्यादा नहीं बिगड़ता।


किराये पर रहकर भी अमीर बना जा सकता है?

भारत में एक बड़ा मिथ है कि “किराया देना बेवकूफी है, इससे अच्छा EMI दो।” जबकि कई फाइनेंशियल प्लानर्स की राय है कि अगर आप डिसिप्लिन के साथ इन्वेस्ट करें तो किराए पर रहकर भी आराम से वेल्थ बना सकते हैं।[abplive]​

एक साधारण सा उदाहरण:

  • मान लीजिए किराया 20,000 है और अगर घर लेते तो EMI 45,000 पड़ती।
  • दोनों का फर्क हुआ 25,000 प्रति माह।
  • अगर ये 25,000 आप लंबे समय तक अच्छे इक्विटी म्यूचुअल फंड्स में SIP के ज़रिए लगाते हैं, तो 15–20 साल में ये एक बहुत बड़ा कॉर्पस बन सकता है।

यहां ज़रूरी बात ये है कि किराए पर रहकर बचा हुआ पैसा वाकई इन्वेस्ट करें, सिर्फ खर्च न कर दें। तभी ये स्ट्रेटेजी काम करती है।[abplive]​


सही फैसला कैसे लें? प्रैक्टिकल चेकलिस्ट

घर खरीदने का निर्णय लेने से पहले इस छोटी सी चेकलिस्ट पर टिक लगा कर देखें:

  • क्या मैंने अपनी इनकम–खर्च–लोन की सही गणना करके EMI तय की है?
  • क्या मेरे पास स्थिर नौकरी/बिज़नेस और इमरजेंसी फंड है?
  • क्या मैंने प्रॉपर्टी की लीगल और टेक्निकल ड्यू–डिलिजेंस करवाई है (टाइटल, RERA, NOC वगैरह)?[podcasts.aajtak]​
  • क्या मैंने सिर्फ एक ही प्रोजेक्ट नहीं, आसपास की कम से कम 3–4 प्रॉपर्टीज की तुलना की है?
  • क्या मैं घर लेने के बाद भी सालाना कम से कम 20–25% इनकम इंवेस्टमेंट के लिए बचा पाऊंगा?
  • क्या यह फैसला मेरे और मेरे परिवार की लाइफ़स्टाइल, हेल्थ, एजुकेशन और रिटायरमेंट गोल्स को बिगाड़े बिना लिया जा रहा है?

अगर इन ज्यादातर सवालों का जवाब “हाँ” में है तो आपके लिए घर लेना समझदारी के ज़्यादा करीब है। अगर आधे से ज़्यादा पर “नहीं” या “पता नहीं” है तो थोड़ा रुककर दोबारा सोचें।


निष्कर्ष: घर ज़रूर लें, लेकिन होश से, जोश से नहीं

घर खरीदना ना तो हमेशा सबसे बड़ी भूल है और ना ही हमेशा सबसे समझदार कदम। गलती तब होती है जब हम दूसरों को देखकर, समाज के दबाव में या “आज नहीं तो कभी नहीं” वाले डर में आकर अपनी क्षमता से ज़्यादा बड़ा फैसला ले लेते हैं।

सही तरीका ये है कि:

  • पहले अपनी फाइनेंशियल नींव मज़बूत करें – इमरजेंसी फंड, इंश्योरेंस, रेगुलर इंवेस्टमेंट।
  • फिर ज़रूरत, लोकेशन, EMI क्षमता, नौकरी की स्थिरता सब देखकर ठंडे दिमाग से प्लान बनाएं।
  • और सबसे ज़रूरी – घर को सिर्फ स्टेटस की वजह से नहीं, जीवन की वास्तविक ज़रूरत और समग्र फाइनेंशियल प्लान के हिस्से के रूप में देखें।youtube+1

जो फैसला दिल और दिमाग दोनों की सुनकर लिया जाए, वही लंबे समय में सुकून और फायदा देता है। घर भी उसी में से एक होना चाहिए।

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