1. नाम रूपी धन से क्या खरीदा जा सकता है
- संसार में धन से हम सभी प्रकार की वस्तुएँ खरीद सकते हैं।[youtube]
- प्रश्न किया गया कि क्या नाम रूपी धन से भी कुछ भी खरीदा जा सकता है।[youtube]
- महाराज जी ने उत्तर दिया – हां, नाम रूपी धन से भी खरीदा जा सकता है।[youtube]
- नाम रूपी धन से संसार की नहीं, भगवान को खरीदा जा सकता है।[youtube]
- “सुमिर पवन सुत पावन नामो अपने बस कर राखे रामो” – इस पंक्ति के माध्यम से बताया गया कि भगवान राम ने अपना वश पवित्र नाम पर ही रखा है।youtube+1
- भगवान राम के नाम के प्रभाव से हनुमान जी ने स्वयं श्रीराम जी को अधीन कर लिया।[youtube]
- भगवान कहते हैं – ऐसा नाम जपने वाला भक्त यदि मुझे बेचे तो मैं बिक जाऊं।[youtube]
- इस प्रकार नाम में इतनी सामर्थ्य बताई गई कि वह भगवान को भी अपने अधीन कर सकता है।[youtube]
2. अन्य साधनों की अपेक्षा नाम की सामर्थ्य
- महाराज जी ने कहा कि जितनी सामर्थ्य नाम में है, उतनी न तप में है, न किसी अन्य साधन में।[youtube]
- नाम रूपी धन देकर भगवान को लिया जा सकता है, यही वास्तविक खरीद है।[youtube]
- साधु‑महात्मा भगवान का नाम रूपी धन एकत्रित करते हैं।[youtube]
- वे इस संचित नाम‑धन को भगवान के चरणों में समर्पित कर देते हैं।[youtube]
- जब भक्त नाम रूपी धन समर्पित करता है तो भगवान स्वयं को भक्त के प्रति समर्पित कर देते हैं।[youtube]
- नाम रूपी धन से ही हम भगवान को “खरीदते” हैं, यह खरीद भगवान और भक्त के प्रेम का संबंध है।youtube+1
3. नाम जप से भगवान का भक्त के प्रति झुकना
- नाम रूपी धन इतना प्रभावी बताया गया कि भगवान भक्त के चरण दबाने लगते हैं।[youtube]
- भगवान भक्त की सेवकाई करने लगते हैं और अपने आप को भक्त का दास मान लेते हैं।[youtube]
- नाम जप में इतनी सामर्थ है कि वह भगवान को भी भक्त के अधीन कर देता है।[youtube]
- एकनाथ जी महाराज भगवान का नाम जप कर रहे थे, तो भगवान ने दीर्घकाल तक “शिखंडिया” के रूप में उनके यहां दासत्व स्वीकार किया।[youtube]
- त्रिलोचन जी नाम जप करके साधु सेवा कर रहे थे, तो अंतर्यामी भगवान ने नावकर रूप, सेवक रूप धारण करके वहां सेवा की।[youtube]
- अर्जुन नाम जप कर रहे थे, तो भगवान स्वयं रथ हांकने की सेवकाई करने लगे।[youtube]
- इन उदाहरणों के माध्यम से बताया गया कि नाम जप भगवान को सेवक भाव तक ले आता है।[youtube]
4. सरलता और उदारता – साधुता के विशिष्ट गुण
- ठाकुर रामकृष्ण परमहंस देव जी के वचन का उल्लेख करते हुए कहा गया कि मनुष्य का सरल और उदार स्वभाव कई जन्मों की तपस्या का फल है।youtube+1
- यह भी कहा गया कि ऐसा सरल और उदार स्वभाव जिस मनुष्य में आ जाए, यह उसका अंतिम जन्म होता है।[youtube]
- प्रश्न हुआ कि ऐसा स्वभाव कैसे बने कि मन और बुद्धि शुद्ध हो जाए, जिससे मरने से पहले एक बार तो शुद्ध मन‑बुद्धि से ठाकुर जी का दर्शन हो सके।[youtube]
- महाराज जी ने कहा – सरलता और उदारता, ये दोनों साधुता के विशिष्ट गुण हैं।[youtube]
- “संत सरल चित और जगत हित” – संत का स्वभाव सरल चित्त और जगत के कल्याण की भावना वाला बताया गया।[youtube]
- संत संसार के कल्याण के लिए स्वयं तप और स्वयं भजन करते हैं, इसे परम उदारता कहा गया।[youtube]
5. हरिवंश नाम के संदर्भ और साधुता
- “हरिवंश नाम है जहां तहां तहां उदारता, सकामता तहां नहीं” – इस प्रकार हरिवंश नाम का उल्लेख आया।[youtube]
- बताया गया कि जहां हरिवंश नाम है वहां उदारता है, वहां सकामता (स्वार्थपूर्ण इच्छा) नहीं रहती।[youtube]
- “कृपालता अभिषेख हरिवंश नाम लीन जे” – हरिवंश नाम में लीन होने वालों पर कृपा का अभिषेक होता है।[youtube]
- ऐसे व्यक्ति सदैव अजात‑शत्रु रहते हैं, प्रपंच और दम्भ आदि में कुछ नहीं देखते।[youtube]
- “हरिवंश नाम जे कहे अनंत सुख तेल है, दुराप प्रेम की दशा प्रत्यक्ष देखे” – हरिवंश नाम को अनंत सुख का साधन कहा गया।[youtube]
- प्रेम की दशा को प्रत्यक्ष दिखाने वाला मूल कारण भी भगवान का नाम बताया गया।[youtube]
6. नाम जप, लीला‑कथा और संत संग से आने वाले सद्गुण
- कहा गया कि जब भगवान का नाम जप करोगे और संतों का संग करोगे, तब भागवतिक सद्गुण प्रकट होते हैं।[youtube]
- भगवान की लीला‑कथा का श्रवण और गायन भी इन सद्गुणों का कारण बताया गया।[youtube]
- सरलता और उदारता को भगवद्गुण बताया गया, जो संतों में उतरकर प्रकट होते हैं।[youtube]
- नाम जप, लीला‑कथा श्रवण‑कीर्तन और संत संग से हृदय में संतों के संग के प्रति प्रियता बढ़ती है।[youtube]
- सरलता और उदारता भगवान को रिझा लेती है, जबकि मोह, कपट, छल और छिद्र‑दोष भगवान को प्रिय नहीं हैं।[youtube]
- “मोह कपट छल छिद्र न भावा, सरल स्वभाव नमन कुठिलाई” – इस भाव से कपट‑त्याग और सरल स्वभाव का महत्व बताया गया।[youtube]
7. सरल स्वभाव का उद्गम और उसका प्रभाव
- कहा गया कि सरलता और सहजता से ही कपट, छल आदि दोषों का त्याग हो सकता है।[youtube]
- यह सरल स्वभाव वास्तव में भगवान का स्वभाव है, जो संतों में उतर आता है।[youtube]
- जब हम भगवान का नाम‑गुणगान करते हैं और संतों का संग करते हैं, तब यही दो महान सद्गुण – सरलता और उदारता – हमारे हृदय में आ जाते हैं।[youtube]
- ऐसे स्वभाव से सबके प्रति यह भाव आता है – “क्या करूं जिससे जगत का मंगल हो जाए।”[youtube]
- यह भी भाव उत्पन्न होता है – “क्या करूं जिससे सब दुख रहित हो जाएं, सब सुखी हो जाएं।”[youtube]
- यही संतों का स्वभाव बताया गया, क्योंकि उनमें उदार वृत्ति और सरल चित्त होता है।[youtube]
8. अनेक जन्मों की तपस्या, अंतिम जन्म और संत‑समागम
- ठाकुर रामकृष्ण परमहंस जी के कथन का पुनः स्मरण कराया गया कि सरल और उदार स्वभाव कई जन्मों की तपस्या का फल है।youtube+1
- प्रश्न उठा कि क्या एक ही जन्म में ऐसा स्वभाव संभव है।[youtube]
- महाराज जी ने उत्तर दिया – हमें मान लेना चाहिए कि हमारा यह अंतिम जन्म है।[youtube]
- कहा गया कि हम कई जन्मों से तपस्या कर रहे हैं, तब जाकर मनुष्य शरीर और साधु‑समागम प्राप्त हुआ है।[youtube]
- यदि यह हमारा अंतिम जन्म न होता, तो हमें संत‑समागम ही न मिलता।[youtube]
- “संत समागम मिला संस्कृति कर अंता बड़े भाग पाय सत्संगा और विनय प्रयास हो भव भंगा” – इस प्रकार सत्संग को जन्म‑मरण के चक्र के अंत से जोड़ा गया।[youtube]
9. सत्संगति और जन्म‑मरण के चक्र का अंत
- “सत्संगति संस्कृति कर अंता” – संस्कृति का अर्थ यहां जन्म‑मरण के चक्र के अंत से बताया गया।[youtube]
- जब जीव के अनेक जन्मों के पुण्य संचित हो जाते हैं, तब उसे भक्ति का लाभ होता है – ऐसा शास्त्र का कथन उद्धृत हुआ।[youtube]
- शंकराचार्य जी का उल्लेख करते हुए कहा गया कि हजारों जन्म की साधना के बाद किसी के भीतर मुमुक्षुता (मोक्ष की तीव्र इच्छा) जागती है।[youtube]
- इसी प्रकार शास्त्र में कहा गया कि बहुत जन्मों के पुण्य एकत्र होने पर भक्ति प्राप्त होती है।[youtube]
- महाराज जी ने कहा – हमारे बहुत जन्म हो चुके, हजारों जन्म हो चुके, हमारी तपस्या हो चुकी।[youtube]
- इसी का फल है कि हमें वृंदावन धाम में संत‑समागम मिल रहा है।[youtube][youtube]
10. इसी जन्म में भगवान‑प्राप्ति का निश्चय
- जब संत‑समागम और वृंदावन धाम जैसी स्थितियाँ मिल गई हैं, तो इसे ही पहले के अनेक जन्मों की तपस्या का फल माना गया।[youtube][youtube]
- महाराज जी ने कहा – अब हमें निश्चय कर लेना चाहिए कि हम इसी जन्म में भगवान को प्राप्त करेंगे।[youtube]
- यह निश्चय ही साधक के लिए मार्गदर्शक संकल्प के रूप में रखा गया।[youtube]
- संत‑समागम, नाम जप और भगवत‑आराधना को इस निश्चय की भूमि के रूप में प्रस्तुत किया गया।[youtube]
- नाम रूपी धन का संग्रह, संतों का संग और सरल‑उदार स्वभाव – इन्हीं को भगवान‑प्राप्ति के हेतु रूप में बार‑बार रेखांकित किया गया।[youtube]
11. मुख्य बिंदुओं का क्रमबद्ध संकलन (सार रूप में)
- धन से संसार की वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं, नाम रूपी धन से भगवान को खरीदा जा सकता है।[youtube]
- नाम में ऐसी सामर्थ्य है जो किसी तप या अन्य साधन में नहीं।[youtube]
- साधु‑महात्मा नाम रूपी धन जोड़कर भगवान के चरणों में समर्पित करते हैं।[youtube]
- नाम जप से भगवान स्वयं भक्त के सेवक, रथ‑सारथी, दास आदि रूप में प्रकट होते हैं।[youtube]
- एकनाथ जी, त्रिलोचन जी और अर्जुन के प्रसंगों से नाम जप की महिमा दिखलाई गई।[youtube]
- सरलता और उदारता को साधुता के विशिष्ट गुण और भगवान के स्वभाव के रूप में प्रस्तुत किया गया।[youtube]
- हरिवंश नाम के संदर्भ से उदारता, कृपालुता और अजात‑शत्रुता के गुण जुड़े बताए गए।[youtube]
- नाम जप, लीला‑कथा और संत‑संग से सरलता और उदारता जैसे भगवद्गुण हृदय में उतरते हैं।[youtube]
- ऐसे स्वभाव से “जगत का मंगल” और “सबके दुख निवारण” की भावना पैदा होती है।[youtube]
- ठाकुर रामकृष्ण परमहंस जी के वचन से सरल‑उदार स्वभाव को कई जन्मों की तपस्या का फल कहा गया।youtube+1
- संत‑समागम और वृंदावन धाम को अनेक जन्मों के पुण्य और साधना का परिणाम बताया गया।[youtube][youtube]
- शंकराचार्य जी और शास्त्र‑वचन से यह निष्कर्ष रखा गया कि बहुत जन्मों के पुण्य से भक्ति और मुमुक्षुता मिलती है।[youtube]
- वर्तमान जीवन को अंतिम जन्म मानकर, इसी जन्म में भगवान‑प्राप्ति का निश्चय करने के लिए प्रेरित किया गया।








