गोल्ड बनाम इक्विटी: लंबी अवधि में कौन देता है असली दौलत? एक्सपर्ट कृष्ण शर्मा समझाएंगे

स्पीकर श्री कृषण शर्मा हैं, जो भारत के एक अनुभवी निवेश शिक्षक और पर्सनल फाइनेंस कोच माने जाते हैं।

संक्षिप्त परिचय:

वे HDFC Asset Management Company से जुड़े एक राष्ट्रीय स्तर के ट्रेनर और फाइनेंशियल एजुकेटर के रूप में भी जाने जाते हैं, जिनका मिशन लोगों को फाइनेंशियल फ्रीडम की ओर मार्गदर्शन देना है।

वे YouTube चैनल “Krishan Sharma – Gateway to Financial Freedom” चलाते हैं, जहाँ वे गोल्ड, इक्विटी, म्यूचुअल फंड, एसेट एलोकेशन आदि पर शिक्षाप्रद वीडियो बनाते हैं।

उनके पास लगभग 30 साल का निवेश और मार्केट का अनुभव बताया गया है, जिसे वे अपने वीडियो और सेमिनारों में शेयर करते हैं।

वह कहते है कि लंबी अवधि में “दौलत बनाने” का काम इक्विटी (शेयर / इक्विटी म्यूचुअल फंड) करती है, और सोना मुख्य रूप से “दौलत बचाने / प्रोटेक्शन” का काम करता है – दोनों की भूमिका अलग‑अलग है

नीचे पूरी बात को आसान हिंदी में, बिंदुवार और क्रम से समझाते हैं।


1. शुरुआत की कहानी – सोना बनाम इक्विटी का सवाल

  • स्पीकर बताते हैं कि उनकी पत्नी नाराज़ हैं कि वह इक्विटी में तो निवेश कर रहे हैं पर सोने में नहीं कर रहे।
  • पत्नी का तर्क: न्यूज‑चैनल और खबरें कह रही हैं कि सोना और चांदी बहुत रिटर्न देंगे, दुनिया चांदी के पीछे भाग रही है, आपने सोने‑चांदी में पैसा क्यों नहीं लगाया?
  • स्पीकर बताते हैं कि 2021–22 में उन्होंने थोड़ा गोल्ड खरीदा था, पर हाल के दिनों में नया गोल्ड निवेश नहीं किया, तो पत्नी ने पूछा – “स्टॉक बेच कर सोना क्यों नहीं खरीद लेते?”
  • उनका जवाब:
    • सोना “wealth protection asset” है – यानि मुश्किल वक़्त में आपकी पुरानी बनाई हुई दौलत की रक्षा करता है।
    • इक्विटी “wealth creation asset” है – यानि आने वाले 15–25 साल में नई दौलत बनाती है।

यहीं से वे कहते हैं – पहले समझो “दौलत क्या है और बनती कैसे है”, तभी समझोगे कि गोल्ड vs इक्विटी में असली फ़र्क क्या है।


2. असली वेल्थ क्या होती है?

  • वे समझाते हैं कि आपके लिए असली वेल्थ क्या है:
    • आपका घर कैसा है, कितनी सुविधाएँ हैं।
    • आपकी गाड़ी कैसी है।
    • आपका किचन, कपड़े, खान‑पान, लाइफस्टाइल कैसा है।
  • सवाल: इस पूरी लिस्ट में सोना कहाँ है? अगर सोना ही वेल्थ होता तो पुराने जमाने के राजाओं के ज़माने में आम आदमी भी बहुत अमीर होता, पर ऐसा नहीं था।
  • नतीजा: असली दौलत सोने से नहीं, “प्रोडक्शन और वैल्यू ऐडिशन” से आती है – यानि चीजें बनाना, उन्हें और बेहतर बनाना और बेच पाना।

3. वैल्यू ऐडिशन और चाय वाले की कहानी

  • वे चाय वाले का उदाहरण देते हैं: एक बेरोजगार आदमी को बैंक से 100 रुपये का लोन मिलता है, वो गाड़ी (रीढ़ी), दूध, चीनी, चायपत्ती, ईंधन वगैरह खरीदता है।
  • वह 10 रुपये की कुल लागत से चाय के गिलास तैयार करता है और उसे 20 रुपये में बेचता है।
  • हर इनपुट की कीमत कम है, लेकिन मिलकर जो “चाय” बनी, उसकी कीमत ज़्यादा है – यही “value addition” है।
  • ये extra जोड़ा हुआ मूल्य ही समाज की नई दौलत है, और इसका मालिक वही चाय वाला (बिज़नेस का मालिक / शेयर होल्डर) है।
  • नतीजा:
    • समाज की ग्रोथ बिज़नेस और प्रोडक्शन से आती है।
    • इस प्रोडक्शन पर मालिकाना हक “इक्विटी” के ज़रिए मिलता है; इसलिए इक्विटी वेल्थ क्रिएशन का एसेट है।

4. क्रेडिट क्रिएशन: बेगम और नवाब की कहानी

  • एक नवाब था जिसने बहुत धन कमाया पर खर्च नहीं किया, मरते वक्त बीवी से कह गया – मेरी सारी दौलत मेरे साथ क़ब्र में दफना देना ताकि मैं बाद में खुद खर्च कर सकूं।
  • बेगम ने क्या किया? सारी दौलत बेचकर पैसा बैंक में जमा कर दिया, बैंक से चेकबुक ली, एक चेक में पूरी रकम लिखकर चेक क़ब्र में नवाब के साथ दफना दी।
  • तकनीकी रूप से उसने वादा निभा भी दिया और बाकी पैसा बैंकिंग सिस्टम में काम करने लगा।
  • स्पीकर कहते हैं – यही “credit creation” की ताकत है:
    • पैसे को बैंक में डालकर समाज में उससे कई गुना ज्यादा खरीद‑फरोख्त और प्रोडक्शन हो सकता है.

5. बैंक, सेंट्रल बैंक और पैसा “हवा” में कैसे बनता है

5.1. बैंकिंग से पहले की दुनिया

  • पहले अगर मेरे पास 100 रुपये थे और आपके पास नहीं, तो सिर्फ मैं ही 100 रुपये का सामान खरीद सकता था।
  • अगर मैं आपको सीधे 100 रुपये उधार दूँ, तो मेरी purchasing power खत्म, आपकी बनती है – समाज में कुल 100 रुपये की खरीदारी ही होगी।

5.2. बैंक के बाद की दुनिया

  • अब मानिए मैंने 1 लाख रुपये बैंक में जमा किए।​
  • RBI ने Cash Reserve Ratio (जैसे 10%) रखा है – बैंक 10,000 रुपये RBI के पास रखेगा और 90,000 रुपये लोन दे सकता है।​
  • बैंक मुझे 1 लाख का डिपॉजिट दिखाता है (मैं चेक से खर्च कर सकता हूँ), साथ में किसी और को 90,000 का लोन देता है (उसके अकाउंट में क्रेडिट के रूप में)।
  • दोनों के अकाउंट में पैसा दिख रहा है – यानी 1 लाख कैश से system में लगभग 1.9 लाख “bank money” बन गया।
  • यही प्रोसेस कई बार रिपीट होती है – हर बार 10% रिज़र्व, बाकी लोन, फिर वो पैसा किसी और के खाते में जमा, फिर उस पर लोन – इस तरह 1 लाख की मूल राशि से 5–8 लाख रुपये तक नए डिपॉज़िट / लोन बन सकते हैं।[youtube]​
  • इसे कहते हैं “credit creation” – बैंक हवा से नया पैसा बनाते हैं, पर उसके सामने बराबर का उधार भी खड़ा हो जाता है।

5.3. CRR से RBI कैसे ब्रेक या एक्सेलरेटर लगाता है

  • जब RBI CRR घटाता है तो बैंक एक ही डिपॉज़िट से ज्यादा लोन दे सकते हैं, credit creation तेज़ होता है, अर्थव्यवस्था को “गति” मिलती है।
  • जब महंगाई और demand बहुत तेज़ हो जाए, RBI CRR बढ़ा देता है, credit creation धीमा हो जाता है, अर्थव्यवस्था “ठंडी” पड़ती है।

6. महंगाई (Inflation) – दुश्मन नहीं, ज़रूरी “ब्लड प्रेशर”

6.1. 1800–1913 अमेरिका: महंगाई लगभग 0

  • फेडरल रिज़र्व के डाटा के हिसाब से 1800 से 1913 तक अमेरिका का consumer price index लगभग फ्लैट था – कभी महंगाई बढ़ती तो अगले साल गिर जाती, कुल मिलाकर 113 साल तक prices ऊपर नहीं गए।
  • उस दौर में बैंकों पर नियंत्रण कम था, बैंकिंग रिस्की थी, बैंक डूब भी जाते थे, इसलिए stable तरह से लम्बी growth और लगातार महंगाई नहीं हो पाती थी।

6.2. 1913 के बाद: सेंट्रल बैंक और लगातार महंगाई

  • 1913 के बाद फेडरल रिज़र्व (सेंट्रल बैंक) के आने से बैंकिंग व्यवस्थित हुई, बैंक डूबने की घटनाएँ कम हुईं, क्रेडिट क्रिएशन स्थिर गति से होने लगा।[youtube]​
  • 1914 से आगे महंगाई धीरे‑धीरे बढ़ती रही, 1970 के बाद जब गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म हुआ और डॉलर गोल्ड से बंधा नहीं रहा, तब inflation और तेज़ हो गई।[youtube]​
  • स्थिर और moderate महंगाई से क्या होता है?
    • लोगों को पता है कि चीजें महंगी होंगी, इसलिए लोग आज ही खरीद लेते हैं, consumption बढ़ता है।[youtube]​
    • consumption से production, jobs, profit, सब बढ़ते हैं – इससे जीडीपी और corporate profits बढ़ते हैं।[youtube]​

6.3. ब्लड प्रेशर का उदाहरण

  • वे inflation को blood pressure से compare करते हैं:
    • बहुत ज्यादा BP खराब है,
    • बहुत कम BP भी खतरनाक है,
    • अगर BP ही नहीं है, तो व्यक्ति मर चुका है।[youtube]​
  • इसी तरह 2–4% की महंगाई healthy है; zero या negative inflation (deflation) growth के लिए खराब है (जापान का उदाहरण), क्योंकि लोग सोचते हैं – “future में और सस्ता मिलेगा, अभी मत खरीदो”, तो demand गिरती है।[youtube]​
  • RBI भी लगभग 4% inflation टारगेट मानती है, क्योंकि moderate महंगाई growth को fuel करती है।[youtube]​

7. सोने का लंबा इतिहास – कब सोना चुप रहा और कब भागा

7.1. 1944–1971: गोल्ड‑डॉलर फिक्स, सोना “सोया” रहा

  • 1944 के Bretton Woods समझौते में अमेरिका ने सोने और डॉलर का rate फिक्स किया – 35 डॉलर प्रति औंस, लगभग 1944 से 1971 तक यही रेट रहा।[youtube]​
  • इस पूरे दौर में डॉलर terms में सोने का दाम नहीं बढ़ा, यानि real return शून्य के आसपास रहा (ऊपर से inflation खाते में तो असल value गिरी भी)।[youtube]​

7.2. 1971–1980: गोल्ड स्टैंडर्ड खत्म, सोना उछला

  • 1971 में रिचर्ड निक्सन ने गोल्ड‑डॉलर की convertibility खत्म कर दी – डॉलर बिना गोल्ड के छपने लगा।[youtube]​
  • 1970 के शुरुआती दशक में सोना 40 डॉलर/औंस से भी नीचे था, 1980 तक यह 850 डॉलर/औंस पार कर गया – लगभग 10 साल में कई गुना jump।[youtube]​

7.3. 1980–2008: 28 साल सोना “डेड” – रिटर्न लगभग 0

  • 1980 के बाद 850 डॉलर से सोना गिरता रहा और लगभग 28 साल बाद 2008 में ही फिर से 850 के आसपास लौटा।[youtube]​
  • इन 28 सालों में:
    • ग्लोबलाइजेशन तेज़ हुआ – WTO, trade, cooperation, शांति बढ़ी।[youtube]​
    • दुनिया का GDP, स्टॉक मार्केट्स, wealth सब बढ़े, पर सोने ने कुछ खास रिटर्न नहीं दिए।[youtube]​
  • कारण:
    • सोना productive नहीं है, GDP बढ़ने या corporate profit बढ़ने में उसका direct रोल नहीं है।[youtube]​

7.4. 2008 के बाद: Crisis, डर और गोल्ड रैली

  • 2008 के global financial crisis के बाद पहली बार अमेरिकी सिस्टम पर दुनिया को गंभीर शक हुआ; डर बढ़ा, “क्या ये सिस्टम reliable है?”।[youtube]​
  • जब भी global व्यवस्था, currency, बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा कम होता है, लोग सोने की तरफ भागते हैं – डर की वजह से demand बढ़ती है, सोना ऊपर जाता है।[youtube]​
  • कोविड के वक्त जब अमेरिका ने बहुत ज्यादा डॉलर supply किए, और उसके बाद geopolitical tensions, wars, de‑globalisation की बातें बढ़ीं, तब भी currencies पर अविश्वास बढ़ा और सोने में तेज़ run आया।[youtube]​

निचोड़:

  • जब दुनिया में विश्वास, trade और शांति है – इक्विटी और प्रोडक्टिव एसेट चमकते हैं।
  • जब दुनिया में डर, युद्ध, currency पर अविश्वास बढ़ता है – सोने की demand बढ़ती है, price jump करता है।[youtube]​

8. फिएट करेंसी बनाम हार्ड करेंसी

  • दो तरह की करेंसी:
    • Hard currency: जैसे गोल्ड – supply सीमित, सरकार इसे “छाप” नहीं सकती।[youtube]​
    • Fiat currency: जैसे डॉलर, रुपये – सरकार मनचाहा quantity छाप सकती है, किसी commodity से बाँधा नहीं है।
  • 1971 के बाद डॉलर pure fiat हुआ – अमेरिका ने ज़्यादा पैसा छापा, उससे inflation भी बढ़ा और growth भी।[youtube]​
  • जब fiat currency की supply बहुत तेज़ बढ़ती है और उसके पीछे real production उतना नहीं बढ़ता, तो currency कमजोर होती है, चीजें महंगी लगती हैं (असल में पैसे की purchasing power गिरती है)।
  • जब fiat सिस्टम और बड़े देशों के कर्ज़ पर भरोसा कम होता है, लोग “hard currency” यानी गोल्ड की तरफ भागते हैं।[

9. क्यों सारी दुनिया की दौलत पिछले 100 साल में इतनी बनी?

स्पीकर तीन मुख्य कारण बताते हैं:

  1. Sustained inflation
    • Moderate महंगाई लोगों को जल्दी खरीदने, निवेश करने और risk लेने के लिए motivate करती है।
  2. Fractional banking और credit creation
    • बैंक हवा से पैसा बनाने में मदद करते हैं, जिससे consumption और investment दोनों बढ़ते हैं।
  3. Technological advancement और innovation
    • कम समय, कम पूंजी, कम energy में ज़्यादा उत्पादन संभव, productivity बढ़ती है, profit और wealth explode करते हैं।

इन सबका मालिक कौन है?

  • ये फायदे किसके पास accumulate होते हैं?
    • बिज़नेस owners और उन बिज़नेस की इक्विटी रखने वाले निवेशकों के पास।
    • सोना इन प्रक्रियाओं में active पार्टी नहीं है।

इसलिए पिछले 100 साल में सबसे ज़्यादा पैसा उन लोगों ने बनाया जिन्होंने बिज़नेस/इक्विटी own की, न कि केवल गोल्ड hold किया।


10. आज की Global स्थिति: Developed देशों का बढ़ता कर्ज़ और गोल्ड

  • कई एडवांस इकॉनमी (जापान, यूरोप, अब कुछ हद तक अमेरिका) की समस्या:
    • उनकी GDP growth के structural कारण (demographics, productivity, innovation pace) कमजोर हो रहे हैं।
    • growth बनाए रखने के लिए वे ज्यादा से ज्यादा कर्ज़ ले रहे हैं।
  • फिएट सिस्टम में जैसे ही credit creation से पैसा बनता है, वैसे ही बराबर कर्ज़ भी खड़ा होता है – अगर नई income उतनी तेज़ नहीं बढ़ती, debt‑to‑GDP ratio खतरनाक स्तर पर पहुँचता है।
  • इन देशों में आज स्थिति यह है कि:
    • जितना भारी कर्ज़ है, उतनी तेजी से real income नहीं बढ़ रही,
    • productivty भी स्लो है,
    • इसलिए currency पर डर बढ़ा है – “कहीं default, currency crash न हो जाए।”
  • इस डर की वजह से:
    • Central banks डॉलर बेचकर सोना खरीद रहे हैं।
    • investor भी डॉलर, यूरो वगैरह से निकलकर गोल्ड में hedge कर रहे हैं।

यानी जो गोल्ड में तेज़ रिटर्न दिख रहे हैं, वह ज़्यादातर developed world की समस्याओं और अविश्वास की वजह से हैं, न कि गोल्ड के “productive होने” की वजह से।


11. भारत की स्थिति अलग क्यों है?

  • भारत ने अभी असली growth शुरू की है:
    • Demography युवा है, productivity बढ़ने की संभावना बहुत ज्यादा है।
    • Debt level विकसित देशों जितना high नहीं है।
    • हमारे बैंकिंग सिस्टम में CRR, SLR दोनों ज़्यादा हैं, इसलिए uncontrolled credit bubble बनने की संभावना कम है।
  • भारत की economy को अभी per capita income कई गुना बढ़ानी है; production, infrastructure, consumption सब बढ़ने वाली stage पर हैं।[youtube]​
  • इसलिए भारत के लिए:
    • Long term में सबसे बड़ा wealth creator equities ही हैं – क्योंकि growth, उत्पादन और jobs यहां अभी आगे बढ़ रहे हैं।[youtube]​
    • सोना यहाँ भी ज़रूरी है, पर “insurance / protection asset” के रूप में, न कि main wealth creation tool के रूप में।[youtube]​

12. सोना: क्या करता है और क्या नहीं करता?

12.1. सोना क्या नहीं करता?

  • सोना
    • नौकरी / रोजगार create नहीं करता।
    • न फैक्ट्री लगाता है, न services create करता है, न consumption बढ़ाता है।
    • आपके लिए regular cash flow (rent, interest, dividend) generate नहीं करता।
  • house किराया देता है, bonds interest देते हैं, equity dividends और capital appreciation दोनों देती है, पर gold सिर्फ “पड़ा” रहता है; return तभी मिलेगा जब आप उसे बेचेंगे और price ऊपर होगा।

12.2. सोना कहाँ ज़रूरी है?

  • जब दुनिया में:
    • युद्ध, geopolitical tension, अनिश्चितता,
    • currencies पर अविश्वास,
    • बड़े देशों की debt crisis जैसी स्थिति हो,
      तब सोना “protection asset / insurance” की तरह काम करता है।
  • केंद्रिय बैंक भी इसलिए गोल्ड खरीद रहे हैं – अपनी fiat currencies के risk से बचने के लिए।

स्पीकर की भाषा में:

  • सोना “protective asset” है,
  • इक्विटी “productive asset” और असली “wealth creation asset” है।

13. सोना = Insurance, पूरा पैसा Insurance में नहीं रखते

  • वे उदाहरण देते हैं:
    • किसी ने 50 लाख का accident insurance लिया, दुर्भाग्य से accident हुआ और उसे 50 लाख मिल गए।
    • क्या अब उसे सारा पैसा केवल insurance premium में लगा देना चाहिए? 5–50 करोड़ की policies लेकर बाकी निवेश छोड़ देना चाहिए? नहीं।
  • इसी तरह, अगर हाल के सालों में gold ने अच्छा return दिया तो ये “insurance type return” है – डर और अविश्वास की वजह से price jump हुआ, ये permanent pattern नहीं है।
  • “Gold is insurance” – इसका मतलब ये नहीं कि 100% पैसा गोल्ड में डाल दो;
    • थोड़ा हिस्सा गोल्ड में protection के लिए,
    • बाकी पैसा productive assets (equity, business, etc.) में wealth creation के लिए।[youtube]​

14. सर्कुलर फ्लो ऑफ इनकम – सोने की जगह कहाँ है?

  • हमारे आर्थिक जीवन में एक का खर्चा दूसरे की आमदनी है, दूसरे का खर्चा तीसरे की आमदनी – इसे ही “circular flow of income” कहते हैं।
  • आप shopping करते हैं तो दुकानदार की income बनती है, वो आगे सामान बनवाता है, workers को payment करता है – ये chain चलती रहती है।
  • इस पूरे cycle में गोल्ड की कोई direct productive भूमिका नहीं है।
  • इस cycle को चलाने वाली तीन मुख्य ताकतें:
    1. Sustained moderate inflation (जो लोगों को आज खर्च करने के लिए प्रेरित करती है)
    2. Fractional banking / credit creation (जो लोगों की purchasing power को बढ़ाती है)
    3. Technological progress (जो कम resource में अधिक output possible बनाता है)
  • इन तीनों का मालिक / लाभार्थी – business/equity holders हैं, सोना नहीं।[youtube]​

15. आखिरकार – Gold vs Equity: क्या करना चाहिए?

स्पीकर का निष्कर्ष आम आदमी की भाषा में:[youtube]​

  1. अगर आप “लंबी अवधि की दौलत बनाना” चाहते हैं (15–30 साल का horizon):
    • तो मुख्य पैसा हमेशा productive एसेट्स – यानी equities / equity mutual funds में होना चाहिए।
    • क्योंकि वही factories, technology, brands, services, jobs और profits पैदा करते हैं।
  2. सोना आपके portfolio में क्यों हो?
    • Currency crises, बड़े global tensions, wars, default risk जैसी बड़ी अनिश्चितताओं के खिलाफ “insurance” के रूप में।
    • इसके लिए portfolio का सीमित हिस्सा – आपकी risk profile के हिसाब से – सोने में रखना समझदारी है।
  3. सोना क्यों नहीं मुख्य निवेश होना चाहिए?
    • क्योंकि वो wealth create नहीं करता, सिर्फ already बनी wealth की रक्षा कर सकता है।
    • अगर आप अभी growth के phase में हैं (जैसे भारत), income बढ़ाना चाहते हैं, lifestyle सुधारना है, तो आपको wealth creation assets (equity) पर फोकस करना होगा।​
  4. “Equity is mother of all assets”
    • स्पीकर कहते हैं: अगर लंबे समय तक equity में return ही न आए, तो किसी भी asset class में sustainable return आना मुश्किल है, क्योंकि बाकी asset classes की backbone भी अंत में businesses ही हैं।
  5. “क्या अभी equity बेचकर gold ले लेना चाहिए?”
    • उनका जवाब साफ है:
      • हो सकता है 6–12 महीने के लिए gold अच्छा दिखे,
      • लेकिन 10–20–25 साल बाद आप पछताएँगे, क्योंकि आपने wealth creation asset को बेचकर केवल protection asset पकड़ा।

इस तरह पूरी बात का सरल सार यह है:

  • सोना ज़रूरी है, लेकिन “बीमा” और “सुरक्षा कवच” की तरह।
  • ज़िंदगी में असली प्रगति, आम आदमी के जीवन स्तर का असली सुधार, और लंबी अवधि की दौलत – ये सब केवल प्रोडक्शन, वैल्यू ऐडिशन और उन पर मालिकाना हक (यानी इक्विटी) से आते हैं, न कि सिर्फ सोने के सिक्के और जेवर जमा करके।

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