नीचे पूरा लगभग 3000 शब्दों का लेख है, जिसमें इस वीडियो की बात‑चित को ही आधार बना कर सरल, भावुक और समझाने वाले अंदाज़ में लेख लिखा गया है।
1 करोड़ रुपये डूब गए… लालच, पछतावा और नया संकल्प
“राधे‑राधे गुरु जी… मैं बहुत परेशान हूं, समझ नहीं आ रहा आपसे प्रश्न कैसे करूं।”
सभा में बैठे युवक की कांपती आवाज़ जैसे उसके अंदर का पूरा तूफ़ान बाहर ला रही थी। चेहरा घबराया हुआ, आंखों में पछतावा, और दिल में एक ही पीड़ा – “मेरी वजह से मेरे घर वाले दुखी हो गए हैं।”
वह बार‑बार कहता है, “मैं नहीं चाहता था कि मेरे कारण मेरे परिवार को कष्ट मिले, लेकिन हर बार गलती मुझसे ही हो जाती है।”
और फिर सामने बैठे महाराज जी धीरे से पूछते हैं – “तो गलती क्या कर दी तुमने?”
गलती क्या थी?
लड़का सिर झुकाकर कहता है, “मैंने शेयर मार्केट में पैसा लगाया गुरु जी…”
महाराज जी का अगला सवाल आता है, “कितना लगाया? कितना कमाया?”
वह हिचकते‑हिचकते जवाब देता है, “कमाया तो कुछ नहीं, सब चला गया… एक करोड़ से ऊपर गवां दिया।”
सारी सभा सन्न।
महाराज जी भी चौंक उठते हैं, पूछते हैं – “एक करोड़? तुम्हारे पास कहां से आया एक करोड़?”
युवक कहता है, “मेरे पास तो था ही नहीं, मैंने इधर‑उधर से लिया… मैं नौकरी करता हूं, पर जल्दी से धन सेठ बनना चाहता था, रातों‑रात करोड़पति बनना चाहता था।”
यहीं से कहानी शुरू होती है – लालच की, जुए की तरह बने शेयर बाज़ार की, बर्बादी की, और फिर भगवान और गुरु की शरण में लौटते एक इंसान की।
लालच – मक्खी की तरह गुड़ में फँस जाना
महाराज जी बड़े शांत स्वर में लेकिन बहुत गहरी बात कहते हैं, “सबसे बड़ी बात जो है, वह है लालच।”
फिर एक दोहा‑सा भाव बताते हैं –
“मक्खी गुड़ में गड़ी रहे, पंख रहे लिपटाए,
हाथ मलै और सिर धने, लालच बुरी भलाई।”
अर्थ यह कि जैसे मक्खी गुड़ में फँस जाती है, उसके पंख भी चिपक जाते हैं, न उड़ सकती है, न निकल पाती है; वैसे ही इंसान लालच की मिठास में फंसकर अपना सब कुछ गंवा बैठता है।
महाराज जी समझाते हैं –
- जितनी चादर है, उतने ही पैर फैलाने चाहिए।
- जितना भगवान दे रहे हैं, उसमें संतुष्ट रहना सीखना चाहिए।
वो युवक सरकारी नौकरी में है, बिजली विभाग में काम करता है, 52 हज़ार की अच्छी सैलरी है, सुविधा है, काम भी बहुत भारी नहीं।
फिर भी उसके भीतर संतोष नहीं था। उसे जल्द अमीर बनना था, जल्दी “सेठ” बनना था, और इसी जल्दबाज़ी ने उसे ऐसे दलदल में धकेल दिया, जहाँ से अब वापस लौटना भी मुश्किल लग रहा है।
शेयर मार्केट – निवेश या जुआ?
युवक रोते हुए कहता है कि उसने शेयर मार्केट में एक‑दो लाख नहीं, पूरे 1 करोड़ से ज़्यादा रुपए डुबो दिए।
कभी 5 लाख जीते, कभी 2 लाख, कभी 4 लाख, फिर 4 से 10 लाख बने, फिर वही 10 लाख भी चले गए, और धीरे‑धीरे करके पूरा करोड़ डूब गया।
वो खुद कहता है, “मैं शुरुआत में कमाता भी था, कभी 10–20 लाख भी बन जाते थे महीने भर में, एक दिन में 2 लाख तक कमाए हैं। लेकिन जितना आता था, उससे कहीं ज़्यादा चला जाता था। रुकता नहीं था पैसा।”
महाराज जी एकदम साफ शब्दों में कहते हैं –
- “ये जो पैसा है ना, जो ऐसे रातों‑रात आता है, ये ईमानदारी का नहीं होता बेटा।”
- “मेहनत करके पसीना बहाकर जो पैसा मिलता है, वही असली सुख देता है।”
वो उदाहरण देते हैं –
फिल्म में परेश रावल वाला किस्सा, जिसमें एक करोड़ की लॉटरी लगती है और खुशी के मारे इंसान मर जाता है।
कहते हैं – “ये जो एक रुपए लगा कर एक करोड़ जीतते हैं, यह पैसा बेईमानी जैसा है, ये जान लेके ही रहेगा।”
फिर शेयर मार्केट पर अपनी ही सोच बताते हैं –
- “मैं खुद ना जुआ खेलता हूं, ना सट्टा, ना जंगली रम्मी, और ना ही शेयर मार्केट में एक पैसा लगाता हूं।”
- “मुझे शेयर मार्केट का पैसा चाहिए ही नहीं। मैं तो पसीने का कमाना चाहता हूं।”
वो एक उदाहरण देकर बात को और साफ करते हैं –
अगर शेयर मार्केट उन्हें कहे कि “एक लाख दो, कल दो लाख कर दूंगा”, तब भी वो नहीं देंगे।
कहते हैं – “मुझे एक दिन में डबल चाहिए ही नहीं। मैं चार दिन, छह दिन मेहनत करके कमा लूंगा, लेकिन लालच के चक्कर में नहीं पड़ूंगा।”
यह बात सीधी है –
- जहां बिना मेहनत के, बिना जोखिम समझे, “एक दिन में डबल” का सपना दिखाया जा रहा है, वहाँ कहीं न कहीं जुआ, सट्टा और लालच छुपा है।
- और जिसमें लालच बढ़ता है, उसमें पतन तय है।
“बाज़ार ऐसा बनाया गया है कि आदमी निकल ही नहीं पाए”
युवक आगे कहता है कि ये मार्केट ऐसा है कि इंसान एक बार घुस जाए, तो निकलना मुश्किल हो जाता है।
वो मानता है –
- “ये बाजार ऐसे बनाया ही गया है बड़े‑बड़े बुद्धिजीवियों ने कि आदमी फंस जाए, बाहर ही ना निकल पाए।”
वो शेयर मार्केट को जुए से भी बुरा बताता है।
कहता है –
- ताश के पत्ते खेलो, तो 100–200–1000 की कोई न कोई सीमा दिखती है।
- लेकिन शेयर मार्केट में जेब में जितना है सब जा सकता है – 5 लाख, 10 लाख, 20 लाख… और शाम तक इंसान खाली हो सकता है।
महाराज जी भी यही बात पकड़ते हैं –
- ये आदत, ये लालच बिना सीमा का है।
- अगर कोई कसम खाकर बोल दे कि “अब नहीं खेलूंगा, अब नहीं लगाऊंगा”, तभी वह बच सकता है।
परिवार से नज़र नहीं मिला पा रहा…
युवक की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि वह अपने घर वालों से नज़र नहीं मिला पा रहा।
- उसने घर वालों से छुपाकर कर्ज लिया।
- कई बार पहले भी गलती कर चुका है, हर बार माफी माँगी, घर वालों ने हर बार उसे माफ किया।
- लेकिन चौथी बार फिर वही गलती, फिर वही झूठ, फिर वही कसम तोड़ देना।
अब हालत यह है कि वह घर से बिना बताए निकल आया है, फोन बंद कर रखा है, और शर्म से, भय से, और पछतावे से भरा हुआ महाराज जी के सामने बैठा है।
महाराज जी उससे साफ कहते हैं –
- “गलत तो तुमने किया ही है।”
- “अब भागने से क्या होगा? वापस जाओ, अपने परिवार से कर्ज चुकाओ, मेहनत करो, गलत काम छोड़ दो।”
उनका संदेश यही है –
- भागने से समस्या नहीं सुलझती।
- अपने कर्मों की जिम्मेदारी लेना, कर्ज चुकाना, अपने घर वालों का विश्वास फिर से जीतना – यही सच्चा प्रायश्चित है।
कसम, टूटती हुई आदत और नया संकल्प
महाराज जी उसे कसम दिलवाते हैं –
- “कसम खाओ कि आज के बाद शेयर मार्केट में नहीं फंसोगे।”
युवक कहता है, “महाराज, मैं ठाकुर जी की कसम खाकर कहता हूं, आज के बाद शेयर मार्केट नहीं खेलूंगा।”
फिर खुद बताता है कि उसने पहले भी घर पर कसम खाई थी, और वह कसम तोड़ दी थी, यही वजह है कि अब वह अपने मां‑बाप का सामना नहीं कर पा रहा।
महाराज जी उसे टोकते हैं –
- “चार बार झूठ बोल चुके हो, चार बार सॉरी बोल चुके हो, चौथी बार कसम खा चुके हो। अब कैसे भरोसा करें कि पांचवीं बार नहीं होगा?”
युवक रोते हुए बस एक ही बात कहता है – “महाराज, आप मेरे ऊपर कृपा कीजिए, मेरी बुद्धि ठीक कर दीजिए। कमाने को तो मैं फिर कमा लूंगा, नौकरी है, मेहनत कर सकता हूं, बस मेरे अंदर से यह लालच निकाल दीजिए।”
यहाँ एक बहुत बड़ी सीख छुपी है –
- असली समस्या पैसा नहीं, “मन की आदत” है।
- अगर मन लालची है, तो पैसा चाहे जितना आ जाए, इंसान संतुष्ट नहीं होगा और जोखिम उठाकर सब गवां सकता है।
संतोष – ईश्वर का सबसे बड़ा प्रसाद
युवक अपनी नौकरी के बारे में भी बताता है –
- “मेरी नौकरी ऐसी है कि मेरा घर वहीं के सामने है। बस घरों की लाइट बंद‑चालू करवा देनी होती है, फॉल्ट हो तो स्टाफ भेज देना होता है।”
- “मुझे बहुत मेहनत वाला काम नहीं करना पड़ता, सैलरी भी ठीक है, भगवान ने उम्मीद से ज्यादा दिया है, फिर भी मैंने अपनी हालत खुद ही खराब कर ली।”
महाराज जी उसे प्रेम से समझाते हैं –
- “जो मिल रहा है, उसमें खुश रहो।”
- “सरकारी नौकरी, बिना ज्यादा मेहनत के अच्छी सैलरी – ये भगवान की बड़ी कृपा है। इसे छोड़कर जुए‑सट्टे में पड़ना मूर्खता है।”
वो कहते हैं –
- “भगवान आपको कर्ज से मुक्त करें, यही प्रार्थना है।”
- “आप रोज कथा सुनो, समाज की सेवा करो, भूखों को खाना खिलाओ, प्यासों को पानी पिलाओ, अच्छे कामों में मन लगाओ, तभी मन बुराई से हटेगा।”
यानी –
- बुरी आदतों से सिर्फ “मत करूंगा” बोल देने से छुटकारा नहीं मिलता।
- मन को किसी अच्छी आदत, सेवा, भक्ति, मेहनत में लगाना जरूरी है।
युवाओं के नाम संदेश – फोकट का पैसा मत लो
महाराज जी सिर्फ उस युवक से नहीं, पूरी सभा के युवाओं से बात करते हैं –
- “आप युवाओं को मेहनत करना अच्छा क्यों नहीं लगता?”
- “फोकट का पैसा क्यों चाहिए आपको?”
वो साफ कहते हैं –
- “मैं तो खुद फोकट का पैसा लेता ही नहीं हूं।”
- “अगर 1 करोड़ भी सामने रखा हो और वह मेरा नहीं हो, तो मैं भी नहीं उठाऊंगा।”
- “अपनी मेहनत पर भरोसा करो। जो मेहनत करता है, ईश्वर उसी के साथ होता है।”
फिर चेतावनी देते हैं –
- “ये लालच छोड़ दीजिए कि शेयर मार्केट आपको रातों‑रात सेठ बना देगा, अमीर बना देगा।”
- “हो सकता है कभी-कभी थोड़ा बहुत कमाओ, लेकिन जितना कमाओगे, उससे कई गुना एक दिन खो दोगे, और फिर रोड पर ही आना पड़ेगा।”
यही इस पूरी घटना का निष्कर्ष है –
- मेहनत पर भरोसा रखो।
- भगवान पर विश्वास रखो।
- फोकट के पैसे और जुए जैसी कमाई से दूरी बनाकर चलो।
परिवार, विश्वास और वापसी का रास्ता
कहानी का सबसे संवेदनशील हिस्सा यह है कि युवक कहता है, “महाराज, मैं अपने घरवालों से माफी मांगूंगा, लेकिन मेरे अंदर डर है, शर्म है। मैं पहले भी चार बार झूठ बोल चुका हूं।”
महाराज जी उसे समझाते हैं –
- “अगर अब भी जाग गए, सुधर गए, तो बढ़िया है।”
- “लेकिन यह चौथी बार सॉरी बोल रहे हो, चौथी बार कसम खा रहे हो, अब पाँचवीं बार की नौबत मत आने देना।”
ये बात हर उस इंसान पर लागू होती है जो बार‑बार गलती दोहराता है –
- सिर्फ माफी मांगना काफी नहीं।
- अंदर से अपनी सोच, अपना व्यवहार बदलना पड़ता है।
- पैसा बाद में भी आ सकता है, लेकिन एक बार विश्वास टूट जाए, तो उसे वापस लाने में बहुत समय लगता है।
युवक अंत में कहता है कि उसे महाराज जी से बात करके हल्कापन महसूस हो रहा है और अब वह सच्चे मन से ठान चुका है कि दोबारा शेयर मार्केट के चक्कर में नहीं जाएगा।
इस बात‑चीत से हमें क्या सीख मिलती है?
इस पूरी बातचीत में सिर्फ एक लड़के की कहानी नहीं, बल्कि आज के समय के हज़ारों‑लाखों युवाओं की तस्वीर दिखती है –
- जल्दी अमीर बनने की चाह
- कम मेहनत में अधिक कमाई, रातों‑रात पैसा, “डबल पैसा” जैसी सोच युवाओं को खतरनाक रास्तों पर ले जा रही है।
- शेयर मार्केट को जुए की तरह लेना
- बिना ज्ञान, बिना रिसर्च, बिना लिमिट लगाये, “टिप्स” और “भावनाओं” के आधार पर पैसा लगाना असल में निवेश नहीं, जुआ है।
- परिवार से छुपाकर कर्ज लेना
- घरवालों को बताए बिना बड़ी रकम उधार लेना, और फिर नुकसान होने पर उनसे मुंह छुपाना – यह सिर्फ आर्थिक नहीं, नैतिक गिरावट भी है।
- कसम तोड़ना, आदत न छोड़ना
- कई बार कसम खाकर भी आदत न छोड़ पाना दिखाता है कि समस्या दिल की गहराई में है – लालच, असंतोष और गलत संगति।
- समाधान क्या है?
- मेहनत पर भरोसा,
- अपनी आय के अनुसार जीवन,
- सेवा, भक्ति और अच्छे कार्यों में मन लगाना,
- परिवार के साथ खुलकर बात करना,
- और सबसे ज़रूरी – “फोकट के पैसे” से सख्त दूरी।
लेख का सार भाव
यह वीडियो और उसकी बातचीत हमें यह समझाती है कि –
- 1 करोड़ रुपये का नुकसान भले बहुत बड़ा हो, लेकिन जिंदगी खत्म नहीं हुई।
- असली हानि पैसा नहीं, परिवार का विश्वास और मन की शांति है।
- लेकिन अगर इंसान सच में जाग जाए, अपनी गलती मान ले, मेहनत का मार्ग पकड़ ले, और भगवान पर भरोसा रखकर सही दिशा में चलने लगे, तो कर्ज भी उतर सकता है और जीवन भी फिर से पटरी पर आ सकता है।
यही संदेश महाराज जी बार‑बार देते हैं –
“मेहनत पर भरोसा रखो, भगवान पर भरोसा रखो, फोकट के पैसे से दूरी बनाओ, और अपने बच्चों को सट्टा, जुआ और ऐसे शेयर मार्केट के मोह से बचाओ।”
इंसान गलती करता है, गिरता है, बर्बाद भी हो जाता है, लेकिन जो गिरकर भी भीतर से सीख ले, संकल्प ले और सही रास्ता पकड़ ले – वही आगे चलकर दूसरों के लिए भी प्रेरणा बन जाता है।






