हम जिनको गुरु मानते हों और जिनसे हमारी गहरी श्रद्धा हो, अगर उनके इष्ट अलग हों और हमारी आसक्ति किसी दूसरे इष्ट में हो, तो भी भक्ति में कोई टकराव नहीं होता; बल्कि सही समझ रखने पर दोनों का कल्याणकारी समन्वय हो जाता है।
1. मुख्य सिद्धांत: गुरु और इष्ट का संबंध
- यदि साधक का सच्चा प्रेम अपने इष्ट भगवान में है, तो गुरु की आराधना करने पर भी उसी इष्ट की प्राप्ति होगी।
- यदि अभी अपने इष्ट के प्रति वास्तविक प्रीति नहीं जगी, केवल मुख से कहते हैं, तो गुरु द्वारा दिया गया मंत्र नए इष्ट में आसक्ति जगा देगा।
- संत और गुरु की आराधना कल्पतरु के समान है, उनसे जो माँगोगे, वही प्राप्त होगा, भक्ति में रुकावट नहीं आएगी।
- यह डर रखना कि “रामोपासक संत का आश्रय लेंगे तो श्याम भक्ति में बाधा होगी” या उलटा, यह सब मिथ्या भय है।
- संत सबका पोषण करने वाले होते हैं, वे किसी एक भावना को काटकर दूसरी नहीं लगाते, बल्कि जो भावना लेकर जाओगे, उसकी पुष्टता कर देते हैं।
2. व्यावहारिक उदाहरण से समझें
- मान लीजिए आप राम जी से प्रेम करते हैं और आपके गुरु श्याम जी के उपासक हैं, तो भी गुरु की आराधना करने से आपको राम जी की ही प्राप्ति होगी, यदि आपका प्रेम राम में सच्चा है।[youtube]
- अगर वास्तव में अभी राम प्रेम नहीं है, केवल नाम भर लिया है, तो श्याम मंत्र और श्याम साधना से श्याम जी में प्रीति जागने लगेगी।[youtube]
- जैसे किसी प्रेममय संत के आश्रय में रामभक्त, श्यामभक्त, काली उपासक, सभी आते हैं और अपनी-अपनी भावनानुसार संतुष्ट होकर लौटते हैं।[youtube]
- काली उपासक भी ऐसे संत के पास आकर “मामा” कहकर भावुक हो जाता है और तृप्त होता है, क्योंकि संत उसके इष्ट के प्रति भी आदर और प्रेम का भाव रखते हैं।[youtube]
- सच्चे संत के पास कोई यह शिकायत लेकर नहीं लौटता कि “मैं अलग उपासक था, इनके पास आकर असंतुष्ट हो गया।”[youtube]
3. ऐसे में साधक को क्या करना चाहिए? (पॉइंटर में)
- अपने इष्ट के प्रति अपने प्रेम की सच्चाई की जांच करें – क्या सच में हृदय से लगाव है या केवल नाम मात्र है।[youtube]
- गुरु को भगवान का प्रतिनिधि और कल्पतरु मानकर उनकी आराधना करें, यह विश्वास रखें कि वे आपके हित में ही मार्ग देंगे।[youtube]
- मन में यह संदेह न पालें कि गुरु का अलग इष्ट होने से मेरी इष्ट भक्ति में बाधा आएगी।[youtube]
- गुरु द्वारा दिए गए मंत्र का सम्मानपूर्वक, नियमपूर्वक जप करें, उससे या तो आपके पुराने इष्ट की प्रीति पुष्ट होगी, या नए इष्ट की सच्ची आसक्ति जागेगी।[youtube]
- अपने इष्ट को छोड़ने या बदलने की मानसिक खींचतान न करें; भक्ति का मार्ग स्वभाविक भाव के अनुसार धीरे-धीरे स्पष्ट होता है।[youtube]
- संत के पास जाते समय अपने हृदय की भावना साफ लेकर जाएं, जो भी इष्ट हो, उसके प्रति अपने प्रेम को स्पष्ट रखें।[youtube]
- संत के चरणों में जाकर अपने संशय विनम्रता से निवेदन करें, संकोच या दुराव न रखें।[youtube]
- यदि आप रामभक्त हैं और गुरु श्यामभक्त, तो भी गुरु की अनुमति से राम नाम, राम कथा, राम ध्यान जारी रखें।[youtube]
- गुरु के इष्ट का अनादर या विरोध कभी न करें; उनकी आराधना का सम्मान करना भी भक्ति का ही अंग है।[youtube]
- जहां आप जाते हैं, यदि वहां प्रियाजू या किसी विशिष्ट स्वरूप की उपासना होती है, तो भी अपने इष्ट को छोड़े बिना, उस स्वरूप को भगवान का ही एक और रूप मानकर आदर करें।[youtube]
- संत के darbar में यह भावना रखें कि यहाँ सबकी भक्ति का पोषण होता है, किसी की भावना काटी नहीं जाती।[youtube]
- गुरु और इष्ट को दो विरोधी ध्रुव न मानकर, एक ही परम सत्य के भिन्न-भिन्न रूप जानें।[youtube]
- मन में उठने वाले तुलना और प्रतियोगिता वाले भाव (मेरा इष्ट बड़ा, उनका छोटा) को तुरंत त्यागने का अभ्यास करें।[youtube]
- जब भी भ्रम बढ़े, अपने अनुभवों को देखें – गुरु की संगति से यदि शांति, प्रेम, भक्ति बढ़ रही है तो समझ लें कि मार्ग सही है।[youtube]
- अपने भीतर ईर्ष्या, अहंकार, दुराव या विरोध जैसे भावों को पहचानकर, बार-बार इष्टचरणों में सौंपते रहें।[youtube]
4. संत का स्वभाव: सबका पोषण
- संत को कल्पतरु बताया गया है, यानी जिसके चरणों में जो भावना लेकर जाओगे, वही पुष्ट होती है, वह भक्ति और मजबूत होती है।[youtube]
- सच्चे संत किसी को यह अनुभव नहीं करने देते कि “मैं दूसरे इष्ट का उपासक हूं, इसलिए मुझे द्वितीय दर्जे का माना जा रहा है।”[youtube]
- संत सभी उपासकों को, चाहे वे किसी भी देवी-देवता की आराधना करें, हृदय से सम्मान और प्रेम देते हैं।[youtube]
- उनके यहाँ कोई भी अपने इष्ट भाव के कारण अपमानित या उपेक्षित महसूस नहीं करता, बल्कि अधिक भावुक और तृप्त होकर जाता है।[youtube]
- संतों का काम किसी की भक्ति तोड़ना नहीं, बल्कि सभी के भीतर विद्यमान भगवत भाव को प्रबल करना होता है।[youtube]
5. परदोष दर्शन से पूरी तरह बचें
- महाराज जी बताते हैं कि किसी के प्रति थोड़ा सा भी “हे-भाव” (नीचा देखने का भाव) आए, वहीं से परदोष दर्शन शुरू हो जाता है।[youtube]
- भगवत भाव के सिवा जो भी दृष्टि हम रखते हैं, वह दोष-दर्शन ही है; यह साधक के लिए हानिकारक है।[youtube]
- गीता में बताए गए गुण – अद्वेष्टा, मैत्री, करुणा, निर्ममता, निरहंकारिता, समदर्शिता – सब इसी दोषरहित दृष्टि से जुड़े हैं।[youtube]
- दोषरहित दृष्टि क्या है? “श्री राम में सब जग जानी, करो प्रणाम जो पानी” – सब जगत को भगवान का स्वरूप मानकर देखना।[youtube]
- इसके सिवा जो भी देखते हैं, उसमें गुण-दोष की बुद्धि लग ही जाती है; गुण में स्तुति, दोष में निंदा, और वहीं से माया का प्रपंच साधक को बांध लेता है।[youtube]
- परदोष दर्शन, परदोष चिंतन, परदोष कथन और परदोष श्रवण – ये सब परमार्थ में वर्जित बताए गए हैं।[youtube]
- जहां भगवत चर्चा के सिवा कोई अन्य व्यक्ति-चर्चा शुरू हो, वहाँ यदि राग, द्वेष, गुण-दोष की बातें हों, तो उसे रोक देना ही हितकारी है।[youtube]
- भगवान की चर्चा के अलावा व्यक्तियों की चर्चा या तो राग जगाती है या द्वेष; दोनों ही साधक के हृदय को मलिन कर देते हैं।[youtube]
- सबसे बड़ा गुण यही है कि न किसी का विशेष गुण देखें, न दोष देखें, सबमें भगवत बुद्धि रखें।[youtube]
- जब सबको भगवत स्वरूप मानने लगते हैं, तभी निर्दोष बुद्धि बनती है; इसके अलावा जो भी दृष्टि है, वह दोषमय हो ही जाएगी।[youtube]






