पूर्व की बुरी आदतें छोड़कर नई दैवी आदतें कैसे अपनाएं? | श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज का मार्गदर्शन

पूर्व की आदतों को बदलकर नई, सतोगुणी और भजन-सहायक आदतें धारण करने का उपाय महाराज जी के अनुसार दो मुख्य आधारों पर टिका है – गहरा नाम-जप और शुद्ध, सात्विक जीवन-शैली।[youtube]​

1. प्रश्न का सार और मूल उत्तर

  • प्रश्न: जीवन भर चली आ रही प्रवृत्तियों/आदतों को कैसे बदला जाए और नई अच्छी आदतों के साथ जीवन की पुनः शुरुआत कैसे हो?[youtube]​
  • उत्तर का मूल भाव: भगवान का नाम-जप पूर्व संस्कारों को मिटाकर नए दैवी संस्कार उत्पन्न कर सकता है, यदि उसके साथ भोजन और आचरण शुद्ध तथा सात्विक हो।[youtube]​

2. भगवान के नाम-जप की शक्ति

  • महाराज जी ने बताया कि घोर वैश्यागामी लोग भगवान का नाम जपकर महात्मा बन गए, चोर और हिंसक प्रवृत्ति वाले ब्रह्मर्षि बन गए।[youtube]​
  • उन्होंने उदाहरण दिया कि जिन्हें “राम राम” भी कहना नहीं आता था, वे “मरा मरा” जपते-जपते ब्रह्मर्षि हो गए, अर्थात नाम-जप ने उनका स्वभाव ही पलट दिया।[youtube]​
  • निष्कर्ष बिंदु:
    • भगवान का नाम केवल बाहरी बोलना नहीं, आंतरिक संस्कारों पर सीधा काम करता है।[youtube]​
    • लगातार नाम-जप से गलत, वासनात्मक प्रवृत्तियाँ ढीली पड़ती हैं और पवित्रता, दया, विनम्रता जैसे गुण स्थिर होने लगते हैं।[youtube]​

3. पूर्व संस्कारों का नाश और नये दैवी संस्कार

  • महाराज जी कहते हैं: यदि हम भगवान का नाम जपेंगे तो हमारे पूर्व संस्कार नष्ट हो जाएंगे और नवीन दैवी संपदा के संस्कार जागृत हो जाएंगे।[youtube]​
  • वे स्पष्ट करते हैं कि भजन पूर्व संस्कारों को नष्ट करके नये संस्कार प्रकट करता है, जो भगवान की प्रसन्नता का कारण बनते हैं।[youtube]​
  • मुख्य बिंदु:
    • “पूर्व संस्कार नष्ट होना” मतलब – पुरानी आदतों की जड़ कमजोर होना, प्रतिक्रिया का ढंग बदलना, पुराने दोषों में रुचि कम होना।[youtube]​
    • “दैवी संपदा के संस्कार” – करुणा, संयम, सत्य, नम्रता, भगवान-स्मरण, पवित्रता जैसे गुण हृदय में स्थायी स्वभाव की तरह स्थापित होना।[youtube]​

4. नाम-जप और भोजन – दोनों का संयुक्त साधन

  • महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि नाम-जप में रुचि तभी होगी जब हम भोजन शुद्ध पाएंगे।[youtube]​
  • यदि कोई केवल सांसारिक, चटोरा, आधुनिकता-प्रधान भोजन लेगा तो भजन नहीं होगा; सात्विक भोजन, भगवान को अर्पित करके लिया जाए, तो भजन में रुचि जगेगी।[youtube]​
  • उन्होंने सूत्र दिया: “जिसका भोजन नीरस उसका भजन सरस, जिसका भोजन सरस उसका भजन नीरस – पक्का समझ लो।”[youtube]​
  • निष्कर्ष बिंदु:
    • भोजन आदतों के परिवर्तन का बड़ा आधार है; जो व्यक्ति जिह्वा को वश में करता है, वह धीरे‑धीरे मन और इंद्रियों पर भी नियंत्रण पा लेता है।[youtube]​
    • सात्विक, संयमित, भगवान को अर्पित भोजन – नए संस्कारों के लिए जमीन तैयार करता है; बाकी काम नाम-जप करता है।[youtube]​

5. पुरानी आदतें बदलने की व्यावहारिक दिशा

महाराज जी के कथन से निकले व्यावहारिक बिंदु इस प्रकार हैं:[youtube]​

  • भजन को केंद्र बनाना
    • प्रतिदिन नियत समय पर भगवान का नाम-जप करना, चाहे मन लगे या न लगे।[youtube]​
    • “खूब भगवान का नाम जप करो, नाम जप पूर्व पाप और पूर्व संस्कार दोनों को मिटाकर नवीन दैवी संपदा का हृदय में संचार कर देता है।”[youtube]​
  • भोजन सुधारना
    • शक्य हो तो सात्विक, सरल, अल्प मसाले वाला भोजन लेना और उसे पहले भगवान को अर्पित करके प्रसाद की भावना से ग्रहण करना।[youtube]​
    • चटोरेपन, बाहर‑बाहर, इधर‑उधर खाने की प्रवृत्ति को कम करना, क्योंकि यह भजन में रुचि को कम कर देती है।[youtube]​
  • पुराने दोषों से संघर्ष का तरीका
    • पुरानी आदत उभरते समय तुरंत नाम-स्मरण की ओर मन को मोड़ देना।[youtube]​
    • यह मानकर चलना कि दोष हटाने वाला मैं नहीं, भगवान का नाम है; मेरा काम केवल नाम-स्मरण और साधन में नियमित रहना है।[youtube]​
  • धीरे‑धीरे स्वभाव का रूपांतरण
    • महाराज जी कहते हैं कि भजन स्वभाव को सुधारता है, पूर्व संस्कार नष्ट करके नए संस्कार प्रकट करता है।[youtube]​
    • इसका अर्थ है कि जैसे‑जैसे नाम-जप बढ़ता है, गुस्सा, वासना, लोभ आदि की तीव्रता घटती है और दयालु, शांत, विनम्र स्वभाव स्वतः सामने आता है।[youtube]​

6. “नई शुरुआत” के लिए आंतरिक दृष्टि

  • “नई आदतों के साथ जीवन में पुनः प्रारंभ” का मार्ग महाराज जी के अनुसार कोई बाहरी नाटकीय परिवर्तन नहीं, बल्कि हृदय में नाम और सात्विकता का सतत प्रवेश है।[youtube]​
  • जब नाम-जप के कारण हृदय में दैवी संस्कार जागते हैं, तो वही नए जीवन की वास्तविक शुरुआत है – व्यवहार बदलता है, रुचि बदलती है, लक्ष्य बदलता है।[youtube]​
  • वे यही संकेत देते हैं कि जो भजन को अपना मुख्य सहारा बना ले और भोजन‑आचरण को सात्विक कर ले, उसके लिए पुरानी प्रवृत्तियाँ स्वतः निर्बल और नयी दिव्य आदतें स्वतः सबल हो जाती हैं।[youtube]​

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