अशविंदर आर. सिंह एक सीनियर रियल एस्टेट लीडर हैं, जो वर्तमान में BCD Group के Vice Chairman और CEO हैं और CII Real Estate Committee के चेयरमैन भी हैं।
उन्होंने पहले Bhartiya Urban, ANAROCK और JLL Residential के CEO के रूप में काम किया है और रेजिडेंशियल व कमर्शियल रियल एस्टेट पर कई किताबें लिखी हैं।
1. भारत में रियल एस्टेट की ताज़ा तस्वीर
- 2021 से 2025 के बीच भारत का रियल एस्टेट बाज़ार बहुत तेज़ी से बढ़ा है, कई शहरों में लगभग 25% सालाना औसत वृद्धि देखी गई है।
- चार साल लगातार तेज़ बढ़त के बाद अब बाज़ार “धीमा” नहीं हो रहा, बल्कि “नॉर्मल” यानी सामान्य गति पर लौट रहा है।
- भारत के टॉप 7 बड़े रियल एस्टेट शहर हैं: मुंबई, पुणे, एनसीआर (गुरुग्राम, नोएडा, दिल्ली), बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता।
- इन शहरों के साथ-साथ पिछले दो सालों में कई टियर-2 शहर जैसे चंडीगढ़, इंदौर, मैसूर, कोच्चि, नागपुर, लखनऊ, आदि भी तेज़ी से उभरे हैं।
- कोविड के बाद तैयार घर (ready‑to‑move) की इतनी कमी थी कि कई शहरों में तुरंत रहने लायक घर मिलना मुश्किल हो गया था।
2. रियल एस्टेट में रिटर्न: 1 करोड़ से 30–40 करोड़ तक?
- अगर आप आज 1 करोड़ का घर लेते हैं और अगले 30 साल तक होल्ड रखते हैं, तो इसकी वैल्यू 30–40 करोड़ तक जा सकती है।
- इसका कारण सिर्फ़ “लकी” होना नहीं है, बल्कि दो बातें हैं: महँगाई (inflation) और उस पर लगभग 5% अतिरिक्त रिटर्न।
- उनका thumb rule है: “रियल एस्टेट में 30 साल में लगभग 30 गुना” एक मोटा बेंचमार्क माना जा सकता है, अगर सही लोकेशन और समय हो।
- उदाहरण: उनके पिता ने 1990 में चंडीगढ़ के पास 250 वर्ग गज (लगभग 2500 वर्ग फुट) का प्लॉट 50,000 रुपये में लिया, जो आज लगभग 6 करोड़ का है; यानी लगभग 35 साल में 100 गुना से ज़्यादा।
- वे कहते हैं कि रियल एस्टेट में असली कीमत जमीन की होती है, इमारत की नहीं, क्योंकि पुरानी बिल्डिंग अक्सर गिराकर नई बना दी जाती है।
3. क्यों कहा जाता है – रियल एस्टेट लंबी अवधि का खेल है
- अगर रियल एस्टेट आपका पहला घर नहीं है (यानी investment property है), तो कम से कम 10 साल की होल्डिंग अवधि रखना ज़रूरी बताया गया है।
- उनका मानना है कि 10 साल की अवधि में औसतन 5% सालाना कॉम्पाउंड ग्रोथ, और बीच‑बीच में 25–50% के दो तेज़ उछाल मिल सकते हैं।
- वे equity market से तुलना करते हुए कहते हैं कि शेयर बाज़ार का “long term” 3 साल भी मान लिया जाता है, लेकिन रियल एस्टेट का असली long term 30–50 साल होता है।
- रियल एस्टेट की सबसे बड़ी “कमज़ोरी” – illiquidity (आसानी से न बिकना) – ही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है, क्योंकि लोग जल्दी बेच नहीं पाते और इसी कारण लंबे समय में बड़ा फायदा मिल जाता है।
- वे इसे इस तरह समझाते हैं: अगर रियल एस्टेट शेयर की तरह तुरंत बिक जाता, तो लोग दोगुना होते ही बेच देते और 20–30 गुना वाला फायदा कभी नहीं ले पाते।
4. कीमत से ज़्यादा ज़रूरी – लोगों का व्यवहार
- वक्ता बार‑बार कहते हैं कि वे रियल एस्टेट को सिर्फ कीमतों से नहीं, बल्कि व्यवहार (behavior) से समझते हैं।
- जब निवेशक पूछते हैं – “रिटर्न कितना मिलेगा?” – तो उन्हें लगता है कि बाज़ार बहुत गरम (overheated) है।
- जब घर ख़रीदने वाले पूछने लगते हैं – “घर टाइम पर मिलेगा? क़ानूनी और रेगुलेटरी चीज़ें ठीक हैं?” – तो ये संकेत है कि बाज़ार नॉर्मल या धीमा हो रहा है, और लोग डिसिप्लिन और सुरक्षा पर ध्यान दे रहे हैं।
- उनका निष्कर्ष: जब पूँजी “अनुशासन” (discipline) का पीछा करती है, तब बाज़ार सामान्य हो रहे होते हैं; जब पूँजी सिर्फ़ “तेज़ रिटर्न” का पीछा करती है, तब बाज़ार गरम होते हैं।
- इसी वजह से वे कहते हैं कि रियल एस्टेट को समझने के लिए “लोग कैसे सोच रहे हैं, क्या पूछ रहे हैं, कहाँ जा रहे हैं” – यह ज़्यादा अहम है।
5. किस तरह की लोकेशन तेज़ी से बढ़ती है
- उनके अनुसार रियल एस्टेट चार चीज़ों से बनता है: accessibility (आवागमन की सुविधा), infrastructure (सड़क, पुल, मेट्रो, आदि), connectivity (कनेक्टिविटी) और लोग (population/धाराएँ)।
- उदाहरण: 10 साल पहले नवी मुंबई के वाशी में 3BHK फ्लैट 5,000 रुपये प्रति वर्ग फुट था, जो अब लगभग 20,000 रुपये प्रति वर्ग फुट तक पहुँच चुका है – यानी 10 साल में लगभग 4 गुना।
- वाशी का उभार इसलिए हुआ क्योंकि मुंबई core area बहुत महँगा हो गया, और वाशी ज्यादा कनेक्टेड व relatively सस्ता विकल्प बना।
- वे भविष्यवाणी करते हैं कि अगले 30 साल में मुंबई और पुणे के बीच पूरा कॉरिडोर मिलकर लगभग एक बड़ा शहरी गलियारा (urban stretch) बन सकता है, बीच में कई नए शहर उभरेंगे।
- इसी तरह, बेंगलुरु–मैसूर एक्सप्रेसवे के कारण मैसूर और आसपास के प्लॉटेड डेवलपमेंट्स में निवेश कर रहे लोग 10–15 साल के नज़रिए से अच्छी बढ़त की उम्मीद कर रहे हैं।
6. कौन‑कौन से टियर‑2 शहर आगे बढ़ सकते हैं
- वक्ता ने कई टियर‑2 शहरों को भविष्य के तेज़ी वाले बाज़ार के रूप में चिन्हित किया है। प्रमुख नाम:
- उत्तर भारत: लखनऊ, इंदौर, Chandigarh–Mohali–Panchkula (ट्राइसिटी), जयपुर, सोनीपत (दिल्ली के पास)।
- दक्षिण भारत: मैसूर, कोच्चि, मंगलुरु, तिरुवनन्तपुरम, विशाखापट्टनम।
- पश्चिम भारत: मुंबई के आउटस्कर्ट, पुणे के बाहरी क्षेत्र, औरंगाबाद, नागपुर, नासिक आदि।
- पूरब में: कोलकाता के आसपास, जमशेदपुर, और आगे चलकर असम व नॉर्थ‑ईस्ट के कुछ शहर, बशर्ते इन्फ्रास्ट्रक्चर और जियोपॉलिटिकल स्थितियाँ सुधरें।
- इन शहरों की खासियत: बेहतर सड़कों, नए एयरपोर्ट, IT और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs), और बड़ी कंपनियों के दफ़्तरों का आना।
- उनका मानना है कि भारत की अगली बड़ी ग्रोथ story इन्हीं टियर‑2, टियर‑3 शहरों से आएगी, क्योंकि मेट्रो शहर सीमाओं पर पहुँच चुके हैं।
7. घर की affordability: आय बनाम कीमत
- चर्चा में ये बात आती है कि आज के समय में घर की कीमतें औसत आय के मुकाबले बहुत ज़्यादा लगती हैं।
- उदाहरण के तौर पर: बेंगलुरु में 3BHK घर की कीमत लगभग 2 करोड़ बताई गई, जबकि 30 साल के युवा की औसत सालाना आय लगभग 10–15 लाख मान सकते हैं; यानी house price to income ratio लगभग 15–20 गुना।
- वक्ता कहते हैं कि 30 साल पहले भी कई जगहों पर यह अनुपात 15–20 गुना तक था, यानी “महँगा” होने की धारणा नई नहीं है, बस आंकड़े बड़े हो गए हैं।
- उनकी राय में affordability का हल शहर के फैलाव और suburban विकास में है – यानी core शहर से बाहर नए, सस्ते, और जुड़े हुए इलाकों का विकास।
- वे ज़ोर देते हैं कि सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर सस्ती आवास नीति (affordable housing policy) लानी चाहिए, जहाँ land, interest rate और developer को मिलकर प्रोत्साहन मिले ताकि 50–75 लाख की रेंज में अच्छे घर बन सकें।
8. EMI बनाम आय – कितना सुरक्षित है?
- वे कहते हैं कि किसी भी middle class परिवार के लिए कुल EMI (सारे loan मिलाकर) आय के 50% से ज़्यादा नहीं होना चाहिए।
- इसमें शामिल हैं: होम लोन, कार लोन, पर्सनल लोन, क्रेडिट कार्ड EMI, मोबाइल/इलेक्ट्रॉनिक EMI, आदि।
- व्यावहारिक फॉर्मूला जो वे सुझाते हैं:
- कुल EMI ≤ मासिक household income का 50%
- होम लोन EMI लगभग 30% के आसपास रखना बेहतर है।
- उदाहरण: अगर परिवार की संयुक्त मासिक आय 1 लाख है, तो घर की EMI 30,000 रुपये से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए; 20,000–30,000 की रेंज अच्छा माना जा सकता है।
- उनके अनुसार, जिन परिवारों की household income 1.5–2 लाख रुपये प्रति माह है, वे 50–60 हजार EMI आराम से उठा सकते हैं, बशर्ते lifestyle और बाकी EMI कंट्रोल में हो।
9. कहाँ घर खरीदें – मेट्रो या अपना छोटा शहर?
- कई मेट्रो शहरों (जैसे मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद) में 2–3 करोड़ से कम में अच्छा घर मिलना मुश्किल है, इसलिए वहाँ रह रहे लोग अक्सर कन्फ्यूज़ रहते हैं।
- वक्ता का सुझाव: अगर आप मेट्रो में रहते हैं लेकिन मूल रूप से किसी टियर‑2 शहर (इंदौर, मैसूर, कोच्चि, चंडीगढ़ आदि) से हैं, तो पहले वहाँ घर खरीदने पर विचार कर सकते हैं।
- कारण:
- कीमतें अपेक्षाकृत कम होती हैं (75 लाख से 1 करोड़ के बीच)
- किराए पर देकर rental income लिया जा सकता है
- capital appreciation की संभावना ज़्यादा हो सकती है, क्योंकि शहर तेज़ी से विकसित हो रहे हैं।
- वे मानते हैं कि आप वहाँ अभी नहीं रह रहे, तब भी rental + future price appreciation, दोनों मिलकर अच्छे रिटर्न दे सकते हैं।
- वे इसे “government infrastructure आपके capital के लिए काम कर रहा है” कहते हैं – यानी सड़क, एयरपोर्ट, पुल, मेट्रो आदि बनते‑बनते आपकी प्रॉपर्टी की कीमत बढ़ती जाती है।
10. रियल एस्टेट और सामाजिक प्रतिष्ठा (status)
- बातचीत में एक बड़ा behavioral point आता है – लोग अपने mutual fund portfolio या SIP amount किसी को नहीं बताते, लेकिन 10 करोड़ का घर ज़रूर सबको बताते हैं।
- रियल एस्टेट को वे “self‑esteem” और “self‑respect” बढ़ाने वाली asset कहते हैं, जो समाज में व्यक्ति की आर्थिक स्थिति “घोषित” कर देती है।
- उदाहरण: कोई 10 करोड़ का घर खरीदता है, तो लोग automatically मान लेते हैं कि उसकी कुल नेटवर्थ 50 करोड़ होगी।
- इसी कारण कई अमीर लोग बहुत महँगे, कभी‑कभी तर्कहीन लगने वाले घर खरीदते हैं – ताकि अपनी सफलता और संपत्ति दिखा सकें।
- वे मुकेश अंबानी के घर “एंटीलिया” का उदाहरण देते हैं, जिसकी लागत लगभग 6000 करोड़ बताई गई थी और आज अनुमानित वैल्यू 18,000 करोड़ के आसपास बताई जाती है, यानी 15 साल में लगभग 3 गुना।
11. निवेशक कौन‑कौन सी बड़ी गलतियाँ करते हैं
- वक्ता बताते हैं कि उन्होंने “Master Residential Real Estate” और “Master Commercial Real Estate” नाम की किताबें लिखीं, क्योंकि 80% लोग घर खरीदते समय गलती करते हैं।
- प्रमुख गलतियाँ:
- अपनी ज़रूरत से छोटा या गलत कॉन्फ़िगरेशन का घर लेना (2BHK की ज़रूरत है, पर 1BHK ले लेना आदि)।
- लोकेशन गलत चुन लेना – जहाँ से ऑफिस, स्कूल, हॉस्पिटल, रोज़मर्रा की सुविधाएँ दूर हों।
- standalone बिल्डिंग में खरीद लेना, जबकि परिवार के लिए integrated township ज़्यादा सुविधाजनक और सुरक्षित होता।
- home loan संरचना समझे बिना loan ले लेना – fixed, floating, balloon payment, subvention plan आदि का अंतर न समझना।
- legal due diligence न करना – टाइटल, approvals, RERA status, builder की track record आदि न जाँचना।
- वे कहते हैं कि रियल एस्टेट में लगभग हर व्यक्ति खुद को “expert” समझता है (क्योंकि उसने या परिवार ने कभी न कभी घर खरीदा या बेचा), और यही overconfidence सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है।
12. अच्छी लोकेशन पहचानने के सरल मानक
- वे सुझाव देते हैं कि किसी भी प्रॉपर्टी की value समझने के लिए पहले उस micro‑market की resale कीमतें देखनी चाहिए, जैसे MagicBricks, 99acres, Housing आदि पोर्टल्स पर।
- उसके बाद local brokers (जो अब RERA certified होते हैं) से rate cross‑check कर सकते हैं।
- अच्छा location वह है जहाँ:
- मेट्रो/मुख्य सड़क/एक्सप्रेसवे से अच्छी connectivity हो
- पास में अच्छे स्कूल, हॉस्पिटल, बाज़ार, ऑफ़िस क्षेत्र हों
- crime rate और water–electricity की स्थिति ठीक हो
- future infrastructure projects (मेट्रो लाइन, फ्लाईओवर, IT पार्क, एयरपोर्ट) प्लान या निर्माणाधीन हों।
- वे integrated township (जहाँ घर, ऑफिस, स्कूल, पार्क, क्लब, दुकानें एक ही campus में हों) को future का model मानते हैं, खासकर ऐसे शहरों में जहाँ traffic बहुत ज़्यादा है।
13. बिल्डर से negotiation कैसे करें
- वे मानते हैं कि आजकल ज़्यादातर बड़े developers बहुत rigid pricing रखते हैं; 2–3% से ज़्यादा सीधा discount मिलना मुश्किल है।
- सीधे discount के अलावा ये तरीके ज़्यादा practical हैं:
- Payment plan बदलवाना: जैसे 4 साल में 25–25–25–25% देने की बजाय पहले साल कम, बाद के साल ज़्यादा, ताकि आपकी आय बढ़ते‑बढ़ते बोझ संभाला जा सके।
- अतिरिक्त work माँगना: जैसे modular kitchen, बेहतर flooring, wardrobes, basic furnishing आदि builder से शामिल करवाना।
- कुछ cases में अगर आप lump‑sum या बड़ा हिस्सा upfront दे सकते हैं, तो 5–10% तक discount संभव हो सकता है, लेकिन ये केस‑to‑केस पर depend करता है।
- उनका कहना है कि आम middle class के लिए सबसे बड़ा फायदा “अच्छा payment plan” होता है, ताकि cash‑flow manageable रहे।
14. passive income के लिए commercial और REIT
- residential प्रॉपर्टी से India में rental yield आम तौर पर 2–4% के बीच रहती है; integrated township, premium लोकेशन में ये थोड़ी ज़्यादा हो सकती है।
- passive income के लिए वे commercial रियल एस्टेट और REITs को बेहतर मानते हैं।
- REIT:
- बड़े commercial assets (office park, mall आदि) का pool होता है, जो SEBI regulated है।
- आमतौर पर हर साल 5% के आसपास rent escalation और 5–7% capital appreciation मिलकर लगभग 12% तक total return दे सकता है, ऐसा उनका अनुमान है।
- Lease Rental Discounting (LRD):
- अगर आपके पास कोई commercial building है जो अच्छे tenant (जैसे Google, Microsoft, Tata, आदि) को किराए पर दी हुई है और 10 लाख महीना rent आता है, तो बैंक उस rent के against 70–80 करोड़ तक loan दे सकता है।
- इस loan पर ब्याज़ दर अपेक्षाकृत कम होती है, क्योंकि बैंक का risk कम है (rent directly बैंक को जाता है)।
- HNIs इसी model से एक building की rental income को EMI में बदलकर दूसरी building खरीदते हैं और धीरे‑धीरे कई commercial assets बना लेते हैं।
15. fractional ownership और blockchain वाला रियल एस्टेट
- fractional ownership का मतलब है – एक बड़े commercial या residential asset को छोटे‑छोटे हिस्सों में बाँटकर कई investors को बेचना।
- अब कुछ प्लेटफॉर्म ऐसा मॉडल ला रहे हैं जहाँ आप “1 वर्ग फुट” या 10 रुपये जितनी छोटी रकम से भी real estate का हिस्सा खरीद सकते हैं, और ये सब blockchain पर record होता है।
- ये model अभी शुरुआती (nascent) stage पर है; SEBI और RERA दोनों तरह के regulation की ज़रूरत पड़ेगी, क्योंकि ये real estate + financial product दोनों है।
- fractional ownership को वे REIT से अलग बताते हैं:
- REIT केवल commercial assets का बड़ा professionally managed pool है, SEBI के सख़्त नियमों के तहत।
- fractional platforms private players द्वारा चलाए जा रहे हैं, जहाँ individual building या उसका हिस्सा tokenize करके बेचा जाता है।
- वे चेतावनी भी देते हैं कि जब आप real estate को बहुत ज़्यादा liquid बना देते हैं (share की तरह रोज़ trade हो सके), तो उसकी मूल “illiquid” ताकत कम हो जाती है, जो long term wealth creation में मदद करती है।
16. policy, planning और future का भारत
- वक्ता बार‑बार कहते हैं कि “Viksit Bharat 2047” के vision में “housing for all” सबसे बड़ा लक्ष्य है – इसलिए प्रधानमंत्री “mutual fund for all” नहीं, “घर सबके लिए” की बात करते हैं।
- भारत में अभी लगभग 125 एयरपोर्ट हैं, जबकि अमेरिका में लगभग 5000; वे मानते हैं कि जैसे‑जैसे एयरपोर्ट और road network बढ़ेगा, वैसे‑वैसे नए शहर और नए real estate markets खुलेंगे।
- वे Dubai का उदाहरण देकर कहते हैं कि वहाँ government और developers मिलकर centralized planning करते हैं, और real estate regulator (RERA जैसी संस्था) बहुत मजबूत है।
- भारत में real estate state subject होने के कारण हर राज्य की अपनी policies हैं; इसलिए एक national level “strong RERA” बनाना आसान नहीं है, लेकिन यही long term में transparency और planning सुधार सकता है।
- उनका मानना है कि अच्छे developers, मज़बूत regulation, और सही city planning मिलकर ही रियल एस्टेट को भरोसेमंद और आम लोगों के लिए सुरक्षित बना सकते हैं।
17. आपके लिए व्यावहारिक सीख (संक्षेप में बिंदुवार)
- रियल एस्टेट को कम से कम 10 साल और आदर्श रूप से 30 साल के नजरिए से देखें, तभी असली compounding दिखेगी।
- EMI की कुल राशि, आपकी household income के 50% से अधिक न हो; home loan EMI लगभग 30% के आसपास रखें।
- अगर मेट्रो शहर में घर afford न हो, तो अपने टियर‑2 “home town” या किसी उभरते टियर‑2 शहर में पहला निवेश करें।
- लोकेशन चुनते समय micro‑market की resale कीमत, upcoming infrastructure, स्कूल‑ऑफिस‑हॉस्पिटल की दूरी, सब देखें; सिर्फ़ builder की branding पर न जाएँ।
- सीधे discount से ज़्यादा फोकस payment plan, अतिरिक्त फिट‑आउट (kitchen, wardrobes) और बेहतर specification पर करें।
- passive income के लिए सिर्फ़ residential किराए पर निर्भर रहने की बजाय REIT और मजबूत tenant वाले commercial property model को भी समझें।
- fractional ownership और blockchain वाले products को समझकर ही entry करें, क्योंकि ये अभी नए और evolving हैं।
- सबसे महत्वपूर्ण – रियल एस्टेट decision लेने से पहले खुद को “expert” न मानें; legal, financial और practical सलाह लेकर ही बड़ा फैसला लें।






