ओडिशा के कोरापुट जिले में 26 जनवरी को मांस‑मछली‑अंडे की बिक्री पर एक दिन की रोक का निर्णय पूरे देश के लिए एक मजबूत नैतिक मिसाल है, इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना भारत को उसकी शास्त्रीय, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जड़ों से जोड़ने वाला कदम हो सकता है। शास्त्र, अहिंसा‑सिद्धांत, पर्यावरण, स्वास्थ्य और पशु‑अधिकार – हर स्तर पर मांसाहार का त्याग और उस दिशा में नीतिगत प्रोत्साहन समय की मांग है।
1. प्रस्तावना: कोरापुट से उठी एक नैतिक आवाज
- ओडिशा के कोरापुट जिला प्रशासन ने 77वें गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी 2026 को पूरे दिन मांस, मछली, चिकन और अंडे की बिक्री पर रोक लगाने का आदेश जारी किया, निर्देश सभी ब्लॉक विकास अधिकारियों और तहसीलदारों तक भेजे गए।
- आदेश में साफ लिखा गया कि 26 जनवरी के दिन पूरे जिले में नॉन‑वेज आइटम की बिक्री प्रतिबंधित रहेगी, यह शायद ओडिशा में इस तरह का पहला प्रशासनिक प्रयोग है जिसने राष्ट्रीय स्तर पर बहस को जन्म दिया।
- बाद में विरोध एवं विवाद के चलते आदेश को वापस लेने की खबरें भी आईं, जो दिखाती हैं कि मांसाहार के मसले पर नीति बनाते समय राजनीतिक संकोच और दबाव कितने गहरे हैं।
2. शास्त्र दृष्टि: मांसाहार क्यों महापाप
- अनेक वैदिक और स्मृति‑ग्रंथों में अहिंसा को सर्वोच्च धर्म बताया गया है और जीवहत्या के माध्यम से भोजन प्राप्त करना घोर अधर्म माना गया है; कई व्याख्याकारों ने स्पष्ट कहा है कि मांस खाने वाला पाप का भागी होता है और आध्यात्मिक प्रगति से वंचित रहता है।
- मनुस्मृति जैसे ग्रंथों की चर्चित व्याख्याओं में यह कथन मिलता है कि जो प्राणी मांस भक्षण करता है, वह शुद्धि से दूर होता है और उसके लिए जड़ी‑बूटी एवं शाक‑सब्जी पर आधारित जीवन को श्रेष्ठ माना गया है।
- अथर्ववेद और उपनिषदों पर लिखे टीकाकारों ने कई स्थानों पर करुणा‑हीन होकर मांस खाने वालों को निंदनीय बताया है और सत्य तथा अहिंसा को धर्म का शिखर मानते हुए पशु‑हत्या से दूरी को सत्यशील जीवन की अनिवार्य शर्त कहा है।
- शिक्षापत्री जैसे बाद के धर्मग्रंथों में भी स्पष्ट निर्देश मिलता है कि किसी भी परिस्थिति में मांस न खाया जाए, भले वह यज्ञ‑बलि में ही क्यों न चढ़ाया गया हो; मांसाहार और मद्यपान को असुर‑स्वभाव से जोड़ा गया है।
3. अहिंसा और कर्म: स्वाद के बदले रक्त की कीमत
- हिंदू दर्शन में हर प्राणी में ईश्वर का अंश माना गया है, ऐसे में जानवर को केवल स्वाद की संतुष्टि के लिए मारना अहिंसा‑सिद्धांत और ईश्वरीय सृष्टि‑सम्मान, दोनों का सीधा उल्लंघन है; कर्म‑सिद्धांत के अनुसार ऐसी हिंसा का फल किसी न किसी रूप में भुगतना ही पड़ता है।
- शाकाहार का आग्रह करने वाले अनेक वैदिक‑वेदांतिक लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि मांसाहार न केवल मन को असंवेदनशील और क्रूर बनाता है बल्कि साधना, ध्यान और भक्ति‑मार्ग में एक बड़ा अवरोध बन जाता है।[
- “स्वाद” के नाम पर पशु‑हत्या का विस्तार वास्तव में मनुष्य की इंद्रिय‑वासनाओं के गुलाम होने का प्रतीक है, जो धर्म‑शास्त्रों के उस आदर्श के ठीक उलट है जिसमें इंद्रियनिग्रह और संयम को सर्वोच्च साधना माना गया है।
4. आँकड़े: कितनी जानें सिर्फ प्लेट तक
- भारत में मांस‑उद्योग से जुड़े आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष करोड़ों पशु‑पक्षी केवल मांस‑उत्पादन के लिए काटे जाते हैं; हाल की सांख्यिकीय रिपोर्ट बताती है कि 2023‑24 में ही लगभग 2.44 लाख गाय‑सांड, 14.53 लाख भैंस, 80.70 लाख भेड़, 1.35 करोड़ बकरियाँ, 9.62 लाख सूअर और लगभग 3.35 अरब मुर्गियाँ मांस के लिए मारी गईं।
- मांस‑उद्योग पर बने एक तकनीकी दस्तावेज़ में यह भी दर्ज है कि भारत में प्रति व्यक्ति औसत मांस‑खपत लगभग 5.2 किलोग्राम प्रतिवर्ष है, जबकि विश्व औसत करीब 39.8 किलोग्राम है; इसके बावजूद कुल आबादी के संदर्भ में भारत में मांस खाने वालों की अनुमानित हिस्सेदारी लगभग 70 प्रतिशत बताई गई है।
- यानी, अपेक्षाकृत कम प्रति‑व्यक्ति खपत के बावजूद बहुत बड़ी जनसंख्या किसी न किसी रूप में मांस पर निर्भर है, जिसके कारण पशु‑हत्या की कुल संख्या भयावह स्तर पर पहुँच चुकी है; यह केवल “खाने की पसंद” नहीं, एक विशाल हिंसक ढांचा बन चुका है।
5. स्वास्थ्य और पर्यावरण: मांसाहार की छिपी कीमत
- मांस‑उद्योग पर बनी रिपोर्टें बताती हैं कि दुनिया भर में बड़े पैमाने पर मांस उत्पादन के लिए पशुपालन से ग्रीनहाउस गैसें, वनों की कटाई और जल‑संसाधनों का अत्यधिक दोहन बढ़ता है, जिससे पर्यावरणीय संकट गहरा होता है; भारत भी इससे अछूता नहीं है और यहां की नीतिगत बहस में यह पक्ष अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
- कई वैदिक‑दृष्टिकोण वाले लेखकों ने तर्क दिया है कि मांसाहार न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से हानिकारक है, बल्कि आधुनिक वैज्ञानिक शोधों के हवाले से इसे हृदयरोग, मोटापा और अन्य जीवनशैली‑रोगों से जोड़ते हैं, जबकि संतुलित शाकाहार को शरीर और मन के लिए अधिक अनुकूल बताते हैं।
- जब एक समाज “स्वाद” के लिए करोड़ों पशुओं की हत्या को सामान्य मान लेता है तो वह अनायास ही हिंसा, क्रूरता और भोगवाद को सामाजिक‑सामान्य मानकों में जगह दे देता है, जिसका दुष्परिणाम मनोवैज्ञानिक हिंसा, अपराध‑वृद्धि और संवेदनहीनता के रूप में भी दिखाई दे सकता है।
6. “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” बनाम सामाजिक‑धर्मिक उत्तरदायित्व
- कोरापुट के निर्णय के विरोध में सबसे बड़ा तर्क यही रखा गया कि यह नागरिकों की “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है; कई समाचारों में इसे प्रशासनिक अतिक्रमण कहा गया।
- लेकिन किसी भी सभ्यता में स्वतंत्रता का अर्थ असीमित स्वच्छंदता नहीं होता; अगर स्वतंत्रता के नाम पर हम जानवरों पर संगठित हिंसा को सामान्य कर दें तो यह उन मौलिक नैतिक मूल्यों पर ही प्रहार है जिन पर संविधान की भावना और भारतीय संस्कृति दोनों टिकी हैं।
- भारत में पहले से ही शराबबंदी, गोहत्या‑प्रतिबंध, सूअर‑मांस या गाय‑मांस जैसे मामलों में क्षेत्रीय प्रतिबंधों की मिसालें मौजूद हैं, जिन्हें स्थानीय सामाजिक‑धार्मिक संवेदनशीलता के आधार पर वैध माना जाता है, तो फिर गणतंत्र दिवस जैसे पावन अवसर पर एक दिन के मांस‑प्रतिबंध को असहिष्णुता कहना तर्कसंगत नहीं लगता।
7. राष्ट्रीय पर्व और शुद्धता का भाव
- 15 अगस्त और 26 जनवरी केवल सरकारी छुट्टियाँ नहीं, राष्ट्र‑स्वाभिमान और बलिदान‑स्मृति के दिन हैं; ऐसे दिन पर कम से कम एक जिले ने यह संदेश देने की कोशिश की कि देशभक्ति का उत्सव रक्त‑रंजित थालियों की बजाय संयम, शुचिता और अहिंसा से जुड़ना चाहिए।
- अनेक धार्मिक‑आध्यात्मिक परंपराएँ मानती हैं कि व्रत, पर्व और उत्सव के दिनों में सात्त्विक भोजन ही किया जाए, ताकि मन निर्मल रहे; गणतंत्र दिवस जैसे दिन को “राष्ट्रीय सात्त्विक‑दिवस” के रूप में मनाने की दिशा में मांस‑प्रतिबंध जैसे कदम एक प्रतीकात्मक शुरुआत हो सकते हैं।
- यदि हम शहीदों की स्मृति में दो मिनट का मौन रख सकते हैं, राष्ट्रध्वज के सम्मान में पूरे देश को खड़ा कर सकते हैं, तो क्या एक दिन के लिए मांस न बेचने, न खाने का सामूहिक संकल्प इतना असहनीय बोझ है कि इसे “अधिकार‑हनन” कहने लगें? यह प्रश्न हमें स्वयं से पूछना होगा।
8. नीति‑निर्माण: पूरे देश में ऐसे प्रतिबंध क्यों और कैसे
- कोरापुट की तरह एक‑दिनीय मांस‑बंदी को पूरे देश में लागू करने के लिए केंद्र और राज्यों दोनों स्तर पर नीति बनाई जा सकती है, जैसे ड्राई‑डे (शराबबंदी दिवस) पहले से लागू हैं; इससे 26 जनवरी और 15 अगस्त को कम से कम पशुओं पर होने वाली हिंसा में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
- नीति‑निर्माताओं के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि वे मांस‑उद्योग के आंकड़ों को सामने रखकर इस हिंसक अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक पर्यावरणीय और स्वास्थ्य‑प्रभावों पर राष्ट्रीय विमर्श शुरू करें, जिससे जनता को भी समझ आये कि यह केवल “धार्मिक आग्रह” नहीं, बल्कि समग्र नैतिक‑वैज्ञानिक प्रश्न है।
- प्रारंभिक चरण में राष्ट्रीय पर्वों, प्रमुख धार्मिक त्योहारों और विशेष स्मृति‑दिवसों पर मांस‑बंदी, अगला कदम सार्वजनिक संस्थानों (स्कूल, हॉस्टल, सरकारी कैंटीन आदि) में शाकाहारी खाद्य‑नीति और दीर्घकाल में मांस‑उद्योग पर कड़े विनियमन व धीरे‑धीरे निर्भरता घटाने की योजना बनाई जा सकती है।
9. समाज की भूमिका: मांसाहार‑विरोध को जनआंदोलन बनाना
- केवल कानून से बदलाव पूर्ण नहीं होता, इसलिए आवश्यक है कि समाज‑स्तर पर आध्यात्मिक‑सांस्कृतिक संगठन, गौ‑संरक्षण, पशु‑कल्याण और पर्यावरण‑समूह मांसाहार‑विरोधी अभियान को शास्त्र‑समर्थन, वैज्ञानिक तथ्य और करुणा‑आधारित भाषा के साथ आगे बढ़ाएँ।
- स्कूल‑कॉलेजों में “अहिंसा, करुणा और भोजन‑संस्कार” पर व्याख्यान, निबंध‑प्रतियोगिताएँ और जागरूकता‑कार्यक्रम आयोजित कर युवाओं को बताया जा सकता है कि उनका भोजन‑चयन सिर्फ निजी नहीं, बल्कि धरती, पशु और समाज पर प्रभाव डालने वाला नैतिक निर्णय है।
- धार्मिक‑समाज और मंदिर‑संस्थाएँ यदि सामूहिक संकल्प लें कि वे मांसाहार के विरोध में सकारात्मक संदेश फैलाएँगी और अपने अनुयायियों को शाकाहार की ओर प्रेरित करेंगी, तो सामाजिक वातावरण बदलना कहीं अधिक सरल हो जाएगा।
10. निष्कर्ष: जड़ों की ओर लौटने का वास्तविक अर्थ
- भारत की आध्यात्मिक परंपरा की असली जड़ अहिंसा, करुणा और संयम है; शास्त्र‑सम्मत जीवन‑शैली का अर्थ केवल पूजा‑पाठ बढ़ा देना नहीं, बल्कि अपने भोजन तक में अहिंसा को स्थान देना है, जिसमें मांसाहार त्यागना केंद्रीय कदम है।
- कोरापुट जैसे निर्णय यदि पूरे देश में प्रेरणा बनें, 26 जनवरी और 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर कम से कम एक दिन के लिए मांस‑बंदी लागू हो और धीरे‑धीरे समाज शाकाहार की ओर अग्रसर हो, तो यह केवल नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि भारत के आत्मा‑स्वरूप की पुनर्स्थापना होगी।
- आज आवश्यकता इस बात की है कि हम “स्वाद की स्वतंत्रता” से ऊपर उठकर “जीवन की पवित्रता” को महत्व दें और मांसाहार के प्रति अपने विरोध को निजी विकल्प भर न मानकर एक नैतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय कर्तव्य के रूप में समझें।








