प्रश्न की पृष्ठभूमि
- प्रश्नकर्ता: अर्जुन जी, जोधपुर से।
- प्रश्न: गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – मेरा स्मरण करो और युद्ध कर, अर्थात कर्तव्य कर्म भी कर और युद्ध भी कर। यदि भगवान का स्मरण करेंगे तो कर्तव्य कर्म ठीक से नहीं होगा, और यदि कर्तव्य कर्म में मन लगाएंगे तो भगवान का स्मरण कैसे होगा?
अभ्यास की आवश्यकता और गीता का निर्देश
- महाराज जी कहते हैं: “कैसी बात करते हो, ऐसा कैसे हो सकता है? ऐसा कैसे हो सकता है? ये आपने अभी अभ्यास नहीं किया इसलिए ऐसा है।”
- वे बताते हैं कि भगवान ने स्वयं गीता में कहा है – “अभ्यास योग युक्त चेतस” – अभ्यास से ही यह स्थिति बनती है।
- निष्कर्ष के रूप में वे कहते हैं कि समस्या यह नहीं कि स्मरण और कर्तव्य साथ नहीं हो सकते, समस्या यह है कि साधक ने अभ्यास ही नहीं किया।
भजन और कार्य एक साथ कैसे चल सकते हैं
- महाराज जी कहते हैं: “आप जो भी कार्य कहो हम वही कार्य करेंगे – फावड़ा चला के, जो आपसे बात कर… हम आपसे बात कर रहे हैं, हमारा भजन चल रहा है।”
- वे बार‑बार आश्वस्त करते हैं: “आप जान पाओगे नहीं। हम आपसे बात कर रहे हैं, हमारा भजन चल रहा है, विश्वास कीजिए हमारी इस बात पर।”
- वे स्पष्ट करते हैं: “हम आपसे बात कर रहे हैं, हमारा भजन चल रहा है, हमारा चिंतन चल रहा है प्रभु का।”
- उदाहरण देते हैं: जैसे आप हमारी बात सुन रहे हैं, फिर भी अंदर कुछ न कुछ चलता रहता है, उसी जगह भजन चलना चाहिए।
- वे कहते हैं: “हम बड़ी एकाग्रता से जो कार्य कहोगे वह कार्य करेंगे और भजन एक सेकंड के लिए भी नहीं रुकेगा।”
अभ्यास का उदाहरण: निशानेबाज और साधक
- महाराज जी कहते हैं: “जैसे हमसे कहा जाए कि आप यहां निशाना लगाइए तो हम आंख खोल के भी नहीं लगा सकते।”
- वे तुलना करते हैं: अगर कोई निशानेबाज है तो पीछे से भी शूट कर देगा, क्योंकि उसने अभ्यास किया है।
- वे निष्कर्ष बताते हैं: “आपका अभ्यास कमजोर, इसलिए आप ऐसा कहते हैं।” यानी स्मरण और कर्म में टकराव दिखना अभ्यास की कमी का परिणाम है।
कर्म समर्पण से हृदय की पवित्रता और भजन
- महाराज जी कहते हैं: “जो कर्म करते हैं न, जब पूरा हो जाता है न दिन, तब तो कर्म समर्पित कर देते हैं।”
- वे बताते हैं: फिर भी ऐसा लगता है कि पूरे दिन भगवान को याद नहीं किया, केवल कर्तव्य में ही लगे रहे।
- वे उपाय बताते हैं: ऐसा भी करते रहो – कर्म समर्पण – आगे चलकर कर्म समर्पण से हृदय जब पवित्र होगा तो भजन होने लगेगा।
- वे शास्त्रवचन का उल्लेख करते हैं: “एक अव्यावत भजना, एक‑एक वृत्त मुरारी पादार्पित वृत्ति।”
गोपियों का उदाहरण: अनेक कार्यों के बीच निरंतर स्मरण
- महाराज जी पूछते हैं: “गोपिकाएं क्या नहीं करती थीं?”
- वे गिनाते हैं:
- घर लिपना।
- धान कूटना।
- परिवार की सेवा करना।
- बच्चों का पालन‑पोषण करना।
- पति की सेवा करना।
- गाय धोना, गाय बांधना।
- इस सबके बीच उनकी स्थिति: “लेकिन मुरारी पाद अर्पित चित्तवृत्ति – भगवान के चरणों में चित्तवृत्ति अर्पित है।”
कार्य की कुशलता और भगवत स्मरण
- महाराज जी कहते हैं: “कार्य यही तो कहते हैं कि कार्य की कुशलता आपके अंदर नहीं आई, ये अकुशलता है।”
- वे स्पष्ट करते हैं: “भगवत विस्मरण करके कार्य करना कार्य की कुशलता नहीं है, भगवत स्मरण करके कार्य करना कार्य की कुशलता है।”
- उदाहरण स्वरूप वे बताते हैं कि बड़े अच्छे से रोटी बनाते हुए, झाड़ू लगाते हुए, फावड़ा चलाते हुए भी भजन चल सकता है।
लैपटॉप और शरीर स्मरण का उदाहरण
- महाराज जी कहते हैं: “अब जैसे लैपटॉप चला रहे हैं और हम भगवान के हैं, हमारा आश्रय है तो लैपटॉप चलाते हुए आश्रय चला जाएगा क्या?”
- वे प्रश्न करते हैं: “हम अपने शरीर का स्मरण करते हैं क्या? हमारे शरीर का विस्मरण होता है क्या? दोनों उत्तर दे दीजिए।”
- फिर वे कहते हैं: “ये है स्मृति।”
- वे समझाते हैं: “अपने शरीर का हम कभी जप नहीं करते, अपने शरीर का ध्यान नहीं करते, लेकिन अपने शरीर को कभी भूलते भी नहीं कि मैं शरीर हूं।”
- वे निष्कर्ष बताते हैं: “तो मैं प्रभु का दास हूं, यह बैठ जाए हृदय में तो हर समय भजन होता रहेगा, हर समय चिंतन चलता रहेगा।”
अभ्यास योग और बचपन से संस्कार
- महाराज जी कहते हैं: “इसीलिए अभ्यास कर भगवान ने लिखा है – अभ्यास योग युक्त चेतस निगामिना – चित्त कहीं जाए न, ऐसा अभ्यास कर लो।”
- वे आश्वस्त करते हैं: “तो अभ्यास से ऐसा होगा।”
- वे अपना उदाहरण देते हैं: “अब जैसे बचपन से अभ्यास किया है, तो उसी का लाभ मिल रहा है कि आपसे बात कर रहे हैं, फिर हमारे दिमाग में वही घूम रहा है, राउंड‑राउंड‑राउंड।”
लंबे समय तक कार्य के बीच भी स्मरण
- महाराज जी कहते हैं: “अब जैसे हमें 10 घंटे के लिए किसी कार्य में लगा दिया जाए, ऐसा थोड़ी कि हम कार्य नहीं करते।”
- वे संग के लोगों की ओर संकेत करते हैं: “इन लोगों से पूछो, साथ रहते कार्य करते हैं।”
- वे बताते हैं: कार्य करते समय “सीरियस मूड, सीरियस – कार्य करते समय विशेष सीरियस।”
- वे आगे कहते हैं: “जैसे आपसे हम बात करें तो विशेष सावधान, अकेले हैं तो मस्ती में हो रहा है, जब कोई आ गया तो सावधान – कि विस्मरण न होने पावे।”
श्वास‑श्वास में नाम: “राधा‑राधा”
- महाराज जी कहते हैं: “अब हमारे स्वास में चल रहा है – राधा, राधा, राधा। हम आपसे बात भी कर रहे हैं।”
- शंका पूर्वक प्रश्न की तरह उठाते हैं: “अब आप कहते हो कैसे चल रहा है?”
- वे उत्तर देते हैं: “अभ्यास करो, तो देखो चलने लगेगा।”
- वे कहते हैं: “अभ्यास जहां से शब्द आया, वहीं संधान किया, वही बाण जा के लगा।”
श्रवण कुमार और शब्द वेधी बाण का उदाहरण
- महाराज जी कथा उदाहरण देते हैं: “श्रवण कुमार के छाती में बाण लगा, डुब‑डुब‑डुब ऐसे घड़े की आवाज हुई।”
- वे बताते हैं: राजा दशरथ ने समझा – मृग पानी पी रहा है, शब्द वेधी बाण मारा।
- वे कहते हैं: “महाराज दशरथ जी ने तो छाती में लगा जाकर श्रवण कुमार को देखा थोड़ी था, शब्द वेधी बाण।”
सरल युक्ति: कर्म समर्पण और नाम जप
- श्रोता पूछते हैं: “महाराज कोई सरल युक्ति है क्या अभ्यास की?”
- महाराज जी उत्तर देते हैं: “यही करते रहो – कर्म समर्पण और नाम जप।”
- वे कहते हैं: “जब स्मृति आवे तो, बार‑बार अगर स्मृति को कोसोगे तो स्मृति बढ़ने लगेगी।”
- वे पश्चाताप का भाव बताते हैं: “पश्चाताप – यार पांच मिनट हो गए, एक बार भी राधा नहीं बोला।”
- वे परिणाम बताते हैं: “तो मन जो है, वह पकड़ने लगेगा राधा को।”
हर पाँच मिनट में “राधा‑राधा” की साधना
- महाराज जी कहते हैं: “हर पांच मिनट में राधा‑राधा, तो हमारा लंबा समय नहीं जाएगा।”
- वे प्रश्न करते हैं: “एक बार राधा बोल दो, पांच मिनट में क्या जाता है?”
- वे निर्देश देते हैं: “इतनी सावधानी रखो कि हम कह रहे, कुछ भी कर रहे, राधा‑राधा – हर पांच मिनट में राधा बोलो।”
- वे आगे कहते हैं: “अगर 24 घंटे भजन में चलने लगे तो हमें बताना।”
चित्र के माध्यम से अभ्यास और चिंतन
- महाराज जी कहते हैं: “चित्र भी सामने लगा है, वो नहीं कि चित्र भी जाए। कंप्यूटर पर उसके सामने चित्र भी लगा।”
- वे कहते हैं: “हां तो इन्हीं सब बातों से हम अभ्यास करते हैं।”
- वे बताते हैं: “हमारे चित्रगत राधा, तो हमारा चिंतन बंटता रहे – हमारा चिंतन…”
भजन और सांसारिक कार्य साथ‑साथ
- महाराज जी स्पष्ट कहते हैं: “और ये नहीं कि अगर हम भजन करेंगे तो सांसारिक कार्य नहीं कर सकते, बहुत अच्छे से कार्य कर सकते हैं।”
- वे कहते हैं: “क्योंकि वो सब हम करके देखें, सब करके देखें।”
- वे उदाहरण देते हैं:
- “वृक्षों में पानी लगाना है तो फावड़ा चला के भी।”
- “सब झाड़ू लगा के भी।”
- “रसोई बना करके।”
- वे निष्कर्ष बताते हैं: “सब कार्य करते हुए भजन बहुत अच्छे से चलता है।”
अभ्यास का अनिवार्य होना
- महाराज जी कहते हैं: “अभ्यास मतलब इसमें जरूरी अभ्यास है, ऐसा नहीं कि आश्चर्यचकित अर्थ है।”
- वे चेतावनी देते हैं: “आप बैठे‑बैठे भजन नहीं करोगे, यदि अभ्यास नहीं तो बैठे‑बैठे मन आपको घुमाता रहेगा संसार में।”
- वे बताते हैं: “अभ्यास है तो कार्य करते हुए भी चलते।”
युद्ध का उदाहरण और गीता का आदेश
- महाराज जी कहते हैं: “जब युद्ध में अगर भजन न हो सकता तो भगवान आदेश न करते।”
- वे युद्ध की कठिनाई बताते हैं: “और युद्ध जैसा – अपनी गर्दन बचानी, दूसरे की काटनी है, एकाग्रता कितनी उसमें चाहिए, जरा सा चूके कि मरे।”
- इस स्थिति में भी श्रीकृष्ण का आदेश: “और उस समय भी भगवान कहे – मा मनुस्मरण, युद्ध – मेरा स्मरण और युद्ध कर।”
- महाराज जी निष्कर्ष निकालते हैं: “तो इसका मतलब युद्ध से सब सरल कार्य है, सबसे कठिन कार्य युद्ध है, जब युद्ध करते हुए भजन हो सकता है तो सब कार्य करते हुए हो सकता है।”
- वे अंत में कहते हैं: “हमें अभ्यास में आगे उन्नति प्राप्त करनी।”
सार‑रूप में महाराज जी के मुख्य बिंदु (केवल उनके शब्दों का भावानुक्रम, बिना व्याख्या)
- अभ्यास न होने के कारण लगता है कि भगवान का स्मरण और कर्तव्य साथ‑साथ नहीं हो सकते।
- गीता में “अभ्यास योग युक्त चेतस” कहकर भगवान ने अभ्यास का ही आदेश दिया है।
- साधक एकाग्रता से कार्य भी कर सकता है और साथ‑साथ भजन भी एक सेकंड के लिए बिना रुके चल सकता है।
- गोपिकाओं ने घर, परिवार, गाय, पति, बच्चों की सेवा करते हुए भी चित्त को भगवान के चरणों में अर्पित रखा।
- भगवत विस्मरण करके कार्य करना अकुशलता है, भगवत स्मरण करके कार्य करना ही कार्य की कुशलता है।
- जैसे शरीर का जप नहीं करते, फिर भी शरीर का विस्मरण नहीं होता, वैसे ही “मैं प्रभु का दास हूं” की स्मृति बैठ जाए तो हर समय भजन होता रहेगा।
- बचपन से किया गया अभ्यास इस रूप में फल देता है कि बाहर के कार्य चलते हुए भी भीतर स्मरण राउंड‑राउंड चलता रहता है।
- हर पांच मिनट में कम से कम एक बार “राधा‑राधा” कहना, स्मृति को बढ़ाने और मन को पकड़ने का सरल अभ्यास है।
- चित्र सामने रखना, नाम जप, कर्म समर्पण – इन सब से अभ्यास बनता है और चिंतन बंटने के बजाय भगवान की ओर टिकता है।
- यदि युद्ध जैसे कठिन और एकाग्रता‑साध्य कार्य में भी भगवान स्मरण का आदेश देते हैं, तो अन्य सभी सांसारिक कार्यों के साथ स्मरण सहज रूप से संभव है, बशर्ते अभ्यास किया जाए।






