कुछ लोग पूजा‑पाठ नहीं करते हुए भी सफल दिखते हैं – इस पूरे प्रवचन में महाराज जी इसका उत्तर कर्म, प्रारब्ध, पुरुषार्थ और नाम‑श्रद्धा के सिद्धांत से देते हैं। नीचे उनकी बातों को बिंदुवार रखकर लगभग 3000 शब्द का विस्तृत हिंदी लेख दिया जा रहा है।[youtube]
1. प्रारब्ध और बार‑बार असफलता
- महाराज जी कहते हैं कि कोई व्यक्ति नाम जप भी करता है, धर्म से चलता है, फिर भी उसका प्रारब्ध बार‑बार उसे गिरा देता है।[youtube]
- उदाहरण देते हैं कि जैसे कोई छात्र बार‑बार फेल हो जाए तो माता‑पिता उसे पढ़ाई से अलग कर देते हैं, वैसे ही जीवन की असफलताएँ भी हमारे कर्मों के अध्याय से ही आती हैं, किसी और की किताब से नहीं।[youtube]
- जो भी प्रश्न, समस्याएँ, कष्ट हमारे जीवन में आते हैं, वे सब हमारी अपनी ही क्लास के चैप्टर हैं – यानी हमारे ही किए हुए कर्मों का फल हैं।[youtube]
- नौकरी, व्यापार, परिवार, स्वास्थ्य – हर क्षेत्र में जो भी परीक्षा मिलती है, वह हमारे ही अतीत के कर्मों की परख है, किसी और के हिस्से की नहीं।[youtube]
2. नौकरी न मिले तो भी निराश क्यों न हों
- महाराज जी कहते हैं कि जैसे नौकरी पाने के लिए एग्जाम दिया जाता है, वैसे ही जीवन में भी कई परीक्षाएँ आती हैं।[youtube]
- यदि कोई सर्वतोभाविन (हर तरह से योग्य, मेहनती, तैयार) होने के बाद भी नौकरी न पाए, तो उसे यह समझकर संतोष करना चाहिए कि वह अपने बुरे कर्मों के प्रारब्ध को भोग रहा है।[youtube]
- लेकिन इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि बैठ जाएँ, प्रयास छोड़ दें; महाराज जी स्पष्ट कहते हैं – बैठना नहीं, दूसरा प्रयास करते रहना चाहिए।[youtube]
- यदि प्रारब्ध बार‑बार फेल करा रहा है, तो रास्ता बदलने की सलाह देते हैं – नौकरी न मिले तो छोटा व्यापार कर लो, नहीं तो मजदूरी करके भी ईमानदारी से कमाओ।[youtube]
3. छोटा काम, मजदूरी, रिक्शा – इसमें भी इज्जत है
- महाराज जी कहते हैं कि यदि नौकरी नहीं मिल रही, तो पढ़ा‑लिखा इंसान भी कोई छोटा व्यापार कर सकता है; कुछ नहीं तो लेबर (मजदूरी) कर सकता है।[youtube]
- वे उदाहरण देते हैं कि लेबर को भी आठ घंटे काम के मिलते हैं; वह सम्मानपूर्वक मेहनत की कमाई से माता‑पिता एवं परिवार की सेवा कर सकता है।[youtube]
- वे बताते हैं कि रिक्शा चलाने वाले भी 500, 1000 रुपए प्रतिदिन कमा लेते हैं और अपने परिवार का पालन‑पोषण सम्मान से करते हैं, इसमें किसी प्रकार की बेइज्जती नहीं है।[youtube]
- बेईमानी, गंदा आचरण और कायर बने रहना गलत है; परिश्रमपूर्वक छोटा काम करना कभी अपमानजनक नहीं, बल्कि चरित्र की महानता है।[youtube]
4. हर हाल में पुरुषार्थ और उन्नति की संभावना
- महाराज जी सुनिश्चित आश्वासन देते हैं कि जो व्यक्ति उद्योगशील है, प्रयास करता रहता है, वह लेबर से भी आगे बढ़ता चला जाता है।[youtube]
- वे कहते हैं कि बहुत छोटा व्यापार भी यदि धैर्य और ईमानदारी से धीरे‑धीरे, क्रमशः बढ़ाया जाए, तो आदमी अरबपति तक बन सकता है।[youtube]
- उनके अनुसार निराश होने का कोई कारण नहीं; यदि आज की स्थिति कमजोर है तो इसका समाधान प्रयत्न और श्रद्धा दोनों से होता है।[youtube]
- साथ ही वे चेतावनी भी देते हैं कि भगवान पर अविश्वास नहीं करना, बल्कि श्रद्धा बनाए रखना ही हमारे मंगल का कारण बनता है।[youtube]
5. पापी लोग भी सुखी क्यों दिखते हैं?
- इसी प्रश्न का मूल उत्तर देते हुए महाराज जी उदाहरण देते हैं – कितने लोग हैं जो वास्तव में पापी हैं, जिन्हें राम‑कृष्ण‑हरि से कोई मतलब नहीं।[youtube]
- वे शराब पीते हैं, मांस‑मुरगा खाते हैं, दुनिया के लगभग सारे पाप करते हैं, फिर भी उन्हें जुकाम तक नहीं होता, कोई बड़ी परेशानी नहीं आती दिखती।[youtube]
- इसका कारण वे बताते हैं – इस समय उनका पुण्य का प्रारब्ध चल रहा है, इसीलिए वे भोग रहे हैं, और अभी उनका पाप‑फल कनेक्ट नहीं हुआ है।[youtube]
- जब उनके संचित पाप और सीमित पुण्य का कनेक्शन होगा, तब उन्हें भी समझ आ जाएगा कि जीवन क्या है और कर्मफल क्या होता है।[youtube]
6. धर्मात्मा होने पर भी कठिनाई क्यों?
- दूसरी ओर, महाराज जी कहते हैं कि आज यदि तुम धर्मात्मा हो, धर्म से चलते हो, नाम जप करते हो, तो तुम वर्तमान में नया पुण्य कमा रहे हो।[youtube]
- लेकिन साथ‑साथ जो पूर्व जन्मों या पूर्व के जीवन का प्रारब्ध है, वह तुम्हें परेशान कर रहा है, इसलिए परिस्थितियाँ कठोर दिखती हैं।[youtube]
- जब पूर्व का प्रारब्ध भोगकर समाप्त हो जाएगा, तब वर्तमान का और बचा हुआ पूर्व का पुण्य मिलकर तुम्हें बहुत ऊँचा उठाएगा – ऐसे चमक जाओगे, ऐसे प्रकाशित हो जाओगे।[youtube]
- इसलिए यदि तुम धर्म से चल रहे हो और गलत परिणाम मिल रहा है, तो समझो यह मेरे ही कर्मों का फल है, इसमें ईश्वर की कृपा गायब नहीं, बल्कि कर्म का हिसाब चल रहा है।[youtube]
7. कर्म रोकें तो दिशा बदलो, रुकना नहीं
- महाराज जी कहते हैं कि यदि एक तरफ कर्म हमें रोकता है, तो हमें दूसरे साइड में भागना चाहिए – जैसे नौकरी न चल रही हो तो व्यापार में लग जाना चाहिए।[youtube]
- प्रारब्ध प्रबल है, इसमें संदेह नहीं; पर वे साफ कहते हैं कि केवल यह कहकर बैठ जाना कि प्रारब्ध है, यह ठीक नहीं, पुरुषार्थ करते रहना आवश्यक है।[youtube]
- वे कहते हैं कि नाम जप तो करते हो, लेकिन यदि केवल नाम जप से ही प्रारब्ध बदल जाता, तो महाराज जी स्वयं तुम्हारे सामने न बैठकर अस्पताल में पड़े होते, क्योंकि वे भी रोज डायलिसिस कराते हैं।[youtube]
- वे अपने उदाहरण से सिखाते हैं कि बीमारी, कष्ट, प्रारब्ध सब होने के बावजूद, मन से मस्त रहना, भगवान पर भरोसा रखकर आगे बढ़ना ही सही दृष्टि है।[youtube]
8. संत का निजी अनुभव – भूख, कष्ट और श्रद्धा
- महाराज जी बताते हैं कि वे स्वयं कई‑कई दिन बिना भोजन के रहे हैं; ऐसी अवस्था में कि गंगाजी की बालू (रेत) तक खानी पड़ी, भूख से व्याकुल होकर।[youtube]
- वे बताते हैं कि रेत उठाकर उसमें से शंख के टुकड़े अलग करते, चार‑पाँच अंजली गंगाजल पीते, फिर भी कोई भोजन नहीं मिलता था।[youtube]
- लोग पूछते हैं: उस समय क्या यह नहीं सोचा कि भगवान देख रहे हैं, फिर भी इतना कठोर व्यवहार क्यों? वे उत्तर देते हैं – हम इस सोच में थे ही नहीं कि हमें भगवान देख रहे हैं।[youtube]
- वे कहते हैं कि हमारा ध्यान इस पर था कि हम भगवान को कैसे देखें, कहाँ मिलें, कैसे मिलें; हमें यह धुन थी कि उन्हें देखना है, न कि यह कि वे हमें देख रहे हैं या नहीं।[youtube]
9. परीक्षा का सिद्धांत – भगवान की कसौटी
- महाराज जी स्पष्ट कहते हैं कि भगवान कठोर नहीं हैं, परन्तु वे परीक्षा जरूर लेते हैं।[youtube]
- वे कहते हैं कि जब भगवान बाजरा खिला रहे हों, सादा‑कठोर जीवन दे रहे हों, तब भी यह समझना चाहिए कि वे देख रहे हैं कि कितना समर्पण है।[youtube]
- एक बार यदि उनकी परीक्षा में पास हो जाएँ, तो वे निहाल कर देते हैं; पर यह “एक बार” हर डिपार्टमेंट में होता है – खान‑पान, देखना, सुनना, परिवार, धन, सबमें।[youtube]
- कई सालों से परीक्षा चल रही हो, तब भी यह मान लेना चाहिए कि अभी भी भगवान की दृष्टि, कृपा और परीक्षण दोनों साथ‑साथ चल रहे हैं।[youtube]
10. परीक्षा के साथ‑साथ कृपा भी चलती है
- वे बताते हैं कि यदि आज तुम उनके सामने बैठकर सत्संग सुन पा रहे हो, नाम जप कर रहे हो, तो यह भी उनकी ही कृपा है।[youtube]
- यदि कृपा न होती तो तुम यहाँ तक पहुँच ही नहीं पाते; यह सोच कि केवल कष्ट ही कष्ट हैं, गलत है – सत्संग मिलना ही बहुत बड़ा अनुग्रह है।[youtube]
- वे श्रोता से कहते हैं – “आप चिंता न करो, नाम जप चलने दो; एक दिन देखना, सुदामा जी की तरह स्थिति बदल जाएगी।”[youtube]
- इस तरह वे भरोसा दिलाते हैं कि भगवान कृपा‑रहित नहीं हैं; जो परीक्षा दे रहे हैं, वही आगे चलकर निहाल भी करेंगे।[youtube]
11. सुदामा चरित्र से शिक्षा
- महाराज जी सुदामा जी का उदाहरण देते हैं – सुदामा को भी कई‑कई दिन भोजन नहीं मिलता था, अत्यंत गरीबी में जीवन चलता था।[youtube]
- अंत में परिणाम यह हुआ कि जैसी द्वारिकापुरी, वैसी ही सुदामापुरी; अर्थात जो भगवान के थे, भगवान ने उन्हें उसी के योग्य बना दिया।[youtube]
- वे कहते हैं – “आपके ही दण विश्वास में कमी है”; यदि विश्वास दृढ़ हो, तो स्थिति अवश्य बदलेगी, समय लग सकता है पर परिवर्तन निश्चित है।[youtube]
- अमीरी‑गरीबी को वे सिर्फ यहाँ की झंझट बताते हैं; असली तैयारी तो वहाँ (परलोक/भगवदधाम) के लिए हो रही है, जहाँ आप अच्छे आचरण और भक्ति से तैयार हो रहे हैं।[youtube]
12. अमीरी‑गरीबी केवल जीवन काटने के साधन
- महाराज जी कहते हैं कि अमीरी और गरीबी, दोनों केवल जीवन काटने के साधन हैं, ये स्वयं लक्ष्य नहीं हैं।[youtube]
- असली लक्ष्य वह है जिसके लिए जीवन मिला है – यानी भगवान का भजन, नाम जप, अच्छे आचरण और भक्ति।[youtube]
- यदि आज गरीबी है तो कल अमीरी हो सकती है; यह आवागमन चलता रहेगा, पर जिसने जीवन का उद्देश्य समझ लिया, वह बाहरी उतार‑चढ़ाव से बहुत अधिक प्रभावित नहीं होता।[youtube]
- इस दृष्टि से देखें तो जो लोग केवल बाहरी सफलता के कारण बड़े दिखते हैं, वे भीतर से उतने सफल नहीं जितना नाम जपने वाला, धर्म से चलने वाला व्यक्ति होता है।[youtube]
13. भगवान से जुड़े रहने में कठिनाई नहीं
- महाराज जी स्वीकार करते हैं कि जीवन कठिन है, परिस्थितियाँ कठिन हैं, प्रारब्ध कठोर है, पर कहते हैं – भगवान से जुड़े रहने में कोई कठिनाई नहीं।[youtube]
- यदि भगवान पर विश्वास हो जाए, तो प्राण देना भी कठिन नहीं लगता; इतना गहरा विश्वास हो जाए कि जो वह कर रहे हैं, वही अच्छा है।[youtube]
- वे कहते हैं – दुखी मत हो, मस्त रहो; मनुष्य जीवन मस्ती के लिए मिला है, पर यह भक्ति‑रूपी मस्ती होनी चाहिए, न कि पाप‑रूपी।[youtube]
- जो भगवान के नाम में, भरोसे में, शरण में मस्त है, वही वास्तव में सुखी और सफल है, चाहे बाहर से उसकी स्थिति साधारण ही क्यों न लगे।[youtube]
14. साधारण, कठोर जीवन की झलक
- महाराज जी अपने वृंदावन के दिनों का वर्णन करते हैं – नीचे कुशासन (साधारण आसन), सर्दी में ओढ़ने के लिए कंबल तक नहीं, केवल गेहूँ के बोरों का टाट ओढ़ते थे।[youtube]
- पेट भरने के लिए रोटी मांगकर लाते थे, सब्जी नहीं होती थी; एक ब्रजवासी सूखे आँवले की ठुठियाँ (कंडिया) प्लेट में रख जाते, वही चबा‑चबाकर खाते।[youtube]
- जब वह सूखी‑कठोर चीज खाने योग्य रही, तो वे खाते रहे; जब पैसा आया और पौष्टिक भोजन मिला, तब तक लीवर और किडनी कमजोर हो चुके थे।[youtube]
- वे यह सब बताकर समझाते हैं कि बड़ा लीला‑बिहारी (भगवान) है; उसने हर दृश्य दिखाया, पर इसी में विश्वास, आनंद और मस्ती बनाए रखना ही भक्ति की कसौटी है।[youtube]
15. असली धन – राम नाम
- महाराज जी घोषणा‑सी करते हैं – “एक दिन अभी इसी समय धनी हो आप, क्योंकि आपके पास जो नाम‑रूपी धन है, वह अविनाशी है।”[youtube]
- वे कबीर की वाणी का सार बताते हैं – “बच्चा कबीरा सब जग निर्धना, धनवंता नहीं कोई; धनवंता सोई जानिए, जिसके पास राम‑नाम धन हो।”[youtube]
- वे कहते हैं कि आज थोड़ी गरीबी है तो कल अमीरी भी आ जाएगी; गरीबी‑अमीरी तो आती‑जाती रहती है, पर नाम का धन एक बार मिल जाए, तो कभी नहीं छिनता।[youtube]
- इस मानक से देखें तो जो व्यक्ति पूजा‑पाठ नहीं करता, पर बाहरी रूप से सफल है, वह वास्तव में उतना धनवान नहीं जितना नाम‑जपी, भक्त और धर्मात्मा है।[youtube]
16. “पूजा नहीं, फिर भी सफल” – महाराज जी का उत्तर का सार
अब पूरे प्रवचन को प्रश्न के संदर्भ में जोड़ें – “कुछ लोग पूजा‑पाठ भी नहीं करते, फिर भी सफल क्यों हैं?”
- ये लोग पिछली या वर्तमान कुछ अच्छी प्रवृत्तियों, दान, सेवा, या अन्य पुण्य के कारण पुण्य‑प्रारब्ध भोग रहे हैं, भले ही आज पूजा न कर रहे हों।[youtube]
- वे अभी अपने जमा हुए पुण्य की कमाई खा रहे हैं; जब पाप का हिसाब जुड़ जाएगा, तब उन्हें भी परिणाम भुगतना पड़ेगा – यह देर‑सवेर का खेल है, इंकार का नहीं।[youtube]
- दूसरी ओर, जो आज पूजा‑पाठ, नाम‑जप कर रहा है और कष्ट झेल रहा है, वह पुराने कर्मों का बकाया चुका रहा है और साथ‑साथ नया पुण्य अर्जित कर रहा है।[youtube]
- जब उसका पुराना ऋण (प्रारब्ध) चुक जाएगा, तब वही व्यक्ति भीतर‑बाहर दोनों तरह से सफल और प्रकाशित होगा; उसकी सफलता स्थायी और मंगलकारी होगी।[youtube]
- इसलिए केवल बाहरी सफलता देखकर भ्रमित नहीं होना चाहिए; असली सफलता वह है जिसमें
- अच्छा आचरण हो,
- बेईमानी न हो,
- भगवान पर भरोसा हो,
- नाम‑जप, सत्संग और भक्ति का मार्ग चल रहा हो।[youtube]
17. व्यावहारिक संदेश – आप क्या करें?
महाराज जी के प्रवचन से निकलने वाला व्यावहारिक मार्ग:
- यदि नौकरी नहीं मिल रही, बार‑बार असफल हो रहे हैं, तो निराश न हों; रास्ता बदलें, छोटा व्यापार या मजदूरी से भी इज्जत की कमाई करें।[youtube]
- बेईमानी, गंदा आचरण, आलस्य और कायरता छोड़ें; जो भी काम मिले, उसे मेहनत, ईमानदारी और प्रसन्न मन से करें।[youtube]
- अपना कष्ट देखकर यह न समझें कि भगवान कठोर हैं; इसे परीक्षा और कर्म‑फल समझकर श्रद्धा रखें, नाम‑जप जारी रखें।[youtube]
- दूसरों की बाहरी सफलता से ईर्ष्या न करें; यह सोचें कि वे इस समय अपना पुण्य भोग रहे हैं और आप अपने बुरे कर्म चुकाकर आगे के लिए बड़ा पुण्य जमा कर रहे हैं।[youtube]
- अपने भीतर यह भाव दृढ़ कीजिए कि असली धन, असली सफलता, असली समृद्धि भगवान के नाम, विश्वास और अच्छे आचरण में है, न कि सिर्फ पैसे और पद में।[youtube]
- मस्त रहिए, हतोत्साहित नहीं; जीवन की कठिनाई के बीच भी भगवान से जुड़े रहना कठिन नहीं, बल्कि वही सबसे बड़ा सहारा है।[youtube]
इस प्रकार महाराज जी बताते हैं कि जो लोग पूजा‑पाठ नहीं करते हुए भी सफल दिखते हैं, वे केवल अपने पुण्य‑प्रारब्ध का भोग कर रहे हैं, जबकि नाम‑जप करने वाला, धर्म से चलने वाला व्यक्ति भले आज संघर्ष में हो, पर वास्तव में वही सच्चा धनी और भविष्य का वास्तविक रूप से सफल इंसान है।[youtube]







