श्री देवकीनन्दन ठाकुर जी महाराज की इस वाणी में मुख्य रूप से संस्कार, मर्यादा और संयमित जीवन का संदेश है। नीचे उनकी बातों को पॉइंट-वाइज आर्टिकल की तरह रखा गया है।
बड़ों के बराबर न बैठने की मर्यादा
- जो हमारे लिए पूज्य हों, उनके बराबर कभी नहीं बैठना चाहिए; यह बच्चों के लिए विशेष रूप से ध्यान रखने वाली बात है।
- आज के समय में बच्चे बेड और सोफे पर माता-पिता के बिल्कुल बराबर बैठ जाते हैं, जबकि शास्त्रीय और पारंपरिक दृष्टि से यह अनुचित माना गया है।
भरत जी से सीखने योग्य आदर
- भरत जी ने रामजी के वनवास के समय नंदीग्राम में पृथ्वी में गड्ढा खोदकर, उसमें आसन डालकर रहना स्वीकार किया।
- उनका भाव यह था कि जिस पृथ्वी पर उनके स्वामी श्री रामचन्द्र जी चलते और कष्ट सहते हैं, उसी पृथ्वी की सतह पर वे उनके बराबर कैसे बैठ सकते हैं।
आसन और बैठने की सही संस्कृति
- जहां तक संभव हो, अपने बड़ों की बराबरी वाले आसन पर नहीं बैठना चाहिए; यदि नीचे बैठने का अवसर न मिले तो कम से कम उनके सामने आदरपूर्वक बैठकर दर्शन करना चाहिए।
- आधुनिक “सोफा कल्चर” में पिता-पुत्र दोनों टाँगें फैलाकर, एक-दूसरे की ओर पैर करके बैठ जाते हैं, जिससे आपसी आदर और मर्यादा की भावना कमजोर होती है।
माता-पिता का भी आचरण मर्यादित हो
- सारी मर्यादा सिर्फ बच्चों के लिए नहीं है; बहुत सी मर्यादा मां-बाप के लिए भी है, विशेषकर जब घर में बच्चे जवान हो जाएं।
- जिस घर में जवान बेटी हो, वहां पिता और माता दोनों को अपने पहनावे, बैठने-बोलने और व्यवहार में विशेष सावधानी रखनी चाहिए, ताकि घर का वातावरण संस्कारवान रहे।
असंयमित व्यवहार और उम्र की मर्यादा
- महाराज जी कहते हैं कि 25वीं वैवाहिक वर्षगांठ पर भी मां-बाप का हाथों में हाथ डालकर युवाओं की तरह नाचना, उनकी उम्र और गरिमा के अनुरूप नहीं है; यह समय बच्चों के लिए होता है।
- माता-पिता की उम्र भजन, माला, और अपने परलोक को संवाँरने की है, न कि युवा-सरीखे दिखावे और वासनात्मक जीवन में उलझते रहने की।
जवान बच्चों वाले माता-पिता के लिए संदेश
- जिस घर में जवान बेटा और बेटी हों, उस घर में माता-पिता को कुछ हद तक बैरागी हो जाना चाहिए, अर्थात् अपनी व्यक्तिगत वासनात्मक इच्छाओं को नियंत्रित करना चाहिए।
- “हमारी फीलिंग नहीं है क्या?” जैसे तर्कों पर वे कहते हैं कि यदि चिता पर भी चढ़ते समय व्यक्ति की वासनात्मक भावना न मरे, तो वह उसके लिए ही हानिकारक है।
भावना: भगवान में या वासना में
- यदि भावना भगवान में हो, तो उस भावना को चिता तक भी मरने नहीं देना चाहिए; ईश्वर-भक्ति की भावना जीवन के अंतिम क्षण तक बने रहनी चाहिए।
- यदि भावना वासना-युक्त हो, तो उसे जितना जल्दी हो सके समाप्त कर, जीवन को भगवान की ओर मोड़ना ही व्यक्ति के वास्तविक हित में है।
आपके लिए व्यवहारिक सीख
- माता-पिता, गुरु और संत-महात्माओं के प्रति बैठने के ढंग, आँखों की भाषा और शरीर-भाषा में आदर दिखाना भी भक्ति और संस्कार का हिस्सा है।
- घर में आधुनिक सुविधाएँ हों, फिर भी दिल में विनम्रता, व्यवहार में मर्यादा और जीवन में संयम रखें, यही महाराज जी की बात का सार है।








